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 धर्मो रक्षति रक्षित:
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ईसा सन १६९९ की वैशाखी का दिन !

आनंदपुर साहब में हजारों लाखों लोगों की भीड़ जुटी थी। प्रतीक्षा थी गुरू गोविन्द राय की जिनके गुरुगद्दी पर आसीन हुये लगभग तेरह वर्ष की लंबी अवधि बीत चुकी थी।

गोविन्द राय उधर स्नान-ध्यान करने गये थे और इधर भीड़ उनके पूर्व हुये गुरुओं के बलिदान के स्मरण में लगी थी। गोविंद राय जब बाहर आये तो उनके चेहरे के दैदीप्यमान तेज़ में अब तक हुये सभी नौ गुरुओं की झलक नज़र आ रही थी तो जिह्वा पर उस रोज़ साक्षात माँ शारदा विराजमान थीं। 

भीड़ से मुखातिब होकर गोविंद राय ने तक़रीर शुरू की। भीड़ मंत्रमुग्ध उन्हें सुनती जा रही थी तभी गुरूजी ने अपनी तलवार खींची और ललकार उठे -
है कोई धर्मी जो प्यासी चंडी को अपना शीश देकर धर्म की रक्षा को तैयार है?

संगत से एक भी आवाज़ नहीं उठी। गुरूजी ने फिर से वही पुकार लगाई- है कोई....?

सभा में उसी तरह ख़ामोशी पसरी रही बल्कि कई तो निकल कर जाने लगे कि न जाने आज इन्हें क्या हुआ। इतने में तीसरी बार जब ललकारा तो सभा ने देखा कि एक आदमी हाथ जोड़े शीश नवाये खड़ा कह रहा है- गुरुदेव! चंडी को मेरे रक्त से नहला दो।

गुरू आगे बढ़कर उसे लिवा लाये और अपने साथ अंदर तम्बू में ले गये। अंदर से तलवार से कटने की आवाज़ आई और तम्बू के किनारों से रुधिर बाहर बहने लगा। 

सारी सभा सन्न कि गुरूजी को आज क्या हो गया।

सभा कुछ और सोच पाती इससे पहले ही गुरू की फिर से वही हुंकार उठी- 

"है कोई धर्मी जो प्यासी चंडी को अपना शीश देकर धर्म की रक्षा को तैयार है?"

अबकी बार एक और शख्स शीश नवाए आगे बढ़ा।  गुरूजी उसे भी तम्बू में ले गये और वही प्रक्रिया दुहराई और रक्त से सनी अपनी तलवार लिये बाहर निकले और फिर से वही पुकार-

है कोई धर्मी जो प्यासी चंडी को अपना शीश देकर धर्म की रक्षा को तैयार है.?

फिर से एक वीर आगे बढ़ा और इस तरह एक-एक कर पाँच सूरमा रणचंडी की प्यास बुझाने के लिये अपने शीश देने आगे बढ़े। 

पर जब अंतिम बार गुरूजी बाहर आये तो अकेले नहीं थे बल्कि उनके साथ अलौकिक तेज़ से लिप्त वो पाँच लोग नये पवित्र वस्त्रों में खड़े थे जो गुरू के आवाहन पर अपना शीश देने आगे आये थे।

गुरूजी ने इन पाँचों को  पञ्च-प्यारा कहकर पुकारा और वहीं से अमृत छकाने की क्रिया शुरू हुई। गुरु ने शिष्यों को अमृत छकाया, फिर सादगी और वीरता का उपदेश दिया और पञ्च ककार की व्यवस्था देकर खालसा की नींव रखी और उनसे कहा- जो तुम सिख हमारे आरज/ देवो शीश धर्म के कारज। 

जो पाँच वीर अपना शीश देने आगे आये थे उनमें पहले थे - लाहौर के दयाराम खत्री, दूसरे थे- हस्तिनापुर का जाट धर्मदास, तीसरे थे द्वारिका का मुहकम चंद धोबी, चौथे थे- धीवर जाति का हिम्मत और पांचवे थे नाई जाति का साहब चंद।

यानि जब सारा भारत मुगलिया अत्याचारों से संतप्त था और भारत को इस अनाचार से मुक्ति दिलाने गुरू गोविन्द सिंह जी बलिदानियों का आवाहन कर रहे थे तब लाखों लोगों की भीड़ में से जो लोग शीश कटाने आगे आये उनमें हिन्दू धर्म के अंदर के उन जातियों के लोग सबसे पहले थे जिनमें से कई को कथित उच्च वर्णों में नहीं गिना जाता।

गुरु गोविंद सिंह जी महाराज की ये कथा मैनें अपने बचपन में पढ़ी थी और तबसे से मेरे अंदर ये भाव जीवित हो गया था कि मेरे धर्म के रक्षण की जिम्मेदारी किसी एक या दो जाति वालों की बपौती नहीं रही है बल्कि इसे बचाये रखने में सभी का शीश कटा है और सभी का खून बहा है।

इस एक कथा ने मुझे जाति के आधार पर किसी को हीन समझना, किसी के लिए कटुता पालना आदि दुर्गुणों से हमेशा के लिए मुक्त कर दिया था

  जिस सनातन धर्म की रक्षा के लिए इस पंथ का निर्माण किया गया था वह पंथ ही अपना पथ से भटकाव की ओर अग्रसर है

Comments

ajay karmyogi said…
बंदे मातरम

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