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शून्य से शून्य तक की देन भारत की सनातन से पुरातन तक

        





🙏वंदे मातरम् साथियों, *** शून्य से शून्य तक शून्य *** कुछ दिन पहले से सोशल मीडीया में एक प्रश्न किया जा रहा है शून्य की खोज किसने की थी ? जवाब आता है, आर्यभट्ट ने तब फिर रावण के दस सर की गिनती कैसे हुई ? आर्यभट्ट काल से शून्य को व्यवस्थित तरीके से व्यव्हार में लाया गया । यानि दाशमिक प्रणाली, गिनती तो वेदों में भी हैं। बहरहाल उस प्रश्न से एक विषय मिला और कुछ दिन के अध्ययन के बाद प्रस्तुत है शून्य से शून्य तक शून्य । शून्य यानि अंकगणित की दुनिया के इस हीरो, जिसे अंग्रेजी में ज़ीरो कहा जाता है, का जन्म भारत में हुआ था। यही शून्य था जिसकी वजह से यह प्रणाली जन्म ले पायी और जिसके बिना अंक गणित की कल्पना भी मुश्किल है। इसके बावजूद आज बोलचाल की हिंदी में शून्य से ज्यादा इस्तेमाल अंग्रेजी के जीरो या सिफर का होता है। मजे़ की बात यह कि दोनो शब्दों के पीछे संस्कृत का शून्यम् हैं। आज इस शून्य को जीरो अंडा कह दिया जाता है। मूर्ख व्यक्ति के दिमाग को सिफर की उपमा दी जाती है। तंत्रिका तंत्र जब काम नहीं करता तो उसे सुन्न होना कहते हैं। जहाँ निविड़ एकांत होता है उसे सूनसान कहते हैं। सूना शब्द भी इसी अर्थ में प्रयोग होता है। ये सभी शब्द शून्य से ही जन्में हैं। संस्कृत के शून्यम् का अर्थ होता है खोखला, खाली या रिक्त स्थान, निर्वात यानी वेक्यूम अथवा आकाश, अंतरिक्ष। इस खोखलेपन में जो अकेलापन, खालीपन या नकारात्मकता का भाव है उसी वजह से मूर्ख व्यक्ति के दिमाग़ को खाली अण्डा, ज़ीरो अण्डा या कद्दू कहा जाता है। मराठी में कद्दू को भोपळा कहते हैं और वहाँ शून्य को भोपळा भी कहा जाता है। कद्दू के आकार पर अगर ध्यान दें तो यह नामकरण अजीब नहीं लगेगा। आखिर अण्डा भी तो गोल ही होता है ! कम समझ रखने वाले को उलाहना दिया जाता है यहाँ खाली दिमाग़ वाली लक्षणा पर ध्यान देना चाहिए। शून्य के अन्य अर्थों में एकांत, निर्जन, वीरान स्थान भी हैं। खिन्नमन, तटस्थता, उदासी, भी शून्य की श्रेणी में आती है। आकाश, अंतरिक्ष, बिंदु आदि भी शून्य हैं। गौरतलब है कि शून्य की कल्पना के पीछे भारतीय मनीषियों की विलक्षणता ही नज़र आती है। शून्य दरअसल क्या है? शून्य के आकार पर गौर करें। गोलाकार मण्डल की आकृति यूँ ही नहीं है। उसके खोखलेपन, पोलेपन पर गौर करें। एक सरल रेखा के दोनों छोर एक निर्दिष्ट बिन्दु की ओर बढ़ाते जाइए और फिर उन्हें मिला दीजिए। यह बन गया शून्य। यह शून्य बना है संस्कृत की ‘शू’ धातु से जिसमें फूलने, फैलने, बढ़ने, चढ़ने, बढ़ोतरी, वृद्धि, उठान, उमड़न और स्फीति का भाव है। मोनियर विलियम्स और आप्टे कोश में ‘ शू ’ धातु की तुलना संस्कृत के ही ‘ श्वि’ से भी की जाती है जिसमें विकसन, फलना-फूलना, समृद्ध होना जैसे भाव हैं। ये एक ही कड़ी में हैं। ‘श्वि’ से बना एक संस्कृत शब्द है ‘शून’ जिसमें सूजा हुआ, बढ़ा हुआ, उगा हुआ या समृद्ध जैसे ही भाव हैं। स्पष्ट है कि शू से बने शून्य में बाद में चाहे निर्वात, सूनापन, अर्थहीन, खोखला जैसे भाव उसकी आकृति की वजह से समाविष्ट हुए हों, मगर दाशमिक प्रणाली को जन्म देने वालों की निगाह में शून्य में दरअसल फूलने-फैलने, समृद्धि का आशय ही प्रमुख था। इसीलिए यह शून्य जिस भी अंक के साथ जुड़ जाता है, उसकी क्षमता को दस गुना बढ़ा देता है, अर्थात अपने गुण के अनुसार उसे फुला देता है। जब इसके आगे से अंक या इकाई गायब हो जाती है, तब यह सचमुच खोखलापन, निर्वात, शून्यता का बोध कराता है। शून्य के आकार में भी यही सारी विशेषताएँ समाहित हैं। गोलाकार, वलयाकार जिसमें लगातार विस्तार का, फैलने का, वृद्धि का बोध होता है। दरअसल शून्य ही समृद्धि और विस्तार का प्रतीक है। भारतीयों की ही तरह गणित और खगोलशास्त्र में अरब के विद्वानों की भी गहन रुचि थी। भारतीय विद्वानों की शून्य खोज का जब अरबों को पता चला तो उन्होंने अरबी भाषा में इसके मायने तलाशे। उन्हें मिला सिफ्र (sifr) जिसका मतलब भी रिक्त ही होता है। बारहवीं तेरहवीं सदी के आसपास योरप को जब दाशमिक प्रणाली का पता चला तो अरबी के सिफ्र ने यहां दो रूप ले लिए। पुरानी फ्रेंच में इसे शिफ्रे ( chiffre ) के रूप में जगह मिली जबकि अंग्रेजी में आने से पहले इसका लैटिनीकरण हुआ। पुरानी लैटिन में सिफ्र ने जे़फिरम का रूप लिया। बाद में यही zephirum या zephyrum > zeuero zero छोटा होकर ज़ीरो बन गया। बाद में फ्रेंच के रास्ते से अरबी के cifra का एक और रूपान्तर cifre हुआ। यही सिफ्र एक बार फिर बदला और भाषा अवेस्ता में छिद्र के लिए सुरा sura शब्द है जो इसी मूल का है। पहलवी में इसका रूप surak होता है और फ़ारसी में आते आते सुराख़ साफ नज़र आने लगता है। लैटिन में cavea, cavus और अंग्रेजी के केव cave का अर्थ गुफा होता है, मगर इस धातु से रिश्तेदारी स्पष्ट है जिसमें खोखलापन साफ नज़र आ रहा है। शून्य शब्द का दार्शनिक महत्व भी है। प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन ने शून्यवादी दर्शन की स्थापना की थी जिसके मुताबिक सृष्टि में किसी पदार्थ की सत्ता नहीं है बल्कि शून्य की सत्ता है। जीव, ईश्वर आदि की सत्ता को स्वीकार नहीं करने की वजह से इस मत को शून्यवाद नाम मिला। वैसे इसे वैनाशिक मत भी कहते थे। उनका मानना था कि पदार्थ के अस्तित्व को लेकर चार तरह के मत हो सकते हैं। अस्ति या नास्ति। अर्थात है अथवा नहीं। इसके बाद आता है तदुभयम अर्थात हो भी सकता है और नहीं भी। चौथा है नोभयम अर्थात तदुभयम का विलोम। नागार्जुन के मुताबिक परमसत्य इन चारों से हटकर है। सो इस विचार को शून्यवाद कहा गया। यह विचार इतना प्रसिद्ध हुआ कि बौद्धों या नास्तिकों को ही शून्यवादी कहा जाने लगा। यूँ ईश्वर की कल्पना को अगर छोड़ दिया जाए तो खगोल विज्ञान संबंधी आधुनिक खोजों से शून्य से सृष्टि के जन्म की बात को बल मिलता है। सब कुछ शून्य से प्रकट हुआ है और शून्य में विलीन हो जाना है। "शून्य की खोज" शून्य की खोज कब, किसने किया? इसका सही-सही उत्तर दे पाना तो बड़ा कठिन है किन्तु यह शत-प्रतिषत विदित है कि ईसा पूर्व बहुत पहले भारतवर्ष में अंक प्रणाली की खोज कर ली गयी थी। 9 ग्रहों के आधार पर अंकों को 1, 2, 3, 4, 5, 6, 7, 8, 9 लिखा जाने लगा था। तत्पश्चात भारतीय मनीषियों ने शून्य (0) की एक आष्चर्यजनक खोज की जो आध्यात्मिक, ऐतिहासिक एवं गणितीय दृष्टिकोण से सर्वाधिक महत्वपूर्ण रही। शून्य की खोज के बिना आधुनिक गणित उस स्तर पर नहीं पहुंच सकता था, जहां आज है। आर्किमिडीज़ (287-212 ईसा पूर्व) के समान प्रतिभाशाली विद्वान ने भी न तो शून्य की चर्चा की और न स्थानमान पध्दति को अपनाया। लंबे समय तक गणित यूनानियों ने बैबिलोनियाई स्थानमान पध्दति को नहीं अपनाया। सन 130 ईस्वी के लगभग जाकर, प्रसिध्द बैबीलोनियाई खगोलशास्त्री टालेमी ने षाष्टिक गणना पध्दति में यूनानी अक्षरीय अंकों में शून्य के लिए एक चिन्ह का उपयोग किया था। जो एक लघु गोले पर एक शिरोरेखा के साथ था। किन्तु इसका स्वतंत्र उपयोग होते हुए भी इसका उपयोग आधा अधूरा था, और वह भी कुछ नाम मात्र के विद्वानों तक ही सीमित था। वास्तव में टालेमी ने उसे मुख्यतया वही खाली स्थान भरने वाला चिन्ह ही समझा था। भारत में लगभग 200 (500) ईसा पूर्व छंद शास्त्र के प्रणेता पिंगलाचार्य हुए हैं (चाणक्य के बाद) जिन्हें द्विअंकीय गणित का भी प्रणेता माना जाता है। अत: शून्य की खोज का श्रेय जो विद्वान आर्यभट को देते हैं, वह सही नहीं है, वरन उसे पिंगलाचार्य को मिलना चाहिए। पिंगलाचार्य ने गणित में और भी आगे कार्य किया है, यद्यपि वह छंदों के नियम बनाने के लिए किया गया था। उनके छंदों के नियमों को यदि गणितीय दृष्टि से देखें तो एक तरह से वे द्विअंकीय (बाइनरी) गणित का कार्य करते हैं, और दूसरी दृष्टि से उनमें दो अंकों के घन समीकरण तथा चतुर्घाती समीकरण के हल दिखते हैं। गणित की इतनी ऊंची समझ के पहले अवश्य ही किसी ने उसकी प्राथमिक अवधारणा को भी समझा होगा। अत: भारत में शून्य की खोज ईसा से 200 वर्ष से भी पुरानी हो सकती है। यह खोज का विषय है। अधिकांशत: किसी अवधारणा की परिभाषा उसके उपयोग के बाद ही स्पष्ट की जाती है, जब तक कि वह कोई क्रान्तिकारी खोज न हो जैसे प्लांक द्वारा क्वाण्टम की खोज। सौभाग्य से गणित के एक बहुमूल्य ग्रंथ बख्शाली पाण्डुलिपि के कुछ (70) पन्ने सन 1881 में खैबर क्षेत्र में बख्शाली गांव के निकट मिले थे। ये भोज पत्र पर लिखे गए हैं, और बहुत ही जीर्ण अवस्था में हैं। इनकी कालगणना बहुत कठिन सिध्द हुई है क्योंकि यह स्वयं मूल की प्रतिलिपि हैं। इनकी भाषा के आधार पर अधिकांश विद्वान इन्हें 200 ईसा पूर्व से 300 ईस्वी का मानते हैं। यह ग्रंथ इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि यह शुल्ब सूत्री (वैदिक) गणित के ईसा पूर्व 800 से लेकर ईसा पूर्व 500 के काल के बाद के गणितीय रूप से निष्यि-से काल की पूर्ति-सी करता है। यह सिध्द करता है कि आर्यभट अचानक ही एक धूमकेतु की तरह नहीं आ गए थे, वरन वे एक गणितीय परम्परा के अंग थे। वैसे, भारत में शून्य का (अंक सहित) सर्वप्रथम लिखित प्रमाण (बख्शाली पाण्डुलिपि के अतिरिक्त) ईस्वी सन 458 में एक जैन ग्रंथ लोकविभाग में मिलता है, और पाश्चात्य विद्वान इसे भी शून्य के खोज की पहली तिथि मानते हैं। गणित से इतर ग्रंथ में लिखित में आने के पहले इस अवधारणा का विकास पहले ही होना चाहिए। इससे भी यह अर्थ निकलता है कि शून्य का उपयोग 458 ईस्वी से बहुत पहले प्रारंभ हो गया था। कम से कम ईसा पूर्व 200 वर्ष वाले पिंगलाचार्य को तो निश्चित ही इसका श्रेय मिलता है। भारत में जैन गणित का प्रमुख काल ईसा पूर्व 500 के बाद माना जा सकता है क्याेंकि इस काल में वैदिक गणित का प्रभाव अपेक्षाकृत कम दिखता है। जैसे गणितीय ग्रंथों में 300 ई.पू. का भगवती सूत्र है जिसमें संयोजन पर कार्य है, तथा 200 ई.पू. का स्थनंग सूत्र है जिसमें अंक सिध्दांत, रेखागणित, भिन्न, सरल समीकरण, घन समीकरण, चतुर्घाती समीकरण तथा मचय (पर्मुटेशन्स) आदि पर कार्य हैं। सन 200 ईस्वी तक समुच्चय सिध्दांत का विकास मिलता है, और अनंत संख्या पर भी बहुत कार्य मिलता है। बाद में लॉगरिदम की अवधारणा की झलक दिखती है। आर्यभट्ट द्वारा गणित तथा खगोलिकी में एक लम्बी छलांग लगाने के कोई 129 वर्ष बाद शून्य के व्यवहार के गणितीय नियम वैज्ञानिक पध्दति में लिखे यथा शून्य में से एक ऋणात्मक संख्या को घटाने से वही संख्या धनात्मक होकर बचती है। शून्य में किसी भी संख्या से भाग देने पर शून्य ही फल मिलता है। किन्तु वे किसी भी संख्या में शून्य का भाग देने से जो फल आता है उसे नहीं समझ पाए थे; वैसे इसे समझना दुष्कर भी है। 500 वर्षों से अधिक के बाद, भास्कराचार्य (1114-1185) ने इस शून्य द्वारा भाग देने का सही उत्तर दिया कि उन्होंने उसे समझाया भी था जिस तरह प्रलय में महाविष्णु में सब समा जाते हैं, और सृष्टि के समय उनकी उत्पत्ति होती है, महाविष्णु को कोई अंतर नहीं पड़ता। यह दर्शाता है कि शून्य की सही तथा पूरी समझ भारतीयों को बहुत पहले थी। आखिर शून्य किसे कहेंगे, जो इतना छोटा हो कि उसे हम माप ही देख नहीं सकते, पांचों इंद्रियों से सूक्ष्मातिसूक्ष्म दर्शी की सहायता से भी नहीं देख सकते, जो प्लांक सीमा से छोटा हो, उसे ही तो विज्ञान शून्य कहता है, कहता था। अब वह विचार करने लगा है, भौतिकी के अधिकांश वैज्ञानिक यह मानते से लगते हैं कि जिसे हम शून्य समझ रहे थे, उसमें से प्रतिक्षण ऊर्जा विकिरित होती है और उसी में विलीन हो जाती है। वैसे भी महान विस्फोट का सिध्दान्त कहता है कि विस्फोट के पहले जब दिक्काल भी नहीं था, तब समस्त ब्रह्माण्ड एक सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप में था, और फिर उसका विस्फोट हुआ और इस सृष्टि का, दिक्काल का प्रसार प्रारंभ हो गया। उसी सूक्ष्मातिसूक्ष्म को हमारे उपनिषद (शब्दों की सीमा जानते हुए) गुहा कहते हैं। कठोपनिषद (20, द्वितीय वल्ली) में कहा गया है, अणोरणीयान्महतो महीयानात्मस्य जन्तो निहितो गुहायाम। तमतु: पश्यति वीतशोको धातु: प्रसादान्महिमानमात्मन:। अर्थात, आत्मा जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म है और महातिमहा है, जो गुहा में रहता है, उसे जो जान लेता है वह आनंद में ही रहता है। आपको भी शून्य जान लेने पर आनंद प्राप्त हुआ होगा। वैसे तो शून्य शब्द का अर्थ है - कुछ नहीं। किन्तु इस कुछ नही मे ही तो सब कुछ है और जहां सब कुछ प्रत्यक्ष आँखों से दिखता है पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्ण मुदच्यते । पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवाव शिष्यते ।। शून्य ही पूर्ण है, शेष सारा कुछ अपूर्ण। पूर्ण में पूर्ण जोड़ने पर पूर्ण ही रहता है और पूर्ण से पूर्ण घटाने पर भी पूर्ण ही रहता है। वस्तुतः ब्रम्ह ही पूर्ण है। संसार अपूर्ण है। पूर्ण अर्थात शून्य संसार अर्थात (1, 2, 3, .......................9) में से हर संख्या को विभाजित कर सकता है। यथा अर्थात् ब्रम्ह संसार को अनन्त संख्याओं में विभाजित कर सकता है किन्तु पूर्ण अर्थात् ब्रम्ह (0) को संसार (सारी संख्यायें मिलकर) विभाजित नही कर सकती। यथा पुनष्च पूर्ण को पूर्ण से विभाजित करना न तो अर्थहीन है, न अर्थपूर्ण। यथा 0+0 =अनिष्चित। शून्य किसी भी सीमित धन संख्या से सबसे छोटी संख्या है और किसी भी सीमित ऋण संख्या से सबसे बड़ी संख्या है। अर्थात् शून्य अणुतोअणीयान एवं महतोमहीयान है। अब तो ब्रम्हाण्ड की उत्पत्ति की खोज महामशीन (लार्ज हैड्रान कोलाइडर) द्वारा करते-करते वैज्ञानिक सूक्ष्मतम कण (हिग्सबोसोन) तक पहुंच गये, जिसे उन्होंने गॉड पार्टिकल कहा। यह गॉड पार्टिकल शून्य ही तो है और किसी गॉड पार्टिकल के महाविस्फोट से ब्रम्हाण्ड की संरचना हुई है। उस महा विस्फोट के बाद से ब्रम्हाण्ड का विस्तार अनवरत हो रहा है। वस्तुतः शून्य अर्थात कुछ नहीं सबकुछ कैसे हो सकता है? शून्य स्वयं कैसे ऊर्जस्वित होकर गति पैदा कर सकता है ? इस प्रष्न का सटीक उत्तर वेदान्त एवं उपनिषदों में दिया गया है। जैसे प्रकार ब्रम्ह अर्थात् शून्य के संकल्पमात्र से चित्त में स्थित बीज रूपी जगत फैलकर विराट वट वृक्ष की तरह उसी शून्य तत्व पर फैल जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि उस परम तत्व में गति और स्थिरता दोनों एक साथ हैं। जब संख्यायें नही थीं, तब भी शून्य था और जब सारी संख्याओं का लोप हो जाता है तब भी शून्य शेष रहता है। एक शून्य से अनन्त संख्यायें बनती है। यथा किन्तु यदि किसी भी संख्या के पूर्व शून्य लिखा जाये तो उसका कोई महत्व नही होता। यथा 01, 02, ............... 09। इससे सिद्ध होता है कि शून्य से संख्याओं की उत्पत्ति हुई है न कि संख्याओं से शून्य की। सागर की अनन्त जल की बूंदे वाष्प बनकर मेघ बनती हैं फिर वही बूदें बरसात के समय धरती पर गिरकर धरती माँ को तृप्त करती हैं। वर्षा का जल नदियों, तालाबों में भी गिरता है और फिर समय पाकर वही जल जाकर समुद्र में मिलता है किन्तु सागर न कभी रिक्त होता है, न उसमें बाढ़ आती है। ब्रम्ह अर्थात् शून्य भी कुछ इसी प्रकार है। पूर्ण ब्रम्ह ( 0 ) से अनन्त आत्मायें निकल कर जीव के शरीर में समाविष्ट होकर जीवात्मा नाम धारण करती हैं और शरीर के मरणोपरान्त फिर वापस चली जाती हैं। किन्तु शून्य इससे सर्वथा अप्रभावित रहता है। शून्य करुणा सागर है। वह औघड़दानी शिव है। क्षुद्र जीव जिस अनुपात में परमात्मा (शून्य) से प्रेम करता है, परमात्मा उससे कई गुना प्रेम करता है। गणितीय संख्याओं के माध्यम से ही देखिये गुना, तीन बार स्मरण करने पर 1000 गुना फल देता है। यथा 10, 100, 1000 ......। किसी वस्तु को संख्याओं में तो प्राप्त किया जा सकता है यथा कमाये जा सकते हैं किन्तु शून्य रुपया कमाना या अर्जित करना अत्यन्त दुर्लभ है। शून्यपति होने का अर्थ है कंगाल हो जाना और कंगाल कौन होना चाहेगा? अनन्त कामनायें ही अनन्त संख्यायें हैं। यही तो माया है। आज तक इस सृष्टि में क्या किसी की सभी कामनायें पूर्ण हुई हैं? कामनाओं को शून्य किये बिना उस (शून्य) परमात्मा से कदापि नही मिला जा सकता। शून्य को जानने के लिए, शून्य से मिलने के लिए शून्य होना पड़ेगा। शून्य होने के लिए हृदय के पात्र को पूर्णतया रिक्त करना पड़ेगा। इस मन से बड़ा संसार में ईष्वर के सिवा और कोई नही है। दसों इन्द्रियों के द्वार पर इसने काम, क्रोध, मद, राग, द्वेष, ईष्र्या, लोभ, आषा, तृष्णा इत्यादि द्वारपाल नियुक्त कर रखे हैं। अहंकार तो इसका प्रधान सेनापति ही है। इसका किला अभेद्य है। कामनाओं की पूर्ति से अहंकार होता है और इसकी पूर्ति न होने से क्रोध उत्पन्न होता है। कामनायें सात्विक, राजसिक एवं तामसिक तीनों प्रकार की होती हैं। तामसिक कामनाओं से राजसिक कामनायें श्रेष्ठ हैं और राजसिक कामनाओं से सात्विक कामनायें श्रेष्ठ हैं। निष्काम होना सर्वश्रेष्ठ है। निष्काम कर्मयोग ही शून्य की साधना है। मन का सहारा लेकर दोनो चर्मचक्षु संसार को देखते हैं। चर्मचक्षुओं को बंद करने पर वही संसार मन भीतर देखता है। मन के एकाग्र करने पर मन और तीव्र गति से संसार की ओर दौड़ता है किन्तु धीरे-धीरे ज्यों-ज्यों एकाग्रता का अभ्यास बढ़ता जाता है, मन रुक-रुक कर इधर-उधर ताक झांक करता है। मन की गति को मन ही देख सकता है। मन के विकारों को मन ही दूर कर सकता है। मन ही मन से लड़ सकता है और मन ही मन को मार सकता है। जहां तक मन की गति है, वहीं तक संसार है। मन समाप्त तो संसार समाप्त। संसार के समाप्त होने पर सब कुछ समाप्त हो जाता है और जब भीतर कुछ शेष नही बचता तो जो बोध होता है वही अस्तित्व बोध है। वही चेतना है, शून्य अवस्था है। आत्मा ही आत्मा को देखता है। शून्य ही शून्य का अनुभव करता है। इसी का नाम परमानन्द है, प्रेम है, महाभाव है, चैतन्य है। यहीं पूर्णता का बोध होता है। गणितीय अंक कुल 9 हैं। अर्थात् 1, 2, 3 ..................9 । इसके पश्चात फिर पुनरावृत्ति होती है और संख्या के आगे शून्य लग जाता है। यथा- 10 .........आदि। 9 एक अंक की सबसे बड़ी संख्या है। 9 ग्रह हैं, 9 दुर्गाएं हैं, 9 साकार ब्रम्ह का पूर्ण स्वरूप है जिसमें एक जुड़कर 10 हो जाता है। फिर एक-एक कर जुड़ते-जुड़ते अनन्त संख्याओं की सृष्टि हो जाती है। शून्य निराकार ब्रम्ह का और 9 साकार ब्रम्ह का प्रतीक है। शून्य (0) की खोज से अस्तित्व बोध, चेतना, सभ्यता तथा संस्कृति के विकास में आष्चर्यजनक परिवर्तन हुआ है। शून्य के बिना निराकार ब्रम्ह, आधुनिक विज्ञान, गणित, आध्यात्मिक तथा भौतिक विकास की कल्पना नही की जा सकती। शून्य अर्थात् निराकार चेतना से ही काव्य, संगीत और कला की धारायें निःसृत हुई हैं। आप अपनी राय/विचार हमें ajaykarmyogi@gmail. com पर अवश्य भेजें। अपना देश अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति अपनी भाषा अपना गौरव वंदे मातरम् अजय कर्मयोगी

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