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बटवारा देश धर्म जात के साथ विचारों का भी

   


 

विभाजन रेखा ...............

एक देश का बँटवारा हुआ। विभाजन रेखा एक पागल खाने के बीच में से गुजरी। तो अधिकारियों को बड़ी चिंता हुई कि अब क्या किया जाय। दोनों देश के अधिकारियों में से कोई भी पागलों को अपने देश में लेने को तैयार न था। अधिकारी इस बात पर सहमत हुए कि पागलों से ही पूछा जाय कि वे किस देश में रहना चाहते हैं। अधिकारियों ने कहा पागलों से! देश का बँटवारा हो गया है आप उस देश में जाना चाहते हैं या इस देश में।

पागलों ने कहा-”हम गरीबों का पागल खाना क्यों बाँटा जा रहा है। हमने क्या गलती की है? हमसे किसी को शिकायत भी नहीं हैं। हम में कोई आपसी मतभेद भी नहीं है। हम सब मिलकर रहते हैं इसमें आपको क्या आपत्ति?” अधिकारियों ने कहा। आपको जाना कहीं नहीं है। रहना यहीं है। आप तो यह बताएँ कि इस देश में रहना चाहते हैं या उस देश में। पागल बोले। यह भी क्या अजीब पागलपन है जब हमें जाना कहीं नहीं है। तो उस देश से या इस देश से क्या मतलब।

अधिकारी बड़ी उलझन में फँस गये। उन्होंने सोचा। व्यर्थ की माथा-पच्ची से क्या लाभ? और उन्होंने विभाजन रेखा पर पागलखाने के बीचों बीच दीवार खड़ी करा दी। कभी-कभी पागल उस दीवार पर चढ़ जाते, और एक दूसरे से कहते। देखा समझदारों ने देश का विभाजन किया है। न तुम कहीं गये न हम। व्यर्थ में हमारा तुम्हारा मिलना जुलना, हँसना-बोलना बंद करके इन्हें क्या मिल गया।
एक पागल बोला इन्होंने देश का बँटवारा नहीं, दिलों को बाँटने की कोशिश की है। जब-जब मनुष्य पर बेअकली सवार होती है तो वह जाति, सम्प्रदाय, रंग, रूप, भाषा, और देश के आधार पर विभाजित होता चला जाता है और अपनी शाँति और खुशहाली नष्ट करता रहता है।
    ऊपर यहां एक बहुत ही रोचक और मन को झकझोर ने वाला लेख है पर इसी में ही इस लेखक की अज्ञानता ने उसे बामपंथी विचारधारा में परिवर्तित कर दिया अंत के चार पांच शब्दों को मैं रखाता हूं और ऐक एक का विश्लेषण आपके सामने रखता हूं
  उन्होंने अंत में लिखा है कि जब मनुष्य पर बेअक्ली आती है देश धर्म जाति संप्रदाय रंग भाषा
  पहला देश देश की मान्यता के लिए यू न ओ, को खड़ा किया गया है जहां-जहां अंग्रेज गए वहां इन्होंने देखो खंड खंड कर डाला और अफ्रीका का कभी न साउथ आइएगा तो समझ में आएगी कि नक्शे पर ही काट डाला है
 दूसरा धर्म ,, धर्म को मान्यता देने का काम यार किसी मनुष्य द्वारा उत्पन्न धर्म का इतिहास मात्र केवल  2000 वर्ष का ही इतिहास है लेकिन हजारों हजारों लाखों सालों से जो व्यवस्थाएं रही है उसे सनातन व्यवस्था कहते हैं इसीकी बराबर में अब्राहमिक संस्कृतियों के उदय के बाद रक्तपत के लिए धर्म को आधार दिया गया पूरी दुनिया  में रक्तपात का कारण बन चुकी है और शिकागो के सम्मेलन के बाद पूरी दुनिया में सनातन पद्धति के अलावा इसाई और यहूदी और इस्लाम को यह मान्यता दिलाने का एक सोची समझी साजिश थी
   जाति,, यद्यपि तब दुख दारुणं नाना सबते कठिन जाति अपमाना यह तुलसीदास जी ने लिखा है और इसकी व्याख्या दैनिक शास्त्र को लिखने वाले  लेखक बद्री प्रसाद  टुलधरिया ने इसकी व्याख्या किया है जिसमें उन्होंने कहा है अंग्रेज जाति से जर्मन एक जाती है और अपन जापानी इन जाती है उसी तरह से हिंदुस्तान में रहने वाले सब हिंदू प्रजा है
 नौकर बनाने के लिए जाति का प्रमाण पत्र बनाने का जो व्यवस्था देकरके जाने वाले अंग्रेजों गए वह नहीं नहीं है
 भाषा उत्तर से लेकर दक्षिण तक और पूरब से पश्चिम तक समाचार जी ने भारत के चारों दिशाओं में मठ का व्यवस्था किया था और सभी एक सूत्र में बढते हुए थे पर आज पूरी दुनिया में भाषा का एक अलग ही रुप देखने को मिल रहा है सारी भाषाएं अंतिम सांसे इंडियन रही अब एक ही भाषा की तैयारी चल रही है पूरी दुनिया में भाषा को बंटवारे का जिम्मेदार ठहराना यह मूर्खता है आर्यावर्त में अनेकों भाषाएं बोली देखने को मिलती है पर कोई वीभेद नहीं दिखता था जैसा आज बताया जा रहा
   इस तरह से पूरे समाज में ऐसे विकृत धारणा को डाल दिया जाता है और हम उन्हीं के आधार से चिंतन भी करते हैं जिन्होंने हमें गुलाम बनाया था यह गुलामी चिंतन की पराकाष्ठा है आज उन्हीं चिंतकों का बोल बाला और धन पद प्रतिष्ठा मान-सम्मान भी है जो इस अंग्रेजी सोच को आगे बढ़ाने में मदद कर रहे हैं जिससे हम मूल चिंतन से भटक गए

Comments

D. S. said…
आज भी अधिकतर भारतीय अन्ग्रेजो के मानसिक गुलामी से बाहर नहीं निकले है। खानपान, पहनावा, गरीब भी अपने बच्चों को अन्ग्रेजी स्कूलों मे पढाना चाहता है। गाँवों की अनपढ़ महिलाएं व पुरुष सभी गुड मॉर्निंग, बाइबाइ से ही बात करने मे अपना गर्व व गुरूर समझते है।

मात्र सही शिक्षा ही इसका समाधान है, गुरूकुल शिक्षा ही, परन्तु हमारे ही लोग अपनी गुलामी मानसिकता की वजह से अपने देश को स्वतंत्र व स्वाभिमान नही देखना चाहते हैं ।
धन्यवाद ।शुभकामनायें ।

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