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अर्थव्यवस्था का संतुलन से रामराज्य की सनातन अवधारणा स्वामी करपात्री जी महाराज

   




भोग वादी संस्कृति यूरोपियन मॉडल और लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स के अर्थशास्त्र कापाठ हमारे विश्वविद्यालयों की सिलेबस में डालकर बच्चों की मस्तिष्क को विकृत करके परिणाम पर सर पीटते हैं और जीडीपी बढ़ोतरी में सुख और आनंद की अवधारणा तलाशते हैं
 #रामराज्य_में_आर्थिक_संतुलन:- #करपात्रीजी_महाराज:- पूंजीवादी देशों में आर्थिक असंतुलन को सन्तुलित करने का प्रयास नहीं किया गया। फलत: उसकी सारी अच्छाईयां बुराईयों में परिणत हो गईं।किन्तु रामराज्य में आर्थिक संतुलन स्थापित करने हेतु धर्म और राज्यशक्ति द्वारा प्रयास किया जाता है। जहां धर्म और राज्यशक्ति दोनों कि अवहेलना होती है उसे हम अराजकतंत्र कहते हैं। सर्वप्रथम हम देखते हैं कि किस प्रकार धर्म के आधार पर आर्थिक संतुलन स्थापित किया जाता है। भोग के साथ दान परोपकार अतिथी सत्कार यज्ञादि के द्वारा धार्मिकता तथा सन्तुलन दोनों का विकास होता है। सम्पूर्ण प्रकृति को ईश्वरमय समझकर तथा सम्पूर्ण जीवमात्र को ईश्वर अंश समझकर उससे बचे हुएे अंश का हर्ष से स्वीकार करना ही रामराज्य कि अर्थनीति का मूलमन्त्र है। "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत" ( ईशोप १.१) हमारा यही आदर्श है। यही कारण है कि कोई शुद्ध भारतीय एक घूंट जल भी पीने लगता है तो उसे भगवान के चरणों में अर्पित और प्रसाद समझकर पान करता है। यद्यपि समाज में व्यष्टि से शुभाशुभ कर्मों के अनुसार विषमता का निर्माण होता रहता है, फिर भी प्रत्येक आस्तिक जीवमात्र को बन्धु समझकर ( अमृतस्य पुत्रा:) सर्वथा समता कि ओर अग्रसर होता रहता है। परोपकार एक व्यापक धर्म माना गया है। "आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत" जब यह उदारभाव आता है, व्यष्टि अपने को समष्टि का प्रतिबिम्ब अर्थात विराट के रुप में समझने लगता है।नेत्र सूर्य,उदर आकाश,कुक्षी समुद्र,अस्थि पर्वत,रोमावलीयां वृक्ष इस प्रकार के भाव होने पर अपने पराये का प्रश्न ही विलीन हो जाता है। उस समय समष्टि दु:ख में दु:खी और समष्टि सुख में सुखी होना पड़ता है। आत्मवत समस्त ब्रह्माण्ड में सुख-दुख के भाव का विकास होने पर अपने सुख और दु:ख का भाव ही नष्ट हो जाता है। इस अवस्था में शोषण और उत्पीड़न का प्रश्न ही कहां उठ सकता है? यह भाव जहां तक विकसित होगा उतने अंशों में कल्याण अवश्य होगा। वेदान्त में उपदेश किया गया है जिसका तात्पर्य यह है कि प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे का सुखसाधन बने कुटुम्ब, ग्राम, प्रान्त,राष्ट्र, विश्व, पितृलोक, देवलोक आदि के प्रति क्रमश: व्यक्ति में समाज के कल्याण भावना का उदय होना आवश्यक है। एक साधक सोचता है कि हे भगवन ! जगत आपने खेलने के लिये खिलौना बनाया।कुछ दुर्बुद्धि उसमें ममता कर बैठते हैं। वस्तुत: आप ही जगत के रचयिता और सर्वस्व हैं। सम्पूर्ण वस्तु ईश्वरीय है।इस प्रकार सम्पत्ति का राष्ट्रियकरण,केन्द्रिकरण तथा समाजीकरण न होकर उसका ईश्वरीकरण होता है। उससे निरंतर चिंता लगी रहती है कि वस्तु समष्टि कल्याण में ही उपयुक्त हो। इस कर्तव्यपालन में उसे शरीर तक का मोह नहीं रहता है। यहां एक बात और ध्यान देने कि है जहां एक तरफ त्याग, दान, परोपकार आतिथ्य सेवा आदि द्वारा समष्टि सेवा बढ़ाने का प्रयत्न किया गया वहीं दूसरी तरफ व्यष्टि को प्रतिग्रह से बचने के लिये भी उपदेश दिया गया।क्योंकि धर्माधारित व्यवस्था में निष्क्रियता आकाशकुसुमवत (आकाश से पुष्प तोड़ना अथवा आकाश में पुष्प) है।उसमें पुरुषार्थ को प्रोत्साहित किया जाता है।उञ्छ तथ‍ा शिल-वृत्ति को श्रेष्ठ बतलाया गया है। "कौपीनवन्त: खलु भाग्यवन्त:" यह एक साधारण सी कहावत है स्थिती यह होती है कि देने वालों में त्याग और लेने वालों में लेने से सर्वथा दूर रहने का प्रयत्न होता था। इस धर्म के प्रभाव से आर्थिक संतुलन बना रहता था। अाध्यात्मिक और भौतिक अर्थनीति में यही अन्तर है कि आध्यात्मिक अर्थनीति में देने वालों में देने कि होड़ लगती थी किन्तु कोई लेने वाला नहीं। और दूसरे भौतिक अर्थनीति में देने वाले देने से जान बचाते हैं, किन्तु लेने वाले नारा लगाते हैं "लड़कर लेंगें, मरकर लेंगे और मारकर लेंगें"। ऐसे शब्द भी धर्म शासित राष्ट्र में सुनाई नहीं पड़ते?

इस देश में भोग और इंद्रिय सुखों के लिए भी एक दर्शन का प्रतिपादन किया गया था जिसके दर्शनाचार्य हुए जिनका नाम चारवाक था पर उसके उस दर्शन को मानयता नहीं दी गई थी क्योंकि यह एक राक्षस प्रवृति को वर्धन करने वाला था उस दर्शन का मूल यह था कि जावद जीवेद सुखम जीवेद ऋणम् कृत्वा घृतम् पिवेद
  पिछले 70 साल से यह भारत की सरकारें इसी कार्य को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही हैं
   वित्त साल 2021-22 के लिए आम बजट एक फरवरी 2021 को पेश होगा. इस बजट से लोगों को बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं. इस वर्ष पेश होने वाला बजट वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के कार्यकाल का तीसरा बजट होगा. बजट में इस्तेमाल होने वाले विभिन्न शब्दों को हम आपको सरल भाषा में समझाएंगे. आज जानिए बजट में अक्सर इस्तेमाल होने वाले शब्द राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) के बारे में.

जब कोई सरकार अपने बजट में आय से अधिक खर्च दिखाती है तो इसे घाटे का बजट कहते हैं. आमतौर पर हिंदुस्तान सरकार घाटे का बजट ही दिखाती हैं. इससे जनता को यह संदेश मिलता है कि सरकार आय की अपेक्षा कल्याणकारी योजनाओं में खर्च अधिक कर रही है.

इसके साथ ही इससे करदाताओं को भी यह लगता है कि सरकार उनसे कमाई नहीं कर रही बल्कि लोक कल्याण में खर्च कर रही है . बता दें कि बजट में तीन प्रकार के घाटे का ब्यौरा होता है- प्राथमिक घाटा, राजस्व घाटा और राजकोषीय घाटा .

क्या होता है राजकोषीय घाटा

सरकार की कुल आय और व्यय में अंतर को राजकोषीय घाटा बोला जाता है . राजकोषीय घाटा आमतौर पर राजस्व में कमी या पूंजीगत व्यय में अत्यधिक वृद्धि के कारण होता है . राजकोषीय घाटे की भरपाई आमतौर पर केंदीय बैंक (रिजर्व बैंक) से उधार लेकर की जाती है या इसके लिए छोटी और लंबी अवधि के बॉन्ड के जरिए पूंजी मार्केट से फंड जुटाया जाता है .

राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के फीसदी के रूप में जाहीर किया जाता है . वित्त मंत्रालय प्रत्येक साल बजट में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य तय करता है . वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने चालू वित्त साल के लिए राजकोषीय घाटे का 3.3 प्रतिशत का लक्ष्य तय किया था . अब बजट पूर्व पेश होने वाले आर्थिक सर्वेक्षण में पता चलेगा कि यह कहाँ तक पहुंचा है . राजकोषीय घाटा अधिक होने से महंगाई बढ़ने का खतरा होता है

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