करोना वायरस का आतंक पूरे दुनिया में एक दहशत और डर के साए में जीने को अभिशप्त समाज एक तरफ दूसरी तरफ समाज के नराधम राक्षस इसे एक मौका पाकर समाज की डकैती डालकर अपनी तिजोरी भरने में जुटे हुए हैं बहुत सारे लोग केवल यहां तक तो सोच पा रहे हैं पर इसके आगे भी एक वृहद षड्यंत्र है जो शायद लोगों को अभी उस एंगल या उस दृष्टि से देखने का संपूर्ण दृष्टि सामान्य समाज में भी नहीं दिख रहा है यह दहशत हर चार-पांच साल में बनाया जाता है या तैयार किया जाता है जब संपूर्ण समाज लूट जाता है तब यह दहशत समाप्त हो जाता है एक बनावटी दहशत है मीडिया houses Who एवं कारपोरेट multinational company की मिली भगत से यह दहशत का धंधा खूब फल फूल रहा है ।
इस बार इन कंपनियों ने अपना एक्शन प्लान बदल दिया है पहले यह कंपनियां अपना दवा तैयार कर लेती थी फिर मीडिया के माध्यम से इसे फैलाती थी यानी तुंही ने दर्द दिया हे तुंही दवा दोगे इस पैटर्न पर काम करती थी और दवा पेटेंट भी कराती थी दोनों काम साथ साथ चलता था और दबा के माध्यम से इसे केवल लूटती थी
पर पिछली बार की जब स्वाइन फ्लू का पिछली बार की जब हउवा खड़ा किया गया था तो उसमें जो कलेक्शन या प्रॉफिट किया गया उतनी ही प्रॉफिट दवा बनाने वाली कंपनियों के अलावा मास्क ग्लब्स बनाने वाली कंपनियों ने भी कमाई किया था ₹10 का मास्क पांच सौ में बिक गया था इस बार उन्होंने अपना नया पैंतरा बदला है कोई कंपनी अभी कोई दवा लेकर सामने नहीं आ रही आज यह कंपनी अपना सारा फोकस केवल मास्क सिनेटाइजर ग्लब्स स्प्रे मशीन और स्प्रे chimical थरमल स्केनर मशीन पर ही केंद्रइत कर रखी है जब यह सब गोदाम खाली हो जाएंगे तब फिर दवा का व्यापार शुरु होगा एक शहर में भी तीन स्केनर मंगवाया जा रहा है पेपर की कटिंग भी आपको संलग्न कर रहा हूं अभी मुख्य खेल बाकी है आगे देखिए होता है क्या
#आयुर्वेद से #कोरोना_वायरस, #COVID_19 से बचाव
होगा दुनिया के किसी कोने में बीमारी फैलते ही भारतवासियों को आयुर्वेद याद
आता है! फिर थोड़े दिन में भूल जाता है! कल तक जिन्हें #एलोपैथी के
#कैप्सूल और #इंजेक्शन #अमृत लगते थे, आज वही वैद्यों के घरों में #चूरन,
#चटनी और #काढ़े की कतार में खड़े हैं यहाँ कुछ बातें पहले बताना और समझना
दोनों आवश्यक हैं| पहली बात तो यह है कि अभी तक आधुनिक मेडिकल विज्ञान में
कोरोनावायरस-2019 की कोई अचूक औषधि विकसित नहीं हो पायी है। दूसरी बात यह
है कि हम यहाँ बीमार व्यक्तियों के उपचार की चर्चा नहीं कर रहे हैं। तीसरी
बात यह है यहाँ चर्चा केवल बचाव की उस रणनीति की संभावना पर है जो आयुर्वेद
के सिद्धांतों पर आधारित है। और चौथी बात यह है कि यहाँ दिये गये सुझाव
आयुर्वेद की संहिताओं, समकालीन वैज्ञानिक शोध तथा अनुभवजन्य-ज्ञान के
एकीकृत दृष्टिकोण पर आधारित तो हैं किन्तु इनका उपयोग केवल
आयुर्वेदाचार्यों या वैद्यों के परामर्श से ही किया जा सकता है। स्वयं
#वैद्य बनकर #self_medication नहीं करना चाहिये क्योंकि ऐसा करना हानिकारक
हो सकता है #ओजस को दुरुस्त अवस्था में रखकर शरीर की प्रतिरक्षा-शक्ति या
व्याधिक्षमत्व बढ़ाकर तमाम तरह के वायरल फीवर, स्वाइन फ्लू, इन्फ्लुएंजा, या
नावेल कोरोनावायरस-जन्य बीमारी जैसे सन्निपातकारी संक्रमणों से बचा जा
सकता है। यदि हमारी पाचन की आग सामान्य है—अर्थात विषमाग्नि नहीं है, माने न
सुलग रही है (मन्दाग्नि), न धधक रही है (तीक्ष्णाग्नि)—तो हमारी
प्रतिरक्षा और व्याधिक्षमत्व शक्तिशाली होगा और कोई संक्रमण हमारे ऊपर
कब्ज़ा नहीं कर सकता है। इसके लिये ऋतुओं के संधिकाल में विशेषकर वर्षाऋतु
और शरदऋतु जैसे मौसमों के दौरान, जब मौसमी वायरल संक्रमण की संभावना अधिक
होती है, तब पहले से ही सम्यक ऋतुचर्या के द्वारा आहार-विहार, सद्वृत्त,
स्वस्थवृत्त, रसायन की सुरक्षा-दीवार खड़ा करके रखना उपयोगी रहता है। वायरल
संक्रमण से बचाव का दूसरा कदम यह है कि संक्रमण फैलने की संभावना को दूर
किया जाये। उदाहरण के लिये, हाथ जोड़कर अभिवादन करने की भारतीय परंपरा का
पालन करने से संक्रमण फ़ैलाने से रोका जा सकता है। हाथ मिलाना वायरल संक्रमण
का आसान और पक्का रास्ता है। इस सन्दर्भ में महर्षि #सुश्रुत द्वारा
औपसर्गिक रोगों के सन्दर्भ संक्रामन्ति-नरान्नरम्-सिद्धांत सभी वायरल
इन्फेक्शन्स के लिये महत्वपूर्ण है। (सु.नि. 5.33-34):
प्रसङ्गाद्गात्रसंस्पर्शान्निश्वासात् सहभोजनात्। सहशय्यासनाच्चापि
वस्त्रमाल्यानुलेपनात्।। कुष्ठं ज्वरश्च शोषश्च नेत्राभिष्यन्द एव च।
औपसर्गिकरोगाश्च संक्रामन्ति नरान्नरम्।। #यौनसंपर्क, शरीर से संपर्क, हाथ
मिलाना, छोटी बूंदों से संक्रमण, पहले से संक्रमित व्यक्ति के साथ भोजन
करना, संक्रमित व्यक्ति के साथ बैठना या सोना, संक्रमित व्यक्तियों के
कपड़े, सौंदर्य प्रसाधन और गहनों का उपयोग आदि से संक्रमण होता है। ऐसे
संक्रामक या औपसार्गिक रोग, जैसे कोविड-2019, वायरल-फीवर, सूअर-जन्य फ्लू,
फुफ्फुसीय तपेदिक, कंजंक्टिवाइटिस आदि एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में
संचारी होते हैं। अतः संक्रमण काल में आचार्य सुश्रुत की बात मानते हुये
असात्म्येन्द्रियार्थसंयोग और प्रज्ञापराध से दूर रहना चाहिये। हाथ जोड़कर
अभिवादन कीजिये। हाथ मिलाकर वायरस मत बाँटिये। वायरस संक्रमण से बचाव का
तीसरा कदम सम्यक #दिनचर्या, #रात्रिचर्या और #ऋतुचर्या का पालन है। इसके
लिये नियमित #नस्य लेना, सप्ताह में कम से कम 150 मिनट व्यायाम व पैदल चलना
आवश्यक है। अभ्यंग, शरीर की सफाई, स्नान, साफ़-सुथरे कपड़े पहनना, योग,
प्राणायाम, और रात में सात घंटे की नींद आदि आवश्यक हैं। संक्रमण काल में
अणुतेल का नियमित प्रतिमर्श नस्य अत्यंत आवश्यक है। बिना नस्य लिये घर के
बाहर नहीं निकलना चाहिये। इसके लिये अच्छी तरह से हाथ-धोकर साफ़ अँगुली में
अणुतेल की दो बूंदें डालकर नासाछिद्र में लगाना चाहिये। ध्यान रखें कि एक
नासाछिद्र में जिस अँगुली से नस्य लें, उसी से दूसरे नासाछिद्र में नहीं।
पुनः दूसरी साफ़ अँगुली का प्रयोग करें। भीड़-भाड़ वाले क्षेत्रों में जाने के
पूर्व भी नस्य लेना आवश्यक है। अगर अणु तेल उपलब्ध न हो तो तिल तेल का भी
उपयोग कर सकते हैं। नस्य पर वैज्ञानिक शोध से भी यह स्पष्ट है कि यह साधारण
सी लगाने वाली क्रिया असल में अत्यंत लाभकारी है। यह आरोग्य और दृढ़ता देती
है। वायरस संक्रमण को निश्चित रूप से रोकती है। वायरस संक्रमण से बचाव का
चौथा कदम, आयुर्वेदाचार्यों की सलाह से, #आहार, #रसायन और #औषधि के सम्यक
प्रयोग पर है। आहार ऐसा हो जिससे जठराग्नि सदैव सम रहे एवं व्याधिक्षमत्व
बढ़ा रहे। आधुनिक वैज्ञानिक संदर्भ में कहें तो ऐसा आहार जो ऑक्सीडेंटिव
स्ट्रेस लोड को कम से कम बढ़ाये, वही व्याधिक्षमत्व बढ़ा सकता है।
रेसवेराट्रॉल एवं ऑक्सीरेसवेराट्राल युक्त खाद्य एवं पेय जैसे द्राक्षासव,
ग्रीन-टी, द्राक्षा, अनार, संतरे व अनन्नास, आँवला आदि बचाव में मददगार है
क्योंकि इनमें एंटीऑक्सीडेंट व एंटीवायरल गुण पाये जाते हैं। अश्वगंधा,
शुण्ठी, कालीमिर्च, पिप्पली, गुडूची, पुदीना, हल्दी, यष्टिमधु, बिभीतकी,
लहसुन, तुलसी, सहजन, चित्रक, कालमेघ, वासा, सप्तचक्र (सैलेसिया
रेटीकुलाटा), दूधी (राइटिया टिंक्टोरिया) का क्षीर आदि बहुत उपयोगी हैं।
शहतूत की नई टहनियों में पाया जाने वाला आक्सीरेसवेराट्राल भी वाइरस
आधुनिक चरक कहे जाने वाले हार्डी कर दादा की शिष्यया का मानना है कि तमाम प्रकार के वायरल रोगों से बचे रहने के लिये संहिताओं,
साइंस और अनुभव को साथ लेकर #कालमेघ, #तुलसी, #शुंठी, #कालीमिर्च,
#पिप्पली, #गुडूची, #हल्दी, यष्टिमधु, बिभीतकी, और अश्वगंधा आदि आयुर्वेदिक रसायन व औषधियाँ युक्तिपूर्वक उपयोग करने बचाव
और उपचार में उत्तम परिणाम देती हैं। किन्तु औषधियां वैद्य की सलाह से ही
ली जायें। वायरल संक्रमण से बचाव का पाँचवां सुझाव यह है कि सद्वृत्त और
आचार रसायन का निरंतर पालन किया जाये। विशेषकर स्नान, मलमार्गों व हाथ की
सफाई, संक्रमित वस्तुओं, व्यक्तियों व स्थलों से सुरक्षित दूरी रखना,
#जम्हाई, #छींक व #खाँसी के समय मुंह ढकना, नासिका-द्वारों को कुरेदना से
बचाना, सोने, जागने, मदिरापान, भोजन आदि में अतिवादी नहीं होना, स्नान के
बाद पुनः पूर्व में पहने हुये कपड़े नहीं पहनना, हाथ, पैर व मुंह धोये बिना
भोजन नहीं करना, गंदे या संक्रमित बर्तनों में भोजन नहीं करना, संक्रमित
व्यक्तियों द्वारा लाया हुआ भोजन नहीं करना चाहिये। वायरल संक्रमण बचाव के
लिये वैक्सीनेशन भी महत्वपूर्ण उपाय माना जाता है, परन्तु वैक्सीन उत्पादन
के तौर तरीके लम्बे समय से नहीं बदले। वैक्सीन की प्रभाविता भी बड़े-बूढ़ों
में असंतोषजनक है। नावेल कोरोनावायरस-2019 का कोई वैक्सीन अभी तक नहीं
विकसित हो पाया है वायरल संक्रमण से बचने के लिये प्रतिदिन #नस्य लीजिये,
फल खाइये, समय समय पर हाथ धोइये, हाथ मिलाने की बजाय हाथ जोड़कर अभिवादन
कीजिये, सप्ताह में कम से कम 150 मिनट व्यायाम व योग कीजिये, रात में सात
घंटे की नींद लीजिये, रसायनों का सेवन कर व्याधिक्षमत्व बढ़ाइये, और
आयुर्वेदाचार्यों की सलाह से प्रोफाइलैक्टिक औषधियों द्वारा तमाम तरह के
फ्लू से बचाव कीजिये। वर्ष 1918 के स्पैनिश फ्लू से 100 मिलियन लोगों
मृत्यु हुई थी जो उस समय कुल मानव जनसंख्या का 5 प्रतिशत था। पर इसमें भी
95 प्रतिशत लोग तो बच ही गये थे न! इसलिये चिंता करने की बजाय बचाव के उपाय
कीजिये। और हाँ, जब दुनिया से कोरोनावायरस से होने वाली बीमारी समाप्त हो
जाये तो आयुर्वेद को भूल मत जाइये।वैद्य प्रेरणा (यह लेखक के निजी विचार हैं और ‘सार्वभौमिक
कल्याण के सिद्धांत’ से प्रेरित हैं)
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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद