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भारत का आर्थिक चिंतन और मनु
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मनुष्य अथवा समाज की नितांत आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए तथा भौतिक उत्कर्ष के लिए अर्थ की आवश्यकता होती है। यद्यपि भारत एक धर्मप्रधान देश रहा है किन्तु भारतीय चिंतन में धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, के संतुलन पर बल दिया जाता रहा है। अर्थ को बाकी तीनों का मूल माना जाता रहा है। अर्थ की महत्ता को परिभाषित करते हुए आचार्य कौटिल्य ने कहा है कि धर्म, अर्थ और काम इन तीनों में अर्थ प्रधान है। धर्म और काम अर्थ पर निर्भर हैं।
भारतीय सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यता है। अनेक पाश्चात्य विद्वान भी भारतीय सभ्यता को सिन्धु घाटी सभ्यता की सीमाओं से परे विश्व की सर्वाधिक प्राचीन सभ्यता मानने लगे हैं। स्वाभाविक है कि यहाँ आर्थिक चिंतन की भी दीर्घ और सुदृढ़ परंपरा रही है। समस्त भारतीय वांग्मय यथा वेदों, धर्मशास्त्रों, स्मृतियों विशेषकर मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति नारद, बृहस्पति आदि, शुक्रनीति, कौटिल्य अर्थशास्त्रा, कामान्दक नीतिसार में भरपूर अर्थचिंतन है।
भारत के आर्थिक इतिहास का अध्ययन करने पर हम पाते हैं कि प्राचीन काल से लेकर 19वीं शताब्दी के प्रारंभ तक भारत काफी समृद्ध देश रहा है तथा भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था रही है। आधुनिक विश्व के सर्वाधिक समृद्ध राष्ट्रों के संगठन ओइसीडी से सम्बंधित प्रसिद्ध आर्थिक इतिहासकार अंगस मेडिसिन के अनुसार प्रथम शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक बीच के कुछ वर्षों को छोड़कर भारत विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा है। एक और प्रसिद्ध विद्वान पॉल ए कैनेडी के अनुसार वर्ष 1750 में संपूर्ण विश्व के उत्पादन का लगभग 25 प्रतिशत केवल भारत में होता था। परन्तु आश्चर्य की बात यह है कि आर्थिक विचारों के इतिहास पर लिखने वाले रॉबिन्सन, फिनले, गॉलब्रेथ जैसे विद्वानों ने आर्थिक विचारों के इतिहास में भारतीय अर्थचिंतन के बारे कुछ भी नहीं लिखा है।
विडम्बना यह है कि पाश्चात्य आर्थिक चिंतकों ने पिछले 250 वर्षों से लेकर 50 या 40 वर्ष पूर्व तक जो आर्थिक सिद्धांत दिए थे और जिन आर्थिक सिद्धांतों को विश्व के सभी विश्वविद्यालयों में प्रमुखता से पढ़ाया जाता है, वे आज की आर्थिक समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रहे हैं अर्थात अपनी प्रासंगिकता खो रहे हैं। इन सिद्धांतों की वैज्ञानिकता तथा व्यावहारिकता पर बड़ा प्रश्नचिन्ह लग रहा है। दूसरी ओर भारत जो हजारों वर्षों से विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रही है तो स्वाभाविक ही है की भारतीय आर्थिक चिंतन और आर्थिक सिद्धांत भी उतने ही वैज्ञानिक तथा व्यवहारिक रहे हैं और उसकी प्रासंगिकता दिनोंदिन बढ़ रही है। भारत के प्राचीन आर्थिक विचारकों में मनु का नाम सर्वाेपरि है। स्मृतियों में मनुस्मृति सबसे प्राचीन मानी जाती है। मनु ने विस्तार से अर्थनीति पर लिखा है। यहाँ हम उनके प्रमुख आर्थिक सिद्धांतों की चर्चा करेंगे।
अर्थ संग्रह – मनु ने जीवन में अर्थ का अत्यधिक महत्व तो दिया है। लेकिन गलत उपायों और मार्गों द्वारा अर्थ उपार्जन को अत्यधिक बुरा बताया है। मनु के अनुसार अपने जीवन यापन के लिए अनिन्दनीय कार्यों से अर्थ संचय करना चाहिए।
अर्थ प्राप्ति उसका संरक्षण और वितरण- मनु के अनुसार राष्ट्र को आर्थिक संकट से बचने के लिए शासक को अप्राप्य अर्थ को प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिए, प्राप्त अर्थ की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए, रक्षित अर्थ की वृद्धि के लिए यत्न करना चाहिए और अधिक वृद्धि से प्राप्त हुए अर्थ को सत्पात्रों में वितरित कर देना चाहिए। प्राचीन भारतीय अर्थशास्त्रिायों ने अर्थ के विकास के लिए “वार्ता” को महत्वपूर्ण बताया है। वार्ता को ही अर्थ प्राप्ति का मूल कारण माना है। कृषि, पशुपालन, व्यापार और ब्याज (बैंकिंग) को वार्ता कहा जाता है।
वार्ता और वैश्य वर्ग- सामाजिक व्यवस्था को निर्बाध रूप से संचालित करने के लिए मनु ने वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था दी थी तथा वर्णों के कर्तव्यों का वर्णन करते हुए वैश्यों को वार्ता से सम्बंधित सभी कार्यों को करने का अधिकार दिया था। मनु ने यह व्यवस्था दी है कि वैश्य वाणिज्य, कुसीद, कृषि एवं पशुपालन करे।
राष्ट्रीय आय का मुख्य साधन- मनु ने कर को राष्ट्रीय आय का मुख्य साधन बताया है। मनु के अनुसार शासक को योग्य व्यक्तियों के द्वारा वार्षिक कर एकत्रा करके, जो कर लेने में प्रजा के साथ न्याय का व्यवहार करें और शासक स्वयं प्रजा से पिता के समान व्यवहार करे।
मनु के अनुसार अच्छा शासक उसी को माना जाता है जो प्रजा की आर्थिक स्थिति को देखकर उन पर कर लगाता है। मनु कहते हैं, मोह के वशीभूत होकर जो राजा अपने राष्ट्र से अर्थ ग्रहण करता है वह शीघ्र ही राज्य से और बंधू-बांधवों समेत नष्ट हो जाता है।
यद्यपि राष्ट्र की आय का मुख्य श्रोत कर है तथापि करसंग्रह में अल्पकरसंग्रह की अवधारणा की अवहेलना नहीं करनी चाहिए। मनु के अनुसार जिस प्रकार जोंक थोड़ा-थोड़ा खून, बछड़ा दूध, भौंरा शहद एकत्रा करता है, उसी प्रकार शासक को भी राष्ट्र से कर एकत्रा करना चाहिए।
मनु के अनुसार पशु और सोने की आय का पचासवां भाग और अनाज का उसकी गुणवत्ता के अनुसार छठा, आँठवा, अथवा बारहवां भाग लेना चाहिए कर के रूप में लेना चाहिए। अगले दो श्लोकों में मनु ने कर लेने के लिए और भी विधान दिए हैं। उसके अनुसार वृक्ष, मांस, मधु, घी, गंधवाली वस्तुएं, औषधि, रस (नमक आदि) पुष्प, मूल, फल, पत्रा, शाक, तृण, चमड़ा बांस, मिटटी से बने बर्तन और पत्थर से निर्मित सभी वस्तुओं का छठा भाग ही कर के रूप में लेना चाहिए।
व्यापारियों पर कर निर्धारण- अच्छे शासक को तीन बातों का ध्यान रखते हुए ही व्यापारियों पर कर लगाना चाहिए। 1. प्रजा की क्रय शक्ति को देखते हुए 2. शासन के कोष का विचार करते हुए और 3. व्यापारी वर्ग के लाभांश का विचार करते हुए ही कर लगाना चाहिए।
मनु के अनुसार राजा को ऐसा कार्य करना चाहिए जिससे राजा राज्य की रक्षा के लिए और व्यापारी व्यापार के लाभ के फल को प्राप्त कर सके। इस प्रकार देखकर ही राजा को राष्ट्र पर कर लगाना चाहिए। राजा को व्यापारियों के आय-व्यय को ध्यान में रखते हुए उनसे कर लेना चाहिए। वे कहते हैं, क्रय-विक्रय, मार्ग व्यय, भोजन पर होने वाले व्यय को, मार्ग रक्षा का व्यय और सम्यक प्रकार के हानि-लाभ को ध्यान में रखकर कर लगाना चाहिए।
कर में छूट का विधान- राज्य की आय वृद्धि के लिए कर लेना नितांत आवश्यक है किन्तु मनु की व्यवस्था में निम्नलिखित लोगों को कर से मुक्त रखा गया था क्योंकि इनका उद्देश्य जीवन की रक्षा करने के लिए ही धन एकत्रा करना था।
1. अँधा 2. मूर्ख 3. लंगड़ा 4. सत्तर वर्ष का वृद्ध और 5. अन्न से श्रोत्रिय लोगों का उपकार करने वाले लोग
वेतन तथा वेतनमान- मनु ने कर्मचारियों के वेतन का प्रतिमान, समय और स्थान उनके कार्य की उत्कृष्टता को ध्यान में रखते हुए निश्चित किया था। मनु कहते हैं, राजा राज्य के काम में नियुक्त स्त्राी, सेवक आदि के लिए उनके कार्य के अनुसार प्रतिदिन का वेतन और स्थान निश्चित करे। खराब काम करने वाले को एक पण प्रतिदिन तथा छह महीने में वस्त्रा और प्रतिमास एक द्रोण अनाज देना चाहिए उत्कृष्ट कार्य करने वाले को छह पण प्रतिदिन वेतन, वस्त्रा और अनाज उसी प्रकार देना चाहिए। (एक तोले ताम्बे की मुद्रा पण कही जाती है तथा एक द्रोण अनाज आज के 38-40 किलोग्राम के बराबर है)
मूल्य वृद्धि नियंत्राण तथा विक्रय कर- मनु के अनुसार “सभी प्रकार के पण्य द्रव्यों का विवेचन कर सकने वाले कुशल लोग जल-स्थल मार्ग आदि के शुल्कशालाओं में पण्यवस्तु के अनुसार वस्तुओं का मूल्य निर्धारण करें, उस निर्धारित मूल्य का बीसवां भाग राजा शुल्क के रूप में प्राप्त करे।”
मूल्य निर्धारण- मनु के अनुसार “राजा वस्तु के आयात-निर्यात को, विक्रय के लिए लगने वाले समय को, मूल्य की वृद्धि को और उसके विक्रय में होने वाले व्यय को भी विचार में रखकर सभी वस्तुओं का समुचित मूल्य में क्रय-विक्रय करावे।”
इस प्रकार मनु ने अर्थव्यवस्था से संबंधित लगभग सभी बिंदुओं पर विचार प्रस्तुत किया है। उनके विधान कहीं अधिक उदात्त और प्रासंगिक हैं। संकलन अजय कर्मयोगी

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