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क्या हिंदी को बचाने के लिए चीन से सबक सीखनी चाहिए?

क्या भारत के लिए आज भी यह पोस्ट प्रासंगिक है अपके विचार का इंतजार


क्या चीन की तरह भारत में भी अंग्रेजी पर प्रतिबंध लगना चाहिए:अंग्रेजी शब्दों के धुआंधार प्रयोग से आक्रांत हिन्दी को बचाने के लिए हमें चीन से सबक सीखना चाहिए ?

सवाल यह है कि क्यों हिंदी के अखबार या पत्र-पत्रिकाएँ जबरन अंग्रेजी के शब्द ठूंसे जा रहे हैं? क्यों हिंदी अखबार या पत्र-पत्रिकाएँ बीच-बीच में अंग्रेजी के शब्द छिड़क देते हैं ?

आजादी के 73 साल बाद भी सरकार हिंदी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा नहीं बना पाई है ।संविधान के अनुसार हिन्दी भारत की प्रथम राजभाषा है और सरकार के सभी दस्तावेज हिन्दी में तो होने ही चाहिए ।क्यों आज हिन्दी का अध्यापक भी तीन वाक्य अंग्रेजी के तीन शब्दों के बिना नहीं बोल पाता है ।

हिंदी अखबार या पत्र-पत्रिकाएँ बीच-बीच में अंग्रेजी के शब्दों के उदाहरण :-----** टिकट, रेल, सिग्नल, बिल, कमेटी, पेंशन, फीस, बटन, पुलिस,स्कूल, गारंटी, कंपनी, फिल्म,रिमेक, फोटो, वीडियो, लाइव स्कोर,कोर्ट, ब्यूरो, रेलवे स्टेशन, बटन, कोट, पैंट, सिग्नल, लिफ्ट, फीस, मीडिया, कानून, अदालत, मुकदमा, दफ्तर, एफआईआर, सिक्योरिटी, कंप्यूटर,फाइल ,प्रॉब्लम, मीडिया, बॉलीवुड, फोर्स, मोबाइल, डिसमिस, ब्रैड, अंडरस्टैंडिंग, मार्केट, शर्ट, शॉपिंग, मॉल,

स्टेडियम, कॉरिडोर, ब्रेकफास्ट, ट्रेन, लंच, डिनर, लेट, वाइफ, हस्बैंड, सिस्टर, फादर, मदर, फेस, माउथ, गॉड, कोर्ट, लैटर, मिल्क, शुगर टी, सर्वेंट, थैंक यू, डैथ, एक्सपायर, बर्थ, हैड, हेयर, वॉक, बुक, एक्सरसाइज, चेयर, टेबिल, हाउस, सॉरी, सी यू अगेन, यूज, थ्रो, आउट, गुडमॉर्निंग सर, गुड नाइट, हैलो, डिस्टर्ब, सडनली, ऑबियसली, येस, नो, करंट अफेयर, लव, सेक्स,न्यूज, चैनल,फैशन, इंडस्ट्री, सिल्वर स्क्रीन, यूथ ब्रिगेड, रैडी और बॉडीगॉड आदि जैसे हजारों अंग्रेजी शब्दों का चलन जारी ।

हिंदी-प्रेमियों, अगर अंग्रेजी भाषा भारत देश की संस्कृति को और उसके राष्ट्रीय स्वाभिमान को ही नष्ट करने की कोशिश में जुट जाए , तो उसका प्रतिकार तो करना ही होगा ।अंग्रेजी के साथ भी कुछ ऐसा ही मामला है क्या हम इतनी जल्दी भूल गए कि देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त करने के लिए लाखों हिंदुस्तानियों ने अपने प्राणों की आहुति दी ,जेल की यातनाएं झेलीं ,तब कहीं करीब चौंसठ साल पहले १५ अगस्त १९४७ को बड़ी मुश्किल से अंग्रेजों को यहाँ से भगाया जा सका

हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, इसे उचित सम्मान और आदर मिलना चाहिए । हिंदी भाषा हमारी राष्ट्रीयता और सम्मान का प्रतीक है। हिंदी और बिंदी तो हमारी पहचान है ।

"भारत की सिर्फ़ सात प्रतिशत जनसंख्या अँग्रेजी बोलती है । सारे विश्व की भाषाओं में हिन्दी सबसे आगे है क्योंकि हिन्दी बोलने वालों की संख्या चीनी एवं अंग्रेजी से अधिक है।क्या हमें अँग्रेजी की गुलामी छोडकर हिन्दी को महत्व नहीं देना चाहिए ? चीन जैसे विकसित देश ने अपनी भाषा को महत्त्व दिया है और निरन्तर प्रगतिमान हैं। हिंदी अति सरल और मीठी भाषा हैं l

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