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देव शिल्पी विश्वकर्मा जी के अवतरण दिवस को क्रिस्चियन विदेशी अंग्रेजी डे के रूप में परिवर्तन की साजिश



स्वदेशी विज्ञान ,प्रौधौगिकी,तकनिकी के निर्माता
सृजन के देवता भगवान विश्वकर्मा दिवस की हार्दिक शुभकामनाये
  देव शिल्पी भगवान विश्वकर्मा के प्रति श्रद्धा रखने वाले सनातन धर्मी भाद्र पद कृष्ण पक्ष संक्रांति को इनका अवतरण दिवस मनाते है पर बहुत सारे आधुनिक पढ़े-लिखे और google को अपना ज्ञान का आधार बताने वाले लोग 16 सितंबर या 17 सितंबर को विश्वकर्मा दिवस मनाते हैं जबकि ईशा मसीह और इसाई वर्ष जब शुरुवात भी नहीं हुई थी उससे पहले से हजारों सालों से यह भारतीय ज्ञान परंपरा आज भी तिथि के अनुसार मनाई जाती है जो कल थी पर इन पढ़े लिखे मूर्खों की वजह से मुझे आज पोस्ट करना पड़ रहा है जो विश्वकर्मा भगवान को भी दिवस या डे के रुप में मनाने की एक साजिश करना चाह रहे हैं बहुत सारे मूर्ख 17 सितंबर को विश्वकर्मा दिवस भी मना रहे हैं
हमारे धर्म में विश्वकर्मा जी को निर्माण एवं सृजन का देवता माना जाता है। मान्यता है कि सोने की लंका का निर्माण उन्होंने ही किया था। विश्वकर्मा जी शिल्प कला के श्रेष्ठ कलाकार थे। जिन्होंने हमें सभी कलाऔ का ज्ञान दिया ।
साधन, औजार, युक्ति व निर्माण के देवता ।
जबकि शिल्प के ग्रंथों में वह सृष्टिकर्ता भी कहे गए हैं। स्कंदपुराण में उन्हें देवायतनों का सृष्टा कहा गया है। कहा जाता है कि वह शिल्प के इतने ज्ञाता थे कि जल पर चल सकने योग्य खड़ाऊ तैयार करने में समर्थ थे।
विश्व के सबसे पहले तकनीकी ग्रंथ विश्वकर्मीय ग्रंथ ही माने गए हैं। विश्वकर्मीयम ग्रंथ इनमें बहुत प्राचीन माना गया है, जिसमें न केवल वास्तुविद्या, बल्कि रथादि वाहन व रत्नों पर विमर्श है। विश्वकर्माप्रकाश, जिसे वास्तुतंत्र भी कहा गया है, विश्वकर्मा के मतों का जीवंत ग्रंथ है। इसमें मानव और देववास्तु विद्या को गणित के कई सूत्रों के साथ बताया गया है, ये सब प्रामाणिक और प्रासंगिक हैं। मेवाड़ में लिखे गए अपराजितपृच्छा में अपराजित के प्रश्नों पर विश्वकर्मा द्वारा दिए उत्तर लगभग साढ़े सात हज़ार श्लोकों में दिए गए हैं। संयोग से यह ग्रंथ 239 सूत्रों तक ही मिल पाया है।
शिल्प संकायो, कारखानो, उधोगों मॆ भगवान विश्वकर्मा जी की महत्ता को मानते हुए प्रत्येक वर्ष 17 सितम्बर को विश्वकर्मा दिवस के रुप मे मनाता है। यह उत्पादन-वृदि ओर राष्टीय समृध्दि के लिए एक संकल्प दिवस है। प्रतिवर्ष 17 सितम्बर विशवकर्मा-पुजा के रुप मे सरकारी व गैर सरकारी ईजीनियरिग संस्थानो मे बडे ही हषौलास से सम्पन्न होता है।
ये विश्वकर्मा भगवान् का देश भारत जो स्वदेशी विज्ञान प्रोध्गिकी और तकनिकी में आत्मनिर्भर था ।
विश्व को जिसने हस्तनिर्मित ढाका की मलमल जैसे अनेको उत्पाद का निर्यात करता था ।जिसकी विश्व निर्यात में 37% भागेदारी थी जिसके आंकड़े मौजूद है । जिस भारत ने विश्व को गिनती सिखाई आज वो भारत विदेशियों से उत्पाद और तकनिकी का आयात कर रहा है आखिर क्यों ?
हम विश्वकर्मा भगवान् की पूजा तो करते है परन्तु उनके द्वारा दिए गए ज्ञान को जीवन में धारण नहीं करते ।
मूल विज्ञान होता है --- प्रायोगिक विज्ञान --- स्वदेशी तकनीकी ------ कारखाने -------उत्पाद
मैकाले की शिक्षा नौकर अर्थार्त मैनेजर बना सकती है मालिक या वैज्ञानिक नहीं ।
भारतीय शिक्षा भारतीय भाषाओ में उपलब्ध होगी तो नवीनतम तकनिकी का निर्माण होगा ।
भारत से प्रतिभा पलायन नहीं तकनीकी और स्वदेशी उत्पादों का निर्यात करेगा तब भारत विश्व गुरु बनेगा ।
अब पुनः भारत को स्वदेशी और स्वराज्य की वोर बढ़ना होगा तभी हम एक स्वावलंबी भारत का निर्माण कर भारत को उसकी खोई हुई प्रतिष्ठा दिलवाकर पुनः विश्वगुरु के पद पर शुसोभित करवा सकते है ।
विश्वकर्मा दिवस स्वदेशी उत्पादन वृद्धि एवम् राष्ट्रिय समृद्धि का संकल्प दिवस है
जय हो विश्वकर्मा भगवान् की
क्यों विज्ञान सार्वभौमिक होता है तकनिकी सदैव स्थानीय स्वदेशी होती है सुनिए श्री राजीव दीक्षित जी को और साथियो को राष्ट्र हित में अग्रेषित कीजिये*
एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियानके सहभागी बनने हेतु 9336919081 पर whatsapp संपर्क करें

 
 

 

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