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गृहस्थाश्रम नीलकण्ठ शंकर बनाने की हैसियत रखता है उसे तथाकथित संन्यास के लिए त्यागना मूर्खता ही नहीं पाप है

तड़पताता संन्यास बनाम खपता गृहस्थ आजकल गुरुओं के विषय में मेरे मन में ज़रा अलग सा खयाल आने लगा है...... कभी किसी गुरु को संन्यास के लिए किसी को प्रेरित नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करना उस व्यक्ति के साथ तथा उसके मातापिता के साथ ज्यादती करना है।संन्यास क्रिया नहीं है बल्कि विवेकोचित त्याग का परिणाम है। सच्चा संन्यास घर में ही जन्मता है।घर में ही पलता है।जो घर छोड़ता है वह भी एक नया घर ( तथाकथित आश्रम)बनाता है। उसे नये घर का मोह हो जाता है साथ ही अपने बूढ़े मातापिता को असहाय छोड़ने का पाप भी लगता है। आजकल तो ट्रेण्ड चल पड़ा है कि गुरु कुछ आकर्षक मुद्दे लेकर समाज में जाते हैं और फिर पब्लिसिटी कमाने की भूख बढ़ती ही जाती है उनकी..........एक विवेकी आदमी क्या गृहस्थी नहीं हो सकता? या क्या एक घर में रहने वाला आदमी विवेकी नहीं हो सकता है?? किसी को आकर्षित / मोहित करने की चाह रखने वाला स्वयं ही उससे मोहित हो जाता है और आकर्षित हो जाता है।किसी से मोहित होना या मोहित करना दोनों अविवेक है , अज्ञान है और अज्ञानियों की दुर्गति तय है वह चाहे गुरु हो या शिष्य...... अपने को पुजवाने की चाह भयंकर अज्ञान है ! यह सब मैं सुनी-सुनायी बात नहींं कह रहा हूँ बल्कि कई-कई बार देश के विभिन्न सम्प्रदाय के संतो के आश्रमों में अकेले जाकर पखवाड़े-महीनेंं बिताकर/देखकर समझकर/सोचकर चिन्तन करके कह पा रहा हूँ। ऐसा नहीं है कि मुझे संत नहीं मिले।संत भी मिले ।उन्होंने प्यार भी लुटाया और समझाया भी कि "तुम्हें संत बनना नहीं है संत होना है।" यह अलग बात है कि मैं अभीतक संत नहीं हो पाया और उस चिकने से खम्भे में एक बिल्ली के बच्चे की तरह चढ़ता हूँ और सरककर नीचे आ जा रहा हूँ, बार-बार आ जा रहा हूँ।प्रक्रिया जारी है लेकिन विश्वास है कभी न कभी सफलता मिल सकता है गृहस्थाश्रम वास्तविक तपोभूमि है।तपना पड़ता है यहाँ... जिम्मेवारी निभानी होती है। स्वयं एक सच्चे मातापिता होना होता है साथ ही अपने मातापिता की प्राणपण से सेवा करनी होती है। अपना-अपना परिवार चला रहे अपने भाई- बहनों की समय-समय पर भरपूर निस्स्वार्थ मदद भी करनी होती है।उनके बच्चों को भी आगे बढ़ने में हर तरह का सहयोग करना होता है।पत्नी को खुश रखना होता है।पत्नी के मातापिता और पत्नी के भाईबहनों का भी उसी तरह से सहयोग करना होता है जैसे अपने मातापिता और भाईबहनों का सहयोग किया जाता है ।ऐसा करके घर से महाभारत को हटाकर रामायण की प्रतिष्ठा करनी होती है। पूरी ज़िन्दगी की कमाई से ज़मीन खरीदकर एक सपनो का घर बनाना होता है साथ ही भाई-बन्धुओं के घर बनाने में सहयोग भी करना होता है।अपनी बेटी ब्याहनी होती है अन्य भाईबन्धुओं की बेटी के ब्याह में सहयोग करना होता है। समय-समय पर अन्य रिश्तेदारों, मित्रों,पड़ोसियो असहायों, वंचितों का भी यथासंभव सहयोग करना होता है और बदले में निन्दा और नकारात्मक आलोचना के ज़हर को भी पीना होता है।पीना ही नहीं होता पचाना भी होता है।नीलकण्ठ बनना होता है। तो भाई ! जो गृहस्थाश्रम नीलकण्ठ शंकर बनाने की हैसियत रखता है उसे तथाकथित संन्यास के लिए त्यागना मूर्खता ही नहीं पाप है।...हाँ बुद्ध जैसा जन्मजन्मान्तर का वैराग्य फूट पड़े तो कभी भी घर से निकल जाना पाप नहीं है क्योंकि फिर सारी दुनिया ही अपना घर हो जाती है। यदैव विरजेत् तदैव प्रवजेत् ! लेकिन याद रखा जाए सिद्धार्थ को किसी ओशो ने विवश नहीं किया था,किसी जग्गी वासुदेव ने उकसाया नहीं था..... ताप से डरके अपने बाप को त्यागने से भगवान् का शाप लगता है और उस शाप की छाप ऐसे पड़ती है कि सारा जीवन संसार की पदचाप सुनने में बीतता है। मैंने तथाकथित गुरुओं को अपने ध्यानकक्ष में बैठकर आगन्तुकों के पदचाप की प्रतीक्षा करते देखा सुना है क्योंकि जब वे पहुँचते हैं तभी गुरु अपनी माया फैला पाते हैं और उनसे कुछ "माया" लूट पाते हैं।अरे...धिक्कार है ऐसै संन्यास को जो परतंत्र बना दे...पूजा प्रतिष्ठा>सम्मान/स्तुति/ प्रसिद्धि का दास बना दे।इससे लाख गुना नहीं करोड़ गुना मरता/पिसता घुटता/खपता गृहस्थ जीवन श्रेष्ठ है। दत्तक(तथाकथित) पुत्र का तथाकथित पिता बनने से बेहतर है अपने पुत्र का ही पिता बना जाए और तीनों ऋणों को चुकाया जाए..तड़पते हाँफते संन्यास से खपता गृहस्थ वरेण्य है ! मुक्ति का द्वार है। ऐसे सौ-सौ संन्यासी से एक गृहस्थ श्रेष्ठ है। मौनी बाबा कहलाकर प्रवचन देने से लाख गुना अच्छा है एक अच्छा भाषण देने वाला बना जाये। ब्रह्मचारी जी कहलाकर पिता बनने से श्रेष्ठ है विवाह करके पिता बना जाये।त्यागी जी कहलाकर एयरकंडीशनर कमरे में रहने से बेहतर है कि अपने मेहनत की कमाई से एक महल बनाया जाये।मैं संन्यासधर्म का विरोधी नहीं हूँ बल्कि वर्तमान में संन्यासियों के वेश में तथाकथित छद्मवेशी मुझे अब प्रिय नहीं लगते ।नहीं लगते तो नहीं लगत मेरी पिछली पोस्ट,जिसमें मैंने तथाकथित संन्यास की अपेक्षा गृहस्थाश्रम को श्रेष्ठ माना है; उससे मुझे संन्यास विरोधी न समझा जाये।ये संन्यासी ही हैं जो विधर्मियों के हजारों आक्रमणों के बाद भी सत्यसनातन धर्म को धारण किये रहे। अपने त्याग,विवेक और सदाचार से न केवल हिन्दुओं का मार्गदर्शन किया अपितु समग्र विश्व को एक दिशा भी दिया।सच्चे संन्यास के लिये साहस चाहिए जो अभी भी हमारे समाज में शेष है। संन्यासी के लिए समस्त अस्तित्व परमात्मा का प्रसाद है।वह सबके मंगल के लिए ही जीता है। जिसके जीवन में सच्चे संत नहीं हैं वह जीवन जीवरहित है ।मेरे जीवन में भी कुछ संत आये हैं जिनके विषय में मैं शीघ्र ही कुछ संस्मरण आप लोगों के समक्ष रखूँगा।इसलिए रखूँगा ताकि आमजन इस बात पर विश्वास करते रहें कि आज भी सच्चे संत हैं.....

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