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आज देश में विज्ञान और गणित के माध्यम से ईसाई मजहबी मान्यताएं स्थापित की जा रही हैं

    ये उस वक्त की तस्वीर है जब शिक्षा के नाम पर मुर्गीखानो की तरह गली-गली गॉव-गॉव में डिग्री कॉलेज, कॉन्वेंट स्कूल नहीं खुले थे, बच्चे अपने बडो से उन्हीं के सानिध्य मे रह कर व्यवाहरिक शिक्षा लेते थे। गुरूकुलो मे गुरूजन राष्ट्र एवं चरित्र निर्माण का पाठ पढाते थे। कोई बेरोजगार नहीं था कोई बोर नहीं होता था। पेड़ को काटना या पर्यावरण को हानि पहुचाना पाप माना जाता था। कौनसा बोद्धिक विकास करती है ये आज शिक्षा जो हम अपने बच्चो नौजवानो को दे रहे हैं। आज की शिक्षा हमे मानसिक रूप से गुलाम व बडे से बडा नौकर बनने की होड़ में शामिल करती है जैसे कि Graduate : सभी प्रकार के सरकारी नौकर। M.B.A.     : बहूराष्ट्रीय कंपनीयो (M.N.C) के नौकर। M.B.B.S.  : विदेशी उपचार एवं जहर को फैलाने वाले नौकर। L.L.B.       : झूठ को सच एवं सच को झूठ साबित करने का प्रशिक्षण। B.Sc, M.Sc (Agriculture) : यूरीया, पेस्टीसाइड फंगिसाइड आदि जहर के समर्थक। B.Tech : बहुराष्ट्रीय कंपनियो के लिए सस्ते मजदूर। B.Ed : मकाले की शिक्षा व्यवस्था को आगे बढाने वाले आदि आदि.. आ...

लोटा गिलास में देसी विदेशी संस्कृति का प्रभाव

आज हर चीज में हम अपने मूल सनातन संस्कृति से कटकर अज्ञानता बस विदेशी संस्कृति के गुलाम हो गए हैं इस कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका आज की शिक्षा व्यवस्था ने किया है   भेष भूसा भाषा भोजन और यहां तक कि पानी पीने के तरीके में भी हम अज्ञानता बश विदेशी या गुलामी के ब्यवहार करके अपने को श्रेष्ठ मानते हैं जानिए लोटा और गिलास के पानी में अंतर भारत में हजारों साल की पानी पीने की जो सभ्यता है वो गिलास नही है, ये गिलास जो है विदेशी है. गिलास भारत का नही है. गिलास यूरोप से आया. और यूरोप में पुर्तगाल से आया था. ये पुर्तगाली जबसे भारत देश में घुसे थे तब से गिलास में हम फंस गये. गिलास अपना नही है. अपना लौटा है. और लौटा कभी भी एकरेखीय नही होता. तो वागभट्ट जी कहते हैं कि जो बर्तन एकरेखीय हैं उनका त्याग कीजिये. वो काम के नही हैं. इसलिए गिलास का पानी पीना अच्छा नही माना जाता. लौटे का पानी पीना अच्छा माना जाता है. इस पोस्ट में हम गिलास और लोटा के पानी पर चर्चा करेंगे और दोनों में अंतर बताएँगे. फर्क सीधा सा ये है कि आपको तो सबको पता ही है कि पानी को जहाँ धारण किया जाए, उसमे वैसे ही गुण उसमें आते है. पानी के...

दही बनाने का सात्विक उपाय

  आज करोना से डरी हुई प्रजा की दुर्दशा और एक अदृश्य जीव के साथ संघर्ष की स्थिति में एक साधारण अदृश्य जीव के साथ कैसे सहयोग से, विना संघर्ष जीवन जीते है । यदि लोगों से पूछें कि इस देह में कितनी जीव होते हैं तो शायद हर व्यक्ति एक जीव को ही मानता है पर इस देह के साथ असंख्य जीव विद्यमान रहते हैं इन जीवो के साथ जीवन जीने की कला या ज्ञान अपनी सनातन परंपरा का हिस्सा था जो इस आधुनिक शिक्षा के माध्यम से नष्ट कर दिया गया है उसी सात्विक जीवन को परिभाषित करता यह लेख जो सात्विक दही बनाने का उपाय बताता है इसका समाधान परंपरागत ज्ञान  से संभव है यह परंपरा तभी बचेगी जब आप इस राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान की समझ व समझदारी होगी संयोजक बनने हेतू 7984113987  whatsup 9336919081 जो आप पत्थर के बर्तन देख रहे हैं यह पत्थर पूरे विश्व में सिर्फ जैसलमेर के पास हाबुर गांव में पाया जाता है इसलिए इसे हाबुर का पत्थर कहते हैं इस पत्थर की सबसे खासियत यह है कि इस पत्थर में यदि आप गर्म दूध डाल देंगे तब यह कुछ समय बाद दही जम जाएगा दरअसल राजस्थान के प्राचीन काल में जैन लोग दूध में जामन डालकर दही नहीं बनात...

चर्च धर्म गुरु के माध्यम से विश्व का सबसे बड़ा सामुहिक #आत्महत्या का आयोजन अमेरिका में 18 नवंबर 1978 कोहुआ था

      भारत की ज्ञान और प्रतिभा का डंका पूरी दुनिया में बज रहा था उस समय यूरोप के कई देशों में लोग जंगली जीवन जीने को अभीसप्त थे  १७वीं सदी में इंगलिस्तान की हालत बयान करते हुए , इतिहासकार ड्रेपर लिखता है , "इंग्लैड में किसानों की झोपड़िया नरसलो और झाड़ियों की बनी होती थी , जिनके ऊपर गारा पोत दिया जाता था , घर मे घास जला कर आग पैदा की जाती थी , धुंए के निकलने के लिए कोई जगह नही होती थी । सड़को पर डाकू फिरते थे और नदियों पर समुद्री लुटेरे , कपड़ो और बिस्तर में जुए । आम तौर पर लोगो का आहार होता था , मटर , उड़द , जड़े और वृक्षो की छाले । जिस तरह का समान एक अंग्रेज के घर मे होता था , उससे मालूम होता है कि गांव के पास नदी के किनारे जो ऊदबिलाव मेहनत से मांद बनाकर रहता था उसकी और एक अंग्रेज किसान के हालात में कोई भेद न था 'शहर के लोगो की हालत भी गांव के लोगो से बहोत अलग न थी । शहरियो का बिछोना भूसे का एक थैला होता था  और तकिये की जगह लड़की का एक गोला ।' न कोई कारखाना था , और न ही कोई वैद्य , सफाई का भी कही कोई प्रबन्ध न था । अंग्रेज जाती अशिक्षित थी , कि पार्लियामेंट और ह...

विदेशी लुटेरों द्वारा सोने को लूटने का क्रम आज भी जारी है इस बैंकिंगव्यवस्था के षड्यंत्र द्वारा

      पर हस्ते गतम् विद्या , पर हस्ते गतम् धनम् कार्य काले समुत्पन्ने, नातद्  विद्या , ना तद् धनम् ।। दूसरे के पास में विद्या और दूसरे के हाथ में रखा गया धन यह आपकी कार्य के समय या आवश्यकता के समय न वह विद्या आपकी है ना वह धन भी आपका है यह बात हजारों साल से हमारे शास्त्रों में लिखी गई है पर हमें इसका कोई ज्ञान नहीं हो पाया और हमने अपने सारे धन उठाकर के बैंकों में डालकर निश्चिंत हो गए कागज की करेंसी ही लेता तो कोई बात नहीं अब तो घर में रखे हुए सारे गहने जेवरात और सोने चांदी सब वहीं पर कलेक्शन हो रहा है और तो और अब इन्हीं सोने देने पर आपको कर्जदार भी बनाया जा रहा है भारत मे सेविंग और FD पर ब्याज इसलिये दिया जाता है तांकि लोगों को सोने में निवेश से रोका जा सके । अगर सोने में निवेश होता रहेगा तो भारत पुनः सोने की चिड़िया बन जायेगा । सोने में निवेश होने से डॉलर की कीमत सोने के विरुद्ध गिरती जाती है । जैसे जैसे सोने की मांग बढ़ती जाएगी डॉलर का अवमूल्यन होता जाएगा । हो सकता है कि एक समय डॉलर के स्थान पर सोना अंतरराष्ट्रीय व्यापार की मुद्रा बन जाये । इसलिये स्वर्ण में निवेश रो...

विश्व को गुलाम बनाने में बैंकिंग प्रणाली की चाल

आखिर कौन है बैंकिंग फैमिली Banking Family रौथ्सचिल्ड परिवार और भारत से रौथस्चाइल्ड का क्या सम्बन्ध है...? 👉कैसे रोथ्स्चाइल्ड ने बैंकों के माध्यम से भारत पर कब्जा किया???? आइए जानते हैं। भारत इतना समृद्ध देश था कि उसे `सोने की चिडिया ‘🐦 कहा जाता था । भारत की इस शोहरत ने पर्यटकों और लुटेरों  दोनों को आकर्षित किया । यह बात तब की है जब ईस्ट इन्डिया कम्पनी को भारत के साथ व्यापार करने का अधिकार प्राप्त नहीं हुआ था । उसके बाद क्या हुआ यह नीचे पढिये👇: ------ सन् १६०० – ईस्ट इन्डिया कम्पनी को भारत के साथ व्यापार करने की स्वीकृति मिली। १६०८ – इस दौरान कम्पनी के जहाज सूरत की बन्दरगाह पर आने लगे जिसे व्यापारके लिये आगमन और प्रस्थान क्षेत्र नियुक्त किया गया। अगले दो सालों में ईस्ट इन्डिया कम्पनी ने दक्षिण भारत में बंगाल की खाड़ी के कोरोमन्डल तट पर मछिलीपटनम नामक नगर में अपना पहला कारखाना खोला । १७५० – ईस्ट इन्डिया कम्पनी ने अपने २ लाख सैनिकों की निजी सेना के वित्त प्रबन्ध के लिये बंगाल और बिहार में अफीम की खेती शुरु कर दी । बंगाल में इसके कारण खाद्य फसलों की जो बर्बादी हुई उससे अकाल की स्थि...

क्या पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी है

  हम सनातन हिन्दूधर्मी बचपन से ही एक बात सुनते आ रहे हैं कि.... हमारी पृथ्वी शेषनाग के फन पर टिकी हुई है... और, जब वो (शेषनाग) थोड़ा सा हिलते है... तो, भूकंप आता है..! और, अंग्रेजी स्कूलों के पढ़े... तथा, हर चीज को वैज्ञानिक नजरिये से देखने वाले आज के बच्चे.... हमारे धर्मग्रंथ की इस बात को हँसी में उड़ा देते हैं... एवं, वामपंथियों और मलेच्छों के प्रभाव में आकर इसका मजाक उड़ाते हैं..! दरअसल, हमारी "पृथ्वी और शेषनाग वाली बात" महाभारत में इस प्रकार उल्लेखित है... "अधॊ महीं गच्छ भुजंगमॊत्तम; सवयं तवैषा विवरं परदास्यति। इमां धरां धारयता तवया हि मे; महत परियं शेषकृतं भविष्यति।।" (महाभारत आदिपर्व के आस्तिक उपपर्व के 36 वें अध्याय का श्लोक ) इसमें ही वर्णन मिलता है कि... शेषनाग को ब्रह्मा जी धरती को धारण करने को कहते हैं... और, क्रमशः आगे के श्लोक में शेषनाग जी आदेश के पालन हेतु पृथ्वी को अपने फन पर धारण कर लेते हैं. लेकिन इसमे लिखा है कि... शेषनाग को.... हमारी पृथ्वी को... धरती के "भीतर से" धारण करना है... न कि, खुद को बाहर वायुमंडल में स्थित करके पृथ्वी को अपने ऊपर ...