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इतिहास में रामानुजन से बड़ा और विशिष्ट गणितज्ञ नहीं पर इसका उपयोग अंग्रेजों ने किया

  



 
 
*रामानुजन और तीसरी आंख का रहस्य* 👁
 रामानुजन जेसा श्रेष्ठ गणितज्ञ को भी अंग्रेजी नराधम व्यवस्था ने उनकी प्रतिभा का उपयोग अपने हित के लिए किया और मात्र 36 साल में ही उन की जीवन लीला समाप्त हो गई क्योंकि बहुत सारे रिकार्ड इनकी नाम भी बन सकते थे और भारत का ज्ञान दुनिया में स्थापित हो सकता था पर दुर्भाग्य से गणितज्ञ रामानुजन जी की अल्प आयु में मौत हो गई जो संदेहास्पद स्थिति प्रतीत होती है और आज ही हजारों प्रतिभा ऐसे ही उनके काम आ रही हैं यह देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य की है आजादी की बाद भी यह सब चल रहा अब एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान     9336919081
अठारह सौ अट्ठासी में दक्षिण के चर छोटे से परिवार में एक व्यक्ति पैदा हुआ--फिर पीछे तो वह विश्वविख्यात हुआ, रामानुजन--बहुत गरीब ब्राह्मण के घर में, बहुत थोड़ी सी शिक्षा मिली। लेकिन उस छोटे से गांव में ही बिना किसी विशेष शिक्षा के रामानुजन की प्रतिभा गणित के साथ अनूठी थी। जो लोग गणित जानते हैं, उनका कहना है कि मनुष्य-जाति के इतिहास में रामानुजन से बड़ा और विशिष्ट गणितज्ञ नहीं हुआ। बहुत बड़े-बड़े गणितज्ञ हुए हैं, पर वे सब सुशिक्षित थे, उन्हें गणित का प्रशिक्षण मिला था, बड़े गणितज्ञों का साथ-सत्संग मिला था, वर्षों की उनकी तैयारी थी। रामानुजम की न कोई तैयारी थी, न कोई साथ मिला, न कोई शिक्षा मिली, मैट्रिक भी रामानुजम पास नहीं हुआ। और एक छोटे से दफ्तर में मुश्किल से क्लर्की का काम मिला।
लेकिन अचानक खबर लोगों में फैलने लगी कि उसकी गणित के संबंध में कुशलता अदभुत है। और किसी ने उसे सुझाव दिया कि कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में उस समय विश्व के बड़े से बड़े गणितज्ञों में एक हार्डी प्रोफेसर थे, उनको लिखो। उसने पत्र तो नहीं लिखा, ज्यामिति की डेढ़ सौ थ्योरम बना कर भेज दीं। हार्डी तो चकित रह गया। उतनी कम उम्र के व्यक्ति से उस तरह के ज्यामिति के सिद्धांतों का अनुमान भी नहीं लग सकता था। उसने तत्काल रामानुजन को यूरोप बुलाया। और जब रामानुजन कैम्ब्रिज पहुंचा तो हार्डी, जो कि बड़े से बड़ा गणितज्ञ था उस समय के विश्व का, वह अपने को बिल्कुल बच्चा समझने लगा रामानुजन के सामने।
रामानुजन की क्षमता ऐसी थी जिसका मस्तिष्क से संबंध नहीं मालूम पड़ता। अगर आपसे कोई गणित करने को कहा जाए तो समय लगेगा। बुद्धि ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकती जिसमें समय न लगे। बुद्धि सोचेगी, हल करेगी, समय व्यतीत होगा। लेकिन रामानुजम को समय ही नहीं लगता था। यहां आप तख्ते पर सवाल लिखेंगे, वहां रामानुजम उत्तर देना शुरू कर देगा। आप बोल भी न पाएंगे पूरा, और उत्तर आ जाएगा। बीच में समय का कोई व्यवधान न होगा।
बड़ी कठिनाई खड़ी हो गई थी। क्योंकि जिस सवाल को हल करने में बड़े से बड़े गणितज्ञ को छह घंटे लगेंगे ही, फिर भी जरूरी नहीं है कि सही हो, उत्तर सही है या नहीं इसे जांचने में फिर छह घंटे उसे गुजारने पड़ेंगे। रामानुजम को सवाल दिया गया और वह उत्तर देगा, जैसे सवाल में और उत्तर के बीच में कोई समय का क्षण भी व्यतीत नहीं होता है।
इससे एक बात तो सिद्ध हो गई थी कि रामानुजन बुद्धि के माध्यम से उत्तर नहीं दे रहा है। बुद्धि बहुत बड़ी थी भी नहीं उसके पास, मैट्रिक में वह फेल हुआ था, कोई बुद्धिमत्ता का और लक्षण भी न था। सामान्य जीवन में किसी चीज में भी कोई ऐसी बुद्धिमत्ता नहीं मालूम पड़ती थी। लेकिन बस गणित के संबंध में वह एकदम अतिमानवीय, मनुष्य से बहुत पार की घटना उसके जीवन में घटती थी।
जल्दी मर गया रामानुजन। उसे क्षय रोग हो गया, वह छत्तीस साल की उम्र में मर गया। जब वह बीमार होकर अस्पताल में पड़ा था तो हार्डी और दो-तीन गणितज्ञ मित्रों के साथ उसे देखने गया था। उसके दरवाजे पर ही हार्डी ने कार रोकी और भीतर गया। कार के पीछे का नंबर रामानुजम को दिखाई पड़ा। उसने हार्डी से कहा, आश्चर्यजनक है! आपकी कार का जो नंबर है, ऐसा कोई आंकड़ा ही नहीं है मनुष्य की गणित की व्यवस्था में। यह आंकड़ा बड़ा खूबी का है। उसने चार विशेषताएं उस आंकड़े की बताईं।
रामानुजन तो मर गया। हार्डी को छह महीने लगे वह पूरी विशेषता सिद्ध करने में। वे जो चार उसने विशेषताएं उस आंकड़े की बताई थीं--आकस्मिक, नजर पड़ गई थी--हार्डी को छह महीने लगे, तब भी वह तीन ही सिद्ध कर पाया, चौथी असिद्ध रह गई बात। हार्डी वसीयत छोड़ कर मरा कि मेरे मरने के बाद वह चौथी की खोज जारी रखी जाए, क्योंकि रामानुजन ने कहा है तो वह ठीक तो होगी ही।
हार्डी के मर जाने के बाईस साल बाद वह चौथी घटना सही सिद्ध हो पाई कि उसने ठीक कहा था, उस आंकड़े में यह खूबी है!
रामानुजन को जब भी यह गणित की स्थिति घटती थी, तब उसकी दोनों आंखों के बीच में कुछ होना शुरू हो जाता था। उसकी दोनों आंखों की पुतलियां ऊपर चढ़ जाती थीं। योग, जिस जगह रामानुजम की आंखें चढ़ जाती थीं, उसको तृतीय नेत्र कहता है, उसको तीसरी आंख कहता है। और अगर वह तीसरी आंख शुरू हो जाए--तीसरी आंख सिर्फ उपमा की दृष्टि से, सिर्फ इस खयाल से कि वहां से भी कुछ दिखाई पड़ना शुरू होता है--कोई दूसरा ही जगत शुरू हो जाता है। जैसे कि किसी आदमी के मकान में एक छोटा सा छेद हो, वह खुल जाए, और आकाश दिखाई पड़ने लगे। और जब तक वह छेद न खुला हो तो आकाश दिखाई न पड़ रहा हो। करीब-करीब हमारी दोनों आंखों के बीच में जो भ्रू-मध्य जगह है, वहां वह छेद है जहां से हम इस लोक के बाहर देखना शुरू कर देते हैं। एक बात तय थी कि जब भी रामानुजन को कुछ ऐसा होता था, तो उसकी दोनों पुतलियां चढ़ जाती थीं। हार्डी नहीं समझ पाया, पश्चिम के गणितज्ञ नहीं समझ पाए, और अभी गणितज्ञ आगे भी नहीं समझ पाएंगे।...
ये घटना मैंने आपसे कहीं हैं यह इंगित करने को कि आपकी दोनों आंखों के बीच में एक बिन्दु है जहां से यह संसार नीचे छूट जाता है और दूसरा संसार शुरू होता है—वह बिन्दु द्वार है। उसके इस पार, जिस जगत से हम परिचित हैं वह है, उसके उस पार एक अपरिचित और अलौकिक जगत है। इस अलौकिक जगत के प्रतीक की तरह सबसे पहले तिलक खोजा गया।
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गहरे पानी पैठ (अंतरंग चर्चा)
तिलक-टीके: तृतीय नेत्र की अभिव्यंजना

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