नास्तिक आस्तिक बाद
(धर्मसम्राट करपात्री जी महाराज का मार्क्सवादी को मुह तोड़ जवाब।) मार्क्सवादी के लिए गीता की प्रशंसा का कोई अर्थ ही नहीं, क्योकि गीता में तो स्वयं ही निर्बातस्थित निश्चल दीप के तल्य योगी के यत चित्त का निश्चल होना बतलाया हैं- 'यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युजतो योगमात्मनः।। (गी ६/१९) मार्क्स स्पष्ट ही निरश्वरवादी है, फिर उसकी दृष्टि से कर्मों का ईश्वर में समर्पण करना, फल की आकांक्षा बिना ईश्वराधन बुद्धि से शास्त्रलोक्त कमों का अनुष्ठान करना आदि सब बातें व्यर्थ हैं। धन को ही सर्वस्व मानने वाले भौतिकवादी के लिए हानि-लाभ, जय-पराजय को समान समझना कहाँ तक सम्भव हैं। किसी दाम्भिक के दम्भ के भण्डाफोड़ होने से किसी युक्ति-शास्त्रसम्मत सिद्धान्त का अपलाप नहीं किया जा सकता। एंजिल्स के ‘डायलेक्टस आफ नेचर' पुस्तक की बाते भी पुरानी पड़ गयी हैं। वस्तुत: वैज्ञानिकों ने ही प्रचालित जडवाद एवं बिकासवाद की युक्तियों का खण्डन करके एक अलौकिक शक्ति का महत्व सिद्ध किया है। *राजनीतिक-दर्शन* पाश्चात्त्य देशों में दर्शन एवं शास्त्र शब्द बड़ा ही सस्ता बन गया है। किसी भी विचार को, जैसे गर्भशास्त्र, मार्क्सदर्शन आदि की वे शास्त्र संज्ञा देते हैं। किन्तु विश्वविख्यात भारतीय विद्वानों ने तो शास्त्र शब्द का प्रयोग मुख्यरूप से अनादि अपौरुषेय वेद में ही किया है। उन्हीं में प्रत्यक्षानुमान से अनधिगत धर्म, ब्रह्मादितत्त्वबोधनक्षमता है- 'प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुध्यते। एनं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता।।', 'शास्त्रयोनित्वात्' (ब्र० सू० १/१/३) में शास्त्र शब्द का ऋग्वेदादि अर्थ ही युक्त है। जैसे रूप आदि के सम्बन्ध में चक्षु आदि स्वतन्त्र प्रमाण हैं, वैसे ही धर्म, ब्रह्म आदि अतीन्द्रिय-अचिन्त्य विषयों में स्वतन्त्र रूप से अपौरुषेय वेद ही प्रमाण हैं अन्य तदाश्रित तदुपहित आर्ष धर्मग्रन्थों में तो प्रत्यक्षानुमानागमादिमूलकत्वेनैव प्रामाण्य है। अतएव शास्त्रत्व भी वेदमूलक होने से ही उनमें सिद्ध होता है। प्रमाण, प्रमेय, साधन फल का प्रामाणिक निर्देश दर्शन का स्वरूप होता है। औत्सुक्यनिवृत्ति, जिज्ञासोपशान्ति मात्र पाश्चात्त्य दर्शनों का उद्देश्य है। तद्भित्रपरस्पराविरोधेन धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की प्राप्ति एवं अव्यभिचरित तत्साधनों का सम्यक् ज्ञान भारतीय दर्शनों का उद्देश्य है। आजकल के कुछ समालोचकों का कहना हैकि 'पाश्चात्त्य देशों के राजनीतिक दर्शन हैं, किन्तु भारत में कोई राजनीतिक दर्शन नहीं है। कारण, 'पाश्चात्य देशों के विद्धान् राजनीतिक एवं दार्शनिक दोनों ही थे; किन्तु भारत के राजा तिज्ञ दार्शनिक नहीं थे।' परन्तु उनका यह कहना सर्वथा निराधार है। सबसे पहली बात तो यह है कि सर्वदर्शनों का शिरोमणि वेदान्त है। वेदों में वेदान्त भी है, राजनीति भी है। मनु, याज्ञवल्क्यादि धर्मशास्त्रों में दर्शन भी है, राजनीति भी है। व्यास सबसे बड़े राजनीतिज्ञ है। वेदान्तदर्शन के रचयिता व्यास ही महाभारत के रचयिता हैं। महाभारत का मोक्षधर्म, गीता का दर्शन और शान्तिपर्व का राजधर्म पढ़े तो उक्त मत सर्वथा निर्मूल सिद्ध हो जायेगा। बृहस्पति, कणिक, कौटल्य, कामन्दक आदि सभी राजनीतिक दार्शनीक थे। योगवसिष्ठ के वसिष्ठ महादार्शनिक एवं महाराजनीतिज्ञ थे। सूर्यवंश की राजनीति के वे ही कर्णधार थे। वस्तुस्थिति यह है कि पदवाक्यप्रमाणपारावारीण विद्वान् शब्द- शुद्धि आदि का कार्य पाणिन्यादि व्याकरण से चलाते हैं, वाक्यार्थ निर्णय के लिए पूर्वोत्तरमीमांसा का उपयोग करते है, अनुमान आदि के सम्बन्ध में न्याय-वैशेषिक का उपयोग करते हैं, तथा वे ही 'तत्त्व-संख्यान' चित्त- निरोध आदि में सांख्य एवं योग का उपयोग कर लेते हैं। वे तार्थ अपूर्व वस्तु का ही प्रतिपादन करते हैं। पाश्चात्य लोग गतार्थ वस्तुओं का भी निरूपण करके स्वतन्त्र दार्शनिक बनने की चेष्टा करते हैं।


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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद