अमिताभ बच्चन की जिंदगी की एक एक कहानी कल से अब तक हर न्यूज़ चैनल पर 100-200 बार दिखा चुके हैं , 1000 बार उनका बंगला सैनिटाइज़ करवा चुके हैं पर मनहूस मीडिया अभी भी हार नहीं मान रहा ऐसे अमिताभ की यादें संजो रहा है जैसे कि ........
अमिताभ का कोरोना तो नानावटी वाले ठीक कर देंगे पर हमारे इम्यून सिस्टम का क्या जो काढ़ा पी पी कर बनाया था, वो तो तुम न्यूज़ चैनल वालों ने पका पका कर फिर से कमजोर कर दिया..कोरोना से ज्यादा खतरनाक हो तुम न्यूज़ चैनल वालों, श्राप लगेगा तुम्हें हम सबकाकोरोना से डर नहीं लगता साहब, मनहूस मीडिया से लगता है..
मत पकाओ रे बाबा....
कन्फ्यूज़ कर दिया..
अमित जी के लिए हाथ उठा कर दुआ मांगू या हाथ जोड़कर प्रार्थना करूँ ?
2 मिनट मे मैगी बनाकर छोटे बच्चों को स्वस्थ बना दूँ या बोर्नबीता खिलाकर उनकी हाइट बढ़ा दूँ या कोल्ड-ड्रिंक पिला कर उनको फुर्तीला कर उनमे जीवन का जोश भर दूँ ?
सोचता हूँ संभवतः इस सब की कोई आवश्यकता भी है अथवा नहीं, क्योंकि शोले का सिक्का भले ही खोटा हो किन्तु कुली का 786 का असली बिल्ला तो अभी भी उनके पास ही होगा..
77 वर्ष की आयु मे भी जो व्यक्ति समाज और धर्म से अधिक अपने बच्चों के लिए कमाने पर ध्यान देता हो वो आदरणीय तो होना ही चाहिए..
और फिर एक Entertainer जिसे अक्सर हीरो भी कहा जाता है, उस दृष्टि से निःसंदेह अभिताभ बच्चन बीती सदी का एक महानायक है.. और उसका सदैव सम्मान किया ही जाना चाहिए, किन्तु व्यक्ति के गुणों को, उसके चरित्र को यदि आधार माना जाए तब अमित जी की स्थिति क्या है, इस पर आपके क्या विचार है ?
*सोचिए उन लाखों हिन्दू युवतियों के बारे में...*
आप में से मुश्किल से कुछ लोगो को ये पता होगा कि मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान जन्म से हिन्दू थी और उनका असली नाम निर्मला नागपाल था और व्यक्तिगत रूप से उनका पूरा जीवन बर्बाद हो गया..
उनके पिता का नाम किशनचंद सिंह और माँ का नाम नोनी सिंह था.. हिन्दू थे और पाकिस्तान में मुसलमानों के बीच नहीं रहना चाहते थे, इस वजह से विभाजन के बाद उनका पूरा परिवार सब कुछ छोड़ कर हिंदुस्तान आ गया ।
महज 3 साल की उम्र से बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम शुरू करने वाली निर्मला 1974 में जब 13 साल की थी तो उनकी एक फ़िल्म आयी थी 'गीता मेरा नाम', उस फिल्म में एक कोरियोग्राफर था -बी.सोहनलाल ।
13 साल की उम्र में निर्मला को अपने से 30 साल बड़े बी.सोहनलाल से प्रेम हो गया और वो उनसे शादी करने के सपने देखने लगी, लेकिन बी.सोहनलाल ने शर्त रखी कि अगर उनसे शादी करनी है तो पहले मुसलमान बनना पड़ेगा.. जिसका नतीजा ये हुआ कि 13 साल की अबोध निर्मला ने इस्लाम अपना लिया और बन गयी सरोज खान !
शादी करने वाला बी.सोहनलाल पहले से शादीशुदा था लेकिन ये बात उसने सरोज खान से छिपाई थी, शादी के बाद सरोज खान ने बेटे राजू खान को जन्म दिया जिसे अपनाने से बी.सोहनलाल ने इनकार कर दिया और सरोज खान का बहुत ही कम उम्र में परित्याग कर दिया।
उस वक़्त से लेकर अंतिम सांस तक सरोज खान अपने बेटे के लिए अकेले ही रही.. उस 13 साल की छोटी सी बच्ची निर्मला का निश्छल प्यार उसके जीवन की सबसे बड़ी गलती साबित हुई ।
इस पूरी सच्चाई को बताने के बाद कुछ बचता नहीं है और बताने को, 13 साल की बच्ची निर्मला से जब पूछा जाता था कि क्या उन्होंने इस्लाम दबाव में स्वीकारा है तो उसका जवाब रहता था नहीं, मुझे इस्लाम से प्रेरणा मिलती है.. उतनी छोटी बच्ची कितनी अबोध होगी ये आप खुद समझ सकते हैं, ये छल उसके साथ हुआ.. साथ मे एक और छल जिसका जिक्र आज के समय मे बहुत हो रहा है, वो ये की बी.सोहनलाल ने शादी के लिए सरोज खान को मुसलमान बनने पर मजबूर किया था लेकिन खुद आजीवन अपना हिन्दू नाम रखकर जीता रहा, क्यों आखिर?
सरोज खान बड़ा नाम था, मशहूर थी तो उनकी कहानी हमे आपको पता चल रही है, सोचिए उन लाखों हिन्दू युवतियों के बारे में जिनको मुसलमान बना कर, निकाह करके, बच्चे पैदा करके छोड़ दिया जात
आप में से मुश्किल से कुछ लोगो को ये पता होगा कि मशहूर कोरियोग्राफर सरोज खान जन्म से हिन्दू थी और उनका असली नाम निर्मला नागपाल था और व्यक्तिगत रूप से उनका पूरा जीवन बर्बाद हो गया..
उनके पिता का नाम किशनचंद सिंह और माँ का नाम नोनी सिंह था.. हिन्दू थे और पाकिस्तान में मुसलमानों के बीच नहीं रहना चाहते थे, इस वजह से विभाजन के बाद उनका पूरा परिवार सब कुछ छोड़ कर हिंदुस्तान आ गया ।
महज 3 साल की उम्र से बतौर चाइल्ड आर्टिस्ट काम शुरू करने वाली निर्मला 1974 में जब 13 साल की थी तो उनकी एक फ़िल्म आयी थी 'गीता मेरा नाम', उस फिल्म में एक कोरियोग्राफर था -बी.सोहनलाल ।
13 साल की उम्र में निर्मला को अपने से 30 साल बड़े बी.सोहनलाल से प्रेम हो गया और वो उनसे शादी करने के सपने देखने लगी, लेकिन बी.सोहनलाल ने शर्त रखी कि अगर उनसे शादी करनी है तो पहले मुसलमान बनना पड़ेगा.. जिसका नतीजा ये हुआ कि 13 साल की अबोध निर्मला ने इस्लाम अपना लिया और बन गयी सरोज खान !
शादी करने वाला बी.सोहनलाल पहले से शादीशुदा था लेकिन ये बात उसने सरोज खान से छिपाई थी, शादी के बाद सरोज खान ने बेटे राजू खान को जन्म दिया जिसे अपनाने से बी.सोहनलाल ने इनकार कर दिया और सरोज खान का बहुत ही कम उम्र में परित्याग कर दिया।
उस वक़्त से लेकर अंतिम सांस तक सरोज खान अपने बेटे के लिए अकेले ही रही.. उस 13 साल की छोटी सी बच्ची निर्मला का निश्छल प्यार उसके जीवन की सबसे बड़ी गलती साबित हुई ।
इस पूरी सच्चाई को बताने के बाद कुछ बचता नहीं है और बताने को, 13 साल की बच्ची निर्मला से जब पूछा जाता था कि क्या उन्होंने इस्लाम दबाव में स्वीकारा है तो उसका जवाब रहता था नहीं, मुझे इस्लाम से प्रेरणा मिलती है.. उतनी छोटी बच्ची कितनी अबोध होगी ये आप खुद समझ सकते हैं, ये छल उसके साथ हुआ.. साथ मे एक और छल जिसका जिक्र आज के समय मे बहुत हो रहा है, वो ये की बी.सोहनलाल ने शादी के लिए सरोज खान को मुसलमान बनने पर मजबूर किया था लेकिन खुद आजीवन अपना हिन्दू नाम रखकर जीता रहा, क्यों आखिर?
सरोज खान बड़ा नाम था, मशहूर थी तो उनकी कहानी हमे आपको पता चल रही है, सोचिए उन लाखों हिन्दू युवतियों के बारे में जिनको मुसलमान बना कर, निकाह करके, बच्चे पैदा करके छोड़ दिया जात



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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद