#त्रावणकोर के #राजपरिवार के विषय में प्रसिद्ध है की #पद्मनाभ_मंदिर में #पूजा_पाठ के बाद बाहर निकलते समय अपने #कपड़े और #हाथ_पैर पूरी तरह से झाड़ते थे ताकि मिट्टी का भी एक कण #मंदिर से बाहर न जाए ..!!
उनके अनुसार #मंदिर का एक एक कण भगवान पद्मनाभ का है ..!!एक #राजपरिवार का अपने दायित्व के प्रति इतनी सजगता, अपने #आराध्य के प्रति इतना #समर्पण....??? कल्पनातीत .... 🙏🙏..
- यही #भारतीय_संस्कृति का आधार है, यही नींव के पत्थर है..!!
... और #लेफ्टिस्टों ...#मिशनिरियों के कुचक्र ने उन्हें ही #प्रबंधन से बाहर कर दिया था .. उनके पारंपरिक अधिकार से वंचित कर दिया था ..!!
... अब मंदिर वापिस इन्हें मिल गया है ..!!
ॐ स्वामी शरणं ..!!
पद्मनाभस्वामी --------
भारतीय वैदिक साहित्य में नागों का विशेष उल्लेख है । जितने भी वैदिक साहित्य हैं, उनमे कहीं न कहीं नागों का उल्लेख अवश्य मिलेगा ।नवनाग श्लोक में 9 प्रमुख नागों का उल्लेख किया गया है -
अनन्तं वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कम्बलं
शन्खपालं ध्रूतराष्ट्रं च तक्षकं कालियं ।
इसमें प्रथम नाम है -अनंत , और इन्ही अनंत पर मेरे आराध्य प्रभु विष्णु शयन करतें हैं। तिरुवनंतपुरम का नाम इन्ही अनंत नाग के नाम पर पड़ा है , और पद्मनाभ स्वामी के गर्भगृह में शयन करते विष्णु ;इसे साक्षात विष्णुलोक बना देते हैं ।
कहा जाता है ,कि श्री पद्मनाभ मंदिर को 6वीं शताब्दी में त्रावणकोर के राजाओं ने बनवाया था। लेकिन इसका उल्लेख प्राचीन वैदिक साहित्य में भी मिलता है, जो बताता है कि पद्मनाभस्वामी मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। महाभारत में एक उल्लेख आता है कि बलराम इस मंदिर में आए थे और यहां पूजा की थी। जनश्रुति है कि इसका निर्माण कलयुग के प्रथम दिन किया गया था , परंपरागत जनश्रुति के अनुसार यह मंदिर अतिप्राचीन है। इस मंदिर से संबंधित कई किंवदन्तियां हैं। उनमें से एक के अनुसार, जिसकी पुष्टि मंदिर में सुरक्षित ताड़-पत्रों पर किये गये अभिलेखों से भी होती है, कि इस मंदिर की मूर्ति-प्रतिष्ठा का श्रेय दिवाकर मुनि नामक तुलु ब्राह्मण को जाता है। उस समय के मौजूदा शासक को जब दिवाकर मुनि ने पद्मनाभ महात्म्य बताया ,तो उन्होंने खुद को ईश्वर को समर्पित कर दिया और वो #पद्मनाभ_दास कहलाए , आज भी इस वंश के लोगों को पद्मनाभ दास ही कहा जाता है ।।
चेरा वंश के गौरवशाली राजा #अनीयम_तिरुनाल मार्तान्ड वर्मा ने 1750 में खुद को भगवान का सेवक यानी ‘पद्मनाभ दास’ बताते हुए अपना जीवन और संपत्ति उन्हें सौंप दी। उन्होंने भगवान को ही राजा घोषित कर दिया और पद्मनाभस्वामी के मंदिर को पुनर्जीवित किया उसका पुनर्निर्माण करवाया ।
चूंकि जितनी पद्मनाभस्वामी के लिए त्रावणकोर रॉयल फैमिली पूर्णतया समर्पित है, उतनी ही हिंदुत्व के लिए भी। इसलिए हिंदुत्व के प्रचार प्रसार के लिए हर कदम उठाती आयी है। और यही कारण है कि ये हमेशा विधर्मियों के निशाने पर रहती है ।त्रावणकोर के राजपरिवार के विषय में प्रसिद्ध है की पद्मनाभ मंदिर में पूजा पाठ के बाद बाहर निकलते समय अपने कपड़े और हाथ पैर पूरी तरह से झाड़ते थे,ताकि मिट्टी का एक कण भी मंदिर से बाहर न जाए ।उनके अनुसार मंदिर का एक-एक कण भगवान पद्मनाभ का है।ऐसे राजपरिवार पर मंदिर की संपत्ति के दुरुपयोग का लांछन लगाया गया याचिकाएं डाली गई ।
भारत एकीकरण के दौरान त्रावणकोर कोचिन के शाही परिवार और भारत सरकार के बीच 1949 में एक अनुबंध पत्र साइन किया गया था । इसके तहत इस बात पर सहमति बनाई गई थी कि श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का प्रशासन 'त्रावणकोर के शासक' के पास रहेगा।इसमें त्रावणकोर कोचिन #हिंदू_रिलीजियस_इंस्टिट्यूशंस_एक्ट के सेक्शन 18(2) के तहत मंदिर का प्रबंधन त्रावणकोर के शासक के नेतृत्व वाले ट्रस्ट के हाथ में रहा जो त्रावणकोर के अंतिम शासक के निधन 20 जुलाई 1991 तक चला, तदुपरांत ईस्ट इंडिया कंपनी के नक्शे कदम पर चलते हुए जैसे उसने वारिस न होने पर अधिग्रहण का नियम बनाकर भारत के राज्यों को अधिग्रहित किया था ;वही पद्मनाभस्वामी मंदिर के साथ ही हुआ । 1991 में त्रावणकोर के अंतिम महाराजा बलराम वर्मा की मौत हो गई। 2007 में एक पूर्व आईपीएस अधिकारी सुंदरराजन ने एक याचिका कोर्ट में दाखिल कर राज परिवार के अधिकार को चुनौती दी। उसके बाद राजा की मृत्यु के बाद मौके की तलाश में बैठे ईसाई मिशनरियों ने सिविल कोर्ट मे याचिकाओं का अंबार लगा दिया की त्रावणकोर के शाही परिवार को मंदिर की संपत्ति का बेजां इस्तेमाल की अनुमति न दी जाए ।
राजा के वारिश के तौर पर उत्राटम तिरुनाल मार्तण्ड वर्मा यानी कि रिश्ते में सगे भाई ने अपना पक्ष रखा कि राजपरिवार के सदस्य के तौर पर वो पद्मनाभस्वामी की सेवा के लिए प्रस्तुत हैं, और वो इस मामले में हाईकोर्ट गए और वहां इससे जुड़ी सभी याचिकाओँ पर एक साथ सुनवाई हुई। तब हाईकोर्ट के सामने प्रश्न था कि क्या त्रावणकोर के आखिरी शासक के छोटे भाई के तौर पर वर्मा को 1950 के त्रावणकोर-कोचिन हिंदू रिलीजियस इंस्टिट्यूशंस एक्ट के सेक्शन 18(2) के तहत श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर पर मालिकाना हक, नियंत्रण और प्रबंधन का अधिकार है या नहीं?????
इस प्रश्न का जवाब देते हुए हाईकोर्ट ने कहा था कि "शासक' ऐसा दर्जा नहीं है जिसे उत्तराधिकारी के तौर पर हासिल किया जा सके। इस वजह से 1991 में अंतिम शासक की मौत के बाद पूर्व स्टेट ऑफ त्रावणकोर का कोई शासक जीवित नहीं है ,अतः उन्हें राजवंश के उत्तराधिकारी मानने से ही इनकार कर दिया और कहा गया कि उत्राटम तिरुनाल मार्तण्ड वर्मा त्रावणकोर के पूर्व शासक के तौर पर मंदिर के प्रशासन पर दावा नहीं कर सकते। हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि मंदिर के तहखानों में रखे खजाने को सार्वजनिक किया जाए। उसे एक म्युजियम में प्रदर्शित किया जाए और उससे व चढ़ावे में मिलने वाले पैसे से मंदिर का रखरखाव किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट में 8 साल से अधिक समय तक मामले की सुनवाई हुई।
केरल हाईकोर्ट ने 2011 के फैसले में राज्य सरकार को पद्मनाभस्वामी मंदिर की तमाम संपत्तियों और मैनेजमेंट पर नियंत्रण लेने का आदेश दिया था। इस आदेश को त्रावणकोर शाही परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जिसपर सुप्रीम कोर्ट में 8 साल से ज्यादा समय तक सुनवाई हुई। जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस इंदु मल्होत्रा की बेंच ने पिछले साल अप्रैल में इस मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था। और कल सोमवार को इसका फैसला आया इस फैसले में कहा कि त्रावणकोर शाही परिवार के आखिरी राजा का निधन होने का मतलब ये नहीं है ,कि मंदिर का मैनेजमेंट सरकार के हाथ में चला जाएगा ।
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने केरल के तिरुअनंतपुरम स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर (Padmanabhaswamy Temple) के प्रबंधन में त्रावणकोर के राजपरिवार के अधिकार को मान्यता दे दी है। तिरुअनंतपुरम के जिला जज की अध्यक्षता वाली कमेटी फिलहाल मंदिर की व्यवस्था देखेगी, कोर्ट ने राजपरिवार के सेवादार के हक को तो बरकरार रखा है ,लेकिन देवता की पूजा के तरीके से लेकर, मंदिर की सम्पत्तियों के रखरखाव, श्रद्धालुओं को सुविधाएं उपलब्ध कराने जैसे तमाम काम का अधिकार कोर्ट ने 5 सदस्यीय प्रशासनिक कमेटी और 3 सदस्य एडवाइजरी कमेटी को सौंप दिया है ।
#विशेष - प्राचीन दक्षिण भारत में आयोजित तीन संगम थे, जिन्हें लोकप्रिय रूप से Muchchangam कहा जाता था। इन संगमों का विकास मदुराई के पांड्या राजाओं के शाही संरक्षण के तहत हुआ। संगम युग के दौरान प्रमुख तीन राजवंशों ने शासन किया, जिनमें चेर, चोल और पाण्ड्य राजवंश थे। इन राज्यों के साक्ष्य के मुख्य स्रोतों को संगम अवधि के साहित्यों में उल्लेख मिलता है। पद्मनाभस्वामी मंदिर का निर्माण इन्हीं में से एक चेर शासकों ने किया । चेर राजवंश का आधुनिक केरल के प्रमुख भागों पर शासन रहा। उस समय चेर की राजधानी वंची थी और चेर राजवंश का प्रतीक 'धनुष और तीर' है। इस अवधि में तोंडी और मुसीरी महत्वपूर्ण बंदरगाह थे ,जिनसे होकर भारतीय मसालों ने एक कीर्तिमान स्थापित किया । चेर वंश का #महाकाव्य #शिलप्पदिकारम में विस्तृत उल्लेख मिलता है । चेर राजवंश के शासकों ने हिमालय के लिए एक अभियान किया , जिसके दौरान उन्होंने कई उत्तरी भारतीय शासकों को हराया था। दक्षिण भारत से चीन में तक राजदूत भेजने वाले पहले भारतीय शासक यही रहे ।।
जय स्वामी पद्मानाभ
अजेष्ठ
पद्मनाभ दिव्यदेशम
“विष्णुसहस्रनाम” एक व्यंजना मात्र है, उनके अनंत नामों को एक सीमित सूची में पिरोने का श्रद्धानत मानवीय उद्योग, जोकि महात्मा भीष्म ने अपने पौत्र युधिष्ठिर के लिए किया था। सूची के होने का तात्पर्य वैसा नहीं कि “उनके” मात्र एक सहस्र नाम हैं। कदापि नहीं!
किंतु फिर भी, ये सूची मानवों के संतोष का कारण अवश्य है कि चलिए “उनके” एक सहस्र नामों की सूची तो उपलब्ध ही है। ऐसी श्रमसाध्य सूची में कुल पाँच बार “नाभि-प्रकरण” का अवसर बना है :
श्लोक उन्नीस, श्लोक चौंतीस (दो बार), श्लोक इक्यावन व श्लोक अठानवे।
इनमें कुल तीन बार “पद्मनाभ” की भाँति, एक एक बार “हिरण्यनाभ” (ब्रह्मा को नाभि से प्रकट करने वाले) और “रत्ननाभ” (जिनकी नाभि सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ रत्न हो) की भाँति।
कई बार कुछ अतिशय तर्कवान बुद्धिपिशाच इस “पद्मनाभ” पुनरावृत्ति को महाभारत का क्षेपक कहकर उपहास करने का यत्न करते हैं, इस तथ्य से अविदित कि तीनों नामों की पृथक् पृथक् व्याख्या है।
श्लोक उन्नीस के “पद्मनाभ” का तात्पर्य है, वो जिनकी नाभि से कमल पुष्प उगता है। श्लोक चौंतीस के “पद्मनाभ” की अर्थ है, वो जिनकी नाभि कमल पुष्प के समान है। परंतु तीसरे “पद्मनाभ” की व्याख्या किंचित गाढ़ी है, प्रभु की भक्तवत्सलता को दर्शाती है।
श्लोक इक्यावन के “पद्मनाभ” वे हैं, जो अपने भक्तों के कमल पुष्प जैसे हृदय के केंद्र (नाभि) में विराजमान हैं, ऐसे पद्मनाभ!
यों तो महात्मा भीष्म की काव्यात्मकता का नाभि-प्रकरण कभी संपन्न नहीं हो सकता, किंतु उसे कहने के मानवीय सामर्थ्य की सीमाएँ हैं। ऐन इसी संक्षिप्त वर्णन से ज्ञातव्य हो कि दक्षिणभूमि के अंतिम तटीय शहर में विराजित महाविष्णु पहले “पद्मनाभ” का मूर्तरूप हैं, वे जिनकी नाभि से कमल पुष्प उगता है।
“दिव्यदेशम” तमिल भाषा के प्राच्य धार्मिक साहित्य की बड़ी मान्यताओं में से है!
इस मान्यता का उद्गम “दिव्यप्रबंधम” से हुआ है। इसे तमिल भाषा में संगृहीत वैष्णव-वेद कह दिया जाए, तो कदाचित् आपत्ति न होगी। इसमें कुल बारह वैष्णव संतों द्वारा रचित चार हज़ार पद्य रचनाएँ हैं। वे श्लोक हो सकती हैं, मंत्र हो सकती है, दोहा चौपाई सोरठा आदि छंद हो सकती हैं।
कुलज़मा चार हज़ार होने के कारण इन्हें “नालायिर दिव्यप्रबंधम” कहा गया है। (तमिल भाषा में चार हज़ार की संख्या को “नालायिर” कहा जाता है!)
इस “दिव्यप्रबंधम” में, जितने विष्णुमंदिरों का उल्लेख हुआ है, उन्हें “दिव्यदेशम” कहा गया। इनकी कुल संख्या एक सौ आठ है, जिनमें से कुल एक सौ छः इस पृथ्वी पर व शेष दो ब्रह्मांड में निश्चित किए गए हैं। भारत में कुल एक सौ पाँच हैं, नेपाल में एक : “मुक्तिनाथ शालिग्राम”।
उत्तर भारत के हिस्से आठ “दिव्यदेशम” आते हैं : उत्तर प्रदेश में चार, उत्तराखंड में तीन, गुजरात में एक। सुखद है कि अयोध्या जी की श्रीरामजन्मभूमि को तमिल “दिव्यप्रबंधम” ने “दिव्यदेशम” माना है। चकित होता हूँ कि कौन हैं वे प्रपंची लोग, जो उत्तर-दक्षिण की आर्य-अनार्य वैमनस्यता को खाद-पानी देते हैं।
सर्वाधिक “दिव्यदेशम” तमिलनाडु में हैं, पिचासी। केरल में ग्यारह और आंध्रा में दो! इन्हीं ग्यारह में से एक “पद्मनाभस्वामी” का मंदिर है, जनपद तिरुवनंतपुरम।
“अनंतपद्मनाभस्वामी” का मंदिर द्रविड़ मंदिर स्थापत्य की शैली के आधार पर निर्मित हुआ है!
कथाएँ प्रचलित हैं कि शेषनाग पर शयन करते महाविष्णु की “पद्मनाभ” मूरत का मूलस्थान केरल के ही कासरगोड जनपद में स्थिति एकमात्र झील मंदिर है, जहां मुख्य आकर्षण मंदिर का मुख्य रक्षक एक शाकाहारी मगरमच्छ है। वहाँ से इस मूरत को “मार्तंड वर्मा” लेकर आए थे।
चूँकि इस मंदिर में निर्माण में “चेर” साम्राज्य का प्रत्यक्ष जुड़ाव मिलता है, ज़ाहिर है कि इसकी स्थापत्य कला में “चेर” विशेषताएँ भी ख़ूब रची-बसी हैं। जैसे कि ऊँची दीवारों के कांधों पर गढ़ा गया गोपुरम्, बनावट में तिरुवत्तर के “आदिकेशव” मंदिर की हूबहू प्रतिकृति।
“त्रावणकोर” राजवंश “चेर” राजवंश की शाखा-प्रशाखा है! चेरों को यों ही नहीं केरल-पुत्र कहा गया, उनका इतिहास दो हज़ार साल पुराना है। सो, “त्रावणकोर” राजवंश के आप्त-छोर की खोज पर एक पृथक् लेख फिर कभी!
वर्तमान परिदृश्य का इतिहास सन् सत्रह सौ पचास के पौष-माघ की संधि में दबा मिल जाता है, जब महाराज त्रावणकोर “मार्तंड वर्मा” ने राज्य को “पद्मनाभ” मंदिर को सौंप दिया और स्वयं व शेष सभी उत्तरवर्तियों के लिए “पद्मनाभ दास” की उपाधि धारण कर ली।
आज भी महाराज त्रावणकोर यही उपाधि धारण करते हैं। उनका पूरा नाम है : श्री पद्मनाभ दास श्रीमूलं रामा वर्मा। उनके पुत्र भी यही धारण करेंगे और उनके पौत्र प्रपौत्र भी।
आज जो सम्मान “त्रावणकोर” राजवंश को प्राप्त हो रहा है, वो औचक नहीं है, अनायास नहीं है, किसी राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित नहीं है, बल्कि सत्य ये है कि केरल-पुत्रों की ऐसी महान “चेर” परम्परा के समग्र राज्य को, महाविष्णु को समर्पित कर देने वाले राजपारिवार के सम्मुख, कैसे न समूचा भारत नतशिर हो जाए।
अनंत प्रभु से कामना है कि मंदिर “अनंतपद्मनाभस्वामी” मंदिर की सेवायतों में “त्रावणकोर” राजवंश की पुनर्वापसी पूरे विश्व के लिए शुभ हो!
अस्तु।



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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद