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सभी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का सदस्य बनने के बावजूद इस इलाके को अर्थात् चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साम्राज्य को संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रत्येक संस्था से बाहर ही रखता है ताकि वहां मनमानी की जा सके।

 





स्तालिन को इंग्लैंड - अमेरिका ने उपहार में दिया सोवियत संघ

मध्यएशिया के बड़े इलाके को लेकर ब्रिटेन डरता है कि कहीं रूस उस इलाके में कब्जा करके अफगानिस्तान तक न पहुंच जाये और रूस डरता है कि ब्रिटेन हमारी सीमाओं तक न आ जाये। अंततः द्वितीय महायुद्ध की समाप्ति के बाद मित्र शक्तियों को दी गई सहायता के बदले में स्तालिन इस इलाके के एक बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर सोवियत संघ नामक साम्राज्य रचता है और शेष हिस्से में ब्रिटेन तथा अमेरिका के संयुक्त प्रभाव से छोटे-छोटे राज्य खड़े कर दिये जाते हैं।
इस प्रकार सोवियत संघ वस्तुतः इंग्लैंड और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा स्तालिन को दिया गया उपहार है या सौदा है जो जर्मनी के विरूद्ध युद्ध में साथ आने के कारण दिया गया।
स्तालिन का चेला माओ
इसी द्वितीय महायुद्ध के बाद स्तालिन एक झटके में झांगहुआ पर माओजे दुंग का कब्जा कराता है और फिर चीन का महिमामंडन कर अपने साथ एक बड़े राष्ट्र को खड़ा प्रचारित करता है तथा साथ ही इस पूरे इलाके में मनमानी की छूट के लिये स्वयं सभी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं का सदस्य बनने के बावजूद इस इलाके को अर्थात् चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साम्राज्य को संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रत्येक संस्था से बाहर ही रखता है ताकि वहां मनमानी की जा सके।
उधर विशेषकर इंग्लैण्ड और फ्रांस को यह आवश्यक लगता है कि वे भी चीन का महिमामंडन करें ताकि भारत को जहां तक संभव हो, बांध कर रखा जा सके। क्योंकि प्रथम और द्वितीय महायुद्धों में इंग्लैंड और फ्रांस की जर्मनी से रक्षा भारतीय सेनाओं ने ही की थी। अतः उसकी महान वीरता से वे आशंकित हैं।
यही कारण है कि अंग्रेज अपने प्रिय समूह के नेता जवाहरलाल नेहरू को स्तालिन के प्रभाव में जाने देते हैं। स्तालिन अंग्रेजों द्वारा नेहरू को सत्ता हस्तांतरण किये जाने के तत्काल बाद ही उन्हें अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लेते हैं और सोवियत ढांचे के लाभ उन्हें समझाते हुए भारत में उसे लागू करने की प्रेरणा देते हैं।
माओ जैसे निकृष्ट व्यक्ति की महिमा भारत में कैसे फैलाई गई?
साथ ही माओजे दुंग से दोस्ती करा कर चीनी कम्युनिस्ट नेताओं से और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से नेहरू की नजदीकी बढ़वाते हैं और भारत में माओजे दुंग जैसे गए गुजरे व्यक्ति की महिमा गाई जाने लगती है।
ध्यान रहे, नेहरूजी सदा स्वयं को स्तालिन युग का बच्चा कहते हैं।संसद में कहा है।
साथ ही चीन को महिमामंडित करने में भारत के भी कम्युनिस्ट तथा साथ ही कम्युनिस्ट झुकाव वाले कांग्रेसी होड़ करने लगते हैं और इस प्रकार निरंतर दूसरों के अधीन रहने वाले चीन को तथा माओजे दुंग के द्वारा चीनी संस्कृति के व्यापक विनाश् के बाद बचे हुये उस क्षेत्र को महिमामंडित करने का काम कुछ इस तरह से किया जाता है, मानो कि वही चीन की परंपरा है।
भारत के राजनेता - झुआंगहुआ की कम्युनिस्ट पार्टी के क्रूर पैशाचिक अत्याचारों से चीन, दक्षिणी मंगोलिया, तुर्किस्तान आदि विस्तृत क्षेत्र की रक्षा का सांस्कृतिक कर्तव्य निभाने की जगह तिब्बत को भी चीन को सौंपने की तैयारी करते हैं और चीन की संस्कृति को नष्ट करने वाले समूह को ही चीन की परम्परा का उत्तराधिकारी प्रचारित करते हैं।
इस प्रकार जो कम्युनिस्ट शासन चीन की संस्कृति का महाविनाशक् है, उसे चीनी संस्कृति का प्रतिनिधि प्रचारित किया जाता है तथा जो आकार चीन का सम्पूर्ण इतिहास में कभी भी नहीं रहा है, उसे ही चीन का स्वाभाविक आकार मानते हुये कम्युनिस्ट पार्टी के विस्तारवाद को संरक्षण दिया जाता है और भारत को उसके सामने छोटा या कमजोर प्रचारित किया जाता है।

भारतीय मंगलचिन्ह कीर्तिमुख को चीन का ड्रैगन प्रचारित कर दिया
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यह बात इस सीमा तक जाती है कि जो ‘कीर्तिमुख’ नामक भारतीय मंगल चिन्ह चीन का भी एक शुभ मांगलिक प्रतीक है, शुभंकर चिन्ह है और जो भारत के अनेक मंदिरों में भित्तियों में तथा गवाक्ष और द्वार पर निर्मित हैं, उसे महाविकराल अजगर या ड्रैगन कहा जाने लगता है और उसे चीन का प्रतीक बताया जाने लगता है। इस प्रकार चीन को एक विकराल राक्षस की तरह प्रस्तुत कर इतिहास में लगातार रही हुई उसकी हीनता को छिपाया जाता है और काल्पनिक दैत्य की तरह उसे प्रस्तुत करके विशेषकर भारत को और भारतीयों के मानस को उससे भयाक्रान्त रखने की विफल कोशिशे की जाती हैं, परन्तु इससे भारत का सिंहत्व न तो रूकने वाला है और न ही भारत का जागरण थमने वाला है।
प्रो. कुसुमलता केडिया


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