यूरोपीय ईसाई इतिहास लेखकों का समस्त लेखन सप्रयोजन है। महमूद गजनवी ने कभी भी सोमनाथ मंदिर पर कोई आक्रमण करने की हिम्मत नहीं की थी।ये गप्पें और झूठ 20 वीं शताब्दी के आरंभ के आसपास सप्रयोजन रची गई। महमूद की ऐसी कोई हैसियत थी ही नहीं।
गजनी वाले महमूद के कथित इतिहास का एकमात्र आधार उस पर लिखने वाले लोग अलबरूनी की पुस्तक ‘अल हिंद’ को बताते हैं। ‘अल हिंद’ पुस्तक का एडवर्ड सचाऊ ने अपनी एक लंबी भूमिका के साथ अनुवाद प्रस्तुत किया है। अबू अल रेहान मुहम्मद इब्न अहमद अल बरूनी की पुस्तक का नाम है ‘अल हिंद’। इस पुस्तक का उपशीर्षक है- ‘हिन्दुओं के ज्ञान और विज्ञान का उनके शास्त्रों के आधार पर विवरण’। बरूनी ने लिखा है कि उनके उस्ताद ने उनसे हिन्दू धर्म के ज्ञान और विज्ञान के विषय में तथ्यपूर्ण विवरण लिखने कहा था, तदनुसार मैंने यह पुस्तक लिखी है।
पुस्तक में कहीं भी गजनी का कोई जिक्र नहीं है, ना ही बिरूनी के अपने इलाके पारसीक जनपद का और ना ही पूरी पुस्तक में कहीं भी गजनी के महमूद का कोई भी उल्लेख है। जब महमूद का ही होई उल्लेख नहीं है तो उसके सैन्य अभियान का उल्लेख होने का सवाल ही नहीं पैदा होता है। पूरी पुस्तक में महमूद अनुपस्थित है, महमूद का सैन्य अभियान अनुपस्थित है, कोई महमूद है और वह कहीं आता जाता है, लड़ता-झगड़ता है, लूटता या तोड़ता-फोड़ता है, इसका कहीं कोई उल्लेख ही नहीं है। ना तो पुस्तक में सम्पूर्ण पाठ मंे इसका कोई उल्लेख है और ना ही अलबरूनी की अपनी भूमिका में महमूद का कहीं कोई उल्लेख है। भूमिका में तो वह अपने उस्ताद की ही बात करता है। अलबरूनी यह कहीं भी नहीं कहता कि वह महमूद के साथ या उसकी सेना में शामिल होकर भारत आया था। क्योंकि वह तो महमूद का कोई उल्लेख ही नहीं करता। उस्ताद के कहने पर उसने हिन्दू धर्म के ज्ञान और विज्ञान के विषय में हिन्दू धर्मग्रंथों के आधार पर तथ्यपूर्ण ग्रंथ लिखा है।
इस पुस्तक मे सोमनाथ का उल्लेख इन पृष्ठों पर इन संदर्भों में है:-
पुस्तक के खंड 1 के पेज 117, 161, 165,189, 205, 208, 261, 357, 405 तथा खंड दो के पेज 9, 103, 104, 105, 176 हैं।( ये 1874 में छपी मूल पुस्तक के 1964 में एस. चांद. एंड कंपनी, नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित प्रथम भारतीय संस्करण के पेज नंबर हैं। )
इनमें से पेज 117 पर केवल भारत की प्रसिद्ध प्रतिमाओं का उल्लेख करते हुये यह कहा है कि थानेश्वर में चक्रस्वामिन भगवान विष्णु की मानवाकृति कांस्य प्रतिमा थी और साथ ही भगवान सोमनाथ और कश्मीर में माँ शारदा की प्रतिमायें संपूर्ण भारत में प्रसिद्ध हैं। वराहमिहिर की संहिता में प्रतिमा निर्माण की पूरी विधि का वर्णन है जो अल बरूनी ने दिया है।
इसी प्रकार पेज 161 में केवल सोमनाथ के किसी निवासी द्वारा अल बरूनी को माप की मात्रा बताये जाने का उल्लेख है। यही बात पृष्ठ 165 पर है। पृष्ठ 189 में यह बताया है कि प्रसिद्ध रसायनशास्त्री नागार्जुन सोमनाथ के पास के ही निवासी थे। पृष्ठ 205 में यह बताया गया है कि बजाना से दक्षिण पश्चिम में अनिलवाड़ा है और वहां से कुछ दूरी पर समुद्र तट पर सोमनाथ है। पृष्ठ 208 एवं पृष्ठ 261पर भी सोमनाथ की स्थिति का ही वर्णन है। पृष्ठ 357 में यह बताया है कि सोमनाथ के निवासी तीन ऋतुओं के चार-चार माह के आधार पर वर्षा काल, शीत काल और उष्ण काल नाम से वर्ष का विभाजन करते हैं। पृष्ठ 405 में बताया है कि सोमनाथ के पास ही सरस्वती नदी समुद्र में मिलती है ऐसा महाभारत में वर्णन है।
खण्ड दो के पृष्ठ 9 में संवत्सर की गणना के क्रम में 947 शक काल का वर्णन करते हुये सोमनाथ का उल्लेख आया है। पृष्ठ 102 में चंद्रमा का विवाह प्रजापति की पुत्रियों से होने का वर्णन मत्स्यपुराण और विष्णु धर्म सूत्र के आधार पर है तथा चन्द्रमा द्वारा रोहिणी से अधिक प्रेम करने की शिकायत रोहिणी की बहनें प्रजापति से करती हैं जिस पर प्रजापति चन्द्रमा को यानी सोम को समझाते हैं और जब वह नहीं मानता तो उसे शाप देते हैं जो चन्द्रमा के भीतर एक धब्बे या कलंक की तरह दिखता है जिसे मृगलांछन कहा गया है। यह अल बरूनी बताता है और वहीं पर अचानक एडवर्ड सचाऊ सोमनाथ का स्मरण करते हैं और फिर सोमनाथ को महमूद के द्वारा तोड़े जाने का भी उल्लेख एक पैरा में करते हैं। जबकि इसके अगले ही पैरा में वराहमिहिर की वृहत्संहिता में प्रतिमा निर्माण और शिवलिंग निर्माण की जो विधि दी गई है उसका प्रसंग आ जाता है। पृष्ठ 104 में सोमनाथ की और शिवलिंग की प्रसिद्धि की चर्चा है तथा पृष्ठ 105 में सोमनाथ की पवित्रता और महत्त वर्णित है। पृष्ठ 176 में यह लिखा है कि श्रावण की पूर्णिमा का दिन सोमनाथ में पवित्र तिथि के रूप में विशेष रूप से मनाया जाता है।
महमूद गजनवी का समकालीन अन्य लेखक है फिरदौसी।उनका शाहनामा प्रसिद्ध है।वह इस्लाम से पहले के पारसीक राजाओं की कथा है।उसमें भी महमूद गजनवी की कोई बात नहीं की गई है।
तो महमूद गजनवी के किसी समकालीन ने उसको ही उल्लेख योग्य नहीं पाया और उसने कोई सैन्य अभियान किया, यह चर्चा ही नही की है।
तो आपने बात की थी इन यूरोपीय ईसाई इतिहास लेखकों की बदमाशी की कि क्या यह उनकी कोई विवशता है। इसका उत्तर यह है कि ये जो भी लिखते हैं, उसका एक प्रयोजन है। अपने प्रयोजन की पूर्ति के लिये ही वे लिखते हैं। आदरणीय रामेश्वर मिश्र पंकज जी से साभार

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद