वामपंथी खुद को atheist कहते है।
और धर्म को अफीम कहते हैं ।
बुद्धिस्म् जैनिज़्म लोकायत आदि नास्तिक कहलाते हैं लेकिन ये सम्प्रदाय या धर्म के अंतर्गत आते हैं ।
तो प्रश्न ये है कि जो मर्क्सिसम और पश्चिम का Atheism है क्या हिन्दू धर्म का और उसके बौद्ध जैन लोकायत आदि धर्म दर्शनों की नास्तिकता एक ही वस्तु है ?
एक ही चीज है ?
या अनुवादों की समस्या है ?
कौटल्य ने मात्र 10 सूत्रों में सुखी राज्य के मूलमंत्र को वर्णित किया है।
लोग कहते आये है कि भारत धर्म प्रधान देश था- उसका अर्थ इतिहासकारों समाजशास्त्रियों और धार्मिक गरुओ ने पूजा पाठ और आत्म साक्षात्कार तक सीमित कर दिया।
जबकि धर्म का अर्थ था कर्तव्य - एकाउंटेबिलिटी जिसकी डिमांड सदैव किसी विभीषिका के समय होती है।
स्वतंत्र भारत अधिकार प्रधान व्यवस्था को अपनाने को क्यो बाध्य हुवा ये भी विश्लेषण की विषय वस्तु है।
दूसरी बात कौटल्य सदैव राज्य को और उसके समस्त नागरिकों के सुख वैभव और कर्तव्य की बात करते हैं। व्यक्तिगत सुख उसी सामूहिक सुख का एक अंग मात्र था।
तीसरी बात निम्नलिखित मंत्र यद्यपि समस्त नागरिक समुदाय के लिए है, लेकिन राजा और राज्य कर्मचारियो के लिए अनिवार्य आवश्यकता थी।
10 मंत्र :
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कौटल्य अर्थशास्त्र :
सुखस्य मूलं धर्मह
धर्मस्य मूलं अर्थः
अर्थस्य मूलं राज्यम
राज्यस्य मूलं इन्द्रिय जयः
इन्द्रिय जयस्य मूलं विनयः
विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा
वृद्धोपसेवाया विज्ञानम
विज्ञानेन आत्मनम सम्पादयेत
संपादित आत्मा जितात्मा भवति
जितात्मा सर्व अर्थ इह संयुज्येत ।।
भावार्थ :
1- सुखस्य मूलं धर्मह : राज्य और प्रजा के सुख का मूल धर्म ( नीति या मानवोचित कर्तव्य) होता है।
2- धर्मश्य मूलं अर्थः : धर्म अर्थात नीतिमत्ता को सुरक्षित रखने में राज्यश्री का महत्वपूर्ण स्थान स्थान है । राजकोष भरा पूरा होना चाहिए।
3- अर्थस्य मूलं राज्यम : राज्य की स्थिरता और राज कर्मचारियों के कर्तव्य ही अर्थ का मूल है। अर्थात राज्यश्री तभी तक सुरक्षित रहेगी जब तक राजा और उसके अधिकारी कर्तव्य च्युत न हों।
4- राज्यस्य मूलं इन्द्रीयजय: : राज्य के मूल में इनद्रिय निग्रह है। अर्थात राज्य के राज्याधिकारियों की स्वेच्छाचारिता, विषय लोलुपता और स्वार्थ परायणता राज्य के लिए विष का कार्य करती है। इंद्रियों पर विजय न पाने वाले राज्याधिकारी जनता को राज्य का शत्रु बना लेते है।
5- इंद्रियजयस्य मूलं विनयः : विनय ही इन्द्रिय जय का मुख्य साधन है। अहंकार का परित्याग कर विनयी लोगों की संगति में सत्य असत्य का ज्ञान प्राप्त करने का विवेक उतपन्न होता है। पात्र अपात्र परिचय, व्यवहार कुशलता, उचितज्ञता, न्याय अन्याय बोध, कार्य अकार्य विवेक ( आनवीक्षकी) आदि सब विनय के व्यवहारिक रूप है।
विनयी मनुष्यो की इंद्रियां सदैव उसके वश में रहती हैं।
6- विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा - ज्ञान वृद्धों की सेवा ही विनय का मूल है । मनुषय विद्या तपस्या और अनुभव से ही ज्ञान वृद्ध बनता है । इन ज्ञान वृद्धों की योग्य परिचर्या करते हुए जिज्ञासु बने रहना वृद्ध सेवा कहलाती है। विनय अर्थात नैतिकता, नम्रता, उचितज्ञता, शासन कुशलता आदि गुणों को ज्ञान वृद्धों से राजा सीख सकता है, और राजा से यह विनय जनता सीख सकती है।
7- वृद्ध सेवाया विज्ञानम - विजिज्ञासु मनुष्य वृद्धों की सेवा से विवेक का ज्ञान होता है, अर्थात कर्तव्य अकर्तव्य और व्यहार कुशलता का भान होता है -
"न सा सभा यत्र न संति वृद्धा। न ते वृद्धा ये न वदन्ति धर्मम।।
ना सौ धर्मो यत्र न सत्यं अस्ति। न तत सत्यं यत छलेन अभ्युपेतम ।।
अर्थात : वह सभा कोई सभा नही है जिसमे कोई अनुभवी ज्ञान वृद्ध न हो। वह् वृद्ध वृद्ध नही है जो धर्म की बात न करे।।
वह धर्म धर्म नही है जो सत्यता की बात न करे। और वह सत्य सत्य नही है जिसमे छल का मिश्रण होता है।
8- विज्ञानेन आत्मानम सम्पादयेत। राज्याधिकारी लोग विवेक से अपनी आत्मा को आलोकित कर अपने को योग्य शासक बनाएं।
9- संपादित आत्मा जितात्मा भवति - नीति और विवेक से युक्त मनुषयः को संपादित आत्मा कहा गया है। जितात्मा अर्थात सुपरिष्कृत मन और इंद्रियों वाला व्यक्ति। ऐसा व्यक्ति आत्म संयमित होता है।
10 -जितात्मा सर्व अर्थ इह संयुज्येत।। जितात्मा नीतिवान लोग समस्त संपत्तियों से सम्पन्न होकर रहें।।
नोट - देखिए भारत का शेयर कौटल्य के राजनीति के दर्शन से पिछले 2000 वर्ष की विश्व जीडीपी में 0 AD से तब तक लगभग एक तिहाई हिस्सेदारी बनी रही जब तक कि तुर्क मोघल डकैत नही आये थे।
0 AD से 1500 AD तक भारत का विश्व जीडीपी में 33 % हिस्सा।
अकबर महान के आने के बाद ये गिरकर 23% आ गया।
फिंर आये आज के भारत के दलितों के माई बाप्स - गोरे ईसाई डकैत। उनके आने पर भारत विश्व की 23 % जीडीपी का हिस्सेदार बचा था जो कि उनके जाते 1900 AD तक गिरकर मात्र 2% बची।
1809 - 13 में बिहार के गंगेटिक इलाके - भागलपुर , पटना-गया, पूर्णिया और और शादाबाद की हैमिलटन बुचनन के अध्ययन और आकलन के आंकड़ों से , और 1901 की जनगणना के आंकड़ो के अध्ययन से पता चलता है क़ि मात्र एक शताब्दी में #प्रोडक्शन_इंडस्ट्री पर आधारित लोगों की संख्या में 50 प्रतिशत की कमी आई ।
अर्थात 50 प्रतिशत लोग मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री से बाहर हो कर बेरोजगार हो गए ।
1809-13 के बीच कुल मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री पर आधारित जनसँख्या का, 62.3% जनसंख्या स्पिनिंग और वीविंग करती थी , जिसकी संख्या 1901 में घटकर मात्र 15.1% बची ।
(बाकी सब बेरोजगार हो गए )
- अमिय कुमार बागची पेज 61 -63 ।
और मात्र डेढ़ शताब्दी पूर्व जो भारत विश्व के 25% जीडीपी का हिस्सेदार था , (जबाकि इंग्लैंड और अमेरिका विश्व जीडीपी के मात्र 2% के मालिक थे ) 1900 आते आते भारत मात्र 2% जीडीपी का हिस्सेदार बचा ।
कौन थे इस जीडीपी के निर्माता , और क्या हुवा उनका डेढ़ शताब्दियों में ?
#पंडीजी तुम लोगों ने बहुत अत्याचार किया #ग्रन्थ लिख लिख कर ।
न तुम ग्रन्थ लिखते न ये लोग बेरोजगार होते ।
1875 के आस पास भारत की जनसँख्या लगभग 22 करोड़ थी ।
1875 -1900 के बीच करीब 2.5 से 5 करोड़ भारतीय अन्न न खरीद पाने के कारण भूख से मर गए ।
अन्न कौन खरीदता है - जो पैदा नही करता है - Industrialist या मैन्युफैक्चरिंग करने वाले ही अन्न खरीदते हैं -किसान नही ।
पंडीजी लोग तुम लोग बहुत अन्याय किये ।
पूजा पाठ करके सारा अनाज छुपाकर रख दिए - उन भाइयों को भूंख से मरने दिए ।
वो तो समझो इनके उद्धार के लिए अंग्रेज और अंग्रेजन माई आ गयी , नहीं तो तुम लोग तो होम करने के बाद उसी यज्ञ की बेदी के धुएं में , बटलोई में शीशा पिघलाकर #शूद्रों के #कान में #शीशा पेलते आये हो हजारों वर्ष से ।
इसीलिये कुछ वामपंथी मैकाले का जन्मदिन धूम धाम से मनाते हैं और #अंग्रेजन_मैया की पूजा करते हैं, उनके मन्दिर बनवाते हैं ।
नीचे कुछ फोटो हैं अमेरिका कनाडा आदि की ।
जहां इन गोरे ईसाइयों ने नीग्रो और मूलनिवासियों को उनके कल्याण हेतु गले में लोहे का सीकड़ पहनाया फिंर जीसस् की मोमबत्ती से उनके प्रज्ञा चक्षु का बपतिष्मा करवाया।
संकलन अजय कर्मयोगी
गणित के विभिन्न क्षेत्रों में भारत का योगदान प्राचीनकाल तथा मध्यकाल के भारतीय गणितज्ञों द्वारा गणित के क्षेत्र में किये गये कुछ प्रमुख योगदान नीचे दिये गये हैं- आंकगणित : दाशमिक प्रणाली (Decimal system), ऋण संख्याएँ (Negative numbers) (ब्रह्मगुप्त देखें), शून्य (हिन्दू अंक प्रणाली देखें), द्विक संख्या प्रणाली (Binary numeral system), स्थानीय मान पर आधारित संख्या आधुनिक संख्या निरूपण, फ्लोटिंग पॉइंट संख्याएँ (केरलीय गणित सम्प्रदाय देखें), संख्या सिद्धान्त , अनन्त (Infinity) (यजुर्वेद देखें), टांसफाइनाइट संख्याएँ (Transfinite numbers), अपरिमेय संख्याएँ (शुल्बसूत्र देखें) भूमिति अर्थात भूमि मापन का शास्त्र : वर्गमूल (see Bakhshali approximation), Cube roots (see Mahavira), Pythagorean triples (see Sulba Sutras; Baudhayana and Apastamba state the Pythagorean theorem without proof), Transformation (see Panini), Pascal's triangle (see Pingala) बीजगणित: Quadratic equations (see Sulba Sutras, Aryabhata, and Brahmagupta), Cubic equations and Quartic equations (b...
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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद