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Habib सैलून का जिहादी कैसे बना अरबपति और नाई कंगाल

  

 
*हम ठगी नहीं छोड़ सकते*

 कड़वी सच्चाई तो यही है कि *हम भारतीय तो एक-दूजे से ठगी मार कर काम चलाते हैं ।* हमें न व्यापार आता है न व्यवहार और न परिस्थितियों के अनुसार ढलना ही आता है ।   हम केवल नौकर बनना जानते हैं इस लाकडाउन में बड़ी-बड़ी सैलूनों में काम करने वाले नाई अपनी पुरानी जजमानी प्रथा के 10 -15 घरों में होम सर्विस को पकड़ लें  तो यह बड़े-बड़े सैलून और बड़ी बड़ी कंपनियों को धूल चटा सकते हैं क्योंकि इन कंपनियों को अपने ग्राहक अपनी दुकान तक पहूचानें के लिए  करोड़ों  अरबों खर्च  इन्हें मार्केटिंग एडवरटाइजिंग में करना पड़ता है और घर पर सर्विश देने के लिए  यह दोगुना तिगुना चार्ज करते हैं यह अगर चाहें तो कंपनियों की सप्लाई लाइन काटकर इन्हें सुखा सकते  कंपनियों की  बैंड बजा सकते हैं स्वयं समृद्ध होकर इस राष्ट्र और समाज को भी समृद्ध बनाते पर.....जबसे लॉक डाउन हुआ है तबसे नाई घर पर ठाले बैठे हैं । हमारा जिला ग्रीन जॉन में है, कल सोचा कि नाई को घर पर बुला कर हजामत करवा ली जाए । यदि आता तो मुहल्ले के ओर भी पांच-सात तैयार हो जाते पर पता किया तो जाना कि घर आकर काटने के 40 की बजाए 100 लेते हैं । मैंने सोचा कि बात सौ की नहीं है अपितु मानसिकता की है । यद्यपि घर पर जाकर कटिंग के सौ रुपये लॉक डाउन से पहले भी लेते थे पर तब तो दुकानों पर धड़ाधड़ काम चलता था .... यह तो एक उदाहरण था पर हमें रोजाना ऐसे कई उदाहरण देखने को मिल जाते हैं जिसमें व्यक्ति दर्शाता तो चालाकी है पर हकीकत में करता मूर्खता ही है । हम अक्सर सोचते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार बढ़ने चाहिए लेकिन हमारी मूर्खता की वजह से नहीं बढ़ पाते । आपको दूरदराज हाइवे पर या किसी गांव के पास बहुत से लोग सब्जी, फल या शहद बेचते हुए मिल जाएंगे पर जब आप इनसे लेने जाओगे तो बाजार से दुगुना रेट बोलेंगे । शहद आपको डाबर से महंगा बताएंगे । नाई की दुकान से बिना पूछे शेव करवा ली तो 20 की जगह 60 मांग लेते हैं । इसलिए गांव वाले भी इनसे सामान लेना पसंद नहीं करते और शहर से लाते हैं । तो यह हाल है गांव के रोजगार का जो ज्यादा चालाकी की वजह से नहीं चल पाता । --- एक उदाहरण ओर देखिए- हम तो ठगी के तरीके ढूंढते है और इसी पर गुजारा करते हैं । इसलिए *जब तक अपनी आदतें नहीं बदलते आत्मनिर्भर नहीं हो सकते|*

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