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सूर्य रथसप्तमी गुप्त नवरात्रि देवी नर्मदे ,गोलवर्कर गुरुजी हिंदू हृदय सम्राट श्री शिवाजीराज महाराज और राष्ट्र चिंतक इतिहासकार आदरणीय श्री धर्मपाल जी के जन्मदिन की शुभकामनाएं

 




 



१. माघ मास (महीने की) शुक्ल सप्तमी को रथसप्तमी मनाई जाती है । इस दिन से सूर्यदेव अपने रथ में बैठकर यात्रा करते हैं । इस रथ में सात घोडे होते हैं; इसलिए रथसप्तमी शब्द का उपयोग किया जाता है २. जिस सूर्य के कारण अंधेरा नष्ट होता है और चराचर में नया तेज, नया जीवन प्राप्त होता है, उस भास्कर की यह पूजा है । यह प्रकाश की, सूर्यदेवता की पूजा है ।
३. स्त्रियां संक्रांति के अवसर पर जो हलदी कुमकुम करती हैं, रथसप्तमी उसका अंतिम दिन माना जाता है ।
(संदर्भ : श्रीधर संदेश, जनवरी २०१४)
महत्त्व
सर्व संख्याओं में सात अंक का महत्त्व विशेष है । सात अंक में त्रिगुणों की मात्रा संतुलित होती है तथा सत्त्वगुण की वृद्धि के लिए आवश्यक चैतन्य, आनंद इत्यादि सूक्ष्म-तरंगें ग्रहण करने की विशेष क्षमता होती है । सप्तमी तिथि को शक्ति और चैतन्य का सुंदर संगम होता है । इस दिन विशिष्ट देवता का तत्त्व और शक्ति, आनंद एवं शांति की तरंगे २० प्रतिशत अधिक मात्रा में कार्यरत होती हैं । रथसप्तमी को निर्गुण सूर्य की (अतिसूक्ष्म सूर्यतत्त्व की) तरंगें अन्य दिनों की तुलना में ३० प्रतिशत अधिक मात्रा में कार्यरत होती हैं ।
सूर्य
सूर्योपासना का महत्त्व
भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म में सूर्य की उपासना का अधिक महत्त्व है ।
१. सूर्योपासना करने से जीव की चंद्रनाडी बंद होकर सूर्यनाडी शीघ्र जागृत होने में सहायता होती है । चंद्र की उपासना की तुलना में सूर्य की उपासना अधिक श्रेष्ठ है ।
२. सूर्य की उपासना करने से सात्त्विकता ग्रहण करने की क्षमता ३० प्रतिशत और चैतन्य ग्रहण करने की क्षमता २० प्रतिशत बढती है ।
३. प्रातः सूर्यदेव को अर्घ्य देकर केवल उनका दर्शन करने से वे प्रसन्न होते हैं, यह उनकी उपासना का एक भाग ही है ।
४. ऊगते सूर्य की ओर देखकर त्राटक करने से नेत्रों की क्षमता बढती है और नेत्रज्योति अधिक प्रबल बनती है ।
५. पंचतत्त्वों की उपासना में सूर्योपासना एक (तेजतत्त्व की उपासना) महत्त्वपूर्ण चरण है ।
६. सूर्यनमस्कार करना : योगासनों में सूर्यनमस्कार व्यायाम का एक महत्त्वपूर्ण प्रकार है । इसमें स्थूल शरीर का उपयोग कर सूर्यदेव को नमस्कार करते हैं । न्यूनतम २० वर्ष प्रतिदिन नियमित सूर्यनमस्कार करने से सूर्यदेवता प्रसन्न होते हैं

    आध्यात्म उपासकों की चरम उत्कर्ष की सहज प्रदान करने वाली माता #नर्मदा जयंती राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक परम पूज्य #सदाशिव-गोलवर-गुरुजी व महानत इतिहासकार गांधीवादी चिंतक और राष्ट्रभक्त विद्वान मनीषी आदरणीय श्री #धर्मपाल जी
हिन्दू सम्राट छत्रपति गौभक्त श्री शिवाजी महाराज जी की जयंती पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
मात्र दस वर्ष की उम्र में शिवाजी महाराज ने गौ माता के लिए लड़ी थी एक लड़ाई !
अगर हिन्दू इतिहास के सबसे बड़े गौ-भक्तों के नाम के जगह लिखे जायें तो शिवाजी महाराज का नाम शुरूआती क्रम में रहेगा.
लेकिन जिस तरह से हमारे इतिहास से खिलवाड़ किया गया है उसका उदाहरण आज हम आपको पेश करने वाले हैं. हम अगर बोलते हैं कि हिन्दू इतिहास से खिलवाड़ किया गया है तो बुद्धिजीवी लोग इसका उदाहरण मांगते हैं. आज हम आपको शिवाजी महाराज की ऐसी कहानी बताने वाले हैं जो अब इतिहास से हटा दी गयी है.
गौ भक्त शिवाजी महाराज के लिए गाय सदैव पूजनीय रही थी. वह हमेशा बोलते थे कि गाय हिन्दू धर्म की शान है. जो भी इसको मात्र पशु समझ रहा है वह अज्ञानी है. खुद शिवाजी महाराज की दिनचर्या में गौ माता की सेवा शामिल थी. ऐसा ही एक किस्सा है, जो अब भूला दिया गया है. बचपन से ही शिवाजी गाय को आदरणीय और पूजनीय मानते थे और मात्र 10 वर्ष की आयु में ही शिवाजी ने यह सिद्ध कर दिया था कि उनका जन्म पापियों का नाश करने के लिए ही हुआ है.
जब शिवाजी महाराज ने गौ माता के लिए काट दिया था कसाई का सर।
हिन्दवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने राज्याभिषेक के पश्चात् गो ब्राह्मण प्रतिपालक की उपाधि धारण करके स्वयं को गौरवान्वित किया था

यह घटना शिवाजी महाराज के बाल्यकाल की है.
अपने पिता के साथ वे बादशाह के यहाँ जा रहे थे. यह बात बीजापुर की है. शिवाजी महाराज बचपन से हिन्दू लोगों के प्रिय भी थे. जब पिता और पुत्र दोनों रास्ते से गुजर रहे थे तो दोनों देखते हैं कि रास्ते में एक कसाई गाय को घसीटते हुए ले जा रहा था और वहां के बाजार के हिन्दू सर झुकाए बैठे हुए थे. मुग़ल शासन था, कौन क्या कर सकता था? उस समय शिवाजी की उम्र दस वर्ष की थी. कुछ इतिहास की पुस्तकें बताती हैं कि लोगों के मन में मुग़ल शासन का ऐसा डर था कि वह कुछ नहीं बोलते थे. हिन्दू मंदिर तोड़े जा रहे थे, गायों का क़त्ल हो रहा था और घर से बहू-बेटियां उठाई जा रही थीं. किन्तु कोई भी कुछ नहीं बोलता था.
जब बालक गौ भक्त शिवाजी यह देखते हैं कि कसाई गो-माता पर अत्याचार करते हुए, उनको काटने ले जा रहा है वह तभी अपनी तलवार निकालते हैं और पहले तो गाय की रस्सी काटकर उसे बंधन मुक्त करते हैं और वह कसाई कुछ कहता इससे पहले ही उसका सर धड़ से अलग कर देते हैं.
जब हिन्दुओं ने देखी बालक की बहादुरी
जब हिन्दू लोगों ने एक बालक गौ भक्त शिवाजी की इतनी बहादुरी देखी तो सबसे अन्दर जैसे नई ऊर्जा शक्ति का संचार हो गया था.
इस बात का जब बादशाह को पता चला तो वह कोई भी कार्यवाही इसलिए नहीं कर सका था क्योकि एक तो यह कार्य करने वाला एक बालक था और दूसरा कि उस समय सभी हिन्दुओं का साथ गौ भक्त शिवाजी को प्राप्त हो गया था.
लेकिन कुछ इतिहासकारों ने गौ भक्त शिवाजी की इस वीरतापूर्ण कहानी को किताबों से हटवा दिया ताकि हिन्दू इस कहानी को ना पढ़ सकें.
आज आवश्यकता है कि इस तरह की कहानियों को एक जगह एकत्रित किया जाये ताकि आने वाली पीढ़ियों तक सही इतिहास पहुँचाया जा सके. जय हिन्द जय गौमाता
  आज हम ऐसे मानसिक दिवालियापन की स्थिति में पहुंच गए हैं कि हम अपने महापुरुषों का जन्मदिवस भी भारतीय काल गणना से नहीं कर पा रहे है



 

मैं #नर्मदा हूं।
जब #गंगा नहीं थी, तब भी मैं थी।
जब #हिमालय नहीं था, तभी भी मै थी।

मेरे किनारों पर #नागर_सभ्यता का विकास नहीं हुआ। मेरे दोनों किनारों पर तो #दंडकारण्य के घने जंगलों की भरमार थी। उन दिनों मेरे तट पर #उत्तरापथ समाप्त होता था और #दक्षिणापथ शुरू होता था।

मेरे तट पर मोहनजोदड़ो जैसी नागर संस्कृति नहीं रही, लेकिन एक आरण्यक संस्कृति अवश्य रही। मेरे तटवर्ती वनों मे #मार्कंडेय, #कपिल, #भृगु , #जमदग्नि आदि अनेक ऋषियों के आश्रम रहे। यहाँ की यज्ञवेदियों का धुआँ आकाश में मंडराता था। ऋषियों का कहना था कि तपस्या तो बस नर्मदा तट पर ही करनी चाहिए।

इन्हीं ऋषियों में से एक ने मेरा नाम रखा, " #रेवा "। रेव् यानी कूदना। उन्होंने मुझे चट्टानों में कूदते फांदते देखा तो मेरा नाम "रेवा" रखा।

एक अन्य ऋषि ने मेरा नाम "नर्मदा " रखा ।"नर्म" यानी आनंद । आनंद देनेवाली नदी।

मैं भारत की सात प्रमुख नदियों में से हूं । गंगा के बाद मेरा ही महत्व है। पुराणों में जितना मुझ पर लिखा गया है उतना और किसी नदी पर नहीं। स्कंदपुराण का "रेवाखंड " तो पूरा का पूरा मुझको ही अर्पित है।

"#पुराण कहते हैं कि जो पुण्य , गंगा में स्नान करने से मिलता है, वह मेरे दर्शन मात्र से मिल जाता है।"

मेरा जन्म अमरकंटक में हुआ । मैं पश्चिम की ओर बहती हूं। मेरा प्रवाह आधार चट्टानी भूमि है। जीवन में मैंने सदा कड़ा संघर्ष किया।

मैं एक हूं ,पर मेरे रुप अनेक हैं । मूसलाधार वृष्टि पर उफन पड़ती हूं ,तो गर्मियों में बस मेरी सांस भर चलती रहती है। मैं प्रपात बाहुल्या नदी हूं । #कपिलधारा , #दूधधारा , #धावड़ीकुंड, #सहस्त्रधारा मेरे मुख्य प्रपात हैं ।

#ओंकारेश्वर मेरे तट का प्रमुख तीर्थ है। #महेश्वर ही प्राचीन माहिष्मती है। वहाँ के घाट देश के सर्वोत्तम घाटों में से है। मैं स्वयं को #भरूच (#भृगुकच्छ) में #अरब_सागर को समर्पित करती हूँ ‌।

मुझे याद आया।

#अमरकंटक में मैंने कैसी मामूली सी शुरुआत की थी। वहां तो एक बच्चा भी मुझे लांघ जाया करता था पर यहां मेरा पाट 20 किलोमीटर चौड़ा है । यह तय करना कठिन है कि कहां मेरा अंत है और कहां समुद्र का आरंभ? पर आज मेरा स्वरुप बदल रहा है। मेरे तटवर्ती प्रदेश बदल गए हैं मुझ पर कई बांध बांधे जा रहे हैं। मेरे लिए यह कष्टप्रद तो है पर जब अकालग्रस्त , भूखे-प्यासे लोगों को पानी, चारे के लिए तड़पते पशुओं को , बंजर पड़े खेतों को देखती हूं , तो मन रो पड़ता है। आखिर में माँ हूं।

मुझ पर बने बांध इनकी आवश्यकताओं को पूरा करेंगें। अब धरती की प्यास बुझेगी । मैं धरती को सुजला सुफला बनाऊंगी। यह कार्य मुझे एक आंतरिक संतोष देता है।

त्वदीय पाद पंकजम, नमामि देवी नर्मदे...

नर्मदे सर्वदे
{अमृतस्य नर्मदा} नमामि देवी नर्मदे जयंती जिनकी सहज उपासना या जिनके गोद में बैठ कर दुर्लभ भी सर्वसुलभ आध्यात्म का जागरण हो जाता है ....

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