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मानसिक गुलाम समाज में शिक्षा की वास्तविक स्थिति



वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर व्यंग भी है और एक रास्ता भी दिखाती है --- डिप्लोमा इन दुनियादारी !!! गाँव के स्कूल में एक मास्टर साहेब थे...नाम था तिरलोचन तिवारी उर्फ़ मरखहवा मास्टर...ज्ञान को हमेशा कपार पर उठाये रहते थे । माघ के जाड़े में भी उनको देखने पर जेठ का एहसास होता था... उनके इस मिजाज का आलम ये था कि स्कूल का कोई लड़का नहीं बचा था, जिसके पीठ पर मास्टर साब की छड़ी का निशान न हो...रनुआ आ सनुआ तो उनके नाम से माँड़ो के बांस जइसा हिलने लगते थे...गिनती नहीं की कि दीपूआ आ सीपूआ ने कितनी बार मास्टर साहब को देखकर पैंट में पेशाब किया होगा…रामबचन का मझिला तो एक दिन तेरह साते अंठानबे कह दिया...बाप रे ! मास्टर साहेब अईसा पिनीक के मारे कि हल्दी दूध का घोल लेना पड़ा । तब जाकर लौंडे के जान में जान आई..आज भले उसे नौ का पहाड़ा याद नहीं लेकिन मरखहवा मास्टर साहेब का नाम सुनते ही तेरह का पहाड़ा तेरह बार पढ़ देता है । तो साहेब.. हुआ क्या की..मास्टर साहब का एक ही बेटा था पिंटूआ । गाँव भर में शोर था की पिंटूआ से पढ़ने में तेज तो पूरे जिले-जवार में कोई नहीं है….बाइस घण्टा हनहना के पढ़ता है..फिजिक्सवा आ केमेस्ट्रीया को तो मूड़ी तर लेकर सुतता है..मैथमैटीक्सवा आ टीनामेंटरीया त शरबत जइसा घोर के पी गया है.. सब परीक्षा में फस किलास आता है..उसको कलेक्टर बनने से काली माई भी नहीं रोक सकतीं...लाल बत्ती हनहनाता हुआ जहिया गांव में आया...बुझ लीजिये की ओहि दिन में गाँव में गरदा हो जाएगा, इतना कहने के बाद सभी लोग एक स्वर में कहते, *”हाँ तो मने बेटा हो तो पिंटूआ जइसा..किस्मत हो तो तिरलोचन मास्टर जइसा..”* इस उम्मीद आ तारीफ़ के कारण मास्टर साहेब भी पिंटूआ को खूब पढ़ाए । बारहवीं तक कहीं घर से आने-जाने नहीं दिए..बस स्कूल से किताब, किताब से कोचिंग, कोचिंग से ट्यूशन, ट्यूशन से घर, घर से स्कूल.. बारहवीं तक पिंटूआ ने इसी माहौल में बिल्कुल एक यंत्र की भांति पढ़ाई किया । एक दिन हुआ ऐसा कि परम्परा के अनुसार बीटेक में एडमिशन हो गया । बीटेक में एडमिशन हुआ..तो परम्परा के अनुसार नौकरी भी मिल गयी..फिर एक साल नौकरी किया तो परम्परा के अनुसार किसी दूसरे जगह से आकर्षक सैलरी का ऑफर भी आ गया..वहां से नौकरी छोड़ा तो मास्टर साहेब के दबाब में डिप्लोमा इन फलाना, डिप्लोमा इन चिलाना सब कर लिया । फिर खूब बढ़िया Salary वाली Job भी मिल गयी..कुछ दिन बाद बियाह हुआ तो बढ़िया नौकरी करने वाली मेहरारू भी मिल गयी.. लेकिन साहेब..आजकल तिरलोचन मास्टर साहेब बड़े खिन्न रहते हैं । पिंटूआ का बड़का बेटा उनको गरियाता है..पिंटूआ की मेहरारू रोज उनके मरने की कामना करते हुए अपने किस्मत को कोसती है । मास्टर साहेब से एक छन नहीं पटता है..फलस्वरूप पिंटूआ ने अपने आप को अपने माई-बाबूजी से दूर कर लिया है । अब तो सालों हो गए, गाँव भी नही आता । फिर क्या..जिस मास्टर साहेब की कभी तूती बोलती थी वो आजकल अपने दुआर पर दीन-हीन की तरह मुंह लटकाए बैठे रहतें हैं.. ..जिस पिंटूआ को लेकर कभी गर्व महसूस करते थे, उसको लेकर अब शर्मिंदा रहते हैं.. लेकिन ये सिर्फ तिरलोचन मास्टर साब की कहानी नही है..जरा नज़र दौड़ाइये तिरलोचन मास्टर साहब जैसे दो-चार दस लोग आपको हर गाँव, हर टोले-मोहल्ले में मिल जाएंगे । आज हर शहर में धड़ल्ले से एक बिल्डिंग बन रही..जिसकी नींव में सीमेंट बालू नहीं तिरलोचन मास्टर साहेब वाली कहानीयों को डाला जा रहा है । और दुनिया बड़े ही संस्कारपूर्वक उसे वृद्धाआश्रम कह रही है.. लेकिन क्या कहेंगे.. ?.. दोष तो पूरा तिरलोचन मास्टर साहेब का है न ?..क्या कहतें हैं आप ? बिल्कुल आप सही कहतें हैं…जीवन भर तो बेटे को किताबों में उलझाये रहे...डिप्लोमा पर डिप्लोमा, डिग्री पर डिग्री, नौकरी पर नौकरी कराते रहे । कराते-कराते एक दिन उसे पइसा कमाने वाली मशीन बना दिए..बस आदमी बनाना भूल गए । और ये भी भूल गए कि हमारे पुरखे-पुरनीयों ने एक कहावत कहा है की, *“बबुआ रे एक मन विद्या के नौ मन बुद्धि चाहेला..”* वो भूल गए की बेटा-बेटी को सभी Diploma के बाद एक वो डिप्लोमा कराना सबसे ज्यादा जरूरी है.. जिस डिप्लोमा को किये बिना कुछ भी करना बेकार है, वो डिप्लोमा है दुनियादारी का डिप्लोमा, वो डिप्लोमा है विवेक का डिप्लोमा, संस्कार का डिप्लोमा, सदाचार का डिप्लोमा, संवेदना का डिप्लोमा । वो भूल गए की पिंटूआ ये नहीं करेगा तो एक दिन बड़ी दिक्कत होगी..लेकिन अफ़सोस । न इसमें मास्टर साहेब का दोष है न पिंटूआ का, ये तो उस लार्ड मैकाले वाली शिक्षा पद्धति का दोष है जिसमें इस टाइप के Diploma की कोई व्यवस्था नहीं की गयी है...न ही अपने आस-पास घट रही घटनाओं को देखकर..कुछ सिखने की जरूरत महसूस की गयी है... बस किताब से रटकर फर्स्ट क्लास पास होना । और नौकरी करना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य रह गया है । आज मास्टर साब जैसे बाप धड़ल्ले से अपने-अपने बेटे को पैसा कमाने वाली मशीन बना रहे हैं । आप जरा नज़र दौड़ाइए..जितनी तेजी से देश में ये मशीने बन रहीं..उतनी ही तेजी से वृद्धाआश्रम बन रहे... क्या है कि मास्टर साहेब हो या पिंटूआ सबको सीखने की जरूरत है । गुजरात के उस अरबपति हीरा व्यापारी से…जिसने एक दिन अमेरिका में MBA करने वाले अपने बाइस वर्षीय बेटे से सभी सुविधाएं छीन कर ये कह दिया कि, *“पढ़ाई लिखाई को थोड़ा रोको* *और जाओ..बिना पैसे खर्च किये कुछ कमाकर लाओ ।”* कहते हैं उनके लड़के का नाम धृव्य था, धृव्य ढोलकिया जिनके बाप का सैकड़ों देशों में कारोबार फैला हुआ है..अरे वही बाप..साव जी ढोलकिया, जिनका नाम दीपावली आते ही इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया में दिए की भाँति चमकने लगता है । जो अपने कम्पनी के कर्मचारियों से इतना प्रेम करतें है की हर दिवाली में हजारों Car से लेकर हजारों flat तक गिफ्ट कर देते हैं । एक दिन उसी अमीर बाप ने अपने बेटे को 7 हजार रुपए दिया और सामने तीन शर्त रख दिया… पहली शर्त ये थी कि वह किसी गैर भाषी प्रांत में रहेगा । बिल्कुल अनजान लोग,भाषा और माहौल के बीच…और वहाँ भी कहीं एक हफ्ते से ज्यादा काम नहीं करेगा । दूसरी यह कि वह कहीं पर भी अपने पिता के नाम का इस्तेमाल नहीं करेगा..तीसरा यह कि वह ना तो मोबाइल इस्तेमाल करेगा और ना ही दिए गए 7 हजार रुपए । कहते हैं..इस घटना के बाद धृव्य ने एक इंटरव्यू दिया..और कुछ बड़ी हीं गौर करने लायक बातें कहीं जो मास्टर साहेब और पिंटूआ टाइप दोनों लोगो को जानना चाहिये…उसने कहा कि, *“मैं एक महीने तक कोच्चि में काम करने के बाद वापस आ गया । 5 दिनों तक मुझे ना तो काम मिला ना ही रहने के लिए कोई जगह । लगभग 60 जगहों पर अप्लाई करने के बावजूद मुझे किसी ने काम नहीं दिया । फिर बड़ी मुश्किल से बेकरी में काम किया । फिर एक कॉल सेंटर में । फिर वह एक जूते की दुकान पर..और आखिरी में McDonald पहुंचा । इस तरह संघर्ष करके बस चार हजार रुपये कमाए..* *लेकिन इस घटना के बाद मेरे अंदर वो ताकत मिली जो आजतक किसी किताब ने नही सिखाया था..वो थी रिजेक्शन को झेलने की ताकत । बार-बार असफल होने की ताकत..किताब से हटकर दुनिया और लोग को नजदीक से समझने की ताकत..बार-बार गिरकर उठने की ताकत..बिना किसी के सहारे खड़े होने की ताकत..”* तिरलोचन मास्टर साहेब के बेटे पिंटूआ को उस सुंदर पिचाई से सीखना चाहिए..वही Google के Ceo सुंदर पिचाई..अभी वो IIT खड़गपुर आए थे.. और एक सवाल के जबाब में कह गए कि, *“दुनियादारी का ज्ञान किताबों के ज्ञान से ज्यादा जरूरी है..जीवन भर किताब और फर्स्ट डिविजन हमें ज्ञान और पैसा तो दे सकते हैंं । लेकिन इस ज्ञान और पैसे का सदुपयोग करने के लिए विवेक नहीं है ।"* कभी सुंदर सी ग्रेड आते थे । लेकिन आज सफलता के शिखर पर हैं । वहां, जहाँ से हर चीज छोटी नज़र आती है.. ये भी कहा कि, *"सफलता हमेशा मार्कशीट देखकर नहीं आती । स्मार्ट तरीके से मेहनत करने से आती है । गधे जैसे मेहनत करने से नहीं.."* सुंदर ने आगे कहा कि, *“उनको तो यह सुनकर आश्चर्य होता है कि भारत में आठवीं कक्षा का बच्चा आज आइआइटी की तैयारी कर रहा है ।"* बस सुंदर ने अभी कुछ देखा ही नहीं । वो मेरे मोहल्ले के एक इंग्लिश मीडियम स्कूल में आए होते..तो दांतों उँगली दबा लेते । दो-दो, तीन-तीन साल के बच्चे चिल्ला रहे हैं । लेकिन उनकी क्यूट सी मम्मा अपने क्यूट से मुन्नू के पीठ पर बस्ते को लादे जा रही हैं..बच्चा चिल्ला रहा, रो रहा, छटपटा रहा..और वो पास खड़ी मोना आँटी से मुंह चमकाके कहे जा रहीं... *”मेला लाजा... बेटा तो इंजीनीयर बनेगा..”*वहीं दूसरी  मोनालिसा अंटी मेरा बिटिया तो डॉक्टर ही बनेगी अरे  बस करिये महराज । क्या ख़ाक बनेगा? आपका यही हाल रहा तो भगवान न करे.. आपका हाल भी तिरलोचन मास्टर का हाल हो जाएगा । अरे ! अभी कितना छोटा है । कितना मासूम । आपकी गोद से बढ़कर कोई स्कूल हो सकता क्या है उसके लिए ? अपने पास ही जमकर खेलने दीजिये न ।गिरने दीजिये, उठने दीजिये, बनाने और बिगाड़ने दी जिये..फेंकने और पटकने दीजिये.उसके हाथ से गिलास न लीजिए..उसे मिट्टी दीजिये और कहिये की एक मिट्टी का सुंदर सा गिलास बनाकर लाओ.. बस..आदमी बनने की पहली क्लास उसी दिन शुरु हो जायेगी..एक संवेदनशील आदमी । क्योंकि ये संवेदनशीलता तभी आएगी..जब कुछ सृजनशीलता आएगी..जब सृजन आएगा तब विवेक आएगा । जब विवेक आएगा तभी ज्ञान की सार्थकता होगी । इन इंग्लिश मीडियम स्कूलों के चक्कर में ज्यादा मत पड़िये..दरअसल ये बाजारवाद का चमत्कार है..जिसके भयंकर मकड़ जाल में आप फंस गये हैं । आप ध्यान से देखेंगे तो वहाँ बड़ी ही गहरे में एक साजिश चल रही है..आपके बच्चे को आपके भाषा, संस्कृति, संस्कार और संवेदना से दूर करने की.. आप जानिये कि वहां आज रट्टू तोते बनाए जा रहे हैं..और ये भी जानिये की रट्टू तोते कभी सृजन नहीं करते । इतिहास गवाह है..जरा उठाकर देखियेगा ..कितनों के नाम गिनाऊँ..अधिकतर महान लोग जिन्होंने अपने सृजन से दुनिया को बदल कर रख दिया है वो या तो कालेज नहीं गए या कालेज के सबसे गधे छात्र रहे हैं..या बीच में ही कालेज छोड़ दिया है…..जरा आँखें खोलिए । ये किताबों का बोझ कम करिये । वरना क्या पता ईश्वर न करे की आपको तिरलोचन मास्टर साहेब की तरह उदास रहना पड़े..ईश्वर न करे की किसी दिन पैसे की मशीन बन गया आपका बेटा आपके शहर का वृद्धाआश्रम आपके लिए बुक करा दे

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