नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा इंडिया गेट पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा स्थापित होने पर इतना घमासान क्यों
आज भी नेताजी सुभाष चंद्र बोस जीवन के रहस्यों से संबंधित वास्तविक और सत्य तथ्य की इंतजार राष्ट्र कर रहा है पिछले साल नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती पर एक कार्यक्रम में कोलकाता एयरपोर्ट पर फोटो शेयर कर रहा हूं नेताजी सुभाष चंद्र बोस एयरपोर्ट कोलकाता पर सुभाष चंद्र बोस की जयंती के अवसर पर आसनसोल प्रस्थान के लिए हवाई अड्डे पर नेता जी को इस हवाई यात्रा का वह अविस्मरणीय पल जहां से सडयंत्र की एक नई कहानी थिअरी प्रगट हुई थी पुनः हवाई यात्रा, जहाज, नेताजी सुभाष चंद्र बोस , यह सारे नाम स्मरण आ रहे हैं और इंतजार है हमारे चिर नूतन लोगों के हृदय में निवास करने वाले नेताजी सुभाष चंद्र बोस की को शत शत नमन
कल इंडिया गेट पर मौजूद अमर जवान ज्योति को नए बने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में विलय कर दिया गया.
इस पर कुछ लोग अफवाह उड़ा रहे हैं कि पुराने वाले अमर जवान ज्योति को बुझा कर नई जगह ज्योति जला दी गई है...!
लेकिन... जब इस पर जबरदस्ती का विवाद पैदा करने की कोशिश की जा रही है तो इस पूरे मामले को समझना जरूरी हो गया है.
असल में.... प्रथम विश्व युद्ध और तीसरे एंग्लो-अफगान युद्ध में ब्रिटिश इण्डियन आर्मी के लगभग 90,000 सैनिकों ने शक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्य को बचाने में अपनी जान गंवा दी थी.
इन्हीं सैनिकों के सम्मान के लिए अंग्रेजों ने इंडिया गेट का निर्माण करवाया था.
इंडिया गेट की आधारशिला उनकी रॉयल हाइनेस... ड्यूक ऑफ कनॉट ने 1921 में रखी थी और इसे एडविन लुटियन ने डिजाइन किया था.
स्मारक को 10 साल बाद तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन ने राष्ट्र को समर्पित किया था.
इसे भारत का राष्ट्रीय स्मारक माना जाता है... जिसके सामने का रास्ता "किंग्स वे" (राजा का रास्ता) कहा जाता था.
आजादी के बाद इसके नाम को अंग्रेजी से बदल कर हिन्दी कर दिया गया... अर्थात...King's Way को "राजपथ" कहा जाने लगा.
वास्तव में.... यह स्मारक पेरिस के आर्क डे ट्रॉयम्फ़ से प्रेरित था और इसे सन् 1931 में बनाया गया था.
मूल रूप से अखिल भारतीय युद्ध स्मारक के रूप में जाने वाले इस स्मारक का निर्माण अंग्रेज शासकों द्वारा उन 90,000 भारतीय सैनिकों की स्मृति में किया गया था जो ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर प्रथम विश्वयुद्ध और अफ़ग़ान युद्धों में शहीद हुए थे.
इस इंडिया गेट पर यूनाइटेड किंगडम के कुछ सैनिकों और अधिकारियों सहित 13,300 सैनिकों के नाम, गेट पर उत्कीर्ण हैं... जिनमे लगभग 4,300 अंग्रेज अफसरों और सैनिको के भी नाम हैं.
यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि.... इंडिया गेट पर अंकित नामों में से जो सैनिक भारतीय मूल के भी हैं, वो भी कोई भारत की स्वाधीनता की लड़ाई नहीं लड़ रहे थे, बल्कि वो तो अपने मालिको के लिए, अपने मालिकों के दुश्मनों से लड़ रहे थे.
ये वो भारतीय मूल के अंग्रेज सैनिक थे... जिन्हें अपने अंग्रेज मालिको के इशारे पर... अपने भारतीय भाइयों पर भी गोली चलाने में हिचक नहीं होती थी.
खैर.... जब इण्डिया गेट बनकर तैयार हुआ था तब इसके सामने जार्ज पंचम की एक मूर्ति लगी हुई थी...
जिसे आजादी के बाद विरोध के कारण अनमने मन से ब्रिटिश राज के समय की अन्य मूर्तियों के साथ कोरोनेशन पार्क में स्थापित कर दिया गया.
अब जार्ज पंचम की मूर्ति की जगह प्रतीक के रूप में केवल एक छतरी भर रह गयी है (जिसमें नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगाई जा रही है).
इसके बाद सन 1971 में भारत-पाकिस्तान का युद्ध हुआ जो कि 13 दिन चला....
और, इस युद्ध में भारत की विजय हुई एवं पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए.
पाकिस्तान के साथ चल रहे युद्ध के कारण उस साल यानि 1972 में गणतंत्र दिवस का परेड नहीं होना था.
लेकिन, युद्ध समय से पहले ही अर्थात 16 दिसंबर को ही समाप्त हो गया.
इसीलिए... आनन-फानन में 1972 के गणतंत्र दिवस के परेड की तैयारी की गई.
परंतु... साथ ही 1971 के युद्ध में हुई जीत एवं उस युद्ध में हमारे वीर सैनिकों के बलिदान को याद करने के लिए एक युद्ध स्मारक की जरूरत आन पड़ी थी.
लेकिन, समय के अभाव के कारण वो स्मारक बनाना संभव नहीं था इसीलिए तात्कालिक तौर पर इंडिया गेट के मेहराब के नीचे अमर जवान ज्योति स्थापित कर दी गयी.
अनाम सैनिकों की स्मृति में यहाँ एक राइफ़ल के ऊपर सैनिक की टोपी सजा दी गयी जिसके चारों कोनों पर सदैव एक ज्योति जलती रहती थी.
और... फैसला हुआ कि... ये तात्कालिक व्यवस्था है और जब हमारा राष्ट्रीय युद्ध स्मारक बनेगा तो फिर अमर जवान ज्योति को वहाँ शिफ्ट कर दिया जाएगा.
लेकिन... 1971 के बाद से 2016 के 50 सालों के कालखंड में भारत में नेहरू स्मारक, गांधी मेमोरियल, इंदिरा मेमोरियल, राजीव मेमोरियल जैसे अनेकों स्मारक, मेमोरियल और म्यूजियम बन गए...
लेकिन, हमारे वीर सैनिकों के सम्मान के लिए युद्ध स्मारक अथवा म्यूजियम बनाने का न तो कभी पैसा हुआ और न ही समय मिला किसी को.
इसीलिए.... 1972 से आजतक... प्रति वर्ष प्रधानमन्त्री व तीनों सेनाध्यक्ष पुष्प चक्र चढ़ाकर अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते रहे थे.
लेकिन, मोदी जी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद यह फैसला किया कि.... आजादी के बाद हुए युद्धों में शहीद हुए हमारे वीर सैनिकों के सम्मान हेतु एक राष्ट्रीय युद्ध स्मारक होना जरूरी है जिसपर स्वतंत्र भारत में शहीद हुए हमारे वीर सैनिकों के भी नाम अंकित हो...!
इसीलिए.... नया राष्ट्रीय युद्ध स्मारक इंडिया गेट परिसर में ही 40 एकड़ में फैला हुआ है और इसकी दीवारों पर भारत के लिए लड़ते हुए वीरगति पाने हुए सैनिकों के नाम लिखे हैं.
और.... नियमानुसार अब नए युद्ध स्मारक में ही हमारे राष्ट्राध्यक्ष एवं सेनाप्रमुख... विभिन्न युध्दों में वीरगति पाए अपने वीर जवानों को.... श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे.
इसीलिए.... जब ये स्मारक बन कर तैयार हो गया तो फिर उस अमर जवान ज्योति को जो कि 1972 ईसवी में तात्कालिक तौर पर इंडिया गेट के नीचे जलाई गई थी...... राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में शिफ्ट कर दिया गया क्योंकि वही अमर जवान ज्योति की उचित जगह है.
अब अंत में ये सवाल कि दोनों जगह ज्योति क्यों नहीं जल सकती है जैसा कि कुछ दुष्ट गिरोह कह रही है...
तो, इसका जबाब ये है कि ... अमर जवान ज्योति हमारे वीर सैनिकों को श्रद्धांजलि हेतु जलाया गया है और वो ज्योति वहीं जलनी चाहिए जहां उन सैनिकों के नाम अंकित हैं.
इसीलिए.... ऐसा किया जाना बिल्कुल व्यवहारिक और न्याय सम्मत है..
तथा... इससे उन्हीं को आपत्ति हो सकती है जिनके रगों में अंग्रेजों का खून दौड़ रहा है...
क्योंकि, तभी तो वे हर हाल में अंग्रेजी सैनिकों और अफसरों के अंकित नामों के आगे अमर जवान ज्योति को जलाए रखना चाहते हैं.
वन्दे मातरम...!!
जय महाकल
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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद