5 अप्रैल 1952 को चाउ एन लाई ने नेहरू जी के (भारत सरकार के) राजदूत कवलम माधव पणिक्कर से कहा कि हमें तिब्बत में अपनी सेनाओं के लिये खाद्यान की आपूर्ति के लिये भारत पर निर्भर रहना पड़ेगा। हम चाहते हैं कि भारत इस मामले में हमारी सहायता करे। पणिक्कर ने नेहरू को यह बताया और यह कहा कि हमें यह आपूर्ति कर देनी चाहिये। नेहरू ने कहा कि ‘हम जानते हैं कि यह खाद्यान आपूर्ति तिब्बत में मौजूद चीनी सेना के लिये की जा रही है जिन्हें सभी दृष्टियों से इसकी अत्यन्त आवश्यकता है।’
तिब्बतियों का खून पी रहे माओ के सैनिकों के लिए चावल भेजा
मई 1952 में नेहरू जी ने चीनी सेनाओं के लिये 500 टन अनाज भेजने का आदेश दे दिया। साथ ही यह जोड़ दिया कि हमारे बीच तिब्बत में हमारे हितों के विषय में सामान्य समझौते की आवश्यकता है। 21 जून 1952 को एक पत्रकार सम्मेलन में जब यह पूछा गया कि क्या भारत से चीनी सेनाओं के लिये तिब्बत में चावल भेजा जा रहा है? नेहरू जी ने उत्तर दिया - ‘बहुत अधिक मात्रा में नहीं। सकरे रास्ते और सघन पर्वतीय क्षेत्र होने के कारण खाद्यान की आपूर्ति अधिक मात्रा में नहीं की जा सकती। उनकी सेना को खाद्यान की अत्यधिक आवश्यकता है। हम उन्हें तिब्बत से बाहर देखना चाहते हैं और इसके लिये बातचीत का वातावरण बने रहना आवश्यक है तथा चीनी सैनिकों का तिब्बत में जीवित रहने में हमारी सहायता इस दृष्टि से ठीक ही है।’ (नेहरू के विशिष्ट कार्य, खंड 18, पृष्ठ 473 से 477)। कोई भारतीय राजनेता कितना कुटिल और क्रूर हो सकता है तथा कैसी छलपूर्ण भाषा बोल सकता है, इसका यह अतिविशिष्ट उदाहरण है।
जब माननीय सांसदों ने चीन में पणिक्कर की भूमिका को लेकर कुछ शंकायें व्यक्त कीं तो नेहरू जी ने उनकी जगह एन राघवन को राजदूत बनाकर भेजा। एन राघवन ने रिपोर्ट दी कि चीन का हमारे प्रति व्यवहार बहुत उदासीनता का है। नेहरू जी ने उत्तर दिया - ‘वे हमारे मित्रवत् हैं।’ फिर एक अन्य पत्र में उन्होंने लिखा - ‘चीन से हमें प्राप्त एक लाख टन चावल की आपूर्ति हम तिब्बत में उनकी सेनाओं के लिये करेंगे। इसके लिये हम परिवहन व्यवस्था बना रहे हैं। अन्य सामग्रियों के विषय में भी हम विचार विमर्श करेंगे।’ शीघ्र ही नेहरू जी ने चीनी सेना के लिये खाद्यान के साथ ही पेट्रोल और डीजल भी तिब्बत भेजे। (नेहरू के विशिष्ट कार्य, खंड 23, पृष्ठ 354-355 एवं खंड 26 पृष्ठ 483)
उधर 28 फरवरी 1952 को जब पत्रकार सम्मेलन में नेहरू जी से पूछा गया कि क्या तिब्बत में चीनी सेनाओं ने कोई घुसपैठ की है, तो उनका उत्तर था - ‘मुझे इस संबंध में कोई जानकारी नहीं है।’ (नेहरू के विशिष्ट कार्य, खंड 17, पृष्ठ 510)। इन अनेक विसंगतियों की ओर श्री अरूण शौरी ने अपनी पुस्तक ‘भारत-चीन सम्बन्ध’ (प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली) में भी 15 वर्षों पूर्व भलीभांति प्रकाश डाला था। परंतु उसके बाद भी भारतीय राजनीति में इस विषय पर कोई उत्तेजना ही नहीं है।
12 अप्रैल 1952 को नेहरूजी ने इस बात पर चिंता व्यक्त की कि चाउ एन लाई तिब्बत में हमारे हितों की समस्या पर विचार-विमर्श नहीं करना चाहते। एक अन्य पत्राचार में उन्होंने कहा कि ‘भारत तिब्बत में किसी भी प्रकार का विशेषाधिकार नहीं चाहता क्योंकि ये विशेषाधिकार ब्रिटिश साम्राज्यवाद द्वारा लादी गई संधियों का परिणाम है।’ अंग्रेजों से उनकी पावर का ट्रांसफर अपने समूह के लिए करवाने में सफल श्री नेहरू यहाँ उनकी संधियांे को नहीं मानने योग्य बता रहे हैं, जबकि वे स्वयं ऐसी ही एक संधि से सत्ता में हैं।
चीनियों को चावल और सैन्य-सहायता
तिब्बतियांे को कुछ भी नहीं
सितंबर 1952 में भारत के शिष्ट मंडल ने ल्हासा से रिपोर्ट भेजी कि चीनी आक्रमण के विरूद्ध देशभक्त तिब्बतियों के कई दल सक्रिय हैं और उनमें से एक दल हमारे संपर्क में है जो हमसे केवल दो लाख रूपये की सहायता मांग रहा है। इस पर नेहरू जी भड़क गये और उन्होंने कहा कि यह व्यवहारिक रूप से भी गलत होगा और नैतिक रूप से भी। हमें तिब्बत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये और तिब्बतियों को अपनी समस्यायें चीनियों के साथ बैठकर सुलझाना चाहिये।
उल्लेखनीय है कि तिब्बत में नृशंस नरसंहार कर रही माओ की सेनाओं को चावल तथा अन्य खाद्यान और पेट्रोल तथा डीजल की आपूर्ति को जवाहरलाल नेहरू जो कुछ ही दिनों पहले तक स्वतंत्र तिब्बत राष्ट्र के प्रतिनिधि मंडल को दिल्ली में एशियाई सम्मेलन में बुला चुके थे, आंतरिक मामलों में कोई हस्तक्षेप नहीं मानते। परंतु देशभक्त तिब्बतियों के एक समूह को माओ की सेनाओं द्वारा किये जा रहे नरसंहार को रोकने के लिये केवल दो लाख रूपये की सहायता को तिब्बत के मामले में आंतरिक हस्तक्षेप मानते हैं। डॉ. राममनोहर लोहिया ने ऐसे ही कार्यों के कारण जवाहरलाल नेहरू के ऐसे कामों को देशद्रोह की संज्ञा दी थी।
जब अनेक लोगों ने यह बात उठाई कि तिब्बत पर तो भारत का अधिराजत्व रहा है तो नेहरू ने उसे साम्राज्यवादी अंग्रेजों का काम बताया और कहा कि अब साम्राज्यवाद समाप्त हो चुका है। ऐसा लगता है कि श्री नेहरू मानते थे कि साम्राज्यवाद ने उन्हें अनुग्रहपूर्वक पावर का ट्रांसफर कर अपनी सर्वोत्तम भूमिका सम्पन्न कर ली है। अब उसका कार्य भारत में समाप्त है और आगे मुझे अपना काम करना है। इसलिये अब वे अपनी सुविधानुसार कभी ब्रिटिश साम्राज्वाद के अधीन ‘कॉमनवेल्थ’ में उत्साह से शामिल हेाते हैं, कभी कथित ब्रिटिश साम्राज्वाद का विरोध करते हुये सोवियत साम्राज्यवाद और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साम्राज्यवाद की सेवा में जुट जाते हैं। ब्रिटिश साम्राज्यवाद से जो लाभ मिलना था, मिल गया। अब क्यों न कम्युनिस्ट साम्राज्यवाद की सेवा की जाय।
जुलाई 1956 में कोलंबो में राष्ट्र मंडल के प्रधानमंत्रियों का सम्मेलन हुआ। जिसमें कई देशों ने राष्ट्रवादी चीनी सरकार का मुद्दा उठाया। इस पर श्री नेहरू ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन का प्रतिनिधित्व राष्ट्रवादी सरकार द्वारा किया जाना तथ्यतः एक निरर्थक बात है और ऐसा होना संपूर्ण एशिया के लिये शर्म की बात है। (नेहरू के विशिष्ट कार्य खंड 25, पृष्ठ 423 से 426)
चाओ-माओ की सेवा में नेहरूजी
फिर उन्होंने राघवन के द्वारा चाउ एन लाई को यह संदेश भी भिजवाया कि हमने कोलंबो सम्मेलन में चीन की स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है।
कुछ समय बात उन्होंने पुनः राघवन से कहा कि आप चाउ एन लाई के समक्ष यह स्पष्ट कर दें कि हम हर जगह उनकी स्थिति को स्पष्ट कर रहे हैं और संयुक्त राष्ट्र संघ में चीन का प्रतिनिधित्व उनकी सरकार को मिले, यह प्रयास कर रहे हैं। हमने स्वयं अमेरिकी राजदूत से इस विषय में बात की है और कृष्णमेनन को लंदन, ओटावा और वाशिंगटन (इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका) में ऐसा ही करने का निर्देश दिया है। (नेहरू के विशिष्ट कार्य, खंड 28, पृष्ठ 167-168)
गाली खाई और सेवा की
माओ और चाऊ ने नेहरू की मनोदशा को अच्छी तरह समझ लिया था। समय-समय पर वे उन्हें ‘ब्रिटिश अमेरिकी साम्राज्यवाद का चापलूस अनुयायी’ कहते रहते थे और आरोप लगाते थे कि नेहरू तिब्बत को अपने साथ मिलाने के लिये इंग्लैंड और अमेरिका की शह पर षड़यंत्र रच रहे हैं। इसके उत्तर में नेहरू ने केवल यह कहा कि ‘कम्युनिस्ट व्यवहार के उद्देश्यों और कारणों को समझना सदैव आसान नहीं होता’। (नेहरू के विशिष्ट कार्य, खंड 21, पृष्ठ 446-448)
समाचार एजेंसी रायटर ने चीनी सेनाओं के विमानों की तिब्बत में बढ़ती संख्या पर समाचार छापा। भारत में नागरिकों और नेताओं ने अगस्त 1953 में इसके विरोध में ‘तिब्बत दिवस’ मनाने का निर्णय लिया। इस पर जवाहरलाल नेहरू ने अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव को लिखा कि ‘कोई भी कांग्रेसी न तो तिब्बत दिवस के समारोह में भाग लेगा और ना ही ऐसी किसी समिति में शामिल होगा’।
श्रीमान चाओ को पत्र
अगले महीने नेहरू जी ने चाउ एन लाई को एक संदेश भेजा कि ‘हमारे देशों के बीच अंतर्राष्ट्रीय मामलों में सहयोग का बढ़ना गहरे संतोष का विषय है। श्रीमान ने हमारे राजदूत से कहा था कि तिब्बत के विषय में भारत और चीन के दृष्टिकोण में कोई अंतर नहीं है। भारत सरकार लंबित मामलों के संदर्भ में एक निर्णायक समझौते पर पहुंचना चाहती है।’ (नेहरू के विशिष्ट कार्य, खंड 23, पृष्ठ 485-486) अपने नागरिकांे के विरूद्ध और माओ के पक्ष में यह निर्णय था।
इस बीच नेहरू ने वक्तव्य देने शुरू कर दिये कि ‘हम तिब्बत में सामंतवादी तत्वों का समर्थन नहीं कर सकते और हम तिब्बत में कोई हस्तक्षेप भी नहीं कर सकते।’ उन्होंने इस बीच निर्णय लिया कि सीमा पर पुलिस चौकियां बनाई जानी चाहिये। इस पर सेना के एक प्रमुख अधिकारी ने कहा कि वस्तुतः उन चौकियों की सुरक्षा सेना द्वारा की जानी चाहिये अन्यथा उन्हें एक ही आक्रमण में नष्ट कर दिया जायेगा परंतु नेहरू पुलिस चौकी बनाने के निर्णय पर टिके रहे।
चाउ एन लाई और माओ ने नेहरू के स्वभाव और मन को अच्छी तरह समझ लिया था और वे उनसे अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर अक्सर चर्चायें करने लगे। चाउ एन लाई भारत आये और कई दिनों तक नेहरू के साथ वार्तायें और साथ-साथ घूमने का क्रम चलता रहा। दोनों ने एक साथ आगरा में फिल्म ‘झांसी की रानी’ देखी। श्री अरूण शौरी ने अपनी पुस्तक ‘भारत चीन संबंध’ मंे पृष्ठ 94 पर बताया है कि चाउ ने फिल्म झांसी की रानी की प्रशंसा की। इस पर नेहरू ने तत्काल उत्तर दिया कि इसकी पटकथा उतनी अच्छी नहीं है। इस पर चाउ ने कहा कि यह विदेशियों के विरूद्ध प्रतिरोध का चित्रण करती है। नेहरू ने तपाक से कहा ‘यह तो सामन्तवादी तत्वों का प्रतिरोध था’। चाउ ने कहा - ‘प्रतिरोध तो सदैव उच्च वर्ग से ही आरंभ होता है।’ नेहरू चुप रहे।
नेहरू को नापकर चाउ लौट गया
इसी प्रकार श्री शौरी बताते हैं कि नेहरू चाउ से लगातार अमेरिकी संविधान और अमेरिकी शासन की निंदा करते रहे। जिससे चाउ प्रसन्न होते रहे। इसके बाद नेहरू ने चाऊ को यह सलाह भी दी कि आज जो संवाददाता सम्मेलन होने वाला है उसमें संवाददाताओं के जिन प्रश्नों के उत्तर देने से बचना हो उनमें आप विनोदपूर्ण हो जायें। नेहरू को नापकर चाउ लौट गये और उन्होंने और भी अधिक उत्साह के साथ तिब्बत में नरसंहार तेज कर दिया।
27 जून 1954 को नेहरू ने बर्मा के यू.नू. को लिखा - ‘चाउ एन लाई एक स्पष्ट वक्ता और निष्कपट व्यक्ति हैं। मैंने उन्हें बर्मा के बारे में जानकारियां भी दीं।’ अरूण शौरी लिखते हैं कि तथ्य यह है कि चाउ ने नेहरू से बर्मा के बारे में कुछ भी नहीं पूछा था। एक जुलाई 1954 को उन्होंने भारत के मुख्यमंत्रियों को बीस पृष्ठों का एक पत्र भेजा और उसमें लिखा कि चाउ एन लाई की भारत यात्रा एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है। उल्लेखनीय है कि यह वह समय है जब चीन अक्साई चिन में सड़क बनाने की तैयारियां कर रहा था। उन्होंने यह भी लिखा कि ‘चीन तिब्बत पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर लेगा। तिब्बत में हमारी स्थिति साम्राज्यवादी ब्रिटेन का स्मृति चिन्ह थी। हमें ब्रिटेन की विस्तारवादी नीतियों से प्राप्त विशेषाधिकारों को बनाये रखना उचित नहीं होगा। व्यावहारिक राजनीति यह है कि तिब्बत में चीनी शक्ति का प्रतिरोध कर पाना संभव नहीं है। वैसे भी हम एक सामंतवादी व्यवस्था का समर्थन नहीं कर सकते। चीनियों ने सड़कों और विमान क्षेत्रांे का निर्माण तिब्बत में शुरू कर दिया है और यह स्वाभाविक ही है। हमें तिब्बत में चल रही इन सैन्य गतिविधियों की जानकारी मिलती रहती है। यद्यपि हम उन जानकारियों पर पूरा भरोसा नहीं कर सकते। तिब्बत एक दुर्गम क्षेत्र है और वहां की जलवायु चीन से भिन्न है अतः वहां बाहर से बड़ी संख्या में आकर रहना सहज बात नहीं है।’ मुख्यमंत्रियों को लिखे इस पत्र के अंश श्री अरूण शौरी ने अपनी उक्त पुस्तक में दिये हैं।
सभी प्रमाणों से प्रमाणित है कि नेहरूजी को कम्युनिज्म प्रिय था, मुख्यतः स्तालिन की छत्रछाया और स्नेह प्रिय था और पूरी तरह से योजना बनाकर तिब्बत में माओ-चाओ की सेना की सेवा एवं सहयोग करते हुए तिब्बत में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की प्रभुता नेहरू ने स्थापित कराई। भारत की बात करना राजनैतिक बाध्यता है ऐसे नेताओं के लिए। पर उनके चित्त में न भारत होता, न हिन्दू धर्म, न समाज। चित्त में अपने साथियों के बीच महत्व व यश पाने की अभिलाषा और आकांक्षा ही होती है। साथ ही, निरंकुश सत्ता का सुख भोगने की लालसा। इसी लालसा में नेहरूजी ने चीन को भारत का पड़ोसी बना डाला।
-प्रो. कुसुमलता केडिया



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