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पूज्य तनसिंह जी द्वारा स्वामी करपात्री जी महाराज को 5 फरवरी 1960 को लिखा गया पत्र, संघशक्ति के मई, 1987 अंक से

 

पूज्य तनसिंह जी द्वारा स्वामी करपात्री जी महाराज को 5 फरवरी 1960 को लिखा गया पत्र, संघशक्ति के मई, 1987 अंक से साभार पूज्य स्वामी जी महाराज, साष्टांग दंडवत । आपके सानिध्य में दो-एक दिन रह कर मुझे जितना आप की विचारधारा ने प्रभावित किया उससे कहीं अधिक आपकी कष्ट सहिष्णुता ने किया है। मानवता के लिए आपके अथक परिश्रम और निस्वार्थ वृत्ति किसे प्रेरणा नहीं देती? आपके दर्शनोपरांत मैंने श्री क्षत्रिय युवक संघ के कार्य में कष्ट सहिष्णुता की उत्कट प्रेरणा ली है। यदि मेरी अशिष्टता को क्षमा करें तो अनुचित होते हुए भी आपसे कुछ निवेदन करना चाहता हूं। रामराज्य परिषद का जीवन दर्शन आर्यधर्म का शाश्वत जीवन दर्शन है। मैं उसकी विचारधारा से पूर्णतः सहमत हूँ और अपनी समस्त शक्तियों को इसी ध्येय प्राप्ति के निमित्त अर्पण करने का आकांक्षी हूँ। परंतु जहां आप गांव गांव में प्रचार के द्वारा राम राज्य की प्राप्ति करना चाहते हैं वहां मेरा मतभेद केवल इतना ही है कि अमृत की प्राप्ति जहर से नहीं हुआ करती। यदि जहर से ही अमृत निकल सकता हो तो उसे मथने के लिए अलौकिक प्रयास चाहिए। हमारे अनुभव हमें यह बता रहे हैं कि राम राज्य परिषद के साथ अपनी राजनैतिक भक्ति बताकर चुनाव में विजयी होने वाले कतिपय व्यक्तियों के व्यावहारिक जीवन में रामराज्य का आचरण बिल्कुल ही स्पर्श नहीं करता। क्या विभीषणों, कुंभकरणों, रावणों और मारीचों से भी कभी राम राज्य के स्वप्न सच्चे हो सकते हैं? मैं उस रामराज्य को रामराज्य नहीं मानूंगा जो कुछ सत्ता के महत्वाकांक्षी, आचरणहीन, धोखेबाज और स्वार्थी विधानसभा के सदस्यों द्वारा जनसाधारण पर लादा जाय। बल्कि उसे रामराज्य मानूंगा जो प्रत्येक व्यक्ति के अंतःकरण के उद्गम से निकलकर चरित्र के व्यावहारिक क्षेत्र में अवतरित हो सकता हो। इस दृष्टि से आप एक धर्मोपदेशक, मार्ग दृष्टा और आचरण प्रेरक के रूप में, मेरी तुच्छ मान्यता के अनुसार, अधिक सेवा कर सकते थे बजाय राजनैतिक दल बंदी में फंसकर के। मैं यह मान्यता भी रखता हूं कि जब तक समाज के जीवन में धार्मिक क्रांति स्वार्थ और गुंडागर्दी के विरुद्ध खड़ी नहीं हो जाएगी तब तक हमारा राजनैतिक प्रचार पैंदा फूटे हुए तालाब की पाल बांधने का प्रयास मात्र है। श्री क्षत्रिय युवक संघ जीवन की गहराई में उतरकर वर्णाश्रम धर्म के अनुसार क्षत्रियों में क्षत्रियोचित आचरण निर्माण करने का प्रयास कर रहा है। ब्राह्मणों द्वारा स्वयं कर्तव्य हीन होने के कारण क्षत्रिय कुमारों की ऐसी समस्त शिक्षा का भार हमें स्वयं वहन करना पड़ता है। मैंने इस दौरे में आपके दो तीन जगह प्रवचन सुने तो ऐसा लगा जैसे कोई दिव्य पुरुष क्षत्रिय युवक संघ के मार्गदर्शन के लिए प्रेरणा दे रहा हो। मेरे मन में उसी दिन से यह भाव जागृत हुआ क्षत्रिय युवक संघ में आप से बढ़कर कोई उत्तम उपदेश नहीं दे सकता और इसलिए आपसे अनुरोध करूं कि आप स्थाई रूप से इस संघ के धर्मगुरु बनें और हमें ऐसा क्षत्रियोचित मार्ग बतावें जिससे हम इस लोक और परलोक में अपना श्रेय साधन कर सकें तथा भागवत कार्य का भगवान के आज्ञाकारी सिपाहियों की भांति सदैव निर्वहन करते रहें। इतिहास इस बात का साक्षी है कि हर क्षत्रिय वीर पुरुष समाज में चेतना लाने में तभी सफल हुआ है जब उसे किसी वीतराग और योग्य गुरु का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ हो। मुझे कोई संदेह नहीं कि आपकी योग्यता हजारों शिवाजी का निर्माण कर सकती है पर नियति का क्रूर व्यंग्य यह है कि सद्गुरु के पास अच्छे शिष्य नहीं है और शिष्य बनने की कामना रखने वालों के पास सद्गुरु नहीं है। परिणामतः दोनों ही अंधेरे में एक दूसरे की खोज करते, भटकते हुए अपने आपको ही अपना गुरु और अपने आपको ही अपना शिष्य बना कर सन्तोष कर लेते हैं। मैं एक बहुत ही छोटा आदमी हूं। न मुझ में त्याग, ज्ञान और चरित्र की तेजस्विता है। फिर भी मैं अत्यंत उग्र महत्वाकांक्षी हूं। मैं हृदय से चाहता हूं कि मैं एक महापुरुष बनूँ। इतना ही नहीं, बल्कि एक युगपुरुष बनूँ और मेरे महापुरुषत्व और युगपुरुषत्व का आधार स्वधर्म-पालन हो। मैं शक्ति के समस्त स्वरूपों का उपासक बनूँ और इतना तपोबल संचित करूं कि क्षत्रियों को उनके सही मार्ग पर नेतृत्व प्रदान कर इस महान जाति को उसके प्राचीन गौरव और वैभव से विभूषित करूं। 14 वर्ष तक किए गए मेरे अथक प्रयासों के बाद भी मुझे एक कमी खलती ही है कि हमें एक त्यागी और तपस्वी मार्ग दृष्टा मिले जो बांह पकड़ कर मुझे ऐसे मार्ग से ले चले जिससे आर्य गौरव को कोई ठेस न लगे और हो सके तो आपका रामराज्य का स्वप्न साकार हो। मैं राम का वंशज हूं और आपके तर्क - 'गंगा की शीतलता, मधुरता और पवित्रता उसकी प्रत्येक लहर में भी है, अग्नि का दाहकत्व उसकी प्रत्येक चिनगारी में है' स्वरूप प्रमाण के अनुसार छोटी बड़ी चिनगारी में दाहकत्व की न्यूनाधिक मात्रा हो सकती है, और मैं स्वीकार करता हूं कि मैं राम की अत्यंत तुच्छ और छोटी से छोटी चिनगारी हूं। इसलिए गुरुदेव मेरी इस चिनगारी को एक अंगारे, फिर अग्नि और फिर सहस्त्र जिह्वा युग निर्माण की अग्नि में आप ही परिवर्तित कर सकते हो। मैं यह बात संकोचवश आपके सामने नहीं कह सका हूं क्योंकि मुझे अपनी चिनगारी की न्यूनता पर इतनी लज्जा आती है जितनी कृष्ण के सम्मुख सुदामा को अपने तीन मुट्ठी चावल समर्पित करते आ रही थी। मुझे यह अटूट विश्वास है कि आपके रामराज्य का स्वप्न रामराज्य परिषद से कभी पूर्ण होने का नहीं। यदि वह सौ वर्ष बाद में भी पूर्ण होगा तो क्षत्रिय युवक संघ के माध्यम से ही होगा क्योंकि मेरी मान्यता है - राजनैतिक संस्था के द्वारा हम अपनी शक्ति का व्यय करते हैं। जबकि क्षत्रिय युवक संघ जैसी संस्था से शक्ति का निर्माण करते हैं। शक्ति के उपार्जन के बिना उसका व्यय किसी अनुभवहीन वैश्य का ही कार्य हो सकता है। इसलिए मैं आप से यही प्रार्थना करता हूं कि जितना श्रम और साधन आप रामराज्य परिषद में खर्च करते हैं उसका शतांश भी यदि क्षत्रिय युवक संघ में खर्च करें तो आपको मेरे अनुरोध का सत्य भली-भांति सिद्ध हो जावेगा। मैं यहां आपसे यह भी निवेदन करना चाहता हूं कि हमारे कुछ बड़े लोगों ने कुछ ऐसे उद्गार भी प्रकट किए हैं जो क्षत्रिय युवक संघ की विचारधारा से मेल नहीं खाते। क्षत्रिय युवक संघ समाज के समस्त वर्गों में अपने स्वधर्म पालन से समन्वयात्मक वातावरण का निर्माण करना चाहता है। वर्णों में कटुता पैदा करना और उन्हें ऊंचा-नीचा बताना, आर्य धर्म की सामाजिक भावना पर अदूरदर्शिता पूर्ण किया गया कुठाराघात है। इस प्रकार की विचारधारा परिस्थितिजन्य निराशा और असहिष्णुता का विकृत रूप ही है। क्षत्रिय युवक संघ का इस प्रकार की विचारधारा से कोई संबंध नहीं और ऐसे कोई लोग क्षत्रिय युवक संघ में कार्य भी नहीं करते जो इस प्रकार की विचारधारा के माध्यम से राजनैतिक शोषण से कार्य करना चाहते हैं। क्षत्रिय युवक संघ इस प्रकार की नीति को धर्म नीति नहीं मानता, इसलिए कि वह प्रभु की समस्त संतानों को समान भाव से देखता है। एक निर्बल मुसलमान की एक बेईमान हिंदू से रक्षा करना वह अपना धर्म मानता है। आपको कोई इस दिशा में संघ के प्रति शंका हो तो उसके स्पष्टीकरण का मुझे और अवसर दें। यदि आपकी यह मान्यता हो तो आप इस दिशा में हमें उचित आदेश दें और समय-समय पर श्री क्षत्रिय युवक संघ के शिविरों में पधार कर मार्गदर्शन का कार्य हाथ में लें। जो लोग आज अपनी महत्वाकांक्षाओं की सिद्धि के लिए रामराज्य परिषद को छोड़कर अन्य दल में जाने के लिए खूंटे तोड़ रहे हैं, उन्हें बालू रेत में तेल निकाल कर अपने भाग्य को आजमाने दें तो अच्छा है और राम राज्य परिषद के इस जूड़े को डाल कर वास्तविक रामराज्य की स्थापना के लिए यदि आप हमें कृतार्थ कर सकें तो अवश्य करें। मेरा विश्वास है कि आप इसके एक भी शिविर में पधारेंगे तो स्थिति स्पष्ट हो जायेगी। वैसे छोटे-छोटे शिविर तो इसके होते ही रहते हैं लेकिन महत्वपूर्ण शिविर जो वार्षिक रूप से हुआ करता है, 15 मई सन 1960 के आस-पास प्रारंभ होकर 15 दिन का सिरोही के आबू पर्वत शिखर पर आयोजित किया जा रहा है। जिसमें समय निकालकर यदि दर्शन दे सकें और मार्गदर्शन कर सकें तो अत्यंत ही अच्छा है। मुझे विश्वास है आप इस बारे में मनन करेंगे और भविष्य निर्माण के वास्तविक कर्म में हमें जुटा सकेंगे। अंत में मैं आपसे सविनय क्षमा मांगता हूं कि कहीं-कहीं मैंने पत्र में अनुपयुक्त भाषा और अशिष्टता प्रगट कर दी है, अतः मुझे क्षमा करें। पर मेरा इरादा आपको किसी प्रकार से असम्मानित करने का नहीं है। यह हो सकता है कि किसी सत्य को उपयुक्त शब्दों में प्रगट न किया हो पर जो कुछ प्रगट किया है वह मेरी आंतरिक मान्यताएं हैं अतः इससे कहीं आपको बुरा लगे तो मुझे बालक मानकर क्षमा करें। आपका कृपाकांक्षी अकिंचन तनसिंह अभी एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान७९८४1१३९८७

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