सचिव वैद गुरु तीन जो प्रिय बोलहिं भैआस राज धर्म तन तीन का होंई बेग ही नाश इसका मतलब यह हुआ सचिव वैद्य और गुरु यदि केवल प्रिय बोलना शुरू करें तो सचिव के माध्यम से राज्य का पतन होता है वैद्य अगर केवल मीठे मीठे खाने को और मीठी-मीठी बातों को बताएं कड़वी बात या कड़वी घुँट ना दे तो उस शरीर का रुग्ण होना पक्का है गुरु या सलाहकार आपको सही सलाह ना देकर केवल आपको चिकनी चुपडी बातें बताएं तो धर्म का भी नाश हो जाता है
हमारे पूरे भारत खंड की तकलीफ, बेचारापन, असमानता, लाचारी का कारण क्या है । हमारी आबादी पूरे युरोपसे कई गुना अधीक रही है । कुदरत की दी हुई बक्षिसें, नदियां, पहाड, खेत के मामले में भी युरोप से कहीं आगे हैं । हिन्दुस्तान सचमुच सोनेकी चिडिया था । और अगर ये सोनेकी चिडिया ना होता तो युरोप की प्रजा कभी भी भारत नही आती । लेकिन इस कुदरती की बक्षिस और भारी आबादी के बावजुद भारत गुलाम है, गरीब है, वंचित है । क्यों ? असली कारण भारतियों का रवैया है । भारत के लोगोमें एकमत नही है । ये लोग अलग अलग जाति, धर्म और बिरादरी में बंटे हुये हैं इसलिए वो गुलाम है ।याद रख्खो, जीस प्रजामें एकता नही होती वो हमेशां के लिए गुलाम रहती हैं, गरीब रहती हैं, वंचित रहती हैं । हालत तब तक नही सुधरेगी जब तक एक हो कर अन्याय से विरोध नही करेंगे ।
ये शब्द एक अंग्रेज के थे, जब वो रिटायर्ड होकर भारत से जा रहा था तो उस के विदाय के समारोह में उसने कहे थे । उसे भारत की जनता की फिकर थी, वो जानता था भारत से अंग्रेजों को भारतिय जनता नही भगा रही, बल्कि युरोप अमरिका के धन माफिया यहुदी भगा रहे हैं ।
हिटलर ने सुभाष बाबू को कुछ ऐसे ही शब्द कहे थे जब वो हिटलर से मदद मांगने गए थे । आगे भी कहा था "आप ऐसी बिखरी हुइ प्रजा पर राज नही कर पाओगे, मि.बोज ।"
हिटलर उन धन माफियाओं से लडते हुए खतम हो गया, राष्ट्रवादियों के लिए जो शुन्यावकाश छोडता गया वो आजतक भरा नही है । उस शुन्यावकाश को थोडा भी भरने की कोशीश की वो खतम हो गया । अमरिका में लिंकन और केनेडी, भारत में शाश्त्री, इन्दिरा और राजीव गांधी, मिडल इस्ट में सद्दाम और गद्दाफी, और जहां उन दानवों का अस्तित्व नही था वहां के राजकर्ताओं को खतम कर दिया । रूस में जार और नेपाल में नेपाली राज घराना, अफगानिस्तान और इरान और संपूर्ण विश्व से राजव्यवस्था समाप्त करवा दिया। यहां के राजाओं को भी बहुत समाप्त करने की कोशिश की गई पर आजादी के समय भी बहुत से रियासतें स्वतंत्र रुप से संचालित हो रही थी वह अंग्रेजी कानून व्यवस्था और उनकी चंगुल उनकी चंगुल से बाहर थे इन सब को खत्म कर दिया गया आजादी के बाद
सभी देशों में लोकशाही के नाम पर उन धन माफियाओं ने अपना बनाया संविधान थोप दिया । सभी देशों के न्यायतंत्र को अपने अधिन रख्खा । भोली जनता को समजाया गया कि न्यायतंत्र लोकशाही का एक स्वतंत्र खंभा है, आप के राज्यकर्ताओं को भी सजा देने का पावर है इस में ।
कैसी विडंना है, जनता ने जीन को देश की लगाम सौंपी उन राज्यकार्ताओं के हाथ के निचे भारत का न्यायतंत्र नही ? तो कानून मंत्री का पोर्टफोलियो ही क्यों बनाया गया है ? राजाओं के कानून मंत्री या अकबर का बिरबल क्या जोक सुनाने के लिए ही थे ?
मिडिया नाम का एक दुसरा खंभा भी खडा किया, लेकिन दानवों ने धन के बल पर उसे भी अपने काबू में रख्खा और नादान जनता को समजा दिया की ये भी लोकशाही का स्वतंत्र खंभा है, आप के राज्यकर्ताओं को गालियां देने के लिए स्वतंत्र है ।
भारत को कभी आजाद किया ही नही है । भारत पाक का बटवारा भारत के क्षेत्रफल को छोटा करना मात्र था । भारत मजबूत और बडा देश बन जाये वो दानव नही चाहते थे ।वे उन दानवों के प्यादे अंग्रेजों की नियत भांप गये थे । इस लिए कुछ लोगों ने संपूर्ण बटवारे की मांग की थी । सारे हिन्दु भारतमें आ जाये और सारे मुस्लिम पाकिस्तानमें चले जाये । कमसे कम दो मजबूत राष्ट्र बनते, भारत सारे हिन्दुओं के कारण और पाकिस्तान सारे मुस्लिमो के । अंग्रेज, अंग्रेज के साथी गांधी और नेहरु डर गये । अपने आका दानवों का प्लान फेल हो रहा था । सनातन के अग्रणी लोगों की मांग को ठुकरा दिया । नकली हिन्दु मुस्लिम भाई भाई की बातें कही गई और पूरा बटवारा भी नहीं होने दिया ।
भारत में जो भी लोग थे उन को और बांटने के लिए भाषा का सहारा लिया । भाषा के हिसाब से राज्य बनाये । नागरिक पंजाबी, गुजराती, मराठी या बंगाली बन गया । हिन्दु प्रजा को तोडने के लिए आरक्षण का सहारा लिया । हिन्दु हिन्दु में जहर भर दिया । नागरिकों की सोच बिखर गई, हर सोच के लिए राजकिय पक्ष बनाने की इजाजत मिल गई । पचासों पक्ष खडे हो गये । ये पक्ष बहार से देखो तो लगता है वो प्रजा के खास हिस्से की आवाज है लेकिन अंदर से देखो तो ज्यादातर उन दानवों के ईशारे पर चलते हैं । आज हम पर दिल्ली नही पर युनो के दानव राज्य कर रहे है । वो दानव के ही आदमी है जो अमरिका द्वारा भारतमें कोइ राष्ट्रिय पक्ष या नेता को पनपने नही देता है । वो दानव के ही आदमी है जो पूरा मिडिया कंटोल करता है । वो दानव के ही आदमी हैं जो अपने आप को धर्म निर्पेक्ष और बुध्धिजीवी समजते हैं और राष्ट्रवादी संस्थाओं और आदमीयों को कोसते रहते हैं । वो दानव के ही आदमी है जो भारत की संपदा दानवों के विदेशी साथियों को 'एफडीआई' के नाम बेच रहे हैं और उन को बेची हुई संपदा के मालिक बन कर भारत में बूला रहे हैं ।
इस फोटो में जीन पार्टियों के नाम है उन मे से किसी में भी हिन्दुओं का कल्याण करने की भावना की खुश्बू नही मिलेगी । बदबू ही बदबू भरी है हिन्दु विरोध की ।
देश का नाम हिन्दुसतान, हिन्दुओं का देश, प्रजा में भी हिन्दु बहुमति में । तो फिर ये सब गद्दार पार्टिया क्यों ?
जवाब है किसने कहा ये सारी पार्टियां इस देश की है, इस देश के लिए हैं । ये सब तो ग्लोबल राजनीति के प्यादे हैं । अंग्रेज पराये लगते थे तो उन को हटाकर दिखने में अपना लगे ऐसे प्यादों को बैठा दिया गया है ।आप सोचते हो आपके वोट से सरकारें बनती है, बिलकुल गलत । आप सोचते हो तुष्टिकर और वोट की राजनीति है, वो भी गलत । ये तुष्टिकरण या वोट की राजनीति नही है, दानवों के इशारे चुनाव आयोग का भ्रष्ट विभाग ही चुनाव जीता देता है, ये ध्रुविकरण की राजनीति है, भारत की जनता को बांटने की राजनीति है, जनता में स्वार्थ भरने की राजनीति है । जनता में दम ही नही रहना चाहिए की जब उनको मारा जाये तो एक साथ लाठी ले कर खडे होकर सामना कर सके । बल्कि जनता ही आपसमें टकरा कर मर जाय ऐसा प्रोत्साहन दिया जा रहा है, ऐसा माहोल खडा किया जा रहा है, समजो बारूद का ढेर बनाया जा रहा है ।
भारत के मूल सनातन धर्म को तोडकर भारत में इतने सारे धर्म बन गये हैं क्या वो मानव कल्याण के लिए हैं ? जी नही, भारत को शतानों के आगे सरेन्डर करवाने के लिए बने हैं । भारत को तितरबितर करने के लिए सेंकडों नकली धर्मगुरु खडे कर दिए उन को बढावा देकर । कोइ धर्म शैतानियत सिखाता है, कोइ पलायनवाद सिखाता है, कोइ अपनी जनता को नपुंसक बनाता है, कोइ दानवों का दलाल बनाता है, कोइ स्वार्थी बन के अकेले भगवान को मिलने जाने के सपने दिखाता है जैसे भगवान उन को मिलने के लिए उपर राह देखता बैठा हो । मुख्य धर्म को बदनाम कर के, शास्र्तों की बातों को घुमाते हुए, मुख्य धर्म का एक एक टुकडा लेकर बैठ गये हैं अपनी अपनी दुकान खोलकर और भक्तजनो को ग्राहक समजते हुए अपना विज्ञापन करना भी नही चुकते ।
यदि हम भारत की जनता को मोती से तुलना करें तो वो फुटे मोती ही है, जो अलग अलग नकली गुरुओं और अलग अलग नेताओं के गले में हार बन के शोभयमान हो रहे हैं । और वहां भी शांति नही है, उन गलों के सभी हार भी बिखरे बिखरे है इस फोटो की काली छाया के हार की तरह ।
कीसी भी देश को सही तरह चलाने के लिए राज्य और धर्म दोनो को साथ में मिलकर काम करना होता है । दानवों ने दोनो पर हल्ला किया है ।
आज यदि भारत का नागरिक नही सुधरा, अपनी आंख नही खोली तो अब दिन दूर नही ये दानव के भक्त भारतिय नागरिकों को अंदर ही अंदर लडावा के मरवा देन्गे ।

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद