रूस-यूक्रेन युद्ध का एक दूसरा पक्ष --- https://m.facebook.com/groups/1083537648465414/permalink/2328716540614179/?m
यूक्रेन के दोनबास में जैसे जैसे रूस की सेना आगे बढ़ रही है, उन्हें यूक्रेन की नात्सी सेना "अजोव-बटालियन" द्वारा मारे गए हजारों रूसी मूल के यूक्रेनी नागरिकों के कब्रिस्तान मिल रहे हैं; कहीं कहीं तो जिनमें जीवित शिशुओं को भी सड़ने के लिये फेँक दिया गया था। एक वीडियो में तो एक शिशु कीड़ों से बचने के लिये हाथ−पाँव हिला रहा था, किन्तु चलने के योग्य नहीं था। सड़ी हुई लाशों पर वह जीवित शिशु असहाय पड़ा था। उसका अपराध यही था कि वह रूसी नस्ल का था। यूक्रेन की अजोव-बटालियन रूसियों से लड़ने का कार्य कर रही है, जिसमें बीस हजार नात्सी हत्यारे हैं जो पिछले आठ वर्षों से यूक्रेन में रूसियों का नरसंहार कर रहे हैं।
NATO में जाने की जिद त्यागकर यूक्रेन निष्पक्ष रहे तो उसका क्या बिगड़ जाएगा? उससे लाभ सिर्फ झेलेन्स्की को है, जिसे युद्ध उद्योग के स्वामी अमेरिका ने अवैध सत्ता दिलायी है। जिन दो गणराज्यों की मान्यता को लेकर झगड़ा आरम्भ हुआ था उनका नाम तक नहीं लेते, क्योंकि वहाँ नात्सी गुण्डों द्वारा दफनाये गड़े मुर्दे अब उखड़ रहे हैं।
विक्तोर यानुकोविच ही यूक्रेन के चुने हुए राष्ट्रपति थे जिनको अवैध तरीके से सन २०१४ ई⋅ में हटाकर उनकी पार्टी को प्रतिबन्धित कर दिया गया था। यूक्रेन की सबसे बड़ी पार्टी को प्रतिबन्धित करने वाला झेलेन्स्की भारत की मीडिया को लोकतान्त्रिक लगता है।
कई स्थानों पर यूक्रेनी सेना भारतीय छात्रों को यंत्रणा दे रही हैं और और भारतीय छात्रा लड़कियों को बुरी तरह पीट रही है। उन्हें आगे जाने देने के लिए प्रति छात्र/छात्रा तीन सौ डॉलर की घूस ली गई है। यह बात वहाँ से आ रही भारतीय छात्राएं खुले आम बता रही हैं, जिसे छिपाया जा रहा है, क्योंकि अभी भी सैंकड़ों भारतीय छात्र/छात्राएं वहाँ फंसे हुये हैं। .
भारत की निजी समाचार मीडिया अपना खर्चा निकालने और पैसा कमाने के लिए विज्ञापनों द्वारा मिलने वाले धन पर निर्भर है। उनको पश्चिमी देशों के धन ने खरीद रखा है, इसलिए वे दिन-रात अमेरिकी एजेंट यूक्रेन के राष्ट्रपति झेलेंस्की का महिमा मंडन, और रूस के विरुद्ध मिथ्या प्रचार कर रही हैं।
उत्तर प्रदेश में हो रहे चुनावों के समाचार छिपाए जा रहे हैं, क्योंकि योगीजी के जीतने से अमेरिकी हितों को कोई लाभ नहीं है।
विश्व के कुछ लोगों के लिए युद्ध एक व्यापार है जिससे पैसे कमाये जाते हैं। वर्तमान में रूस-यूक्रेन युद्ध को ही लें।
रूसी पेट्रोलियम पर प्रतिबन्ध लगने के कारण दुनियाँ को अब मँहगा पेट्रोलियम खरीदना पड़ेगा, जिससे अमेरिकी स्वामित्व वाली पेट्रोलियम कंपनियों को ही लाभ होगा। यह विवाद जितना लंबा खिंचेगा उतना ही अधिक मुनाफा होगा।
अमेरिका और उसके पिछलग्गू देशों ने यूक्रेन को अरबों डॉलर के हथियार दिये हैं, जिसका मूल्य तो उन देशों की जनता को कर के रूप में चुकाना ही पड़ेगा। इससे लाभ तो हथियार बनाने वाले उद्योगपतियों, सौदागरों व दलालों का ही होगा। सबसे बड़े दलाल तो अमेरिका के राष्ट्रपति और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री होते हैं।
भारत के ७५ रूपये में जितना सामान आप खरीद सकते हैं उतना सामान एक डॉलर में आप खरीद सकते हैं। ७५ रूपये का नकली विनिमय दर बनाकर अमेरिका भारत से अरबों रुपया लूट रहा है। इससे बचने के लिए हमें अरब पेट्रोलियम पर निर्भरता समाप्त करनी पड़ेगी, जिसके स्वामी अमेरिकन धनपति ही हैं। यदि हम वैकल्पिक ऊर्जा स्त्रोत विकसित कर लें तो भारतीय अर्थव्यवस्था समूचे यूरोप, जापान और अमेरिकी अर्थव्यवस्था से भी बड़ी हो जाएगी।
पुनश्च: ..... रूस-यूक्रेन युद्ध -- यूक्रेनी राष्ट्रपति अमेरिकी दलाल झेलेंस्की की नासझमी व अमेरिका की बदमाशी है। और कुछ भी नहीं है
अमरीका की वास्तविक इतिहास के राज समझने में छिपा है विश्व का कल्याण का राज
IF YOU DIDN'T KNOW ABOUT THE UNITED STATES BEING A CORPORATION FOR CENTURIES, NOW YOU WILL.
THE U.S. CORPORATION WAS DISSOLVED IN 2020
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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद