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कोरोना से चीन की कराह उन अबोल जीवो का क्रंदन

   चीन में कहावत है की चारपायों में टेबल कुर्सी को छोड़कर और उड़ने वाले में पतंग को छोड़कर बाकी सब खा जाते हैं पर आज ऐसा संकट है कि करोना वायरस आज सब को खा जा रहा है

पूरी दुनिया मे चीन जितना मूर्ख देआश ढूँढ़कर भी नही मिलेगा,,,,, चीन जैसे अतिमहत्वकांक्षी देश ने नेचर की अबतक की सबसे ज्यादा वाट लगाई है उतनी किसी विकसित देश ने नही लगाई,, ताजा उदाहरण कोरोना वायरस ने चीनी लोगो के जुबानी स्वाद की वाट लगा रखी है।। 1958 में भी चीन में ऐसी परिस्थिति थी, माओ झेडोंग नाम के चीनी pm ने उस वक़्त के गरीब चीन को औद्योगिकरण और अर्थव्यवस्था को ब्रिटेन और अमरीका के आगे ले जाने के लिए झेडोंग ने मूल कृषि प्रधान चीन को चार सूत्री कार्यक्रम में डाल दिया वो है four pests campaign... इस प्रोग्रम का विषय यह था कि इसमें चीन के 4 दुश्मन थे उसमे 1)गौरैया 2)चूहा 3)मक्खी 4)मच्छर चीन के तात्कालिक अर्थ वैज्ञानिक दृष्टिकोण से एक गौरैया एक साल में 4.5 kg अनाज खा जाती है, और उसका परिणाम चीन के अर्थव्यवस्था पर होता है ऐसा उनका मानना था, इस प्रोग्राम के तहत सारे चीनी लोग गौरैया को मारने के लिये पागल हो गए,, सिर्फ जनता ही नही सरकार भी आर्मी के साथ मैदान में उतरी,, गौरेया को मारने की अक्ल भी क्या खूब लगाई लोग उनके पीछे ढोल बजाते भागते फिर जबतक गौरेया थक जाती तो नीचे गिर जाती और मर जाती.. करोड़ो गौरैया(चिमनी) को मारा गया, उनके घोसलों के अंडे भी फोड़े गए,,, इस कत्लेआम की भीषणता इतनी थी कि 2 दिन में 2 लाख गौरैया को मौत के घाट उतारा गया,,, 1958 में शुरू हुए इस कैम्पेन ने 1.5 साल में गौरैया की जाति खत्म हो गयी, अब दूसरा अध्याय,,,,,,, इस प्रकार अनैसर्गिक तरीके से गौरैया को खत्म करने से नेचर का संतुलन बिगड़ गया,,,, अब बारी इंसानों की थी,,,, गौरेया को इस प्रकार खत्म करने से फसल के कीटो की संख्या गजब तरीके से बढ़ने लगी,,, कि उनको खत्म करने के लिए चीन को पेस्टिसाइड्स की मात्रा टनों उत्पादन बढ़ाना पड़ा इतना पेस्टिसाइड्स मारने से कीट के बजाय फसल ही खराब होने लगी.. उसमे भी नकटोड़ा (graashopper टिड्डियों) की संख्या ऐसी बढ़ी कि उनका झुण्ड जब फसलों पर बैठता था तो ऐसा लगता था कि यहाँ कुछ लगाया नहीं है पूरा मैदान साफ,, कहते हैं निसर्ग बड़ा कठोर होता है जब अपने पर आता है,, 1960 में आखिर में झेडोंग को पता लग गया कि उसने जिस पक्षी को मारा वो किसान का मित्र ही था,, अंत मे रशिया से गौरैया मँगानी पड़ी,, लेकिन 1958 से 1960 इन 3 सालो में 3 करोड़ लोग भुखमरी से मर गए,, फसल ही नही बची अनाज ही नही मिला। इस 3 साल का वर्णन यांग जिशेंग इस पत्रकार ने tombstone नाम की किताब में दर्ज किया है जो अबतक बेन है,, लेकिन चीन ने उस इतिहास से कुछ नही सीखा और आजतक वो नेचर से खिलवाड़ कर रहा है , कोरोना उसीका उदाहरण है आज कोई चीन से सम्बन्ध नही रखना चाहता व्यापार बन्द है लोग जा नही सकते,, 115 प्रकार के प्राणी खानेवाले चीन को अब निसर्ग ऐसा नचा रहा है कि पूछो मत,, ये बुद्ध का देश नही कम्युनिस्ट देश है जो अंधों की तरह आगे बढ़ रहा है उसका परिणाम भी झेलेगा,, भारत जैसे शांतिप्रिय और सुसंस्कृत देश को सीमा विवाद में फँसाये रखा,, उसकी नदियों में सीमेंट का पानी मिलाया... क्या क्या नही किया भारत को हराने के लिए,, आज कोरोना उसका बदला तो नही ले रहा! नेचर की लाठी दिखती नही... भारत तो आज भी वसुधैव कुटुम्बकम की बात करता है लेकिन पड़ोसी देश इसे नही समझते!!

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