नए गुरुकुल के उद्घाटन के अवसर पर उड़ीसा में इस बिटिया का Sanskrit प्रेम अपनी ही मोबाइल से वीडियो बना करके आपको भेज रहा हूं और शायद इस लेख के माध्यम से आप की चेतना को जागृत हो
एक लेख पढ़ रहा था जिसकी शुरुआत कुछ इस तरह होती है .. "Will_Germans_be_the_eventual_custodians_of_Sanskrit,_its_rich _heritage_and_culture?"मतलब क्या है कि जर्मनी जिस तरह से संस्कृत को लेकर गम्भीर है वैसा और कहीं नहीं है और इस आधार पे ही बोला जा रहा कि क्या जर्मनी ही इसका अंतिम संरक्षक होगा ??
जर्मनी के 14 टॉप यूनिवर्सिटियों में संस्कृत की पढ़ाई हो रही है व रिसर्च भी।
साउथ एशिया इंस्टीट्यूट और हैडलबर्ग यूनिवर्सिटी समर (summer) में स्पोकन कोर्स ऑर्गेनाइज करती है जिसमें एडमिशन लेने के लिए दुनिया भर से होड़ लगा हुआ होता है.. एप्लिकेशन की बाढ़ आ जाती है विश्व भर से जिसमें कि छंटाई करने की नौबत आ जाती है और छंटाई भी करनापड़ता है।
ये यूनिवर्सिटी केवल जर्मनी में ही नहीं बल्कि स्विट्जरलैंड, इटली और आप यकीन नहीं मानोगे भारत में भी संस्कृत स्पोकन का समर स्कूल ऑर्गेनाइज करती है। बताइये कि भारत की चीज भारत को ही बेचा जाता है। किस कारण ??
Professor Dr. Axel Michaels, head of classical Indology (University of Heidelberg) कहते है कि " आज से 15 साल पहले जब हम इसका शुरुआत किये थे तो शुरुआती के दो साल में ही बंद करने की स्थिति में थे लेकिन हमने ऐसा नहीं किया बल्कि इसको और मजबूत बनाने पे ध्यान दिया और अन्य युरोपियन कंट्री के लिए भी कोर्स के लिए ओपन किया!"
आज जर्मनी में 14 यूनिवर्सिटी हैं जहां संस्कृत की पढ़ाई चल रही और ब्रिटेन के 4 यूनिवर्सिटी में। प्रत्येक वर्ष हम समर में एक महीने के लिए समर स्कूल रन करते हैं जिसमें दुनिया भर के एप्लिकेशन आते हैं।.. अब तक 254 स्टूडेंट इसमें पार्टिशिपेट हो चुके हैं 34 अलग-अलग देशों से.. और प्रत्येक साल इसमें गज्जब का इज़ाफ़ा हो रहा है जिसमें कि हमें एप्लिकेशन को रिजेक्ट भी करना पड़ रहा है।
जर्मनी के बाद अमेरिका से सबसे ज्यादा स्टूडेंट होते हैं उसके बाद ब्रिटेन इटली और अन्य यूरोपीय देश।
आगे प्रोफेसर कहते है कि "किसी पोलिटिकल आइडियोलोजी के तहत संस्कृत को धर्म के साथ जोड़ना सबसे स्टुपिड और विघातक बात है.. जो इनके महान विरासत को दाग लगाते है! .. यहां तक कि बुद्धीज्म का जो मूल विचार है वो संस्कृत में है..अगर हम शुरुआती दर्शन,इतिहास,भाषा,विज्ञान व संस्कृति के उत्पत्ति को बेहतर ढंग से जानना व समझना चाहते है तो हमें ओरिजिनल संस्कृत टेक्स्ट पढ़ने पड़ेंगे जो कि सबसे पुराने विचार व अनुसंधान का नतीजा है!"
Francesca Lunari एक मेडिकल की छात्रा है जो हैडलबर्ग यूनिवर्सिटी में संस्कृत का अध्ययन कर रही है.. वो कहती है कि "मैं साइको एनालिसिस में ज्यादा इंटरेस्टेड हूँ और इसके लिए ये जानना जरूरी है कि कैसे मानवीय विचार ग्रंथ,संस्कृति और समाज से होते हुए निकला .. और इसको समझने के लिए जो सबसे शुरुआती स्टेप है वो है संस्कृत है।.. मुझे बांग्ला के प्रसिद्ध मनोचिकित्सक गिरीन्द्र बॉस के मनोविज्ञान को पढ़ना है जो कि बांग्ला में है और भारत में भी लोग इनको नहीं पढ़ते जिन्होंने बहुत कमाल का कार्य किया है इस क्षेत्र में.. मुझे उनके कार्य को डेसिफर करना है और उसके लिए संस्कृत ही शुरुआती स्टेप है।"
ये आगे कहती है कि "हम एक महान वैश्विक संस्कृति व विरासत को पूर्णतः विलुप्त होते हुए देखेंगे यदि हिंदी बांग्ला जैसे मेजर लैंग्वेज को यूं ही इंडियन इंग्लिश के सामने घुटने टेकते हुए पाते है तो .. जो कि दिनों दिन कमजोर ही होता जा रहा है.. यही आज संस्कृत के साथ हुआ है .. और ये चिंता का विषय है क्योंकि इंडियन परिवार अपने बच्चों को अपने लैंग्वेज में न पढ़ा के इंग्लिश पे ज्यादा जोर देते हैं और दे रहे हैं।"
डॉ. माइकल कहते है कि "पॉलिटिक्स व इकोनॉमिक्स के क्रमिक विकास को वह बेहतर समझ सकता है जो चाणक्य के अर्थशास्त्र का अध्ययन करता हो"
आने वाले सेमेस्टर में ‘human physiology and psychology in the early Upanishads’ भी पढ़ाया जाएगा।
आईआईटी के मैथेमेटिसियन आनंद मिश्रा कहते है कि "जब हमने पाणिनि के संस्कृत व्याकरण का स्टडी किया तो पाया कि ये कम्प्यूटिंग लैंग्वेज के हिसाब से सबसे सूटेबल लैंग्वेज है।" .. और इसके ऊपर काम भी शुरू है।
जर्मनी हमेशा से संस्कृत विद्वानों के लिए संरक्षक व भंडार रहा है.. जितने भी हार्वर्ड,कैलिफोर्निया व ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी में संस्कृत विद्वान हैं वे सभी के सभी जर्मन हैं .. ऐसा क्यों है तो इसके जवाब में डॉ माइकल कहते है कि " ऐसा इसलिए है कि हमने कभी इंडिया को उपनिवेश नहीं बनाया जैसा कि ब्रिटेन ने किया और हमने हमेशा इनके ऊपर रोमांटिक व्यू ही रखा है!"
लेकिन यहाँ जब लंबे समय तक मुगलों व अंग्रेजों के अधीन सबकुछ रहा तो संस्कृत आज सेकुलरिज्म का दुश्मन घोषित हो गया है।
नरेंद्र मोदी जब जर्मनी यात्रा पे जाते है तो यही बात कहते है कि "आज देश में कोई संस्कृत न्यूज बुलेटिन नहीं है क्योंकि ऐसा लगता है कि इससे सेकुलरिज्म खतरे में पड़ जाएगा!"
ये बातें 2015 की है ... आज त्रिभाषा की बात हो रही .. नई शिक्षा नीति की बात हो रही है तो सबसे ज्यादा मरोड़ या परेशानी किससे हो रही है तो वो है संस्कृत .. पता नहीं क्यों इन्हें संस्कृत के नाम से जुलाब होने लगता है.. दस्त रुकते नहीं रुकते हैं.. हिचकोले मार-मार के उबाल मारता है.. रह-रह के उबाल मारता है.. जबकि साफ कह दिया है कि संस्कृत विकल्प में है.. अगर आपको पढ़ना है तो पढ़े नहीं तो विकल्प के रूप में अन्य भारतीय भाषा भी है.. लेकिन नहीं सारा मुड़फुटौवल इसी पे करना है.. पिछले दो दिन से गली-गली से महान भाषाविद के नाना सब उफिया के माफिक बाहर निकल रहे हैं.. जो हिंदी भी ढंग से टाइप नहीं कर पाते वे संस्कृत के एक्सपर्ट बन के बैठे हुए हैं। .. इन्हें विरोध करना ही करना है क्योंकि सेकुलरिज्म की बात जो आ जाती है न।
तुम्हें नहीं पढ़ना है तो मत पढ़ न .. लेकिन जहां संस्कृत का ओरिजिन है वहां गर देश-विदेश से स्कॉलर आ के ज्ञान अर्जित करेंगे तो किनका फायदा है ??? तुम्हें पैसे कमाने है तो तुम पढ़ो न जर्मन,फ्रेंच,पुर्तगाली,रूसी,इटालियन .. तुम्हें कौन मना किया है .. सरकार ने व्यवस्था भी किया हुआ है.. लेकिन जो स्कॉलर लोग हैं उन्हें क्यों तुम अपनी बचकानी सेकुलरिज्म की आड़ में उपहास उड़ा रहे हो ??? क्या ये नहीं होना चाहिए कि जहां विश्व के टॉप यूनिवर्सिटीज में जर्मन स्कॉलर विराजमान हैं वहाँ कोई भारतीय हो ?? क्या ये नहीं हो सकता ?? क्यों नहीं हो सकता.. जब यहां एक्सपर्ट तैयार होंगे तभी तो वो विश्व भर में जाएंगे न .. नहीं तो ऐसा न हो कि हमें संस्कृत पढ़ाने वाले जर्मन लोग ही आगे होंगे। मने हमारी चीज हमें ही पढ़ाएँगे।
कुछ ऐसा ही विरोध रहा तो हिंदी भी हिन्दू के साथ जुड़ जायेगा और सेकुलरिज्म का दुश्मन घोषित हो जाएगा तब भी कोई फॉरेनर ही हमें हिंदी सीखा रहा होगा।
कुछ तो शर्म करो रे।
जो एक आम भारतीय को बोलना चाहिए वो एक जर्मन प्रोफेसर बोल रहा है.. जो कि मैं ऊपर ही कोट किया हूँ और पुनः इधर भी कर रहा हूँ जो इन शेखुलरों को समर्पित है..
"किसी पोलिटिकल आइडियोलोजी के तहत संस्कृत को धर्म के साथ जोड़ना सबसे स्टुपिड और विघातक बात है.. जो इनके महान विरासत को दाग लगाते है!"
(इसको आप अपने तरीके से भी बोल सकते है.. मने कि सभ्य तरीके से।)😊
गंगवा
खोपोली से।
मेरी ये पोस्ट उन पढ़े लिखे मानसिक विकलांगो को समर्पित है जो आज भी सोचते है कि, भारत एक पिछड़ा हुआ देश था, है और हम ऐसे ही वैदिक वैदिक की रट लगाते रहे तो आगे भी रहेगा ।।
पिछले दिनों एक मित्र से कुछ किताबे पढ़ने को मिली इस मामले में मैं थोड़ा लालची हूँ और आप कह सकते है कि मैं और किताबे बिल्कुल चुम्बक की तरह ,इसमें से एक किताब को पढ़ने के बाद मुझे आप सच मानिए भारतीय मानसिकता पे रोना आया ये किताब थी --
भूतपूर्व राष्ट्रपति आदरणीय डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम द्वारा लिखित(स्व. इसलिए नही लिखा क्योंकि मैं उन्हें अभी भी जीवित मानता हूँ) --
#इण्डिया_2020 - #ए_विजन_फॉर_न्यू_मिलेनियम
डॉ कलाम लिखते है -- मेरे घर की दीवार पर एक कैलेंडर टँगा है, इस कलरफुल कैलेंडर में सैटेलाइट द्वारा यूरोप, अफ्रीका महाद्वीपों के लिए गए बहोत से चित्र छपे हैं। ये कैलेंडर जर्मनी में पब्लिश किया गया था। जब भी कोई व्यक्ति मेरे घर में आता था तो दीवार पर लगे कैलेंडर को देखता था, तो वाहवाही जरूर करता था और प्रथम दृष्टि में उसके मुंह से निकलता था वाह! बहुत सुन्दर कैलेंडर है तब मैं कहता था कि यह जर्मनी में छपा है। यह सुनते ही उसके मन में आनन्द के भाव जग जाते थे। वह बड़े ही उत्साह से कहता था कि सही बात है, जर्मनी की बात ही कुछ और है उसकी टेक्नालॉजी बहुत आगे है।
सेम टाइम जब मैं उससे यह कहता कि कैलेंडर जरुर जर्मनी में पब्लिश किया गया है किन्तु जो चित्र छपे हैं उसे भारतीय सैटेलाइट नें खींचे हैं, तो दुर्भाग्य से कोई भी ऐसा आदमी नही मिला जिसके चेहरे पर वही पहले जैसे आनन्द के भाव आये हों। आनन्द के स्थान पर आश्चर्य के भाव आते थे, वह बोलता था कि अच्छा! ऐसा कैसे हो सकता है? और जब मै उसका हाथ पकड़कर कैलेंडर के पास ले जाता था और जिस कम्पनी ने उस कैलेंडर को छापा था, उसने नीचे अपना कृतज्ञता ज्ञापन छापा था ''जो चित्र हमने छापा है वो भारतीय सैटेलाइट नें खींचे हैं, उनके सौजन्य से हमें प्राप्त हुए हैं।'' जब व्यक्ति उस पंक्ति को पढ़ता था तो बोलता था कि अच्छा! शायद, हो सकता है।
डॉ कलाम इस भारतीय मानसिकता को लिखते हुए वाकई दुखी थे क्योंकि इस पूरे लेखन में इस पेज पर उनका दुःख आप सपष्ट महसूस कर सकते है ।।
#डॉ_कलाम_लिखते_है_कि --
दुनिया के कुछ वैज्ञानिक रात्रिभोज पर आये हुए थे(तब डॉ कलाम सिर्फ वैज्ञानिक थे), उसमें भारत और दुनिया के कुछ वैज्ञानिक और भारतीय नौकरशाह थे। उस भोज में विज्ञान की बात चली तो राकेट के बारे में चर्चा चल पड़ी। डॉ. कलाम नें उस चर्चा में भाग लेते हुए कहा कि कुछ समय पूर्व मैं इंलैण्ड गया था वहाँ उन्हें बुलिच नाम की जगह पे रोटुण्डा नामक म्युजियम घूमने का सौभाग्य मिला। जिसमे पुराने समय के युध्दों में जिन हथियारों का प्रयोग किया गया था, उसकी प्रदर्शनी भी लगायी गयी थी। वहाँ उन्होंने देखा कि एक रॉकेट का खोल रखा गया था और जब उन्होंने उसका डिस्क्रिप्शन पढ़ा तो उनको बड़ा आश्चर्य हुआ उसपे लिखा था पर आधुनिक युग में छोड़े गये प्रथम राकेट का खोल । और आपको जानकर आश्चर्य होगा इसका प्रयोग भारतीय सेना ने श्रीरंगपट्टनम के युद्ध मे टीपू सुल्तान और अंग्रेजों की लड़ाई में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ इस्तेमाल किया था ।
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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद