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भारत के शस्त्र और शास्त्र का अद्भुत संयोग, अश्वविद्या के ग्रंथ शालिहोत्र शास्त्र का लेखन महाराजा भोज और विद्वान वररूची





 


वाणी के चार प्रकार
हयो भूत्वा देवानवहद्
वाजी  गन्धर्वान्
अर्वाऽसुरान्
अश्वोमनुष्यान्
Horse  को  देव हय कहते हैं.
         गन्धर्व  वाजि  कहते हैं
         असुर  अर्व  कहते हैं
         मनुष्य  अश्व  कहते हैं ।
हमलोग  घोड़ा  कहते  हैं ।
लकड़ी की काठी
काठी पे घोड़ा
घोड़े की दुम पर जो मारा हथौड़ा
बाते हैं बातों का क्या
ओर नहीं छोर नहीं
सिर नहीं पैर नहीं

#उत्तर_प्रदेश के #बागपत जिले का एक छोटा सा गांव #सिनौली आज विश्व के सारे इतिहासकारों के लिए आश्चर्य का विषय बना हुआ है। कारण यह कि दो वर्ष पूर्व हुए उत्खनन में वहाँ भूमि से कांसे-तांबे के कीलों से बने रथ, और तलवारें आदि मिली हैं। कार्बन डेटिंग पद्धत्ति से हुई जांच उन्हें 3800 वर्ष प्राचीन बताती है। अर्थात ये चीजें 1800 ईस्वी पूर्व की बनी हुई हैं। रथ का डिजाइन बता रहा है कि उसमें घोड़े जोते जाते होंगे। उस छोटे से हिस्से में हुई खुदाई से मिली चीजें प्रमाणित कर रही हैं कि तब इस क्षेत्र में एक अस्त्र-शस्त्रों से सम्पन्न विकसित लड़ाकू सभ्यता थी।
     मजेदार बात यह है कि हमारे यहाँ इतिहास की किताबों में पढ़ाया जाता है कि #भारत में रथ और घोड़े बाहर से आर्यों के साथ आये, और आर्य भारत में पश्चिम से सिंधुघाटी सभ्यता को उजाड़ कर आये। सिंधु घाटी सभ्यता का समापन काल लगभग 1000 ईस्वी पूर्व का बताया जाता है, अर्थात लगभग उसी समय भारत में आर्य आये।
      आर्यों के मूल स्थान के सम्बंध में भी यूरोपियन्स और भारत के कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने खूब भ्रम फैलाया है। उन्हें मध्य एशिया, हंगरी, डेन्यूब घाटी, दक्षिण रूस, आल्प्स पर्वत, यूरेशिया, बैक्ट्रिया और जाने कहाँ कहाँ से आया बताया गया है। प्रयास यह सिद्ध करने का था कि आर्य कहीं के भी हों भारत के नहीं थे। इसके लिए मैक्समूलर, गौइल्स, जे.जी. रोड, मेयर, पिग, रामशरण शर्मा, रोमिला थापर, और जाने किस किस ने अपनी मनगढ़ंत थ्योरी से आर्यों की उत्पत्ति के सम्बंध में रायता फैलाया है। आर्यों के भारत आने के समय को लेकर भी अलग-अलग दावे किये गए हैं, पर अधिकांश इतिहासकार 1500 ईस्वी पूर्व पर एकमत हैं।
      अब सिनौली में इसके लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व के तीन तीन रथों का मिलना इतिहास के षड्यंत्रों को नंगा कर रहा है।
      आजादी के बाद गढ़ा गया भारत का इतिहास शायद आधुनिक युग में विश्व का सबसे मूर्खतापूर्ण षड्यंत्र है। चंद विदेशी सिक्कों से अपनी कलम बेंच चुके फर्जी इतिहासकारों ने अपने इतिहास को जिस तरह निर्दयतापूर्वक विकृत किया वह बड़ा ही घिनौना है। आर्यों को बाहर से आना और यहाँ के मूल निवासियों को दास बनाने जैसे समाज में विद्वेष फैलाने वाले दावों से समाज को खंडित करने का जो प्रयास इन विदेशी शक्तियों ने किया वह बताता है कि भारत के प्राचीन गौरव को कलंकित करने का षड्यंत्र कितना शक्तिशाली था।
     आपको जान कर आश्चर्य होगा कि पश्चिमी विद्वानों ने आर्यों को आक्रांता सिद्ध करने के लिए कैसे कैसे हास्यास्पद तर्क गढ़े हैं। उदाहरण देखिये, सीरिया के पास बोगजकोइ नामक स्थान पर हुई खुदाई में लगभग 4000 वर्ष प्राचीन संस्कृत के कुछ अभिलेख मिले जिनमें इंद्र, सूर्य, मरुत आदि देवताओं के नाम हैं। इस आधार पर अंग्रेज इतिहासकारों ने यह दावा कर दिया कि आर्य वहीं मध्य एशिया से निकल कर भारत आये। जबकि इसका अर्थ यह निकलना चाहिए कि भारतीय वैदिक आर्यों का प्रसार ईरान-सीरिया तक था, क्योंकि इसके अनेक साहित्यिक साक्ष्य मौजूद हैं।
      सभ्यताओं के विमर्श में स्वयं को बड़ा सिद्ध करने के दो ही मार्ग होते हैं। या तो स्वयं का इतना उत्थान करो कि बड़े हो जाओ, या जो बड़ा है उसे किसी भी तरह छोटा सिद्ध कर दो। यूरोपियन्स ने स्वयं को सनातन से बड़ा दिखाने के लिए दूसरे रास्ते को अपनाया। भारत की प्राचीन संस्कृति इतनी विकसित और शक्तिशाली थी कि उसके समक्ष यूरोप का अंधा इतिहास कहीं खड़ा ही नहीं हो सकता था। सो उसे छोटा सिद्ध करने के लिए आर्यों को बाहरी और भेदभाव करने वाला बताया गया। पर सत्य को षड्यंत्रों से नहीं मारा जा सकता।
     सिनौली में मिले साक्ष्यों ने आर्यों को लेकर गढ़ी गयी सारी पुरानी थ्योरी को बकवास सिद्ध दिया है। इससे यह दावा समाप्त हो जाता है कि आर्य बाहर से आकर सिंधु घाटी सभ्यता के निवाशियों से लड़े और उनको पराजित कर के भारत में स्थापित हुए। इससे यह सिद्ध होता है कि आर्य-द्रविड़ द्वंद वस्तुतः मूर्खतापूर्ण सिद्धांत है, सच यह है कि सिंधुघाटी सभ्यता और प्राचीन वैदिक सभ्यता दोनों एक ही समय में फल फूल रही दो अलग सभ्यताएँ थीं।
      यह वस्तुतः भारतीय इतिहास के साथ हुए षड्यंत्र की समाप्ति का प्रारम्भ है।
✍🏻लेखक : सर्वेश तिवारी श्रीमुख
एक थे वररुचि : अश्‍वशास्‍त्र के प्रणेता
विक्रमादित्‍य के दरबारियों में एक रचनाकार थे वररुचि। माना जाता है कि वह नवरत्‍नाें में थे, मगर उनकी रचना प्रकिया और उनके विषयों की उपयोगिता पांचवीं सदी के आसपास की लगती है। इसी काल से उनकी उक्तियां मिलती हैं जो पठन-पाठन में व्‍यवहार्य हो गई। उनके ग्रंथों की चर्चा कश्‍मीर तक थी। उत्‍पल भट्ट जैसे विवृत्तिकार के संग्रह में वररुचि का अश्‍वशास्‍त्र विद्यमान था। यह ग्रंथ बहुत ही महत्‍वपूर्ण रहा होगा तभी तो उसने वराहमिहिर के अश्‍ववर्णन प्रसंगों की तुलना वररुचि के विवरण से की। वैसे उत्‍पल का प्रयास रहा है कि वराहमिहिर के ग्रंथों की टीका करते समय जो-जो भी ग्रंथ वराह के सामने रहे, उन सभी को वह टीका में संदर्भ सहित प्रस्‍तुत करें। इसीलिए उसकी टीकाएं सबसे महत्‍वपूर्ण मानी गई हैं।

पिछले दिनों उज्‍जैन में महाराजा विक्रमादित्‍य शोधपीठ के निदेशक आदरणीय डॉ. भगवतीलालजी राजपुरोहित ने वररुचि विरचित ' पत्र कौमुदी' की एक प्रति मुझे दी तो मैंने कहा कि वररुचि वही जिन्‍होंने अश्‍वशास्‍त्र लिखा, तो वह पूछ बैठे- ये अश्‍वशास्‍त्र कौनसा है। मैंने कहा- वही जिसको उत्‍पल ने बताया है।
 बोले- उसको खोजिये। मैंने कहा- तैयार है...।
उत्पल ने वररुचि के अश्‍वशास्‍त्र के केवल संदर्भ ही नहीं दिए, बल्कि पूरा ही अश्‍वशास्‍त्र उद्धृत कर दिया। अच्‍छा हुआ जो एक शास्‍त्र बच गया, वरना यह कौन कह सकता था जिन वररुचि की ख्‍याति निघंटु, सुभाषित वचन और पत्रकौमुदी जैसे रचनाकार की हैसियत से जानी जा रही है, वह अश्‍ववैद्यक या अश्‍वशास्‍त्री भी थे।
वररुचि का अश्‍वशास्‍त्र अधिक बड़ा नही, संक्षिप्‍त है। संक्षिप्‍त ही होना चाहिए क्‍योंकि सूत्र रूप में सही, उन्‍होंने अश्‍वविद्या को लिख दिया। उन्‍होंने कहा कि यह ज्ञान तीनों ही लोक में है, इसको मुनिजन जानते है, यूं तो अश्‍वों के विस्‍तृत लक्षणों को कहना बहुत कठिन हैं, वह जानने में तक कठिन है उनके लिए भी जो अच्‍छी बु‍द्धि वाले हैं मगर जिनको जानकारी नहीं है, उनके लिए संक्षिप्‍त में कहता हूं। मेरी रचना में स्‍पष्‍टता रहेगी, मधुर छंद है और इन्‍हीं के सहारे संक्षेप में अश्‍वों के वर्ण, आवर्त, प्रभा, अंग, स्‍वर, गति सहित सत्‍व, गन्‍ध आदि को कहता हूं :
ज्ञानं त्रैलोक्‍य विद्भिर्मुनिभिर‍भिहितं लक्षणं यद्विशालं
दुर्ज्ञेय तद्वहुत्‍वादपि विमलाधिया किं पुनर्बुद्धिहीनै:।
तस्‍मादेतत् समासात् स्‍फुटमधुरपदं श्रूयतामश्‍वसंस्‍थ
वर्णावर्त्‍त प्रभांगस्‍वरगतिसहितै: सत्‍त्‍वगन्‍धैरुपेतम्।।
मुझे मालूम है कि मोटर साइकिल, बस, कार आदि के दौर में घोड़ों के विषय में जानने की सबकी रुचि कम होगी... अब तो घोड़ा केवल दूल्‍हा बनने पर ही याद आता है मगर याद कीजिएगा कि यह जानवर मानव का इतना खास सखा, सहचर और संगी रहा कि उतना साथी अपना सहोदर भी नहीं रहा। सिकंदर ने अपने अश्‍व का स्‍मारक बनवाया। महाराणा प्रताप का स्‍मारक भले ही ना बना मगर चेटक का स्‍मारक बना। याद है न उसने हल्‍दीघाटी युद्ध के बाद तीन टांग पर दौड़ लगाई, अपनी पुतलियां झाड़कर जिसने सहोदर सहित शत्रु सैनिकों का पीछे लगना भांप लिया, प्रताप को प्राणदान देने के लिए रास्‍ते में पड़े नाले को लांघना उचित समझा और पलक झपकने से पहले ही स्‍वामी के हिस्‍से की मौत को झपट लिया, उसके बदले अपनी जान लगा दी...। कई योद्धाओं के स्‍मारक चिन्‍हों, पालियों-पाडियों, वीरगलों में योद्धाओं के साथ उनके अश्‍वों को भी पूजा जाता है...। सच है न।
वररुचि के इस शास्‍त्र की खोज और उसके पाठ का निर्धारण-अनुवाद सचमुच गौरवस्‍पद होगा। विभूतियों में वर्रेण्‍य वररुचि के बारे में फिर कभी...।
शालिहोत्र - राजा भोज का वाहन शास्‍त्र  
धारा के परमार नरेश राजा भोज अपने साहित्यिक अवदान के लिए मशहूर हैं। उनके नामों की उपाधियां चौरासी, दरबार में विद्वान चौरासी, उनकी लिखी किताबें चौरासी,,, उनकी उम्र चौरासी थी या नहीं, यह तो मालूम नहीं, मगर चित्‍तौड़गढ़ में कुमारकाल बिताने के बाद 1010 से 1050 ई. तक भोजराज ने राज्‍य किया और अपने समय के श्रेष्‍ठ सर्जकों को अपने राजदरबार में आश्रय दिया। स्‍वयं ने भी कृपाण ही नहीं, कलम उठाई और कई ग्रंथ लिखे। उनका लिखा एक ग्रंथ 'शालिहोत्रम्' है।
शालिहोत्र अश्‍व का पर्याय है और युद्धोपयोगी इस पशु ने मानव की जो सहायता की, वह रोचक है। जानवरों के स्‍मारकों के रूप में सिकंदर के समय से ही अश्‍व की समाधियां बनती रही हैं। चाहे महाराणा प्रताप का अश्‍व चेटक ही क्‍यों न हो। अश्‍व विद्या पर भोज ने जिस शालिहोत्रम् की रचना की, वह संक्षिप्‍त किंतु गागर में सागर में भरने वाली कृति है। हालांकि अश्‍वपालन, अश्‍वशाला व अश्‍वों के आहार आदि पर भोज ने समरांगण सूत्रधार में भी पर्याप्‍त लिखा है, वह पहला ग्रंथ है जिसमें पहली बार संक्रमण से बीमारी होने की जानकारी दी गई है।
शालिहाेत्र में कुल 138 श्‍लोक हैं और ग्रंथकार ने अश्‍व पालन-पोषण, चिकित्‍सा आदि पर पर्याप्‍त रूप से जानकारी दी है। वह कहते हैं कि वर्णों के आधार पर श्‍वेत, लाल, पीले, सारंग, पिंग, नीले और काले घोड़े होते हैं किंतु उनमें सफेद अश्‍व श्रेष्‍ठ होता है -
सितो रक्‍तस्‍तथा पीत: सारंग: पिंग एव च।
नील: कृष्‍णोथ सर्वेषां श्‍वेत: श्रेष्‍ठ‍तम:स्‍मृत:।।
इसके बाद घोडों की भंवरियां या आवर्त के बारे में लिखा गया है। अश्‍व की ऊंचाई आदि के प्रमाण के बाद उनके वेग, उन पर आरोहण, श्‍लेष्‍म रक्‍तलक्षण आदि की जानकारी दी गई है। रक्‍तमोक्षण में कहा गया है कि अश्‍व के शरीर में 72 हजार नाडियां होती है और उसके आठ द्वार होते हैं। भोज ने अश्‍व की ऋतुचर्या को लिखने बाद शरद काल, हेमंत, शिशिर एवं वसंत कालीन रोगों की चिकित्‍सा की जानकारी है। घोड़ों के नस्‍य, पिण्‍ड के क्रम में वे विजलिका नामक औषधि का जिक्र करते हैं जो अश्‍वों को बल देने वाली है। इस ग्रंथ पर प्राचीनकाल में नकुल के लिखे 'अश्‍वचिकित्‍स' ग्रंथ का पूरा प्रभाव है।
पिछले दिनों धार की यात्रा के दौरान शालिहोत्र याद आ गया तो सोचा कि इसकी जानकारी आपको भी मिले। यूं भारतीयों के पास अश्‍व के संबंध में लगभग दो दर्जन ग्रंथ है, मगर आज उनमें से एकाध की जानकारी भी शायद ही हो। कभी अश्‍व विद्या का पठन-पाठन हर आम ओ खास के लिए आवश्‍यक होता था क्‍योंकि तब असवारी (सवारी) का मतलब भी 'अश्‍व-सवार' लिया जाता था। यातायात के लिए यह बेहतर सवारी थी।
रथारूढ़ सूर्य
माघ के शुक्ल पक्ष की सप्तमी का महत्व रथ सप्तमी के रूप में रूप में कब से है, मेरे समझ में तब आया जब गूढार्थ गणना संख्या में रथ = 7 का ज्ञान हुआ। आकाश में सप्त ऋषि की स्थिति रथ रूप में बनती है या नहीं, लेकिन सूर्य के वार 7 हैं, ये मूलत: वाह और वाहन है। अश्व को वाहन कहा है और असवार, असवारी तथा सवार या सवारी जैसे शब्द वहीं से आए हैं। अपराजित पृच्छा में सात के लिए रथ शब्द आया है।
6 के लिए रस और 7 के लिए रथ, 8 के लिए अष्ट, 9 के लिए धत् : रसं षटं रथं सप्तं, रिद्धि अष्टं धातु नवम्।
है न रोचक ! भारतीयों ने गणना के लिए गणित दी तो संख्या के लिए अनेक विधियां दी। ये विधियां लगभग बीस प्रकार की हैं। हम केवल एक ही तरह से संख्या लिखते हैं लेकिन ज्योतिष आदि में अनेक रूप हैं और उनको जानना भी बहुत रोचक है...
जय जय।
घोडला : द्वार अंग
कुछ साल पहले तक जब द्वार चौखट वाले और आजू बाजू आलिए वाले बनते थे, उत्तरंग या ऊपर दोनों ओर घोड़े बनाए जाते थे। मान्यता थी कि घर को चलाने के लिए भी अश्वबल चाहिए।
रथ को हांकने के लिए जैसे घोड़े चाहिए, वैसे ही रथ रूप सदन, भवन को चलाने के लिए भी घुडबल अपेक्षित होता है। भवन, मंदिरों के लिए रथ शब्द का प्रयोग भी पुराना है। संहिताओं में दिग्गजों पर पृथ्वी को उठाने के संदर्भ हैं तो लोक में अश्वबल को सवारी, संचालन का पर्याय कहा गया है। शालिहोत्र ने वाह को वास के भी संक्रमण से बल से युक्त कहा है। शायद यह लोक की घोड़े को लेकर प्रचलित मान्यता की ही शास्त्रीय स्वीकारोक्ति है।
द्वार की रचना बहुत कलात्मक होती जैसा कि "अपराजिपृच्छा" और "द्वारदीपिका" में कहा गया है। "प्रमाणमंजरी" में लकड़ी के सुंदर प्रयोग का विवरण आया है और दरवाजे के सौन्दर्य पर जोर दिया गया है। (ये पुस्तकें लेखक की अनूदित है) द्वार को रथाकार माना गया है- त्रिरथ, पंचरथ, सप्तरथिक जैसे शब्दों का द्वार के लिए प्रयोग उनके स्तर के साथ ही भवन के रथ स्वरूप का सूचक भी है।
दरवाजे के घोड़े को लोक बोली में घोड़ला कहा जाता था। दक्षिण के मन्दिरों में खम्भों पर भी सुंदर अश्व रचनाएं मिलती हैं। ये किसी स्थिर रचना की गतिमयता के सूचक हैं, हालांकि लोक ने प्राणीबल को जनबल का हितैषी मानकर उसे आवास में महत्व दिया। अनेक जनजातियों में अपने घरों के द्वार आदि को प्राणियों की आकृतियों से सज्जित करने की परिपाटी है। यही मान्यता लोक से लेकर शास्त्रीय आधार पर निर्देशित की गई।
✍🏻श्रीकृष्ण जुगनू जी की पोस्टों से संग्रहित
भारत में हजारों साल से चली आ रही मौखिक-लिखित कहानियों में कभी कभी ऐसी नायिका का जिक्र भी मिल जाता है जिसकी सहेली कोई चित्र बनाती है। कभी कभी ये लड़की राजकुमारी की सेवा में या उसकी सहेली होती है। अक्सर राजकुमारी को अपनी सहेली के बनाए इस चित्र के नायक से प्यार भी हो जाता है। किसी के रूप सौन्दर्य को देखकर “चित्रलिखित सा खड़ा रह जाना” का जुमला भी साहित्य में मिल जाता है। मानव सभ्यताओं में चित्रकारी की परंपरा हमेशा से रही है।
बाकी और सभ्यताओं से ज्यादा पुरानी होने की वजह से भारत में ये चित्रकारी की परंपरा सदियों में नहीं, हजारों साल से चलती आ रही है। घरों में बनते अल्पना-रंगोली जैसी चित्रकारी को छोड़ भी दें तो बाकायदा अभ्यास से सीखी जाने वाली दस अलग अलग चित्रकारी की विधाएं आराम से निकल आएँगी। राजपूत पेंटिंग, मुग़ल पेंटिंग या तंजावुर पेंटिंग जैसी राजघरानों के प्रश्रय में बढ़ी कला के अलावा और भी कई हैं। कालीघाट, कलमकारी, मंडाना, गोंड, मधुबनी, और फड जैसी कलात्मक विधाएं लोकजीवन में ही रची बसी होती हैं।
गोंड जैसी चित्रकला का इतिहास में भी अपना फायदा है। भीमबेटका जैसे इलाके की गुफाओं पर जो आदिमानवों के बनाये चित्र हैं, उनमें घोड़े पर शिकार भी दर्शाया गया है। वेटिकन पोषित या अन्य आयातित किस्म की विचारधाराओं पर पलते “इतिहासकारों” का रूप धरे उपन्यासकारों की आर्यन थ्योरी में ये भी छेद कर देता है। घुड़सवार और रथारूढ़ हमलावर कहीं और से आये थे और भारत में घोड़े नहीं होते थे, ऐसा इन भित्ति चित्रों को देखने के बाद कहना मुश्किल है। समाज का अलग अलग समय बदलता स्वरुप भी चित्रों में दिख जाता है

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