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शीतल जल और वास्तुशास्त्र का उपयोग वैदिक जीवन शैली में


कंबोडिया के अंकोरवाट का यह चित्र अपनी सनातन संस्कृति का एक जीता जागता दृश्य जो गौरव के साथ आनेवाली पीढ़ी को गौरवशाली अतित का स्मरण कराता है ये पानी में रहने वाले शेषनाग का मंदिर
हमारी वैदिक जीवन शैली और और इस गर्मी के मौसम में पानी की कैसी व्यवस्था रही है और घरों के पानी रखने के स्थान का वास्तु के हिसाब से नक्षत्रों का प्रभाव हमारे शास्त्रों में बताया गया है इन सब विषयों को इसमें समाहित किया गया है
ज्येष्ठे मूलाख्यनक्षत्रे शीतकुम्भं प्रदापयेत् ॥
पुराण में यह बात तब कही गई थी जब जेठ के महीना में थोड़ी गरमी होने लगती थी।
इसी मक्षिका स्थाने मक्षिका न पकड़े रहो,
अब चैत की नवरात में जो घड़ा लेकर आते हो न,  उसी की बात हो रही है.
चैत में ही घड़ों को देना चाहिये कि नहीं?
अच्छा किसी को मत दो.. प्याऊ की व्यवस्था तो देखी होगी न?  किस महीने से दिखने लगती है?
अच्छा अपने घर में फ्रिज का ठण्ढा पानी कब से पीना शुरू कर देते हो?
हैंऽ?  तब पुराण ध्यान नहीं आता होगा कि जेठ की पूर्णिमा से फ्रिज का ठण्ढा पानी पीना शुरू करें. !
इसी कारण भगवान् ने गीता से कहा था कि शास्त्र से अधिक शास्त्रविधि का पालन करो।
पनडेरा, पंडेरा और पानेरा
घरों में जलस्थान बनाने की परंपरा बड़ी पुरानी है। घट कलश, चरु-चरवी और गंगाजली (लोटा), झारा, गिलास वगैरह इसके अंग रहे। चाणक्य ने पानेरा व पानेरी का जिक्र किया है। प्रपा के महत्व को तो ऋग्वेद में बताया गया है लेकिन वहां इसके रचनात्मक रूप के वर्णन का अभाव है।
हर्षचरित में पौंसले का जो वर्णन है, वह कई अर्थों में रोचक है। कई तरह के कलशों का जिक्र है और पानी को ठंडा रखने के लिए रेत पर गिले कपड़े से ढककर कलश रखने जैसी विधि वही है, जो आज भी हमारे बीच है लेकिन फ्रीज़ ने उस परंपरा को दरकिनार करने में कसर नहीं छोड़ी और घर के वास्तु को बिगाड़ने का भी काम किया।
वास्तु विषयक अनेक ग्रंथों घर में सोलह उपयोगी स्थल बनाने का जो संदर्भ है, वह जलस्थल से आरंभ होता है। इसकी वजह थी कि वरुण स्थान समस्त रचनाओं को संतुलित करता। इससे यह विश्वास भी मजबूत हुआ कि यह देवी की तरह है। इसी कारण पंडेरा को 'पंडेरी' कहा जाने लगा।
ऐसे कई परिवार हैं, तो अपने मूल स्थान की पंडेरी को किसी भी सामूहिक आयोजन में पूजना नहीं भूलते। वंशवर्द्धन पर भी पंडेरी पूजी जाती है। पंडेरी पर कोई कभी पांव नहीं रखता। सिंदूरी त्रिशूल इसे शक्ति स्थल सिद्ध करता है। इसी पर पितृ स्थान, इसके ईशान कोण में देवकोना व आग्नेय कोण में दीप स्थान रखा जाता।
इस तरह घर में पंडेरी से अनेक स्थलों का निर्धारण किया और माना जाता, मगर यह भी रोचक है कि मर्तबान के धोने व पानी के टपकने पर जो कुंडी रखी जाती, उसी से नाबदान या प्रणाल को निश्चित किया जाता। यह विवरण नारद संहिता, वसिष्ठ संहिता में है और ऊंचाई व निम्नता को देशानुसार तय किया गया है। यह विधान शुक्रजन्य मधुमेहादि व्याधि से बचाता लेकिन अब इस परंपरा पर हमारा ध्यान नहीं जाता। रसोई में ही जल स्थान तय कर दिया जाता है।
है न पंडेरा से जुड़ी रोचक बातें। कुछ आपके ध्यान में भी होगी। यदि हां तो जरूर बताइयेगा।
जय जय।
कूपवेदी और जलोत्थान के लिए भ्रमणी
जलस्रोतों के रूप में कुओं का महत्व दुनियाभर में रहा है। सिंधुघाटी से लेकर अनेक सभ्यताओं में कूप मिले हैं। उस दौर में गृहोपयोगी कूप की मान्यता विकसित थी। कृषि या सिंचाई के लिए संभवत: कुओं का प्रयोग होता नहीं था। पानी गहरा होने पर अंधेरा लगता था एेसे में संसार को अंधकूप की संज्ञा बहुत समय से दी जाती रही है।
मुझे पतंजलि के 'महाभाष्य' की वह उक्ति याद आ रही है जिसमें वह परिश्रम से मिली सफलता पर थकान भूल जाने की बात कूप खोदने वाले के उदाहरण से समझाते हैं। यानी शुंगकाल में कूप की उपयोगिता थी और उनके खोदने वाले बहुत अधिक मिलते थे। ये कूप खनका कहे जाते, लेकिन खुदाई से पहले पानी वाले स्थान की पहचान भूमिस्थ जल परीक्षण और दकार्गल जैसी विद्या का प्रयोग भी होता। सारस्वत मुनि को इस शास्त्र के प्रवर्तन का श्रेय है और यह निश्चित ही कृषि के लिए कूप के जल के उपयोग की ओर संकेत है क्योंकि "शारदा तिलक" की टीका में सारस्वत के रचे जवांकुरण व जलादि के प्रयोग संबंधी श्लोक मिलते है।
कूप उथले, मध्यम और गहराई वाले होते और जल खींचने के लिए उस पर पक्की "वेदी" बनाई जाती थी। इसे कहीं कहीं माड, मांडा या ढाणा और कहीं "दाबड़ा" भी कहा जाता है। हर्षचरित और मंदसौर अभिलेख में इसका महत्वपूर्ण संदर्भ मिल जाता है। कई रूप में इसकी रचना होती है। राजवल्लभ, अपराजित पृच्छा आदि में चौबीस और 7×7= 49 पद वास्तु से मंडान का निर्देश मिलता है। इसमें से एक भाग कूप पर व छह भाग बाहर समानांतर रखे जाते।
इसी दाबड़े पर कई प्रशस्तियां सुरक्षित मिली है जिन्होंने इतिहास के पन्नों को समृद्ध किया है। ये यात्रियों, संतों व पुण्य अर्जित करने वालों के संबंध में कई जानकारियां देती है। मंदसौर की प्रसिद्ध प्रशस्ति कूप की मुंडेर की है। घाघसा गांव के कुएं की महारावल तेजसिंह कालीन 13वीं सदी की प्रशस्ति मैंने पढ़ी है। आकोला गांव के सांडेश्वर के दाबड़े को नंदगांव के महात्मा ने बनाया। लिखा है :
" श्री यह दाबड़ा महात्मा पितांबर दासजी ने बनवाया, सं. 1993 पौष बुदी 11 स्थान नंदगांव जिला मथुरा। द. आपके दास का।।" ( देखिये : राजस्थान की ऐतिहासिक प्रशस्तियां और ताम्रपत्र, पृष्ठ 271)
जलोत्थान के लिए इन पर रस्सी के लिये भ्रमणिका (भमण) चक्र (गिरगड़ी) ताकलिया और कोशवाह या चमड़े का चरस के ढांणे होते
अथवा अरहट का विधान होता है, वह जिक्र फिर कभी...
जय जय।
त्वं  सुतस्य पीतये सद्यो वृद्धो अजायथा: । 
इन्द्र ज्यैष्ठ्याय सुक्रतो ।।  ऋ•1.5.6  
अन्य 
  ऋ. 3.32.7
    4.54.5
   6.24.7 
   1.84.4
   1.84.5
     1.167.2 
इन ऋचाओं  में     इन्द्र  को     वृद्ध  तथा   ज्येष्ठ   बताया  गया है  ।   
वर्ष के मासों के पृथक् पृथक् नाम  हमारे  वाङ्मय मे प्राप्त होते हैं.  
सौर मासों की संज्ञायें  आदित्यों के नाम के रूप   मे   बताई  गयी  हैं     ।  
अब  देखिए    
एक संकेत  
"" ज्येष्ठामूले भवेदिन्द्र: आषाढे सविता रवि:  ।""   
 कूर्म पुराण पू• वि• 41/18 
मत्स्य  पु.  मे  "नभ" मास के आदित्य को इन्द्र  कहा गया है । 
महाभारत  आदि पर्व  122/66-67 
धातार्यमा च मित्रश्च वरुणोंऽशो भगस्तथा  ।। 
इन्द्रोविवस्वान् पूषा च त्वष्टा च सविता  तथा ।
पर्जन्यश्चैव विष्णुश्च  आदित्या  द्वादश स्मृता: । 
पृथ्वी  , सूर्य की  परिक्रमा  पूर्ण वृत्ताकार पथ पर नहीं करती  वरन्  दीर्घवृत्ताकार  पथ पर करती है ।  
इस कारण  सभी मासों  की  अवधि समान  नहीं होती । 
सौर मास  29.318  दिन  से   31.644  दिन  तक  की  अवधि  के  होते  हैं  ।  
स्वाभाविक है कि वर्ष का एक सौर मास  सबसे दीर्घ अवधि का  अर्थात् बढा हुआ (वृद्ध) ज्येष्ठ कहलाएगा । 
ज्येष्ठा नक्षत्र को  वेदाङ्ग ज्योतिष तथा काठक संहिता  39.13  मे   "इन्द्र"  कहा गया है । 
इस आधार पर यह  निश्चित होता है कि  सूर्य के ज्येष्ठा नक्षत्र मे रहते  होने वाला सौर मास  इन्द्र संज्ञक  तथा  लगभग 32 दिवसों की अवधि का होता था । 
   स्पष्ट है कि  इस प्रकार की ऋचायें तभी दृष्ट हुई  होंगी.  जब दीर्घाक्ष  का  एक बिन्दु  225°54'   पर  था  ।
फुटकर शब्दों में थोक बात कहना चाहूँगा …
इषे त्वा ऊर्जे त्वा ॥ भारत में एक ऋतु दो माह की कही जाती है, उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्र के लिये यही अनुभव में भी है।
इष और ऊर्ज मास शरद ऋतु के मास कहे जाते हैं, भारत की कृषि
वर्षा पर आधारित रही है। वर्षा ऋतु के भी दो मास होना चाहिये,
लेकिन हम पाते हैं कि वर्षा ऋतु को चौमासा कहा जाने लगा है,
वर्षा दो ही मास होती है, फिर चार मास कैसे हो गये?
वर्षारम्भ पर किसान आनन्दित होता है, अन्य जन लेखक कवि बाल युवा युवती भी आनन्दित होते हैं लेकिन इनका आनन्दित होना अभौतिक है।
किसान का आनन्दित होना ही वास्तविक आनन्द है, अन्नदा धरती,  अन्नद कृषक और इसमें हेतु होती है वर्षा ।
क्वांर और कार्तिक माह वर्षा ऋतु के दो मास होते थे, इसे बरतने वाले लोग परम्परा से इन मासों के साथ वर्षा ऋतु का व्यवहार करते चले आ रहे थे,
४००० - ५००० वर्ष बीत गये
तब लगा कि क्वांर कार्तिक (इष ऊर्ज) से बहुत पहले ही वर्षा होने लगी है, सावन भादों में । सावन से शुरू होकर छिटपुट क्वांर कार्तिक तक .... तो वर्षाकाल सम्बन्धी बातों का समन्वय सावन भादों (श्रावण - श्रविष्ठा) से करते हुये क्वांर कार्तिक को भी स्मृति में बनाये रखा ।
ऋतुचक्र भ्रमणशील है सो यहाँ पर भी वह रुक नहीं सकता था..
और पीछे सरक कर यह आषाढ़ में आया और एक पैर जेठ की ओर उठा दिया।
घाघ कहते हैं कि ऋतु को एक महीना पहले ही आया जानो, जेठ में ही आषाढ़ के कृत्य करो.. जेठ में ही खेत की जुताई कर डालो।
घाघ यह भी कहते हैं कि खेत को दोबार जोतना तभी फसल अच्छी होगी।
तो बात है वर्ष के सबसे बड़े दिन की, जब दक्षिणायनारम्भ होता है
पुराने विवरण यह बताते हैं कि इस दिवस में रात्रि होती है १२ मुहूर्त की और दिन होता है १८ मुहूर्त का यानी १४ घण्टे से भी कुछ अधिक का ।
भारत में दक्षिणायनारम्भ दिवस पर छाया मापन और दिवस प्रमाण ज्ञात करने की प्राचीन परम्परा रही है। यदि आप साढ़े तेइस अंश उत्तरी अक्षांश के दक्षिण में हैं तो ठीक मध्याह्न होने पर आपकी छाया पृथ्वी पर नहीं बनेगी । एक पल के लिये ही सही आप अपने आपको देवता फील कर सकते हैं, क्योंकि देवों की भी छाया नहीं बनती है।
आर्य्यभट, वराहमिहिर ने ऋतु के  सरकने की बात पर विचार किया
 है , पूर्वाचार्यों और गर्ग तथा नारद जैसे ऋषियों के वचनों को ध्यान में रखकर ही इन दोनों ने अयन की गति और अयन के समायोजन हेतु गणितीय सूत्र दिये । जिनकी चर्चा आगे होगी.
वराहमिहिर और आर्य्यभट से कम से कम पाँच हजार वर्ष पहले से चली आ रही चान्द्रमास और सौरवर्ष पर आधारित व्यवस्था में ऋतुवर्ष का छोटा होना एक समस्या बनकर उभरा । इस पर देश में ही नहीं विदेशों में भी विचार हुआ,  विचार विमर्श,  विचार और ज्ञान का विनिमय हुआ।
रामायण और महाभारत में विनिमय को आसानी से देखा समझा जा सकता है, विनिमय (exchange) अर्थात् बदले में कुछ पाना । यदि हमारे पास देने के लिये कुछ नहीं है तो पाने की सम्भावना शून्य के निकट होगी।
भगवान् के वचनों में - पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति....
यह सूत्र है कुछ पाने

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