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ग्राम प्रधान से पंतप्रधान तक चुनाव के माध्यम से गुलामी की जंजीरें की जकड़ से भारत को बर्बाद करने का षड्यंत्र

  


 


 


जब इंडियन संविधान की बात होती हैं तो लोग भीमराव अम्बेडकर का वर्णन करते हैं। संविधान निर्माता बेनेगन नरसिंह राव, प्रेम बिहारी नारायण रायजादा, राजेन्द्र प्रसाद, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, जवाहर लाल नेहरू व वल्लभ भाई पटेल जैसे व्यक्तियों का वर्णन नहीं किया जाता ?
जबकि डॉ. अम्बेडकर तो इस संविधान के विरोध में थे, और इसे जला देना चाहते थे !

  अंबेडकर को बदनाम करके कुछ लोग प्रसन्न होते हैं और अंबेडकरवादी मनु महाराज को गाली देकर प्रसन्न हो जाते हैं पर इस देश में अंग्रेजों को रहना जब भारी पड़ने लगा तो उन्होंने स्वतंत्रता से 4 साल पहले ही इस देश को चलाने की कायदे या विधान की रचना करवाने के लिए अपने कुछ चाटूकार लोगों को चुन कर यह लिखित गुलाम संविधान की तैयारी करवा लिये फिर ट्रांसफर पावर का खेल खेला गया जिस का परिणाम इस ग्राम प्रधान के चुनाव में भी स्पष्ट दिख रहा है पहले मतदान फिर जलपान और ऐसे ही अनेक स्लोगन से मतदाता जागरुकता अभियान का मंच चलाने वाले आज पूर्ण रुप से गायब हो गए हैं मीडिया ने सन्नाटा है पर हर गांव में उथल पुथल मची हुई है क्योंकि आग तो अब लग चुकी है अब दूर से बैठकर तमाशा देखना है घर-घर में विभाजन की स्पष्ट रेखा दिख रही है श्रेष्ठ संभ्रांत त्यागी तपस्वी इस लूट तंत्र से दूर जा चुके हैं गांव के इस चुनाव में सारी मर्यादाएं तार तार हो रही हैं शराब शबाब कबाब का नग्न परिदृश्य देखकर आत्मा कराह रही है और यहां पर भी उत्तर प्रदेश में मार्किट से यह सारी सामग्री गायब हो चुकी और इस का अभाव बना हुआ है शराब कबाब एक जिताउ हथियार यानी ब्रम्हास्त्र के रूप में उपयोग किया जा रहा है जो पूर्वज हजारों साल से इस भयावह आक्रमण को भी झेल कर अपनी संस्कृति अपनी गरिमा बचा रखे थे मुझे बचपन का याद है जब इलेक्शन की जगह सलेक्शन होता था जब लोग मिलकर समाज के अग्रणी श्रेष्ठ को जबरजस्ती पद देकर लोग धन्यता को प्राप्त होते थे। पर आज इस लोकतंत्र के माध्यम से सारी मर्यादाएं तार तार हो रहा है धन्य हो इस ग्राम प्रधान चुनाव का
#टैक्स  सिर्फ ट्रेडर्स यानी वाणिज्यिक लोगों से लिया जाय।
उपकरणों से शिल्पकर्म रत #शूद्रों से कर न लिया जाय।
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टैक्स लेना राज्य का कर्तव्य और अधिकार दोनों है, लेकिन कैसी सरकार टैक्स ले सकती है और किससे कितना ले सकती है, इसके भी सिद्धांत गढे गए हैं, पहले भी और हाल में भी।
ब्रिटिश जब कॉलोनी सम्राट हुवा करता था तब वहां के कुछ बड़े विद्वानों ने गैर जिम्मेदार सरकार को  टैक्स न देने की बात की, थी जिनका नाम आज भी उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत किया जाता है।
आज के संदर्भ में सबसे प्रसिद्ध व्यक्ति जिसने टैक्सेशन का सकारण विरोध  किया, था वो था डेविड हेनरी थोरौ जिसके सिविल diobedience के फार्मूले को गांधी ने भारत मे दमनकारी कुचक्री क्रूर बर्बर और Hypocrite ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध प्रयोग किया। लेकिन चूंकि हम अनुवाद के मॉनसिक गुलाम है तो भाइयो ने उसे हिंसा और अहिंसा से जोड़ दिया।
यदि आप जॉन मोर जैसे फेक इंडोलॉजिस्ट द्वारा लिखित "ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट"  के स्थान पर,  भारतीय संस्कृत ग्रंथों को पढ़ेंगे, तो पाएंगे कि वस्तुतः धर्मशास्त्र कहकर प्रचारित किये ग्रंथ सामाजिक शास्त्र है, जो परिवर्तनशील जगत में  जीने का दर्शन और सिद्धांत प्रतिपादित करते हैं।
चूंकि सनातन के अनुसार जगत परिवर्तनशील है इसलिए सामाजिक नियम और दर्शन भी परिवर्तित किये जाते रहे हैं समय समय पर - As and required टाइप से।
 कौटिल्य का अर्थशास्त्र पढ़ने वाले लोग जानते है कि कौटिल्य ने जब समाज के लिए  नियम लिखे तो उन्होंने पूर्व के समाजशास्त्री ऋषियों के नियमो का उल्लेख करते हुए लिखा कि, उनके अनुसार ऐसा था लेकिन मेरे अनुसार ऐसा है। और भारतीय हिन्दू जनमानस उसको स्वीकार करता था।
लेकिन गुलाम मानसिकता के स्वतंत्र भारतीय चिंतक, अब्राहमिक मजहबों के उन  सिद्धांत से प्रभावित रहे है जो ये कहते है कि होली बुक्स में लिखे गए पोलिटिकल मैनिफेस्टो अपरिवर्तनीय हैं, और उसी चश्मे से भारत को देखने समझने के अभ्यस्त हैं।
ज्ञातव्य है कि डॉ आंबेडकर की पुस्तक #WhoWereTheShudras जैसे गर्न्थो में जॉन मोर, एम ए शेरिंग और मैक्समुलर जैसे फेक इंडोलॉजिस्ट और  धर्मान्ध ईसाइयों के संदर्भो को ही आधार बनाया गया है।
मैकाले इन्ही भारतीय विद्वानो को "एलियंस और मूर्ख पिछलग्गू' कहा करता था।
यहां कर यानी टैक्स के सिद्धांतों का अतिप्राचीन संस्कृत ग्रंथ से उद्धारण देना चाहूंगा- जिसका समयकाल आप स्वयं तय कीजिये।
"स्वधर्मो विजयस्तस्य नाहवे स्यात परांमुखः।
शस्त्रेण वैश्यान रक्षित्वा धर्मयमाहरतबलिम्।।
राजा का धर्म है कि कि वह युद्ध मे विजय प्राप्त करे। पीठ दिखाकर पलायन करना उसके लिए सर्वथा अनुचित है। शास्त्र के अनुसार वही राजा प्रजा से कर ले सकता है जो प्रजा की रक्षा करता है।
धान्ये अष्टमम् विशाम् शुल्कम विशम् कार्षापणावरम।
कर्मोपकरणाः   शूद्रा:      कारवः       शिल्पिनः तथा।।
संकटकाल में ( आपातकाल में सामान्य दिनों में नहीं) राजा को वैष्यों से धान्य के लाभ का आठवां भाग, स्वर्णादि के लाभ का बीसवां भाग कर के रूप में लेना चाहिए। किंतु शूद्र, शिल्पकारों, व बढ़ई आदि से कोई कर नहीं लेना चाहिए क्योंकि वे उपकरणों से कार्य करके जीवन यापन करते हैं।
#मनुषमृति : दशम अध्याय ; श्लोक संख्या 116, 117।
नोट: स्पष्ट निर्देश है कि श्रमजीवी या श्रम शक्ति से कर संकटकाल में भी नही लेना चाहिए।
कर सिर्फ वाणिज्य करने वाले वाणिज्य शक्ति से ही लेना चाहिए।
#राजा #कर #वाणिज्य #उपकरण #शिल्पी #शूद्र।

कौटिल्य ने उत्पाद पर  टैक्स रेट 1/6 निर्धारित किया था। टैक्स उसी तरह हो जैसे सूर्य पानी से भाप बनाता है।
अंग्रेज इसे 1/3 से 1/2 तक ले गया।
ईस्ट इंडिया कंपनी के समुद्री लुटेरों ने जब भारत मे 1757 मे टैक्स इकट्ठा करने की ज़िम्मेदारी छीनी तो ऐसा कोई भी मौका हांथ से जाने नहीं दिया , जहां से भारत को लूटा जा सकता हो।
 वही काम पूरी के जगन्नाथ मंदिर मे हुआ। वहाँ पर शासन और प्रशासन के नाम पर , तीर्थयात्रियों से टैक्स वसूलने मे भी उन्होने कोताही नहीं की। तीर्थयात्रियों की चार श्रेणी बनाई गई। चौथी श्रेणी  मे वे लोग रखे गए जो गरीब थे। जिनसे  ब्रिटिश कलेक्टर टैक्स न वसूल पाने के कारण उनको मंदिर मे घुसने नहीं देता था। ये काम वहाँ के पांडे पुजारी नहीं करते थे, बल्कि कलेक्टर और उसके गुर्गे ये काम करते थे।
( रेफ - Section 7 of Regulation IV of 1809 : Papers Relating to East India affairs )
इसी लिस्ट का उद्धरण देते हुये डॉ अंबेडकर ने 1932 मे ये हल्ला मचाया कि मंदिरों मे शूद्रों  का प्रवेश वर्जित है। वो हल्ला ईसाई मिशनरियों द्वारा अंबेडकर भगवान को उद्धृत करके आज भी मचाया जा रहा है।

ज्ञातव्य हो कि 1850 से 1900 के बीच 5 करोड़ भारतीय संक्रामक रोगों और अकाल के कारण, प्राण त्यागने को इस लिए विवश किये गए, क्योंकि उनका हजारों साल का मैनुफेक्चुरिंग का व्यवसाय नष्ट कर दिया गया था। बाकी बचे लोग किस स्थिति मे होंगे ये तो अंबेडकर भगवान ही बता सकते हैं। वो मंदिर जायंगे कि अपने और परिवार के लिए दो रोटी की व्यवस्था करेंगे ?
आज भी यदि कोई भी व्यक्ति यदि मंदिर जाता हैं और अस्व्च्छ होता है है तो मंदिर की देहरी डाँके बिना प्रभु को बाहर से प्रणाम करके चला आता है। और ये काम वो अपनी स्वेच्छा और पुरातन संस्कृति के कारण करता है ,न  कि पुजारी के भय से।

जो लोग आज भी ये हल्ला मचाते हैं उनसे पूंछना चाहिए कि ऐसी कौन सी वेश भूषा पहन कर या सर मे सींग लगाकर आप मंदिर जाते हैं कि पुजारी दूर से पहचान लेता है कि आप शूद्र हैं ?

विवेकानंद ने कहा था - भूखे व्यक्ति को चाँद भी रोटी के टुकड़े की भांति दिखाई देता है।
एक अन्य बात जो अंबेडकर वादी दलित अंग्रेजों की पूजा करते हैं, उनसे पूंछना चाहूँगा कि अंग्रेजों ने अपनी मौज मस्ती के लिए जो क्लब बनाए थे , उसमे भारतीय राजा महराजा भी नहीं प्रवेश कर पाते थे।
बाहर लिखा होता था -- Indian and Dogs are not allowed .
गुलाम मानसिकता का दुष्परिणाम तो भुगतना ही होगा।
डॉ आंबेडकर ने 1932 में लोथियन समिति को बताया कि डिप्रेस्ड क्लास को ही अछूत समझा जाना चाहिए। और प्रमाण स्वरूप रेगुलेशन 1809 सेक्शन iv का संदर्भ देते हुए 17 निम्न जातियों की लिस्ट प्रमाण के रूप में सौंपी।
रेगुलेशन 1806 में इन निम्न जातियों को मंदिर में प्रवेश करने का अधिकार था जिनको #कंगाल_या_पुंज_तीर्थी कहते थे। 1809 में इनका प्रवेश मंदिर के अंदर वर्जित कर दिया गया। उनको टैक्स देने पर मंदिर के बाहर 16 दिन रहकर धार्मिक कर्मकांड की अनुमति दी गयी।
1806 में लाल जात्रियों के लिए उत्तर की तरफ अतर्रा नाला घाट की तरफ से घुसने पर 10 रुपये और दक्षिण की तरफ लोकनाथ घाट से घुसने पर 6 रुपये देने पर ही मंदिर में घुसने दिया जाता था। बाकी कम आय वाले लोगों से 2 रुपये वसूले जाते थे।
ये टैक्स ईस्ट इंडिया कंपनी वसूलती थी।
"जे हंटर 21 नवंबर 1806 को टैक्स कलेक्टर अप्लाइंट हुवा। 22 जनवरी 1806 से टैक्स लगा। 22 जनवरी से 30 अप्रैल 1806 के बीच 48,720 तीर्थयात्री पुरी गए, जिनमे 26,841यात्री खैराती थे, अर्थात उनसे टैक्स नही लिया गया। इन 26,841 लोगों में 19140 कंगाल थे,3,124 वैरागी थे और 4577 देशी लोग ( संभवतः लोकल) लोग थे।"
(Pilgrim Tax and Temple Scandals: Prabhat Mukerji p. 63)
अब यह सोचिये कि जिनसे टैक्स लिया गया उनकी संख्या बची - 21879 जिनसे 2 रुपये से 10 रुपये के बीच मे टैक्स वसूला गया। 1806 के 10 रुपये का मूल्य आज कितना होगा?
यह था सोने का भारत - 1800 तक भारत की जीडीपी घटी अवश्य थी परंतु 24 से घटकर 20% तक ही आयी थी।
अभी तक भुखमरी और संक्रामक बीमारियों की महामारियां आयी नही थी। इसीलिए 1897 में हैमिलटन बुचनन के द्वारा दक्षिण भारत के सर्वेक्षण वाली 1500 पेज की पुस्तक में #अछूतों का जिक्र तक नहीं है।
अम्बेडकर जी के इस डॉक्यूमेंट को विश्व के कितने लोगों ने लिख पढ़ कर उसका पुनर्लेखन किया होगा ?
ये है "माइंड मैनीपुलेशन" का गेम जो #एलियंस_एंड_स्टुपिड_प्रोटागोनिस्ट्स भारत मे खेल रहे हैं पिछले एक शताब्दी से।
लेकिन किसी ने आज तक इनका काउंटर नही किया।
आज लोथियन समिति की समीक्षा और आलोचना समाप्त किया।
वैसे तो यह एक बड़ी पुस्तक का अंश है, लेकिन यह अपने आप अकेले में भी पूर्ण है।
देखते हैं कि किस तरह आगे आती है।
#राजशिल्प_से_अछूतपन_की_यात्रा
आज से 350 वर्ष पूर्व 1651 में निर्मित उदयपुर निर्मित जगदीश मन्दिर।
अब इसकी आर्थिक और सामाजिक पृष्ठिभूमि को देखा जाय। ऐसा अद्भुत वास्तुकला का उदाहरण आज भी मिलना असंभव है। 350 साल पहले आर्किटेक्ट नही होते थे, जो सीना चौड़ा करके घूमते हों।
राजशिल्पी अवश्य हुवा करते थे।
1600 के आसपास भारत विश्व की 30% जीडीपी का उत्पादक था। आज बजट आया है। आप जीडीपी का महत्व समझ सकते हैं।
इसके निर्माण हेतु गरीबों का खून नही चूसा जाता था जैसा कि आने वाले मात्र 100 साल बाद शुरू हो जाएगा।
कौन निर्मित करता था इनको?
ब्राम्हण क्षत्रिय वैश्य या शूद्र ?
इनको निर्मित करने वाले थे राजशिल्पी। शूद्र  जिनको कौटिल्य ने बताया था वार्ता में करकुशीलव -"एक्सपर्ट इन टेक्नॉलॉजिकल साइंस"
यह अकेला मन्दिर नही है भारत मे।
 ऐसे हजारों मन्दिर हैं। कुछ इन्हीं एक्सपर्ट करकुशीलव द्वारा निर्मित  खूबसूरत मंदिरों और महलों के फोटोग्राफ यहाँ और भी दिए जा रहे हैं।
ये जीवित और दुर्लभ प्रमाण हैं जो उन्हीं शूद्रों द्वारा निर्मित किये गए हैं जिनको साइमन और लोथियन नामक ब्रिटिश दस्युओं से मिलकर अम्बेडकर जी ने 1932 में अछूत घोसित किया, और 1946 में अपनी पुस्तक #WhoWereTheShudras, में मेनियाल अर्थात नीच घोसित  किया।  

इन दस्युवों के द्वारा भारत के धन वैभव की के लूट  सत्यता और उसके द्वारा भारतीय समाज की दुर्दशा का वर्णन आज तक - कार्ल मार्क्स विल दुरंत, जे सुन्दरलैंड, रोमेश दत्त, गणेश सखराम देउस्कर, दादा भाई नौरोजी, पॉल बैरोच अंगुस मैडिसन, एस गुरुमूर्ति, शशि थरूर ने लिखकर और बोलकर प्रस्तुत किया है।
उस पर भारतीय बुद्धिजीवी कब बात करेंगे?
कब तक अनजाने समय काल के शम्बूक और एकलव्य की कथा सुनाकर उनको भरमाओगे?
आओ शास्त्रार्थ करो।
जब ईसाइयों,  विलियम जोंस और मैक्समूलर आदि ने  पढ़ाया कि आर्य यानी सवर्ण बाहर से आये थे और उन्होंने यहां के मूल निवासियों को गुलाम बनाया। तब भारत की जीडीपी नष्ट होकर मात्र 1.8% बची थी। करोड़ो लोग भूंख और संक्रामक बीमारियों सेपरिचय मृत्यु की गोंद में समा गए। 1750 से 1947 के बीच भारत मे एक भी मन्दिर न बना। क्यों ?
न बनाने का धन था और न ही वे आर्किटेक्ट जिंदा बचे जिनको राजशिल्पी कहते थे।
45 ट्रिलियन डॉलर लूटकर ले गए। यह बात भारत सरकार के विदेशमंत्री ने अभी कुछ माह पुर्व बोला था। आज की तिथि में यह संपत्ति ब्रिटेन के 17 साल की जीडीपी के बराबर है।
चल संपत्ति लूट ले गए।
कोहिनूर हीरा कभी भी लुटेरों की रानी के मुकुट में शोभित हो रहा है। बेशर्मी का अवशेष।
अचल संपत्ति कैसे लूटकर ले जाते?
ये मंदिर उसी अचल संपत्ति और सोने की चिड़िया रहे भारत का एक प्रामाणिक उदाहरण है।

आज से कुछ वर्ष पूर्व मुझे सिल बट्टा चाहिए था। जो लोग चिलबिला क्रासिंग से पहले गुजरे होंगे उन्हें याद होगा कि रेलवे लाइन के बगल कुछ झुग्गी झोपड़ियां थी। वे लोग सिल बट्टा बनाकर बेंचते थे।
मैंने गाड़ी रोककर एक सिल बट्टा खरीदा उसका मूल्य चुकाया और उस व्यक्ति से पूंछा कि भैया -" कौन जात हो?"
उसने बड़ी ठसक के साथ बताया कि साहब राजशिल्पी।
मैंने कहा कि अब सरकारी हिसाब से कौन जात हो।
उसने बताया कि अनुषुचित जाति।

उसकी ठसक में उसके जाति कुल का गौरव छलक रहा था। जाति का अर्थ होता है कुल, वंश वृक्ष।
इसका अर्थ कास्ट नही होता।
किसी कुल में जन्म लेने से कोई अगड़ा पिछड़ा कैसे होता है भाई?
लेकिन तुमको तुम्हारे अंग्रेजी बापों ने बताया कि कास्ट हिंदुओं की सबसे बुरी बीमारी है।
और बाबा साहेब और उनके चेलान्दु तबसे #Annihilation_Of_Caste किये जा रहे हैं।
कोरोना ने प्रामाणिक रूप से सिद्ध किया है कि #अछूतपन ( social distancing ) और #शौच ( hygine)  की उत्पत्ति का कारण ऊपर वर्णित संक्रामक रोग और महामारियां थी, जिनके कारण 1850 से 1947 के बीच करोङों भारतीयों की मृत्यु हुयी। मृत्यु से बचने के भय से यह सामाजिक बीमारी उतपन्न हुयी, जिसका अंग्रेजो ने राजनीतिकरण और विधानिकरण किया - अपने अपराधों पर पर्दा डालने तथा ईसाइयत में धर्म परिवर्तन का आधार निर्मित करने हेतु।
आज देखिये कौन सा वर्ग उन ईसाई मशीनरियों के निशाने पर है? उत्तर मिलेगा: SC and ST।
यदि यह गलत बात हो तो बताइए?

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