Skip to main content

हथियारों के मामले में अमेरिका पर निर्भरता व जैविक युद्ध के लिए सेना तैयार, हादसा होने से दो दिन पहले सहीद जरनल विपिन रावत का एलान उनकी उनकी जान पर भारी पड़ा

 




 #BIPINRAWAT #S400 #VladimirPutin
■ भारत ने अमेरिका के #CAATSA कानून को ignore करते हुए, RUSSIA से S-400 DEFENCE SYSTEM खरीदा। अमेरिका ने भारत के उपर SANCTIONS लगाने की धमकियां दी। 6 DECEMBER को ही RUSSIAN PREZ व्लादिमीर पुतिन की 🇮🇳 यात्रा संपन्न हुई और आज 2 दिनों के बाद CDS BIPIN RAWAT का हेलिकॉप्टर #COONOOR, TAMIL NADU में CRASH हो गया। ये सब संयोग नही हो सकता।
■ अमेरिका को इस बात का डर है कि भारत उसके SPHERE OF INFLUENCE से बाहर निकल रहा है। रशिया से भारत की नजदीकियां अमेरिका को पसंद नही आ रही। भारत का हथियारों के मामले में अमेरिका पर निर्भरता कम करना भी अमेरिका को hurt कर गया
  जनरल रावत कोई राजनेता नहीं थे कि कोई उनका समर्थक और कोई उनका विरोधी होता. वे एक पत्रकार नहीं थे जिनके व्यूज के लिए कोई उनको पसंद या नापसंद करता. वे एक सेलिब्रिटी नहीं थे जिन्हें एडमायर या क्रिटिसाइज किया जाता.
वे सैनिक थे, भारत की सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख थे. उनका एक ब्रिलियंट सैनिक रिकॉर्ड था, और उनके नेतृत्व में भारतीय सेनाओं ने सफलताएँ पाई थीं, मनोबल ऊँचा हुआ था. वे किसी एक समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे, बल्कि हमारी सेना का नेतृत्व करते थे जो सभी की सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है.
फिर भी अगर कोई उनकी असमय मृत्यु पर हर्ष प्रकट कर रहा है तो उसके पीछे क्या कारण हो सकता है? जनरल रावत से तो किसी की दुश्मनी नहीं हो सकती, जो दुश्मनी है भारत की सेना से है, भारत राष्ट्र से है. उनकी मृत्यु पर खुशी मनाना कहीं से भी एक व्यक्तिगत ओपिनियन का विषय नहीं हो सकता. यह खुला राष्ट्रद्रोह है.
जो भी व्यक्ति, समूह, विचारधारा इस अवसर पर अपने आप को एक्सपोज़ कर रहे हैं, उन्हें पहचानें. हम युद्ध में हैं, और युद्ध में शत्रुबोध आवश्यक है.
आपकी बात याद रहेगी जनरल. हम दो और आधे मोर्चे पर लड़ रहे हैं. दो मोर्चे वर्दी वाली फौजें संभालेगी...पर यह आधा मोर्चा हमारा है. और यह वादा है जनरल...इस मोर्चे पर हमारे हाथ नहीं कांपेंगे।
डा. राजीव मिश्रा राज शेखर
-----------------------------
वे जो अढ़ाई के आधे हैं ,
उनका भारत निर्माण में सहयोग “ शून्य “ है
उनकी जनसंख्या लगभग 20% है परन्तु जम्मू कश्मीर के अर्ध सैनिक बलों की संख्या हटा दी जाए तो देश की सेना में उनका प्रतिशत भी शून्य है ।
चोरी डकैती लूट रंगदारी अस्मतदरी में उनका योगदान 75% से अधिक है ..
और भूमि से लेकर समाज के अन्य अंगों में जि हाद का प्रतिशत 100% है ।
आज वे अट्टहास कर रहे हैं.. क्यों ? कल तक वे गंगी जमुनी का नाला बहा रहे थे ? कल तक  तो उनके बाबरों का रक्त भी इस मिट्टी में मिला हुआ था..
  वीरगति पर रोते नहीं।
आप रोए या डरे, यह भारत के क्षत्रिय तेज का अपमान होगा।
वीरप्रसूता भूमि अभी बंजर नहीं हुई। क्षत्रिय तेज अभी भी ज्वलंत है। जनरल बिपिन रावत उस अवस्था में पहुंचे जहाँ ब्रह्मर्षि महर्षि के लिए भी स्थान दुर्लभ।
पृथ्वी पर उनकी जगह लेने मनोज मुकुंद नरवणे आ गये हैं। मराठा योद्धा।
हम सब एक हैं। सशक्त हैं। सभी ढाई मोर्चे हमीं जीतेंगे। दुश्मनों को दिखा देंगे अर्जुन भीम बलराम परशुराम के वंशज लड़ना जानते हैं।
जो कापुरुष वर्णसंकर आज ह़स रहे हैं। उनके वंशधर तक उनके नाम पर थूकेंगे। इनकी पूरी कौम रोएगी।
हर हर महादेव। जय भवानी।
ईर्ष्या मन की कृपणता है, कुरूपता है। फिर भी ईर्ष्या कई बार स्वाभाविक भी है। हम अत्यंत साधारण मनुज फिर भी ईर्ष्या डाह जलन मन में कम ही आ पाते। कभी विश्वामित्र को तपस्वियों से ईर्ष्या हो आई थी। परंतु मुझे ईर्ष्या केवल उन वीरों से जो मातृभूमि पर प्राण यूं लुटाए दे रहे हैं ज्यों दानवीर कोई मुक्तहस्त अन्न बिखेरते चलता हो।
जिस ऊंचाई पर उनके प्राणों का आयाम है, जिस मुक्त स्तर पर उनकी आत्माओं का स्थान है, संभवतः देवताओं को भी ईर्ष्या हो।
प्रकृति के संतुलनकारी उपकरणों में से एक सहज उपलब्ध उपकरण युद्ध भी है, सहज उद्घाटित और प्रकटीकरण में सरलतम! निश्चित ही हिंसा और प्रतिहिंसा के बीज हमारे डी एन ए की पुरा गह्वरों में कहीं भीतर भी विद्यमान हैं।
संघर्ष प्रकृति के विस्तार का प्रमुख तत्व है, वह जैव विकास - योग्यतम की अतिजीविता वाले डार्विन हों, चाणक्य, व्यास या कि वाल्मीकि या फिर ट्राट्स्की! न्याय और शान्ति की पुनर्स्थापना के लिए युद्ध के विकल्प की बात हर जगह है।
प्रकृति के पंजे और चोंच रक्त तप्त हैं वह संघर्षो्ं से चेतना को सशक्त करती है तो विध्वंस से सृजन। एक पूरे मेटाबोलिज्म में कैटाबोलिज्म और एनाबोलिज्म का साम्य-संतुलन सधता रहता है।
युद्ध टालने के लिए सशक्त बुद्धिलब्धि और अच्छी नीयत वाले सुयोग्य दोनों पक्षों में आवश्यक हैं। नेकनीयती के अभाव में तो रावण जैसे महापंडित का भी वध आवश्यक है। आप अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग अहिंसा का इस्तेमाल कर सकते हैं, अल कायदा और जैश के विरूद्ध तो यह आत्मघात जैसा होगा।
भारतवंशियों में सदैव युद्ध को टालने की मंशा और क्षमता रखने वाले सुपुरूष प्रखर रहे फिर भी युद्ध एक सिद्धहस्त कुशल शिकारी की भांति अपने लक्ष्य को भेद ही देता है। आज हम पर आरोप है कि हम भारतवंशी युद्धोन्मादी हैं। मुझ पर व्यक्तिगत आक्षेप भी मेरी एक कविता को लेकर। कविराजों और कविरानियों ने फैसला दिया कि हम कवि नहीं रहे हालांकि कवि होने का हमारा कोई दावा या मंशा भी नहीं।
स्पष्ट करते चलें कि हम युद्धोन्मादी नहीं रहे कभी! हम रावण से , बैक्ट्रिया के यवनों से, अलक्षेन्द्र से, मिनाण्डर से, डिमिट्रियस प्रथम से, शकों,हूणों,कुषाणों, मोहम्मद बिन कासिम, गजनी-गोरियों,बाबर,अकबर औरंगजेबों, डच, पुर्तगाली, अंग्रेजों, चीनी पाकिस्तानियों से कभी युद्ध नहीं चाहते थे। पर हमें लड़ना पड़ा आज भी लड़ ही रहे हैं।
और कैसा लड़े सब जानते हैं। कुरूवंश के पहले के लगभग सभी राजाओं, महाराज पृथु, महाराज युधिष्ठिर, चंद्रगुप्त मौर्य, महाराज मिहिरकुल ने विराट भूभाग पर सनातन यज्ञ किए।
हम लड़ना नहीं चाहते पर जब लड़ते हैं तो मृत्यु का तिरस्कार करते हैं। हमारे वीरगति सद्गति से तो देवता तक ईर्ष्या करते आए हैं। हमारा देवता चिताभस्म का आभूषण धारण करता है तो हमारी ईश्वरी की क्रीड़ाभूमि ही श्मशान है। हम महाभारत के शान्ति पर्व में युद्ध का दर्शन देने की क्षमता वाले लोग हैं ।
धर्म्माद्धि युद्धाच्छ्रेयो$न्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते ।
(भीष्म पर्व २६/३१ )
इस्लामिक अतिवादी आततायी हैं। चीन आततायी है। छः प्रकार के आततायियों के विनाश के लिए शस्त्र-धारण की आज्ञा शास्त्र देते हैं। प्राण-भय से बुद्ध का जप करने वाले नैराश्यवादी प्रवंचक तो जीते ही मृतक समान हैं निकम्मे गृहस्थ की तरह।
राष्ट्र धर्म और राष्ट्र-रक्षा यज्ञ है। वर्तमान समय में क्षात्र धर्म का धारण ही राष्ट्र के लिए सम्यक धम्म है। रक्षण आक्रमण में लगे हमारे क्षत्रिय योद्धा धन्य हैं।धन्य हैं वह जो इस यज्ञ में प्राणों की आहुतियां दे रहे हैं देने को तत्पर हैं। हमारे मोक्ष जैसा परमपद भी उन वीरों की सद्गतियों के सम्मुख तुच्छ है।
क्षत्रियो निहत: संख्ये न शोच्य इति निश्चय: ।( वाल्मीकि रामायण - युद्धकाण्ड १०९|१८ )
अथ चेत्वमिमं धम्यं, संगा्रमं न करिष्यसि।
ततः स्वधर्म कीर्ति च, हित्वा पापमवाप्स्यसि।।
स्वकर्म स्वधर्म में लगे उन क्षत्रियों के चरण रज को नमन।
लेखक : मधुसूदन उपाध्याय

Comments

Popular posts from this blog

उच्च प्रतिभा के धनी और गणित के विद्वानों के लिए ही यह पोस्ट भारत की गौरवशाली अतीत का

      गणित के विभिन्न क्षेत्रों में भारत का योगदान प्राचीनकाल तथा मध्यकाल के भारतीय गणितज्ञों द्वारा गणित के क्षेत्र में किये गये कुछ प्रमुख योगदान नीचे दिये गये हैं- आंकगणित : दाशमिक प्रणाली (Decimal system), ऋण संख्याएँ (Negative numbers) (ब्रह्मगुप्त देखें), शून्य (हिन्दू अंक प्रणाली देखें), द्विक संख्या प्रणाली (Binary numeral system), स्थानीय मान पर आधारित संख्या आधुनिक संख्या निरूपण, फ्लोटिंग पॉइंट संख्याएँ (केरलीय गणित सम्प्रदाय देखें), संख्या सिद्धान्त , अनन्त (Infinity) (यजुर्वेद देखें), टांसफाइनाइट संख्याएँ (Transfinite numbers), अपरिमेय संख्याएँ (शुल्बसूत्र देखें) भूमिति अर्थात भूमि मापन का शास्त्र : वर्गमूल (see Bakhshali approximation), Cube roots (see Mahavira), Pythagorean triples (see Sulba Sutras; Baudhayana and Apastamba state the Pythagorean theorem without proof), Transformation (see Panini), Pascal's triangle (see Pingala) बीजगणित: Quadratic equations (see Sulba Sutras, Aryabhata, and Brahmagupta), Cubic equations and Quartic equations (b...

bhu के संस्थापक मदन मोहन मालवीय की आत्मा क्यों कराह रही है

    प्रश्न यह है कि फिरोज कोई, ऐसे थोड़े झोला उठाकर बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रवेश कर दिया है उसके लिए बकायदा नियम कानून और यहां के बुद्धिजीवियों के और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के सारे मापदंडों को पूर्ण करते हुए वह यहां तक पहुंचा है। प्रश्न यह है कि यह ऐसा नियम कानून और मापदंड स्थापित करने वाले कौन हैं जो भारत की अस्मिता को समाप्त करना चाह रहे हैं जो भारत की सनातन परंपरा को नष्ट करना चाह रहे हैं हालांकि गलती तो उसी समय हो गई थी जब अपनी गुरुकुल व्यवस्था का त्याग करके और अंग्रेजों की आधुनिक शिक्षा के माध्यम से एक बड़ा संस्थान बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी बनाई गई है उसी समय इस सनातन परंपरा के नष्ट होने का बीज डाल दिया गया था यह तो अब उसके फलअश्रुति हैं हम लोग केवल परिणाम पर छाती कूटते हैं कारण और निवारण पर कोई ध्यान नहीं रहता है  बोय पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय कहीं यही हालत राम मंदिर निर्माण का भी ना हो इसलिए सजगता आज से ही जरूरी है और श्रेष्ठ परंपरा के वाहक तेजस्वी पुरुष चयन अगर हो पाता है तू ही विश्व गुरु भारत के संकल्पना साकार हो सकती है नहीं तो अपने अपने पा...

Newziland,Britain apply Sanskrit teaching for smartness

   जब हमारे श्रेष्ठ भारत का नाम कहीं बदनाम होता है।क्या बतायें जब शिक्षित वेश्यावृत्ति करता है बस ह्रदय दुखता है।क्योंकि कुछ ही दसक पहले हमारे यहां7लाख 32हजार गुरूकुल हुआ करते थे।समस्त संसार की मानव जाति हमसे ही सीखती थी कि शिक्षा क्या होती है।और अब हम अपनी मानसिकता से इतना विकृत हो चुके हैं कि क्या बतायें कुछ कहते नहीं बनता।पर इतना जरूर कहूंगा हमारे भारत की मूल गुरुकुल शिक्षा ही सभी समस्याओं  से   मुक्त करती है व मानव को महामानव बनाती थी। एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान     विश्व हिन्दी दिवस प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है. इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए जागरूकता उत्पन्न करना तथा हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करना है. अजय कर्मयोगी: https://m.youtube.com/watch?v=JixMEQ2kehU   , https://m.youtube.com/watch?v=JseQIWhJ7xk  , https://m.youtube.com/watch?v=JixMEQ2kehU  ,  https://m.youtube.com/watch?v=IFmv2YFApQk                 ...