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केवल शुभ लाभ की संस्कृति में ही वैश्य कर्म है

  




कुछ सिद्धांत और लॉजिक बड़े अच्छे होते हैं पर उनका व्यवहारिक पक्ष बड़ा ही भयानक होता है

  वैश्यशूद्रौ प्रयत्नेन स्वानि कर्माणि कारायेत् ।
तौ हि च्युतौ स्वकर्मभ्यः क्षोभयेतामिदं जगत् ।।
राजा वैश्य तथा शूद्र से यत्नपूर्वक अपने-अपने कर्मों को करवाता रहे, क्योंकि स्वकर्मों से भ्रष्ट ये दोनों इस संसार को क्षुभित कर देंगे।
[भूत-भौतिक पदार्थों के स्वरूपरक्षक नियम- विधिविधान ही भूतभौतिक पदार्थों के प्राकृतिक धर्म हैं। समस्त प्राकृतिक पदार्थ अपने-अपने अन्तर्यामीरूप निःयतिःसत्यात्मक धर्मसूत्रों से ही नियन्त्रित हैं, इन सभी प्राकृतिक धर्मों का मूलाधार विश्वातीत शाश्वत-निरपेक्ष मूलधर्म है। 'धर्मो रक्षति रक्षितः' इसी प्राकृतिक या प्रतीक धर्म के लिए ही कहा गया है। सत्य-धर्म और धर्म-कर्म शब्द अभिन्नार्थक बने हुए हैं। सत्य धर्मरूप से अभिव्यक्त है और धर्म कर्मरूप से सुसमृद्ध है। ब्रह्म से उत्पन्न क्षत्र को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इसी कारण भीष्म ने 'राजा कालस्य कारणम्' कहते हुए प्राकृतिक धर्म को सत्तातन्त्रसाक्षेप माना है। चूंकि ब्रह्म प्रतीकभूत ब्राह्मण भूतात्मनिष्ठ बनता हुआ स्वयं अपनी ही निष्ठा से जागरूक है इसलिए बुद्धिविकासात्मक क्षत्रभाव युक्त क्षत्रिय हेतु 'तदेतत् क्षत्रस्य क्षत्रं यद्धर्मः' कहा गया है।
मनोनिबन्धन वैश्य तथा शरीरनिबन्धन शूद्र वर्ण में वैश्य चान्द्रमन स्वभावतः चलित-स्खलित अमर्यादितप्रज्ञ है और पार्थिव शरीर स्वभावतः जड़-स्तब्धप्रज्ञ है। ये दोनों ही वर्ण स्व-स्व आचारधर्मों की तब तक उपेक्षा ही करते हैं जब तक कि भौतिक सत्तातन्त्र इन दोनों वर्णों को स्वधर्म में नियन्त्रित नहीं कर देता।
अंतर्जगत् से नैष्ठिक किन्तु व्यावहारिक जगत् दृष्टि से भावुक ब्राह्मण इन दोनों वर्णों को नियन्त्रित नहीं कर सकता, यदि वह ऐसी चेष्टा करता है तो कालान्तर में लोकभावुक ब्राह्मण को ये वर्ण नियन्त्रित कर लेते हैं और दासभाव को प्राप्त होना ही इसकी परिणति होता है।
वित्तशाली विड्वर्ण के नियन्त्रण से धर्मवंचित सत्तातन्त्र एवं संस्कृतिचिन्तन से वञ्चित ब्राह्मणवर्ण- राष्ट्र के दोनों ही रक्षक वर्ग राष्ट्रक्षोभ के कारण बनते हैं। सत्तासक्षेपता के कारण क्षत्रियधर्म, वैश्यधर्म, शूद्रधर्म एवं धर्मवञ्चित ब्राह्मणधर्म, चारों के धर्म का नियन्त्रण सत्तातन्त्र  पर ही वर्तमानयुग में अवलम्बित है।
काममय अर्थ एवं भूतमय श्रम दोनों स्वतन्त्र बनकर कालांतर में अनर्थ और क्रान्ति के ही सर्जक बनते हैं, यह प्राकृतिक नियम है। अतः क्षात्रसत्ता के धर्मसूत्रात्मक नियन्त्रण से ही राष्ट्र की काममयी अर्थशक्ति तथा भूतमयी श्रमशक्ति की व्यवस्था होनी चाहिए।

वणिक् निष्ठा प्रत्येक कार्य का, सहयोग का प्रतिदान चाहती है, फिर वह प्रतिदान व्यावसायिक हो अथवा धार्मिक। उसका पूजन-पाठ-दान आदि सभी कुछ वित्तैषणात्मिका लोकैषणाओं के लिए ही सुरक्षित है। व्यवसाय निष्ठा की सफलता ही इसकी दृष्टि में संस्कृति-धर्म की एकमात्र उपयोगिता है। वर्तमान सत्तातन्त्र की जीवनप्रतिष्ठा व्यवसायनिष्ठों की कृपा पर अवलम्बित है। आज सत्तातन्त्र व्यवसायकुशल नितान्त नैष्ठिक वणिक्तन्त्र का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से भक्त बना हुआ है।

सत्तातन्त्र की धर्मनिरपेक्षता की स्थिति में राष्ट्र का वित्तशाली विड्वर्ग और श्रमशाली शूद्रवर्ग, एवं धर्मसूत्रसंचालक सत्तावर्ग की एकमात्र आराध्या अर्थ-काममूला एषणा बन जाती है। ऐसी स्थिति में सत्तातन्त्र पूँजीवाद की विभीषिका उत्पन्न करता हुआ जनतन्त्र का शोषण करता है एवं व्यवसायतन्त्र आर्थिक प्रलोभन-कौशलों द्वारा जनतन्त्र का शोषण करता है। परिणाम इसका 'क्षोभयेतामिदं जगत्' होता है। ऐसा धर्मनिरपेक्ष किंवा धर्मविहीन सत्तातन्त्र स्वकर्म-कर्तव्य से विमुख बनता हुआ 'कुतस्तत्र प्रतीकारो रक्षको यत्र भक्षकः' को चरितार्थ करता है और अर्थ-काम से आसक्त हुआ ऐसा सत्तातन्त्र छल से अपनी अर्थ-काम-वासनाओं की पूर्तिमात्र में प्रयत्न करता हुआ राष्ट्र के केन्द्रभूत जनतन्त्र के महान् क्षोभ का कारण बनता है।]

{उल्लिखित विवेचन में वर्णों का अर्थ प्राकृतिक गुण-कर्मविभागानुसार है, अतः कृपया प्रचलित स्वार्थमूलक-राजनीतिक जातिगत अर्थ नहीं समझे जायें}

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