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भारत

    

 वैश्विक महामारी ने यूरोपियन इकोनामिक सिस्टम व भारत में प्रचलित आदिकाल से स्थापित जाति व्यवस्था की पूरी पोल खोल करके रख दी।
  जब हजारों हजार लोग सर पर गठरी और बॉक्स ला दे बड़े-बड़े महानगरों से आहें भरते अपने गांव की तरफ पलायन कर रहे थे।इस करुण दशा के लिए ब्रिटिशर्स ने लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स की सिद्धांतों को आगे बढ़ाते हुए हमारी आदिकाल से प्रचलित इस सहजीवन की प्राकृतिक और श्रेष्ठ व्यवस्था को तहस-नहस करके हमें रोड पर ला दिया दिया।घृणा द्वेष और वैमनस्य के बीजों को डालकर तोड़ो और राज करो की नीति पर आज भी यह मॉडल भारत को बर्बाद कर रहा है और भारत के लोगों का आनंद और उत्सव को छीन कर दुख निराशा और हताशा के जीवन में डूबा रहा है आप फिल्म का यह गाना याद करें
  हमरी न मानों रंगरेजवा से पूँछो : कहाँ मर बिला गयी रंगरेज जाति
हमरी न मानों रंगरेजवा से पूँछो जिसने गुलाबी रंग दीना दुपट्टा मेरा : कहाँ बिला गया वो रंगरेज ?
How The Fluid Indian "Jaat Pratha" was changed into Alien / European Rigid Caste System : Part- 3
"मॉडर्न caste सिस्टम एक सनकी रेसिस्ट ब्रिटिश ऑफीसर H H RIESLEY की दें है जिसने 1901 में नाक की चौड़ाई के आधार पर "unfailing law of Caste" का एक सनकी व्यवस्था के तहत एक लिस्ट बनाई , जिसमे उसने नाक की चौड़ाई जितनी ज्यादा हो उसकी सामाजिक हैसियत उतनी नीचे होती हैं , इस फॉर्मूले के तहत सोशियल hierarchy के आधार पर जो लिस्ट बनाई वो आज भी जारी है और संविधान सम्मत है / यही भारत की ब्रेकिंग इंडिया फोर्सस का , और ईसाइयत मे धर्म परिवर्तन का आधार बना हुवा है /
ऐसा नहीं है कि भारत मे जात प्रथा थी ही नहीं / ये थी लेकिन उसका अर्थ था एक कुल या वंश , जिसके साथ कुलगौरव और एक भौगोलिक आधार के साथ साथ एक पेशा भी जुड़ा हुवा था /"
अब MA शेरिंग की 1872 की पुस्तक -"caste आंड ट्राइब्स of इंडिया " से उद्धृत उस प्रथा की रूपरेखा समझने की कोशिश करें ।
"MA SHERING शृंखला -5 " जात और जाति (Caste) में क्या अंतर है ?
"Caste and Tribes of India "
चॅप्टर xiii पेज- 345
Caste of weavers , thread spinners ,Boatmen नुनिया / लूनिया beldars Bhatigars
कटेरा या धुनिया --------------------
रुई की धुनाई करने वाली एक caste है जिनको धुनिया कहा जाता है / ढेर सारे मुसलमान और हिन्दू इस व्यवसाय से जुड़े हुये हैं / रुई की धुनाई और सफाई के लिये जिस यंत्र का ये प्रयोग करते हैं , वो एक साधारण धनुष के समान होता है / जमीन पर उकडूं बैठकर ताज़े रूई के ढेर पर , जिसमें धूल और तिनके और अन्य गंदगी भरी होती है, बायें हाथ में धनुष पकड़कर और दाहिने हाँथ में लकड़ी के mallet से कटेरा लोग जब धनुष की रस्सी पर प्रहार करते हैं तो रूई के ढेर के उपरी सतह पर हलचल होने लगती है / और रूई के ढेर से ह्लके रेशे इस रस्सी से चिपक जाते हैं / ये प्रक्रिया लगातार जारी रहती है जिससे रूई की रूई की बढिया और सुन्दर धुनाई हो जाती है और सारी गंदगी अपने भार की वजह से रूई से अलग होकर जमीन में गिर जाती है / ये caste बनारस दोआब और अवध के पूर्वी जिलों मे पायी जाती है /
कोली या कोरी-------------------------------
ये बुनकरों (weavers ) की caste है / इनकी पत्नियाँ भी इनके साथ साथ काम करती हैं और इनकी मदद करती हैं / ये समुदाय छोटा है और आगरा तथा प्रांत के पश्चिमी जिले मे पाया जाता है /
"कोली वैस राजपूत के सम्मानित वंशज है /"
नोट - शेरिंग ने 1872 मे ‪#‎caste‬ शब्द का प्रयोग किन अर्थों मे किया है , जिसमे एक ‪#‎व्यवसाय‬ में ‪#‎हिन्दू‬ और ‪#‎मुसलमान‬ सब सम्मिलित हैं / 

और मॉडर्न caste सिस्टम जो Risley की 1901 की जनगणना की देन है , आज किन अर्थों में प्रयुक्त होता है , आप स्वयं देखें / कोली कैसे जो कभी एक संम्‍मानित क्षत्रिय व्यवसायी थे , जब सारे व्यवसाय नष्ट हो गये तो , शेडुलेड़ caste और OBC में लिस्टेड हो जाते है , आप स्वयम् देखें / आभाषी दुनिया के मित्र श्रीराज कोली ने स्वयं यह बात स्वीकार किया है ,की उनके वंशज कहते हैं कि वे क्षत्रिय थे / आपको ये समाज का विखंडन और बंटवारा समझ मे आ रहा है न ?
"MA SHERING शृंखला -6
"Caste and Tribes of India "
चॅप्टर xiii पेज- 346
तांती ----------------------
बुनकरों की एक कॅस्ट , जो , सिल्क का किनारा (बॉर्डर) aur भांती भांती प्रकार के धातु बनाते हैं / ये किंकबाब या सोने चांडी से मढ़े हुये महन्गी ड्रेस , जिसमें इन्हीं महन्गी धातुओं की embroidary हुई होती हैं , बनाते हैं / बताया जाता है कि ये गुजरात से आये हुये हैं / बनारस में इस ट्राइब का मात्र एक परिवार है जो धनी हैं और शहर के एक विशाल भवन में निवास करता है /
तंत्रा (Tantra)------------------------
तंत्रा एक अलग clan (वंश) है जो सिल्क के धागों का निर्माण करता है / बताया जाता है कि ये दक्षिण से आये है , और इनको निचली कॅस्ट मे माना जाता है क्योंकि ब्राम्हण इनके घरों मे खाना नही खाते हैं /
कोतोह (Kotoh)----------------------
अवध के जिलों मे पे जाने वाली थ्रेड स्पिन्नर्स की की एक छोटी परंतु सम्मानित caste है /
Page- 346
रँगरेज ----------------------
कपड़े डाइ करने वालों की caste है ये / ये शब्द रंग से उद्धृत है , और रेज यानी ये काम करने वाला / ये caste प्रांत के लगभग सभी जिलों मे पायी जाती हैं /
छिप्पी  -----------
कपड़ों पर प्रिंटिंग करने वालों की caste / इनका विशेष कार्य कपडो पर क्षींट stamp karna है / ये लोगों का ये लोग ज्यादा न्हैं हैं , लेकिन ये प्रांत के लगभग सभी जिलों मे पाये जाते हैं / बनारस में ये एक अलग caste के अंतर्गत आते हैं /
"छिप्पी अपने आपको राठौर राजपूत   कहते हैं "
मल्लाह--------------------------
सभी नाविकों को मल्लाह कहा जाता है चाहे वो जिस भी caste के हों / इसके बावजूद मल्लाहों की एक विशेष ट्राइब जो कई कुलों (क्लॅन्स) में बंटे हुये हैं / वो निम्नलिखित हैं :-
१- मल्लाह
२- मुरिया या मुरीयारी
३- पनडुबी
४- बतवा या बातरिया
५- चैनी चैन या चाय
६- सुराया
७- गुरिया
८- तियर
९- कुलवाट
१०- केवट
ये नाविक भी हैं , fisherman (मछली मारने वाले ) भी हैं , और मछली पकडने के लिये जाल की manufacturing भी करते हैं / पहले ये एक दूसरे में शादी करते थे लेकिन अब वो बंद हो चुका है / हिन्दुओं की कई और castes भी मल्लाही का पेशा करते हैं /
नोट : कोई बताए कि ऊपर वर्णित समुदायों मे कौन अगडी थी कौन पिछड़ी थी ? ये किस ग्रंथ मे लिखा है - कि फलाना जात अगड़ी और फलाना जात पिछड़ी ?
और अगर नहीं लिखा तो ये आया कहाँ से ?
अंबेडकर के चेलों से ये प्रश्न है /
कहाँ गए छिप्पी तांती तंत्रा कोताह रंगरेज ?
मर गए , बिला गए या जहन्नुम रशीद हो गए ।
क्यों और कैसे ?
जब इनका व्यवसाय ही उच्छिन्न हो गया तो ये कहाँ से बचते ?
जय हो बाबा के संविधान का ।
वंदेमातरम

Comments

D. S. said…
भारत मे वर्ण व्यवस्था थी और वर्ण कार्य के अनुसार थे। जन्म से सभी मनुष्य ही थे। और वर्ण बदले जा सकते थे जैसे काम बदले जाते है। वेद व्यास जी मछिहारी के पुत्र थे जो शुद्र वर्ण में थे परन्तु वे ब्रह्मर्षि बने। मीरा राजपूतनी थी परंतु ब्रह्मऋषी रैदास जो चमार मोची का काम करते थे उनकी भक्त बन गई। कृष्ण स्वयं वैश्य कुल में पैदा होकर ब्राह्मण का काम कर अर्जुन को गीतोपदेश दे बैठे। ऐसे कई उदाहरण है। राम स्वयं क्षत्रिय थे, ब्राह्मण नहीं तभी ब्रह्मऋषि वशिष्ठ के शिश्य बने। कहा भी है, "जन्म जस्ट शुद्र सभी, कर्मेंनु
ब्राह्मण भवति".
जाति प्रथा ने और मुसलमानों व अंग्रेजो ने भारतीयों की संस्कृति ही बदल दी।

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