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हमारे प्राचीन काल में हमारे ऋषि, मुनि, संतोंने एक समरस हिन्दू समाज का निर्माण किया, जिसके कारण हम विश्व के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बने, यह तो पिछले लेखों में हमने देखा. लेकिन इस सामर्थ्य के पीछे एक और बड़ा कारण था – हमारी राष्ट्रनिष्ठा. हमारे ऋषि मुनियों ने, हमारे पुरखों को राष्ट्रनिष्ठा से जोड़ा. उनके मन में राष्ट्र भक्ति का भाव जागृत किया.

अथर्ववेद के ‘पृथ्वी सूक्त’ में इस देश भक्ति का उत्कट आविष्कार हैं.

यत् ते भूमे विखनामि क्षिप्रं तदपि रोह तु I
मा ते मर्म विमृग्वरि मा ते हृदयर्पिपम II

अर्थ – हे भूमि, मैं जिस जगह पर (आपने फायदे के लिए, खनिज लेने के लिए) खोद रहा हूँ, वह शीघ्र ही प्राण तत्व से भर जाए. मेरे द्वारा, आपके मन पर आघात न हो. आप के ह्रदय को मेरे द्वारा चोट न पहुचे.

दूसरा मन्त्र हैं –

इन्द्रो यां चक्र आत्मने 'नमित्रां शचीपतिः ।
सा नो भूमिर् वि सृजतां माता पुत्राय मे पयः ॥१०॥

अर्थ – शचीपति इंद्र द्वारा जिस भूमि को शत्रु रहित किया हैं, यह भूमाता मेरे लिए वैसे ही दूध (पय:) की धारा प्रवाहित करे, जैसे मां अपने बेटे के लिए करती है.

हमारे पुरखों ने हमारे देश को हमेशा ही ‘भूमाता’ कहा हैं. सर्वव्यापी पृथ्वी में वह जहां रहता हैं, उस मातृभूमि के बारे में ही सारे उल्लेख हैं.

एक और मंत्र हैं –

अहमस्मि सहमान उत्तरो नाम भूम्याम्‌।
अभीषाडस्मि विश्वाषाडाशामाशां विषासहिः।।

अर्थ – मैं अपनी मातृभूमि के लिए सभी प्रकार के कष्ट भोगने हेतु तैयार हूँ. मैं सभी दिशाओं में विजय प्राप्त करूँगा.

अथर्ववेद में आगे लिखा हैं –

यद् वदामि मधुमत तद वदामि यदिक्षे तद वनन्ति मा ।
त्विषीमानस्मि जूतिमानवान्यान हन्मि दो धत : ।।

अर्थ – मेरे मातृभूमि के हित में ही मैं बोलुंगा. जो कुछ करना हैं, वह मेरे मातृभूमि के वैभव के लिए ही करूंगा.

इस सूक्त के अंतिम भाग में कहा गया हैं –

दीर्घं न आयु: प्रतिबुध्यमाना
वयं तुभ्यं बलिहृत: स्याम II ६२ II

अर्थ – हमें दीर्घायुष्य मिले. हमें अच्छा ज्ञान मिले और मातृभूमि के लिए आवश्यकता पड़ने पर हम बलिदान भी करे.

ऋग्वेद में भी मातृभूमि की सेवा की बारे में लिखा हैं –

उप सर्प मातरं भूमिमेताम् । (ऋग्वेद : १०/१८/१०)

अर्थ - हे मनुष्य, तू इस मातृभूमि की सेवा कर

यजुर्वेद में उल्लेख हैं –

नमो मात्रे पृथिव्यै नमो मात्रे पृथिव्यै । (यजुर्वेद : ९/२२)
अर्थ - मातृभूमि को हमारा नमस्कार हो, हमारा बार-बार नमस्कार हो.  

वयं राष्ट्रे जागृताम पुरोहिताः ।  (यजुर्वेद : ९/२३)

अर्थ - हम राष्ट्र के बुद्धिमान् नागरिक अपने राष्ट्र में सर्वहितकारी होकर अपनी सद्प्रवृत्तियों के द्वारा निरन्तर आलस्य छोड़कर जागरूक रहें ।

हमारे पुराणों में भी राष्ट्र भावना जागृत करने वाले अनेक उल्लेख हैं. ‘विष्णु पुराण’ में लिखा हैं, “सहस्त्र जन्मों के बाद भारतवर्ष में जन्म मिलता हैं और यहाँ जन्म लिये लोगों को ही स्वर्ग और मोक्ष प्राप्त होते हैं. ‘ब्रह्मपुराण’ का २७ वा अध्याय तो ‘भारतवर्षानुकीर्तनम’ इसी नाम से प्रसिध्द हैं. इसमें लिखा हैं, “जो नरश्रेष्ठ भारत में जन्म लेते हैं, वह धन्य हैं. देवों को भी इस भूमि में जन्म लेने की तीव्र इच्छा रहती हैं. इस भारतभूमि के सभी गुणों का वर्णन करना किसे संभव हैं..?” ‘वायु पुराण’ में भी इसी आशय का वर्णन आता हैं.

स्वामी विवेकानंद जी के जीवन में इसी पर आधारित एक घटना हैं –

स्वामीजी सबसे पहले परिव्राजक के रूप में १८९० में जब अल्मोड़ा गए थे, तो स्वाभाविकतः न शिष्य परिवार था, और न ही कोई संपर्क. अल्मोड़ा के खजांची बाजार में श्री बद्रिसहाय टूलधारी जी रहा करते थे. अल्मोड़ा के प्रतिष्ठित व्यक्ति थे और लाला बद्रि सहा नामसे जाने जाते थे. टूलधारी यह उन्होंने लिया हुआ उपनाम था. उन्होंने स्वामीजी को अपने यहाँ आमंत्रित किया. स्वामीजी उस प्रवास में और बादमे १८९७ के मध्य में जब पुनः अल्मोड़ा गए थे, तब भी बद्रिसहाय जी के ही यहाँ रहे. वहा स्वामीजी से चर्चा होती थी. चर्चा में स्वामीजी ने बताया की ‘ईश्वर की मूर्ति को हमें कुछ समय के लिए बाजू में रखना चाहिए. समाज पुरुष यही हमारा ईश्वर हैं. समाज की और राष्ट्र की पूजा याने साक्षात् ईश्वर की पूजा..!’ स्वाभाविकतः बद्रिसहाय जी ने पूछा, ‘यह बात किसी वेद, उपनिषद या पुराण में लिखी हैं? और यदी नहीं, तो हम आपकी बात क्यूँ माने?’

स्वामीजी ने तुरंत वेद और उपनिषदोंमे उल्लेखित ऋचाओं के सन्दर्भ दिए. बद्रिसहाय जी को आश्चर्य हुआ. उन्होंने सारे सन्दर्भ स्वामी जी से उतार लिए और बाद में वाराणसी जाकर उन ग्रन्थोंका अध्ययन किया. स्वामीजी ने बताएं हुए विचार उन ग्रंथों में मिल रहे थे. बादमे स्वामीजी की मृत्यु के पश्चात बद्रिसहाय जी ने इस विषय पर एक पुस्तक लिखी, जिसे लोकमान्य तिलक ने आशीर्वचन दिए. १९२१ में यह पुस्तक, ‘दैशिकशास्त्र’ नाम से प्रकाशित हुई. स्व. दीनदयाल उपाध्याय इस पुस्तक से बड़े प्रभावित थे. उन्होंने राष्ट्र के ‘चिती’ और ‘विराट’ की संकल्पनाएं इस पुस्तक से ही ली थी.

प्राचीन काल में इन वेदों से, पुराणों से प्रेरित होकर, अपने मातृभूमि के लिये हिन्दू समाज एकजूट होकर लड़ा. उसने सिकंदर, शक, कुषाण, हूण जैसे अनेक विदेशी आक्रमण लौटा दीये. उन्हें परास्त किया. भारत को दुनिया का प्रथम क्रमांक का देश बनाया....

किन्तु आज..?

इतनी गौरवशाली परंपरा के संवाहक हम, कितनी राष्ट्रनिष्ठा हम में हैं..? जिनके पास ऐसी गौरवशाली परंपरा नहीं थी, वह जापान, अमेरिका, जर्मनी जैसे देश हमेशा उनकी मातृभूमि के बारे में पहले सोचते हैं. उनके सारे निर्णय देशहित को ध्यान में रख कर होते हैं.

किसी जमाने में, एक हजार वर्ष पूर्व, ‘राष्ट्र सर्वप्रथम’ इस मंत्र को लेकर हम दुनिया के सबसे शक्तिशाली और वैभवशाली देश बने थे. आज उसे फिर अपनाना पड़ेगा..!
 अजय कर्मयोगी गुरूकुलम्

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