दिग्विजयी सम्राट शालिवाहन परमार को आधुनिक शिक्षा ने सम्राट विक्रमादित्य का हत्यारा व शक संवत बना दिया
विश्वविजेता सिकंदर नहीं सम्राट शालिवाहन थे...
सम्राट विक्रमादित्य के ५९ वर्ष बाद शालिवाहन परमार की राज्याभिषेक ७७ (इ.) हुआ था तो मुर्ख वामपंथीयों का यह तथ्य बिलकुल गलत हैं की सम्राट विक्रमादित्य की हत्या उनके परपोत्र शालिवाहन ने किया हैं ।
मित्रों मैकॉले ने तो इतिहास को बर्बाद किया हैं पर मैकॉले के मानसपुत्र काले अंग्रेज़ो ने इस परंपरा को आगे ज़ारी रखते हुए इस राष्ट्र के वीरों को गुमनाम कर दिया गया और लूटेरों को इस भारत भूमि के शासक बना दिया गया, जैसे अंगिनत बार हारनेवाले मैसिडोनिया के सिकंदर को विश्व विजयी बना दिया सिकंदर सौ से भी अधिक राज्यों से पराजित हुआ था सिकंदर को विश्वविजयेता घोषित करनेवाले मैकॉले के मानसपुत्र इतिहासकार थे। आप सोच भी नहीं सकते इन्होंने इतिहास में कितनी गंदी मिलावट की, प्रियदर्शिनी नाम का राजा हुआ करता था जो विश्वविजयता था उनको मिटा कर राजा अशोक का नाम प्रियदर्शिनी कर दिया गया सातवाहन राजा सातकर्णि राजा कोई और था पर इतिहासकारों ने विक्रमादित्य के परपौत्र के नाम को मिटाने के लिए शालिवाहन को सातकर्णि बना दिया । हमारे भारत के १२ ऐसे राजा हुये जिन्होंने विश्वविजय किया उनमे से एक का इतिहास आपके समक्ष रखूंगी - सम्राट विक्रमादित्य के परपौत्र शालिवाहन ७७-१३७ (ई.).
इन्होंने अफ्रीका , रोम , यूरोप को पूरी तरह से जीत लिया था।
अब बात करते हैं विश्वविजयी सम्राट शालिवाहन के बारे में
१) प्रथम युद्ध- टाइटस ग्रीक-रोम के शासक थे त्रिविष्टप पर आक्रमण किया था सन ८०(ई.) ग्रीक-रोम (पुराणों में इन्हें गुरुंड कहा गया हैं) ३०० घुड़सवार सैनिक ६०,००० पैदल सैनिको के साथ आक्रमण किया था त्रिविष्टप पर सम्राट शालिवाहन ने मात्र १२००० की सेना में साथ जय महाकाल की शंखनाद के साथ टूट पड़ा रोम आक्रमणकारियों पर । सन ८० (ई.) से रोम आक्रमणकारियों का भारत पर आक्रमण लगातार होता रहा पर कभी भारतवर्ष को ग़ुलाम नहीं बना पाया तो यह केवल इसलिए संभव हो पाया क्यों की भारतगण राज्य में शालिवाहन जैसे १२ ऐसे राजा हुए जिन्होंने सम्पूर्ण विश्व को जीत लिया था । शालिवाहन से हारने के बाद रोम साम्राज्य की ५२% भाग शालिवाहन ने हिन्दू राज्य में सम्मिलित कर लिया । इस युद्ध की शानदार वर्णन Cassius Dio, Roman History LXV.15 में किया गया हैं ।
२) द्वितीय युद्ध सम्राट शालिवाहन परमार ने दोमिटियन (Domitian) के विरुद्ध लड़ा था सन ८२(ई.) में जिसमे सम्राट शालिवाहन ने दोमिटियन को परास्त किया था जो की रोम एवं फ्रैंको (वर्तमान में फ्रांस) का राजा था जिसने स्पेन तक अपनी साम्राज्य विस्तार किया था इस युद्ध का वर्णन Heinrich Friedrich Theodor ने अपनी पुस्तक "A history of German" में लिखा था एवं Previte Orton द्वारा लिखा गया पुस्तक "The Shorter Medieval History" vol:1 पृष्ठ-: १५१ एवं Suetonius, The Lives of Twelve Caesars, Life of Vespasian 9 में आपको मिलेगा सम्राट शालिवाहन परमार के साथ कुल तीन युद्ध हुए थे प्रथम दो युद्ध भारतवर्ष पर आक्रमण करने हेतु शालिवाहन परमार के हाथों हार कर वापस लौटना पड़ा तीसरे युद्ध में शालिवाहन ने फ्रैंको पर आक्रमण कर दोमिटियन (Domitian) को हराकर पूर्वी फ्रान्किया (जो वर्तमान में जर्मन कहलाता हैं ) और स्पेन पे अधिकार कर लिया था । दोमिटियन (Domitian) ने शालिवाहन शासित राज्य परतंगण पर आक्रमण किया था (यह राज्य मानसरोवर के पास उपस्थित हैं भारत चीन सीमांत में) दोमिटियन (Domitian) की सेना ८०,००० की थी घुड़सवार और पैदल सैनिक २५-२७,००० थे शालिवाहन की सेना ३०००० से ४० हज़ार की थी शालिवाहन की युद्धकौशल रणनीति कौशल के सामने यवन पीछे हटने पर मजबूर होगये थे दोमिटियन (Domitian) की लाखों की सेना के साथ आये थे पर इस ऐतिहासिक युद्ध की जिक्र विदेश इतिहासकारों ने "war of blood"घोषित किया क्यों की यह भयंकर युद्ध इतिहास में सायद ही दोबारा हुआ होगा १लाख से अधिक सेना के साथ आक्रमण करनेवाले दोमिटियन (Domitian) रोम में मात्र १२०० सैनिक के साथ वापस लौटा था । इसके बाद शालिवाहन ने स्पेन पर आक्रमण कर दिया मात्र ४५,००० सेना के साथ स्पेन के राजा दोमिटियन (Domitian) युद्ध करने की हिम्मत नहीं किया और समझौता कर स्पेन का आधा राज्य और पूर्वी फ्रान्किया पर भी शालिवाहन ने भगवा ध्वज लहरा दिया था ।
३) ट्राजन (Trajan) मेसोपोटामिया एवं अर्मेनिया के ज़ार (राजा) थे जिन्होंने भारतवर्ष पर सन ११४(ई.) में आक्रमण किया स्वीडिश एवं स्कॅन्डिनेवियन (Scandinavian)जर्नल में लिखा गया हैं शालिवाहन शासित राज्य विदेह जो नेपाल की राजधानी जनकपुर का हिस्सा हैं वहा आक्रमण किया था ज़ार को मुह की खानी पड़ी थी शालिवाहन के पास ६७ रणनीति में कुशल शस्त्र विद्या में पारंगत युद्ध व्यू रचने में भी पारंगत सेनापतियों की टोली थी, सेनापति अह्वान परमार के साथ शालिवाहन १५००० की सेना के साथ ज़ार ट्राजन को परास्त कर स्कॅन्डिनेवियन पर शालिवाहन ने सनातन वैदिक राज की स्थापना किया था ज़ार के साथ लड़े गए युद्ध मेरु युद्ध जो मेसोपोटामिया में लड़ा गया था शालिवाहन ने मेसोपोटामिया की ३ चौथाई राज्य जीत लिया था ।
५) सन १२५(ई.)पर्शिया के राजा हद्रियन की नज़र भारतवर्ष की धन दौलत पर पड़ी थी हद्रियन ने सम्राट शालिवाहन को अपनी ग़ुलाम बना कर भारतवर्ष पर अपना राजसत्ता कायम करना चाहता था सम्राट शालिवाहन को गुप्तचर शिव सिंह से सुचना मिली की हद्रियन अपने लश्कर के साथ निकल चूका है सिंघल्द्वीप (श्रीलंका)पर आक्रमण किया था तीस से चालीस हज़ार पैदल लश्कर ९,००० घुड़सवार और ग्यारह से बारह हज़ार की तादात पर धनुर्धारी लश्कर की फ़ौज थी सम्राट शालिवाहन ने बाज़ व्यूह का उपयोग किया था सम्राट शालिवाहन ने २१नये युद्ध व्यूह की रचना किया था जिससे पलक जपकते ही दुश्मन दल को नेस्तनाबूद कर सकते थे इसलिए सम्राट शालिवाहन की सात से नौ हज़ार की घुड़सवार फ़ौज और विश्व के श्रेष्ठ धनुर्धरों सैनिको ने हद्रियन को धूल चटा दिया था ।
और भी अनंत हैं पर अफ़सोस हम भारतीयों को ग़ुलामी की दास्ताँ पढ़ाया जाता हैं सम्राट शालिवाहन जैसे ११ दिग्विजयी सम्राट और हुए थे सम्राट शालिवाहन परमार को वामपंथी इतिहासकार ने सम्राट विक्रमादित्य का हत्यारा बना दिया जब की सम्राट विक्रमादित्य के परपौत्र थे सम्राट शालिवाहन ।
सम्राट शालिवाहन का राज्य मध्य यूरोप , दक्षिणी इंग्लैंड , फ्रान्किया (फ़्रान्स), कैपेटियान्स, रोम , और भी कई देशो पर सनातन धर्मध्वजा को सात समुन्दर पार फैराया था सम्राट शालिवाहन ने ।
हर हर महादेव ।
वंदे मातरम् ।
भारत के महान सम्राट शकारि शालिवाहन द्वारा प्रवर्तित हिंदू "शालिवाहन संवत्" प्रणाली इंडोनेशियाई शिलालेखों में पाई जाती है, जैसे कि उपरोक्त दिनांक 611 ई.पू. के इन शिलालेखों में.. [1][2]
सम्राट शालिवाहन को वामपंथीयों के पिताजी व्हिसेंट स्मिथ ने भी early history of India में #शकारि ही कहाँ है जिसका अर्थ है शक+अरि अर्थात् शको का घोर शत्रु।
भविष्य महापुराण के अनुसार सम्राट शालिवाहन विक्रमादित्य के परपौत्र थें। वामपंथियों ने इनके द्वारा प्रवर्तित संवत् को शक राजा द्वारा प्रवर्तित संवत् कहकर उसे शक संवत् बना दिया। और सम्राट शालिवाहन को ही शक राजा घोषित कर दिया। यदि वे शक होते तो शकारि क्यों कहलातें? क्या एक शक राजा भला शकारि हो सकता है? क्या शक राजा भारत में हुए शक आक्रांताओं को निष्कासित करके मां भारती को आक्रांताओं से मुक्त कर सकता है? यहां तो इन भांड इतिहासकारों ने आतंकवादीयों को भगाने वाले को ही आतंकवादी घोषित करके उसकी महत्ता और अस्तित्व को ढकने का भयंकर कुत्सित अपराध किया गया है । शालिवाहन के इतिहास को झुठलाने के लिए ये एक षड्यंत्र है जिसकी पोल इन उक्त एतिहासिक तथ्यों से उजागर हो जाती है।¶
पुरे विश्व में शालिवाहन सम्राट विख्यात थे। उनके समय भी उज्जयिनी के विक्रमादित्य के भांति आर्यावर्त जगतगुरू था। उन्होंने भी विश्व विजय की थी
सिकंदर नहीं अपितु शालिवाहन विश्व विजयेता थे लेकिन इन पाश्चात्यो ने इन तथ्यों को झुठलाने के लिए शालिवाहन संवत् को शक संवत् और शकारि शालिवाहन को शक राजा घोषित कर दिया......
आज जरूरत है फिर से इतिहास को लिखने की....
#संदर्भ :
(1) Andrea Acri (2016). Esoteric Buddhism in Mediaeval Maritime Asia: Networks of Masters, Texts, Icons. ISEAS-Yusof Ishak Institute. pp. 256–258. ISBN 978-981-4695-08-4.
(2) Colette Caillat; J. G. de Casparis (1991). Middle Indo-Aryan and Jaina Studies. BRILL. p. 36. ISBN 90-04-09426-1.
https://en.m.wikipedia.org/wiki/Hindu_calendar#cite_note-39
,पश्चिम एसिया और भारत-भारतीय इतिहास में अंग्रेजों द्वारा इतनी भयानक जालसाजी हुयी है कि कोई भी वर्णन पश्चिम या मध्य एसिया के इतिहास से नहीं मिलता है और पूर्व भाग के बारे में बिलकुल ही भूल गये। राजतरंगिणी के अनुसार गोनन्द वंश का ६२वां राजा हिरण्यकुल था जिसने लौकिकाब्द २२५२-२३१२ अर्थात् ८२४-७६४ ई.पू. तक शासन किया। उसका पुत्र वसुकुल (७६४-७०४) तथा मिहिरकुल (७०४-६३४) ई.पू. था। उसके पूर्व इसी गोनन्द वंश का ५१वां शासक हुष्क था जिसके पुत्रों जुष्क और कनिष्क ने १२९४-१२३४ ई.पू. तक शासन किया। कनिष्क को उज्जैन के परमारवंशी राजा विक्रमादित्य (८२ ई.पू. -१९ ई) के पौत्र शालिवाहन (७८-१२८ ई.) के शक से जोड़ कर परमार वंश का नाम उड़ा दिया। यदि यह जालसाजी सही है तो सम्पूर्ण बाइबिल और इसाई इतिहास झूठा हो जायेगा। प्रायः ४ ई.पू. में विक्रमादित्य राज्य के मगध से २ ज्योतिषी गये थे जिन्होंने ईसा को महापुरुष बताया था। उस समय विक्रमादित्य और इजरायल के रोमन राज्य के बीच कोई अन्य राज्य नहीं था। शूली पर बेहोश हो कर उतरने के बाद ईसा मसीह कश्मीर आये जिनका निवास हजरत बल (बहाल = रहना) कहा जाता है। यह शालिवाहन राज्य में हुआ। इसाई मान्यता के अनुसार ईसा के शिष्य थोमस ८२ ई. में मद्रास (चेन्नई) आये थे (शालिवाहन शक के ४ वर्ष बाद)। अतः उस समय भारत आश्रय स्थल था, आक्रमण का शिकार नहीं था।
उससे पूर्व असीरिया का उदय नबोनासर काल में होने पर भारत पर पहला आक्रमण ८२४ ई.पू. में हुआ जिसका प्रतिरोध खारावेल की गज सेना ने मथुरा में किया (खारावेल प्रशस्ति, शासन के ४ वर्ष बाद नन्द शक १६३४ ई.पू. का ८०३ वर्ष, राज्य के ११ वर्ष पर मथुरा में शकों की पराजय)। यह विफल होने पर रानी सेमिरामी (ग्रीक नाम) ने सभी पड़्सी राज्यों की सहायता से ३५ लाख की सेना इकट्ठी की तथा ऊंटों को खोल पहना कर १०,००० नकली हाथी तैयार किये (होमर के ट्राय या भास के स्वप्नवासवदत्ता की तरह)। यह असुरों का सबसे बड़ा आक्रमण था जिसके प्रतिरोध के लिये विष्णु अवतार बुद्ध मगध में अजिन ब्राह्मण के पुत्र रूप में उत्पन्न हुये। सिद्धार्थ बुद्ध (१८८७-१८०७ ई.पू.) ने मगध राजाओं से दोस्ती कर केवल सारनाथ-गया के बीच के लोगों को मोहित किया था, असुरों को नहीं। उसके बाद गौतम बुद्ध (५वी सदी ई.पू.) ने वैदिक मार्ग नष्ट करने के लिये उत्तर प्रदेश में प्रयत्न किये। इन दोनों ने केवल वेद का विरोध किया असुरों का नहीं।
विष्णु बुद्ध ने ७५६ ई.पू. में आबू पर्वत पर ४ राजाओं का संघ राजा शूद्रक की अध्यक्षता में किया। इस समय शूद्रक शक आरम्भ हुआ (यल्ल का ज्योतिष दर्पण)। शूद्रक का नाम इन्द्राणीगुप्त (मृच्छकटिकम्) था, ब्राह्मण होने पर भी ४ राजाओं का प्रधान सेवक (जैसे आज प्रधान मन्त्री अपने को कहते हैं) होने के कारण उनको सम्मान के लिये शूद्र कहा गया। ४ जो भारत रक्षा में अग्रणी होने के कारण अग्निवंशी कहे गये-परमार प्रतिहार, चाहमान और शुक्ल (चालुक्य)। इन सबकी वंश परम्परा ७५६ ई.पू. से आरम्भ होती है पर कर्नल टाड ने उन सभी को हूण वंशी सिद्ध करने के लिये उनका काल ७३० ई.पू कर पुराना सभी अन्धकार युग कर दिया। इसके लिये उसको राणा कुम्भा का ताम्र-पट्ट तोड़ना पड़ा जिसमें उन्होंने अपने को ब्राह्मण बप्पा रावल का वंशज कहा था जो गोरखनाथ के आदेश से राजा बने थे। यही उनके द्वारा गीतगोविन्द व्याख्या की भूमिका में भी है। स्वयं गोरखनाथ को भी लुप्त कर यह शंकराचार्य का काल कर दिया जो अंग्रेजों के अनुसार मुस्लिम आक्रमण होने पर बौद्धों का विरोध कर रहे थे। सबसे बड़े असुर आक्रमण (७५६ ई.पू. सेमिरामी की ३५ लाख सेना + घुड़सवार+नकली हाथी प्रायः ४ लाख) को इसी संघ ने पराजित किया। सभी पाश्चात्य इतिहास इसका वर्णन करते हैं पर भारत में इसके २०० वष बाद से राज्य व्यवस्था कही जाती है। ६१२ ई.पू. में दिल्ली के चाहमान राजा ने असुर (असीरिया) राजधानी निनेवे को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया जिसका बाइबिल में ५ स्थानों पर वर्णन है। इस समय चाहमान शक आरम्भ हुआ जिसका प्रयोग वराहमिहिर तथा ब्रह्मगुप्त (बृहत् संहित १३/३) ने किया है। इसके बाद ४५६ ई.पू. में शक आक्रमण हुये जिनका प्रतिरोध मालवा के राजा श्रीहर्ष ने कर मालव गण समाप्त कर दिया (राजतरंगिणी, कथा सरित् सागर, अलबिरुनि आदि)। श्रीहर्ष शासन समाप्त होने पर आन्ध्र वंशी राजाओं के सेनापति घटोत्कच (मेगास्थनीज आदि ग्रीक लेखकों द्वारा इसका अनुवाद नाई किया है) ने उसे समाप्त कर अपने पुत्र चन्द्रगुप्त-१ को राजा बनाया। इस समय सिकन्दर का आक्रमण हुआ था और उसके लेखकों ने आन्ध्र राजाओं की सेना का तथा चन्द्रगुप्त समुद्रगुप्त का वर्णन किया है। उसके बाद सेल्यूकस आक्रमण का समुद्रगुप्त के इलाहाबाद स्तम्भ लेख में वर्णन है। उसके पुत्र चन्द्रगुप्त-२ ने उसे पराजित कर उसकी पुत्री से विवाह किया जिसका विस्तृत वर्णन देवी-चन्द्रगुप्तम् नाटक तथा उसके आधार पर जयशंकर प्रसाद के ध्रुवस्वामिनी नाटक (१९३० ई.) में है। गुप्त काल समाप्त होने पर ८२ ई.पू. में उज्जैन के परमार राजा विक्रमादित्य का साम्राज्य बना जिस काल में ईसा मसीह का जन्म, सीजर की पराजय, बन्दी बनना और इस कारण ब्रूटस द्वारा उसकी हत्या तथा ४६ ई,पू. मे विक्रम वर्ष १० के पौष मास से मिलाने के लिये जूलियन वर्ष ७ दिन बाद आरम्भ हुआ। उनके पौत्र शालिवाहन काल में ईसा तथा उनके शिष्यों ने भारत में शरण लिया। गणना के लिये शालिवाहन शक तथा पर्व के लिये विक्रम सम्वत् आज भी चल रहे हैं। शक सम्वत्सर का अर्थ नहीं समझने वालों द्वारा बनाया गया राष्ट्रीय-शक-सम्वत् न तो राष्ट्रीय है, न शक है, न सम्वत् है। विक्रमादित्य राज्य के बाद कुछ समय विप्लव स्थिति थी जब (१९-३० ई.) में तातार, तुर्क, हूण और चीनी लोगों ने आक्रमण किये जिनका तिब्बत तथा चीन इतिहास में भी उल्लेख है। इस समय गुप्तवंश की एक शाखा ने गुजरात के वलभी में राज्य स्थापित किया, जिसके नष्ट होने पर ३१९ ई. में वलभी भङ्ग शक आरम्भ हुआ (अलबिरुनि)। प्रायः इसी समय अंग्रेजों ने मूल गुप्त राज्य का आरम्भ कर दिया है।
जिस समय हूण शकों का आक्रमण कहा जाता है उस समय उत्तर भारत में हर्षवर्धन तथा अग्निवंशी राजाओं का शासन था। हुएनसांग या फाहियान ने इस काल में किसी शक आक्रमण का नाम नही सुना था जो मध्य एसिया रास्ते से ही आये थे।

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद