रमप्पा टेंपल संसार का सबसे hard पत्थर बेसाल्ट से बना Ramappa_temple जिसे काटने के लिए डायमंड कटर मशीन इस्तेमाल होता है
भारत एक शिल्प कला प्रधान देश भी है इसमें अनेकों ऐसे तेजस्वी और कला के पुजारी इस धरती पर जन्म लिए हैं जिन्होंने अपनी ज्ञान और कला का डंका पूरी दुनिया में बजाया है कुछ अंग्रेजी काल के पढ़े हुए और अंग्रेजी काल में पैदा हुए विद्वानों ने मूर्ति पूजा और कला का मजाक बनाकर इस्लाम और ईसाइयत का झंडा बुलंद करने में लगे हुए हैं और भारत की मूल व्यवस्था व संस्कारों से काटने का काम जो अंग्रेज और मुगल नहीं कर पाए वह काम बड़े तरीके से हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी भी कर रहे हैं और सबसे बड़ी बात यह की यह स्वयंभू प्राचीन भी बनने का दंभ भी भरते हैं जिससे कि मंदिर और शिल्प कला के भारत की समृद्धि और और वैभवशाली परंपरा को नष्ट किया जा सके
Ramappa_temple
भारत वर्ष के हिन्दू मंदिर की भव्यता देखो
इस मंदिर की मूर्तियों और छत के अंदर जो पत्थर उपयोग किया गया है वह है बेसाल्ट जो कि पृथ्वी पर सबसे मुश्किल पत्थरों में से एक है इसे आज की आधुनिक Diamond electron machine ही काट सकती है वह भी केवल 1 इंच प्रति घंटे की दर से
अब आप सोचिये कैसे इन्होंने 900 साल पहले इस पत्थर पर इतनी बारीक कारीगरी की है
सबसे ज्यादा अगर कुछ आश्चर्यजनक है वह है इस मंदिर की छत यहां पर इतनी बारीक कारीगरी की गई है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है
मंदिर की बाहर की तरफ जो पिलर लगे हुए हैं उन पर कारीगरी देखिए दूसरा उन की चमक और लेवल में कटाई
मंदिर के प्रांगण में एक नंदी भी है जो भी इसी पत्थर से बना हुआ है और उस पर जो कारीगरी की हुई है वह भी बहुत अद्भुत है
पुरातात्विक टीम जब यहां पहुंची तो वह इस मंदिर की शिल्प कला और कारीगिरी से बहुत ज्यादा प्रभावित हुई लेकिन वह एक बात समझ नहीं पा रहे थे कि यह पत्थर क्या है और इतने लंबे समय से कैसे टिका हुआ है
पत्थर इतना सख्त होने के बाद भी बहुत ज्यादा हल्का है और वह पानी में तैर सकता है इसी वजह से आज इतने लंबे समय के बाद भी मंदिर को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंची है
यह सब आज के समय में करना असंभव है इतनी अच्छी टेक्नोलॉजी होने के बाद भी तो 900 साल पहले क्या इनके पास मशीनरी नहीं थी?
उस समय की टेक्नोलॉजी आज से भी ज्यादा आगे थी
यह सब इस वजह से संभव था कि उस समय वास्तु शास्त्र और शिल्पशास्त्र से जुड़ी हुई बहुत सी किताबें उपलब्धि थी जिनके माध्यम से ही यह निर्माण संभव हो पाये उस समय के जो इंजीनियर थे उनको इस बारे में लंबा अनुभव था क्योंकि सनातन संस्कृति के अंदर यह सब लंबे समय से किया जा रहा है
मंदिर शिव को समर्पित है
मंदिर का नाम इसके शिल्पी के नाम पर रखा हुआ है क्योंकि उस समय के राजा शिल्पी के काम से बहुत ज्यादा खुश हुए और उन्होंने इस मंदिर का नाम शिल्पी के नाम पर ही रख दिया
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