#मदर्स_डे
नेपाल का मदर्स डे , बैशाख महीने में मनाया जाता है ।
इंग्लैंड में मदर्स डे , मार्च के दूसरे संडे को मनाया जाता है ।
स्पेन , पुर्तगाल में मदर्स डे मई के पहले संडे को मनाया जाता है ।
अमेरिका और अनेक देशों में यह मई के दूसरे संडे को मनाया जाता है ।
हमने अमेरिका वाला कॉपी पेस्ट कर लिया ।
यदि मैं इंग्लैंड में बैठकर केवल mother’s search करूँ तो गूगल बता देगा की तुम्हारा 14 मार्च 2021 को आएगा ।
मदर्स डे , आप मनाएँ पर कॉपी पेस्ट के स्थान पर यदि भारत शारदीय नवरात्रि की नवमी को इसे चुनता तो मुझे अधिक व्यवहारिक लगता , क्योंकि मई का दूसरा संडे , भारत के लिए तिथिनुसार कोई अर्थ नहीं रखता , और पूरी दुनिया इसी एक ही दिन को मना रही होती तो और बात थी ।
स्वीडेन का मदर्स डे , मई के लास्ट संडे को आता है, अर्थात 31 मई को ।
अमेरिका वाले मदर्स डे की शुभकामनाएं । इंग्लैंड वाला मदर्स डे तो मार्च में आता है और बाक़ी देशों के भी अलग अलग मदर्स डे , सनातन धर्म की अपनी नवरात्रि भी है ।
फिर भी हम उत्सव धर्मी लोग हैं अत: अमेरिका वाला डे हो या जापान वाला , मना लेने में कोई समस्या नहीं है पर साथ के साथ हम माँ का स्वरूप भी समझते रहें ।
जन्म देने वाली माँ , गंगा माँ, अन्नपूर्णा माँ , तुलसी माँ से लेकर सनातन धर्म में जहाँ दृष्टि जाएगी , माँ , आधिभौतिक आधिदैविक और प्रमा के रूप आध्यात्मिक रूप से दिखती रहेगी ।
माँ का एक और स्वरूप मेरे गुरू ने समझाया है उस पर भी दृष्टि डालने का अनुरोध है ।
राधा की माँ का नाम कीर्तिदा था और श्रीकृष्ण की माँ का नाम यशोदा था । अर्थात् कीर्ति और यश से ही भगवान मिलते हैं ।
अब प्रश्न उठता है कि कीर्ति और यश कैसे मिलता है तो उसका उत्तर है #कथा ।
जो व्यक्ति कहीं से भी संत संगति ( चाहे सोशल मीडिया या कहीं भी ) करके कथा श्रवण करता है तो उसके मन में ईश्वर का अवतार हो जाएगा ।
मदर्स डे पर ईश्वर की #कथा को भी एक माँ के समान ही अपने जीवन में उतारें ।
साभार राज शेखर
ईसाइयों के लिए मई का महिना मडोना की उपासना का महिना होता है। अगर मडोना नाम अलग लगे, कम सुना हुआ हो तो ऐसे समझ लीजिये कि वो जो चर्च में मदर मैरी की गोद में बच्चा लिए तस्वीरें-मूर्तियाँ दिखती हैं, उसे मडोना कहते हैं। कभी कभी उसे गोद में बच्चे के बिना भी दर्शाया जाता है। मुंबई के बांद्रा में जो बासीलीक ऑफ़ आवर लेडी ऑफ़ द माउंट है, वो भी वर्जिन मैरी यानि मडोना का ही है। विश्व भर में तीस बड़े मडोना के रिलीजियस सेण्टर हैं जैसे नाजरेथ, इसराइल का बासीलीक ऑफ़ एनानसीएशन, या फिर पुर्तगाल का आवर लेडी ऑफ़ फ़ातिमा।
इस महीने की शुरुआत में कैथोलिक पोप ने घोषणा की थी कि इन सब में पूरे महीने कोरोना संकट से लोगों को मुक्ति दिलाने के लिए प्रार्थनाएँ चलेंगी। किसी चर्च में दिवंगत लोगों के लिए प्रार्थना होगी, कहीं गर्भवती स्त्रियों और छोटे बच्चों के लिए होगी, कहीं प्रवासियों के लिए, कहीं बुजुर्गों के लिए, तो कहीं वैज्ञानिकों और शोध संस्थानों और कहीं डॉक्टर और नर्सों के लिए प्रार्थना की जाएगी। इसकी शुरुआत करते हुए पोप ने प्रार्थना कर के रोजरी यानि जप वाली मालाएं इन सभी जगहों पर भेजी हैं। इस विशेष प्रार्थना के लिए 5 मई को ही, शाम छह बजे का समय भी निर्धारित कर दिया गया था।
भारत में वैसे तो “कोम्परिटिव रिलिजन” यानि धर्म को तुलनात्मक रूप से पढ़ने-समझने का अब चलन बहुत कम ही बचा है (अगर कहीं बचा भी हो तो), फिर भी इसे एक अच्छे उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है। माला के जरिये जप करने की परम्परा हिन्दुओं से पहले से किसी में भी नहीं होगी। ऐसा भी नहीं कि आज इस परंपरा का लोप हो गया है। कई लोग अभी भी गोमुखी में हाथ डाले, माला जपते दिख जायेंगे। इसका प्रभाव वैज्ञानिक तौर पर भी माना जाता है। ये एकाग्रता – कंसन्ट्रेशन बढ़ाने का एक अच्छा उपाय होता है। अकाल मृत्यु जैसे भय से बचाने के लिए महा मृत्युंजय मन्त्र का जप किया जाता है, ये भी आबादी के एक बड़े हिस्से को पता होता है।
इसके बाद भी क्या ऐसा कोई प्रयास हुआ? अरे नहीं! ऐसा करने से तो अनर्थ ही हो जाता ना! कहीं जो घर के लोग माला जपने से साधू हो गए तो क्या होगा? वैसे किसी ने माला जपने वालों को साधू हो जाते नहीं देखा है मगर फिर भी रिस्क क्यों लेना? मेरे ही घर कोई हो गया तो? इसके अलावा जो बड़े पीठ हैं, मठाधीश हैं, उनकी ओर से ऐसा कुछ करने का कोई आह्वान भी नहीं सुनाई दिया। घरों में धर्म से जुड़ी किसी रीति का पालन होते देखने पर घर के लोगों की, विशेष कर नयी पीढ़ी की उसमें रूचि जाग सकती थी, लेकिन साधू हो गया तो? रिस्क क्यों लेना? इसलिए न तो आपने खुद किया, ना मठाधीशों ने कोई आह्वान ही किया।
ऐसे ही धीरे-धीरे आपके पास से आपके रीति-रिवाज खिंचकर दूसरों के पास जाते हैं। जैसे वो क्रिसमस ले गए, जप की माला भी बीस-तीस वर्षों में रोजरी हो ही जाएगी। प्रकृति खाली जगह बिलकुल बर्दाश्त नहीं करती। गड्ढा होते ही वो और किसी से नहीं तो पानी से भरने लगता है। वैसे तो गड्ढों को हम लोग कचरे से भर ही देते हैं। बिलकुल वैसे ही जो जगह धर्म से खाली होगी, वो रिलिजन से भरेगी। उसके बाद आप शिकायत करेंगे कि “कूल डूड” की पीढ़ी तो हर महीने बर्थडे मनाती है, मोमबत्ती फूंक कर केक काटती है! इसके लिए खाली जगह आपने ही तो बनाई है!
बाकी खाली जगह हमने-आपने और हमसे-आपसे पहले की पीढ़ियों ने छोड़ी ही क्यों, ये जवाब हमें और आपको खुद ही सोचना है। जो गलतियाँ पहले हो गयी उन्हें दोहराते जाना है, या कम से कम एक माला जुटा लेना है, ये भी खुद ही सोच लीजियेगा!
आनन्द
इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम् ।
गुरुशुश्रुषया त्वेवं ब्रह्मलोकं समश्नुते ।। मनु स्मृति २/२३३
अर्थात् मां की भक्ति से इस लोक को ,पिता की भक्ति से मध्यमलोक को ,इसी प्रकार गुरु की सेवा से ब्रह्म लोक को प्राप्त करता है ।
यावत् त्रयस् ते जीवेयुस् तावन् नाऽन्यं समाचरेत् ।
तेष्वेव नित्यं शुश्रुषां कुर्यात् प्रियहिते रत: ।। मनु स्मृति २/२३५
अर्थात् जब तक वे तीन (माता-पिता-गुरु) जीवित रहते हैं ,तब तक अन्य धर्म का अनुष्ठान न करे ,उन के प्रिय और हित कार्यों में रमता हुआ सदाकाल उन की ही सेवा करे ।
सनातन धर्म में माता पिता गुरु की सेवा का क्या महत्त्व है यह उक्त मन्वादि शास्त्र वचन से सिद्ध है।
ब्रह्मवैवर्त्तपुराण में सोलह मातायें कही गईं
स्तन पिलाने वाली (धाय), गर्भ में धारण करने वाली (जननी), भोजन देने वाली (पाचिका), गुरुपत्नी, अभीष्ट देवता की पत्नी, पिता की पत्नी (सौतेली माता), कन्या, बहिन, पुत्रवधू, पत्नी की माता (सास), माता की माता (नानी), पिता की माता (दादी), सहोदर भाई की पत्नी, माता की बहिन (मौसी), पिता की बहिन (बूआ) तथा मामी– ये सोलह मनुष्यों की वेद विहित माताएँ कहलाती हैं।
भोजरचित चाणक्यनीति में पाँच मातायें गिनाई गई हैं-
राजपत्नी गुरोः पत्नी मित्र पत्नी तथैव च ।
पत्नी माता स्वमाता च पञ्चैता मातरः स्मृता ॥ त्वमेव माता च पिता त्वमेव।
✍अत्रि विक्रमार्क
एक माता थी मदालसा जिन्होंने लोरी और पालने में ही अपने बालक को ब्रह्मज्ञान करा दिया और अज्ञान रूपी दुःख से छुटकारा दिला दिया ।
और एक आजकल की मातायें हैं जिनका उद्देश्य बस अपने बालक को खाना खिलाने , पैसा कमवाने और शादी करके बच्चा पैदा करवाने तक ही सीमित रह गया है ।
काश मदालसा माँ जैसी माँ सबको मिले ।
मदालसा का अपने पुत्र को ब्रह्मज्ञान का उपदेश :-
शुद्धो sसिं रे तात न तेsस्ति नाम
कृतं हि ते कल्पनयाधुनैव ।
पंचात्मकम देहमिदं न तेsस्ति
नैवास्य त्वं रोदिषि कस्य हेतो: ॥
हे तात! तू तो शुद्ध आत्मा है, तेरा कोई नाम नहीं है। यह कल्पित नाम तो तुझे अभी मिला है। वह शरीर भी पाँच भूतों का बना हुआ है। न यह तेरा है, न तू इसका है। फिर किसलिये रो रहा है?
न वा भवान् रोदिति वै स्वजन्मा
शब्दोsयमासाद्य महीश सूनुम् ।
विकल्प्यमाना विविधा गुणास्ते-
sगुणाश्च भौता: सकलेन्द्रियेषु ॥
अथवा तू नहीं रोता है, यह शब्द तो राजकुमार के पास पहुँचकर अपने आप ही प्रकट होता है। तेरी संपूर्ण इन्द्रियों में जो भाँति भाँति के गुण-अवगुणों की कल्पना होती है, वे भी पाञ्चभौतिक ही है?
भूतानि भूतै: परि दुर्बलानि
वृद्धिम समायान्ति यथेह पुंस: ।
अन्नाम्बुदानादिभिरेव कस्य
न तेsस्ति वृद्धिर्न च तेsस्ति हानि: ॥
जैसे इस जगत में अत्यंत दुर्बल भूत अन्य भूतों के सहयोग से वृद्धि को प्राप्त होते है, उसी प्रकार अन्न और जल आदि भौतिक पदार्थों को देने से पुरुष के पाञ्चभौतिक शरीर की ही पुष्टि होती है । इससे तुझ शुद्ध आत्मा को न तो वृद्धि होती है और न हानि ही होती है।
त्वं कञ्चुके शीर्यमाणे निजेsस्मिं-
स्तस्मिश्च देहे मूढ़तां मा व्रजेथा: ॥
शुभाशुभै: कर्मभिर्दहमेत-
न्मदादि मूढै: कंचुकस्ते पिनद्ध: ॥
तू अपने उस चोले तथा इस देहरुपि चोले के जीर्ण शीर्ण होने पर मोह न करना। शुभाशुभ कर्मो के अनुसार यह देह प्राप्त हुआ है। तेरा यह चोला मद आदि से बंधा हुआ है (तू तो सर्वथा इससे मुक्त है) ।
तातेति किंचित् तनयेति किंचि-
दम्बेती किंचिद्दवितेति किंचित्
ममेति किंचिन्न ममेति किंचित्
त्वं भूतसंग बहु मानयेथा: ॥
कोई जीव पिता के रूप में प्रसिद्ध है, कोई पुत्र कहलाता है, किसी को माता और किसी को प्यारी स्त्री कहते है, कोई ‘यह मेरा है’ कहकर अपनाया जाता है और कोई ‘मेरा नहीं है’ इस भाव से पराया माना जाता है। इस प्रकार ये भूतसमुदाय के ही नाना रूप है, ऐसा तुझे मानना चाहिये ।
दु:खानि दु:खापगमाय भोगान्
सुखाय जानाति विमूढ़चेता: ।
तान्येव दु:खानि पुन: सुखानि
जानाति विद्वानविमूढ़चेता: ॥
यद्यपि समस्त भोग दु:खरूप है तथापि मूढ़चित्तमानव उन्हे दु:ख दूर करने वाला तथा सुख की प्राप्ति करानेवाला समझता है, किन्तु जो विद्वान है, जिनका चित्त मोह से आच्छन्न नहीं हुआ है, वे उन भोगजनित सुखों को भी दु:ख ही मानते है।
हासोsस्थिर्सदर्शनमक्षि युग्म-
मत्युज्ज्वलं यत्कलुषम वसाया: ।
कुचादि पीनं पिशितं पनं तत्
स्थानं रते: किं नरकं न योषित् ॥
स्त्रियों की हँसी क्या है, हड्डियों का प्रदर्शन । जिसे हम अत्यंत सुंदर नेत्र कहते है, वह मज्जा की कलुषता है और मोटे मोटे कुच आदि घने मांस की ग्रंथियाँ है, अतः पुरुष जिस पर अनुराग करता है, वह युवती स्त्री क्या नरक की जीती जागती मूर्ति नहीं है?
यानं क्षितौ यानगतश्च देहो
देहेsपि चान्य: पुरुषो निविष्ट: ।
ममत्वमुर्व्यां न तथा यथा स्वे
देहेsतिमात्रं च विमूढ़तैषा ॥
पृथ्वी पर सवारी चलती है, सवारी पर यह शरीर रहता है और इस शरीर में भी एक दूसरा पुरुष बैठा रहता है, किन्तु पृथ्वी और सवारी में वैसी अधिक ममता नहीं देखी जाती, जैसी कि अपने देह में दृष्टिगोचर होती है। यही मूर्खता है ।
धन्योs सि रे यो वसुधामशत्रु-
रेकश्चिरम पालयितासि पुत्र ।
तत्पालनादस्तु सुखोपभोगों
धर्मात फलं प्राप्स्यसि चामरत्वम ॥
धरामरान पर्वसु तर्पयेथा:
समीहितम बंधुषु पूरयेथा: ।
हितं परस्मै हृदि चिन्तयेथा
मनः परस्त्रीषु निवर्तयेथा: ॥
सदा मुरारिम हृदि चिन्तयेथा-
स्तद्धयानतोs न्त:षडरीञ्जयेथा: ॥
मायां प्रबोधेन निवारयेथा
ह्यनित्यतामेव विचिंतयेथा: ॥
अर्थागमाय क्षितिपाञ्जयेथा
यशोsर्जनायार्थमपि व्ययेथा:।
परापवादश्रवणाद्विभीथा
विपत्समुद्राज्जनमुध्दरेथाः॥
बेटा ! तू धन्य है, जो शत्रुरहित होकर अकेला ही चिरकाल तक इस पृथ्वी का पालन करता रहेगा। पृथ्वी के पालन से तुझे सुखभोगकी प्राप्ति हो और धर्म के फलस्वरूप तुझे अमरत्व मिले। पर्वों के दिन ब्राह्मणों को भोजन द्वारा तृप्त करना, बंधु-बांधवों की इच्छा पूर्ण करना, अपने हृदय में दूसरों की भलाई का ध्यान रखना और परायी स्त्रियों की ओर कभी मन को न जाने देना । अपने मन में सदा श्रीविष्णुभगवान का चिंतन करना, उनके ध्यान से अंतःकरण के काम-क्रोध आदि छहों शत्रुओं को जीतना, ज्ञान के द्वारा माया का निवारण करना और जगत की अनित्यता का विचार करते रहना । धन की आय के लिए राजाओं पर विजय प्राप्त करना, यश के लिए धन का सद्व्यय करना, परायी निंदा सुनने से डरते रहना तथा विपत्ति के समुद्र में पड़े हुए लोगों का उद्धार करना ।

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद