एक मित्र ने प्रश्न पूछा कि,
'बचपन में 'ञ' पढ़ाया गया था, आज तक समझ नहीं आया कि उसका प्रयोग कहाँ करना है?'
यह प्रश्न आना स्वाभाविक है, इसका उत्तर देने का प्रयास कर रही हूँ।
पर उन लोगों को समझाने के लिए नहीं है जिन्हें knowledge सरल और 'ज्ञान' कठिन शब्द लगता है।
जब उन्हें पता चलेगा कि ज् +ञ = ज्ञ होता है तो उनके लिए हिन्दी भाषा और क्लिष्ट दिखायी पड़ सकती है।
चलिए 'क' 'च' 'ट' वर्ग
के अंत में आने वाले पञ्माक्षरों को जानते हैं।
हिंदी भाषा में “ञ” “ङ” "ण" "न" "म" को पञ्चमाक्षर के रूप में जाना जाता है।
पञ्चमाक्षर का प्रयोग संस्कृत में बहुतायत में पाया जाता है।
संस्कृत या कहें कि देवनागरी लिपि इन अक्षरों के बिना अधूरी है।
परंतु लिखने में तथा छपाई में होने वाली क्लिष्टता से बचने के लिए शनैः शनैः इन पञ्चमाक्षर का प्रयोग हम छोड़ते चले गए।
जैसे कि चंद्रबिंदु का प्रयोग भी कई लोग कम करना शुरू कर दिए हैं।
जैसे अब “गाँव” को आप अक्सर “गांव” लिखा हुआ ही पाते होंगे।
अब रही बात “ञ” के प्रयोग की या “ङ” के प्रयोग की तो जिन शब्दों के उच्चारण में “अ” की ध्वनि आधी और साथ ही साथ अनुनासिक ध्वनि का प्रयोग करना हो वहां उस वर्ग के के पञ्चमाक्षर का प्रयोग करते हैं।
जैसे चवर्ग का अंतिम अक्षर का उपयोग कर लिखा जाने वाला “चञ्चल” को अब “चंचल” लिखा जाने लगा है। कवर्ग का अंतिम अक्षर का प्रयोग कर लिखे जाने वाले “गङ्गा” को अब “गंगा” लिखा जाने लगा।
अतः निष्कर्ष यही निकलता है कि भाषा की शुद्धता तथा उच्चारण की अस्पष्टता के लिए ञ” “ङ” जैसे शब्द जरूरी है
पर क्लिष्टता के नाम पर भाषा में अशुद्धियों की मिलावट कर ली गयी है।
'ञ' चवर्ग का अन्तिम व्यंजन अक्षर है । ञ का उच्चारण स्थान तालू और नासिका है ।
'ञ' से हिंदी शब्दों का आरम्भ या अंत नहीं होता। परंतु यह महत्त्वपूर्ण ध्वनि है और अनेक भाषाओं में इसका प्रचुर प्रयोग होता है और हिंदी शब्दों में, बीच में, 'ञ' प्रयुक्त होता है।
चवर्ग के व्यंजनों से पूर्व आकर 'ञ' उनसे संयुक्त अक्षर बनाता है। जैसे- चञ्चल, वाच्छा, रञ्जन, सञ्झा इत्यादि।
ज् और ञ का संयुक्त रूप 'ज्ञ' 'ज्ञ' (अज्ञ, ज्ञान, विज्ञापन) लिखा जाता है। 'ज्ञ' (अर्थात् ज्ज्ञ) का अशुद्ध उच्चारण हिंदी भाषी प्राय: 'ग्य' करते हैं। उदारणार्थ, 'ज्ञान' का शुद्ध उच्चारण 'ज्ञान' होना चाहिए परंतु शताब्दियों से इसे 'ग्यान' बोला जाता रहा है। 'ञ' के स्थान पर प्राय: अनुस्वार जैसी बिंदी का प्रयोग सुविधा के लिए प्रचलित है (जैसे- चंचल, वांछा, रंजन, संझा इत्यादि में) परन्तु इसे अनुस्वार समझने का भ्रम हो सकता है। इसी क्रम में जितने भी च वर्ग के संयुक्ताक्षर हैं, जैसे कि पाञ्चजन्य, रञ्जक, सञ्चालन, सञ्जय, धनञ्जय आदि उनमें नियमतः ञ ही प्रयुक्त होना चाहिए।
✍🏻डॉ अभिलाषा
जिज्ञासा...
म्लेच्छभाषा किसे कहते हैं?
समाधानम्...
संस्कार रहित (असंस्कृत) कुत्सित तथा अपशब्दों से युक्त भाषा को म्लेच्छभाषा कहा जाता है।
तथा
प्रकृति-प्रत्यय विभागपुरस्सर नियतार्थबोधक शब्दयुक्त भाषा को संस्कृत भाषा कहते हैं।
इसीलिए संस्कृत को सुरभाषा कहा जाता है,तद्
भिन्ना भाषा....स्वयं कल्पना करें।
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पाणिनि व्याकरणानुसार
म्लेछँ (धातु चुरादि) अव्यक्तायां वाचि =म्लेच्छयति
म्लेछँ (भ्वादि) अव्यक्तशब्दे =म्लेच्छति
अव्यक्तशब्द का अर्थ है अपशब्दना
म्लेच्छति म्लेच्छयति =असंस्कृतं वदतीति अपभाषणं करोतीति म्लेच्छः।
इसीलिए कहा जाता है कि "धृतव्रतो विद्वान् न म्लेच्छयति/म्लेच्छति परन्तु मूढो मूर्खस्तु म्लेच्छयति/म्लेच्छति एव।"
महाभाष्य पस्पशाह्निक में व्याकरणाध्ययन् के प्रयोजन प्रकरण में लिखा है.. "तस्मात् ब्राह्मणेन न म्लेच्छितवै नापभाषितवै म्लेच्छो ह वा एष यदपशब्दः।"
कैयट कहते हैं म्लेच्छितवै का अर्थ है अपभाषितवै।।
साभार: समर्थ श्री
✍🏻पवन शर्मा की वॉल से
भगवान् विष्णु के लेखाकार चित्रसेन या चित्रगुप्त सम्भवतः गन्धर्व थे , गान्धार प्रदेश की चित्राल घाटी का नाम यही सङ्केत करता है। पहले पहल लिपि चित्रात्मक ही बनी इसलिए तूलिका और चित्र शब्द लेखन के सम्बन्ध में प्रयुक्त होते थे। ऋग्वेद के कुछेक मन्त्रों में भी चित्रलिपि के होने के विषय में स्पष्ट घोष है।
लिपि, अक्षर, लिखित शब्द तब तक निष्प्राण ही होते हैं जब तक प्राणयुक्त न हों अर्थात् उच्चरित न हों । श्वास रहित निर्जीव ही होता है।
आज लेखनी की भी पूजा होती है, उन पूर्वजों को नमस्कार जिन्होंने करोड़ों सार्थक वाक्य लिखे, जिन्हें एक जन्म में पूरा नहीं पढ़ा जा सकता ।
कहते हैं गणेश जी ने अपने एक दाँत को ही लेखनी बना लिया था , इषीक , नरकुल , पक्षियों के पंख, नख, छेनी न जाने किन किन वस्तुओं से लेखन कार्य किया जाता रहा।
फाउण्टेन पेन, छापाखाना, और बॉल-प्वाइण्ट पेन के आविष्कर्ता भी समादरणीय हैं।
जकरबर्गवा किताब पर लिखवाता है, नाम धरे है फेसबुक। कॉपीबुक जिस पर लिखा जाता है उसे भी अँगरेज 'बुक' ही कहता है और 'कॉपी' का अर्थ नकल करना ही होता है, मतलब अँगरेजों ने लिखना पढ़ना दूसरों से ही लिया है।
विक्रमार्क अन्तर्वेदी
कक्को केवलो !
#ओलम
ककहरा से सीखने के सोपान चढ़ने का सिलसिला बड़ा पुराना है। पढ़ाई कैसे होती थी, शिक्षा विषयक नारदीय आदि किताबों में बड़ी बड़ी बातें हैं लेकिन ककहरे का क्रम बौद्ध ग्रन्थों में मिल जाता है, सिद्धमातृका के नाम से लिपि का एक पाठ भी भारत से जापान गए एक बौद्ध ग्रन्थ में मिला है।
सामान्य मित्र अत्रि विक्रमार्क अन्तर्वेदी जी का धन्यवाद कि उन्होंने हमारा ध्यान ओलम ( इल्म से मिलता जुलता, लेकिन मलयालम में सुरक्षित शब्द) शब्द की ओर खींचा और बताया कि यह ककहरा सीखने और प्रशिक्षण की पहली पोथी के अर्थ में है। इसके आसपास का ओली शब्द राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र में मिलता है जिसका आशय लिखना, दाखिला देना होता है।
मित्र इस ककहरे को संभाल कर रखें। यह कुल 46 अक्षरों का है :
मातृका ( ओलम ) ^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^
यदा अकारं परिकीर्तयन्ति स्म, तदा अनित्यः सर्वसंस्कारशब्दो निश्चरति स्म।
आकारे परिकीर्त्यमाने आत्मपरहितशब्दो निश्चरति स्म।
इकारे इन्द्रियवैकल्यशब्दः।
ईकारे ईतिबहुलं जगदिति।
उकारे उपद्रवबहुलं जगदिति।
ऊकारे ऊनसत्त्वं जगदिति।
एकारे एषणासमुत्थानदोषशब्दः।
ऐकारे ऐर्यापथः श्रेयानिति।
ओकारे ओघोत्तरशब्दः।
औकारे औपपादुकशब्दः।
अंकारे अमोघोत्पत्तिशब्दः।
अःकारे अस्तंगमनशब्दो निश्चरति स्म।
ककारे कर्मविपाकावतारशब्दः।
खकारे खसमसर्वधर्मशब्दः।
गकारे गम्भीरधर्मप्रतीत्यसमुत्पादावतारशब्दः।
घकारे घनपटलाविद्यामोहान्धकारविधमनशब्दः। ङकारेऽङ्गविशुद्धिशब्दः।
चकारे चतुरार्यसत्यशब्दः।
छकारे छन्दरागप्रहाणशब्दः।
जकारे जरामरणसमतिक्रमणशब्दः।
झकारे झषध्वजबलनिग्रहणशब्दः।
ञकारे ज्ञापनशब्दः।
टकारे पटोपच्छेदनशब्दः।
ठकारे ठपनीयप्रश्नशब्दः।
डकारे डमरमारनिग्रहणशब्दः।
ढकारे मीढविषया इति।
णकारे रेणुक्लेशा इति।
तकारे तथतासंभेदशब्दः।
थकारे थामबलवेगवैशारद्यशब्दः।
दकारे दानदमसंयमसौरभ्यशब्दः।
धकारे धनमार्याणां सप्तविधमिति।
नकारे नामरूपपरिज्ञाशब्दः।
पकारे परमार्थशब्दः।
फकारे फलप्राप्तिसाक्षात्क्रियाशब्दः।
बकारे बन्धनमोक्षशब्दः।
भकारे भवविभवशब्दः।
मकारे मदमानोपशमनशब्दः।
यकारे यथावद्धर्मप्रतिवेधशब्दः।
रकारे रत्यरतिपरमार्थरतिशब्दः।
लकारे लताछेदनशब्दः।
वकारे वरयानशब्दः।
शकारे शमथविपश्यनाशब्दः।
षकारे षडायतननिग्रहणाभिज्ञज्ञानावाप्तिशब्दः। सकारे सर्वज्ञज्ञानाभिसंबोधनशब्दः।
हकारे हतक्लेशविरागशब्दः।
क्षकारे परिकीर्त्यमाने क्षणपर्यन्ताभिलाप्यसर्वधर्मशब्दो निश्चरति स्म॥
इति
कुल ४६ वर्णाक्षरों का ज्ञान मिला, और सबका प्रयोग नकारात्मकता में है ।
'क' से कबूतर , कमल , कलम कुछ भी बता सकते हैं, किन्तु शिशु को जैसा प्रथम बार बता देंगे वह आजीवन अमिट रहेगा। ग से गमला बताइये चाहे ग से गणेश या ग से गधा।
लिपियां - छोटा देश, बड़ा लिपि संसार
हमारे यहां कई लिपियां थीं। पहली सदी तक चौंसठ लिपियां अस्तित्व में थीं। इन लिपियों के अलग-अलग नाम भी मौजूद हैं। यह कैसे हुआ, कोई नहीं कह सकता, मगर लिपियों का इतनी संख्या में होना जाहिर करता है कि ये सब एकाएक नहीं आ गई।
एक छोटे से देश में इतनी लिपियां और उनको लिखने की परंपरा,.. बुद्ध जब पढने जाते हैं तो पहले ही शिक्षक को 64 लिपियों के नाम गिनाते हैं जिनमें पहली लिपि ब्राह्मी हैं। महाभारत में विदुर को यवनानी लिपि के ज्ञात होने का जिक्र आया है, वशिष्ठस्मृति में विदेशी लिपि का संदर्भ है। किंतु ब्राह्मी वही लिपि है जिसको चीनी विश्वकोश में भी ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न करना बताया गया है..।
पड़ नामक लिपि खोदक का नाम अशोक के शिलालेख में आता है, जो अपने हस्ताक्षर तो खरोष्टी में करता था और लिखता ब्राह्मीलिपि। हालांकि अशोक ने अपनी संदेशों को धर्मलिपि में कहा है...। सिंधु-हडप्पा की अपनी लिपि रही है, इस सभ्यता की लिपि के नामपट्ट धोलावीरा के उत्खनन में मिल चुके हैं...। कुछ शैलाश्रयों में भी संकेत लिपि के प्रमाण खोजे गए हैं।
ऐसे में ब्यूलर वगैरह उन पाश्चात्य विद्वानों के तर्कों का क्या होगा जो भारतीयों को अपनी लिपि का ज्ञान बाहर से ग्रहण करना बताते हैं। भारत में लिपियों का विकास अपने ढंग से, अपनी भाषा और अपने बोली व्यवहार के अनुसार हुआ है। हर्षवर्धन के काल में लिखित 'कादम्बरी' में राजकुमार चंद्रापीड़ को अध्ययन के दौरान 'सर्वलिपिषु सर्वदेश भाषासु' प्रवीण किया गया।
इस आधार पर यह माना जाता है कि उस काल तक लोग सभी लिपियां जानते थे, अनेक देश की भाषाओं को जानते थे। उनको पढ़ाया भी जाता था। लगता है कि भारतीयों को अनेक लिपियों का ज्ञान होता था और उनकी सीखने में दिलचस्पी थी। तभी तो हमारे यहां लिपिन्यास की परंपरा शास्त्रों में भी मिलती है। लिपिन्यास का पूरा विधान ही अनुष्ठान में मिलता है.. इस संबंध में एक बार फिर से प्रकाशित भारतीय प्राचीन लिपिमाला की भूमिका लिखी है पिछले दिनों,,, जिक्र फिर कभी।

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद