संविधान की धारा 348 की वजह से ही गली-गली में अंग्रेजी माध्यम के अधकचरे स्कूल खुल रहे हैं। बच्चा हो या बड़ा, हर एक अपने परिवेश की बोली में ही अपने आप को सहजता से अभिव्यक्त कर पाता है। मातृभाषा परिवेश पर निर्भर करती है न कि मजहब़ वंश, जाति आदि पर। अंग्रेजी जैसी गैर परिवेश की भाषा में तो बस हम रटी रटायी बात ही उगल सकते हैं, मौलिक चिंतन नहीं कर सकते।
हमारे देश की संविधान निर्माताओं ने अंग्रेजी को एक अल्प अवधि के लिए ही लागू किया था। उन्हें अनुमान था कि संविधान लागू होने के 15 वर्ष के अन्दर हिन्दी देश के सभी राज्यों में स्वीकार कर ली जाएगी और फिर देश में काम काज की भाषा अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी हो जाएगी। पर तमिलनाडु में हुए विरोध के चलते हिन्दी कामकाज की अधिकारिक भाषा नहीं बन पायी। तमिलनाडु आज भी तमिल को उच्चन्यायालय की अधिकारिक भाषा बनवाने के लिए तरस रहा है।
अंग्रेजी व्यवस्था की वजह से भारत में कहने भर को लोकतंत्र रह गया है। पर 'इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ की वजह से शासन प्रशासन के स्तर पर होने वाली कार्यवाही जनता के समझ के बाहर है। जनता न तो मूलत: अंग्रेजी में लिखे कानून को समझ पाती है, न ही उसके आधार पर चलने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया को और न ही उसके क्लिष्ट हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में हुए अनुवाद को ही। शोध आधारित विशलेषण के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि भारतीय संविधान की धारा 348 की वजह से ही गली-गली में अंग्रेजी माध्यम के अधकचरे स्कूल खुल रहे है। बच्चा हो या बड़ा, हर एक अपने परिवेश की बोली में ही अपने आप को सहजता से अभिव्यक्त कर पाता है। मातृभाषा परिवेश पर निर्भर करती है न कि मजहब़, वंश, जाति आदि पर। अंग्रेजी जैसी गैर परिवेश की भाषा में तो बस हम रटी रटायी बात ही उगल सकते हैं, मौलिक चिंतन नहीं कर सकते
'इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ ने सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को तोता तैयार करने की फैक्ट्री में तब्दील कर दिया है। जिससे निकला तथाकथित शिक्षित वर्ग रटी रटाई बातों को ही उगलता है। जिस तेजी से अंग्रेजीयत का काला साया हमारे समाज पर पसर रहा है, उसका आने वाले 10-15 सालों में प्रभाव यह निकलने वाला है कि 'का’,'की संविधान की धारा 348 की वजह से ही गली-गली में अंग्रेजी माध्यम के अधकचरे स्कूल खुल रहे हैं। बच्चा हो या बड़ा, हर एक अपने परिवेश की बोली में ही अपने आप को सहजता से अभिव्यक्त कर पाता है। मातृभाषा परिवेश पर निर्भर करती है न कि मजहब़ वंश, जाति आदि पर। अंग्रेजी जैसी गैर परिवेश की भाषा में तो बस हम रटी रटायी बात ही उगल सकते हैं, मौलिक चिंतन नहीं कर सकते।
हमारे देश की संविधान निर्माताओं ने अंग्रेजी को एक अल्प अवधि के लिए ही लागू किया था। उन्हें अनुमान था कि संविधान लागू होने के 15 वर्ष के अन्दर हिन्दी देश के सभी राज्यों में स्वीकार कर ली जाएगी और फिर देश में काम काज की भाषा अंग्रेजी के स्थान पर हिन्दी हो जाएगी। पर तमिलनाडु में हुए विरोध के चलते हिन्दी कामकाज की अधिकारिक भाषा नहीं बन पायी। तमिलनाडु आज भी तमिल को उच्चन्यायालय की अधिकारिक भाषा बनवाने के लिए तरस रहा है।
अंग्रेजी व्यवस्था की वजह से भारत में कहने भर को लोकतंत्र रह गया है। पर 'इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ की वजह से शासन प्रशासन के स्तर पर होने वाली कार्यवाही जनता के समझ के बाहर है। जनता न तो मूलत: अंग्रेजी में लिखे कानून को समझ पाती है, न ही उसके आधार पर चलने वाली प्रशासनिक प्रक्रिया को और न ही उसके क्लिष्ट हिन्दी एवं भारतीय भाषाओं में हुए अनुवाद को ही। शोध आधारित विशलेषण के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे है कि भारतीय संविधान की धारा 348 की वजह से ही गली-गली में अंग्रेजी माध्यम के अधकचरे स्कूल खुल रहे है। बच्चा हो या बड़ा, हर एक अपने परिवेश की बोली में ही अपने आप को सहजता से अभिव्यक्त कर पाता है। मातृभाषा परिवेश पर निर्भर करती है न कि मजहब़, वंश, जाति आदि पर। अंग्रेजी जैसी गैर परिवेश की भाषा में तो बस हम रटी रटायी बात ही उगल सकते हैं, मौलिक चिंतन नहीं कर सकते।
'इंग्लिश मीडियम सिस्टम’ ने सम्पूर्ण शिक्षा व्यवस्था को तोता तैयार करने की फैक्ट्री में तब्दील कर दिया है। जिससे निकला तथाकथित शिक्षित वर्ग रटी रटाई बातों को ही उगलता है। जिस तेजी से अंग्रेजीयत का काला साया हमारे समाज पर पसर रहा है, उसका आने वाले 10-15 सालों में प्रभाव यह निकलने वाला है कि 'का’,'की’ जैसे शब्दों के अलावा कोई भी शब्द भारतीय सांस्कृतिक बोलियों के नहीं रह जाएगे। भारतीय भाषाओं के शब्दकोश अजायब घर में रखे जाने वाली विलुप्त धरोहर भर बन कर रह जाएगी। रोम और यूनान की तो सभ्यताएं ही मिटी पर यहाँ तो पूरी की पूरी संस्कृति ही विलुप्त होने के कगार पर खड़ी है।
अत: राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, भारत सरकार एवं संसद से हम निम्न आग्रह करते हैं।
1. 343(1) हिन्दी के स्थान पर समस्त भारतीय जन-भाषाएं(भाषा एवं बोलियाँ) 343(1) धारा हिन्दी को राजभाषा घोषित करती है जिसे भ्रम वस लोग राष्ट्रभाषा भी समझ लेते हैं। इस धारा का महान योगदान यह है कि इसने हमारे देश को हिन्दी - गैर हिन्दी नामक दो कृत्रिम राष्ट्रीयताओं में विभक्त कर दिया है या यूं कहे कि भाषा और क्षेत्र के आधार पर अनेकों राष्ट्रीयताओं को पैदा कर दिया है। 'हिन्दी राष्ट्रभाषा है कि नहीं’, हिन्दुतानी भाषा-भाषी की आपसी इस लड़ाई में संविधान की धारा 343(2) के माध्यम से अंग्रेजी का वर्चस्व स्थापित हो जाता है।
एक रोज हिन्दी को पूरा देश स्वीकार करेगा उस रोज हिन्दी अंग्रेजी का स्थान लेगी, यह एक ऐसी मिथक कल्पना है, जो कभी पूरी होती नहीं दिखती। हम आपसे पूछते है कि यदि हिन्दी राष्ट्रभाषा है तो तमिल, तेलगू, कश्मीरी, गुजराती, बंगाली आदि क्या गैर राष्ट्र भाषा है ? सच्चाई तो यह है कि हिन्दी को राजभाषा बनाने वाली संविधान की धारा 343(1) की वजह से ही गैर हिन्दी परदेशों में हिन्दी के प्रति नफरत पनपी है। वर्ना समस्त भारतीय भाषाओं के मिश्रण से 'हिन्दुस्तानी-फेविकोल’(अमीर खुसरों से लेकर गांधी तक की मिली जुली हिन्दुस्तानी) तैयार होने की प्रबल संभावना है। आज हमें दो में से एक को चुनना है। एक भाषा अनेक देश। अनेक भाषा एक देश। हमारी संस्कृति विविधता में एकता की है। अत: 343(1) के स्थान पर भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल समस्त भारतीय भाषाएं एवं आठवीं अनुसूची में समस्त भारतीय बोली-भाषाओं को शामिल किया जाए।
2. हिन्दी-उर्दू को एक भाषा माना जाए। लिपी भाषा नहीं होती है। लिपियांत्रण को बढ़ावा दिया जाए। समस्त भारतीय लिपियों में भी हिन्दी-उर्दू/हिन्दवी/हिन्दुस्तानी आदि को लिखा जाए एवं उसके विपरीत भी। देवनागरी/रोमन/फारसी/ समेत समस्त भारतीये लिपियों का इस प्रकार विस्तार किया जाए कि भारत की सभी भाषाओं को एक से ज्यादा लिपियों लिखा जा सके।
3. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(2) एवं 348 के प्रवाधान से अंग्रेजी के स्थान पर समस्त भारतीय भाषाओं (कम से कम आठवीं अनुसूचि की) को शामिल किया जाए। त्वरित न्याय के लिए देश के हर एक जोन में सर्वोच्च न्यायालय स्थापित हो जो उस क्षेत्र में बोली जाने वाली सभी बोलियों में न्याय की व्यवस्था करे। सभी राज्यों के उच्चन्यायालय अनिवार्यत: उस राज्य में बोली भाषाओं में ही कामकाज करे। हर राज्य में सर्वोच्च न्यायालय की शाखा खोली जाए। जो उस राज्य की बोली भाषा में काम काज करे।
4. हिन्दी-उर्दू अर्थात हिन्दवी/हिन्दुस्तानी का काम भारत की समस्त भाषाओं में समन्वय का हो। पर किसी भी भाषा को थोपे न। परिवेश के अनुरूप इस मिली जूली हिन्दूस्तानी के कई-कई स्वरूप उत्पन्न हुए है। जैसे मराठी-हिन्दी-उर्दू-संस्कृत/हिन्दवी/हिन्दुस्तानी(मुम्बईया-हिन्दी), गुजराती-हिन्दी-उर्दू-संस्कृत/हिन्दवी/हिन्दुस्तानी, तमिल-हिन्दी-उर्दू-संस्कृत/हिन्दवी/हिन्दुस्तानी, नागामीश-हिन्दी-उर्दू-संस्कृत/हिन्दवी/-हिन्दुस्तानी, आदि। भाषा नदियों के समान होती है। नदी में पानी के बहाव की दर में परिवर्तन आता रहता है, वैसे ही भाषा में भी परिवर्तन आता रहता है। संगम पर दो नदियों की धारां अलग अलग जान पडती है पर मिल कर एक विशाल नदी का रूप ले लेती है। सरकार भाषाई मामले में हस्तक्षेप न करे तो भारत की भाषाओं को मिल कर एक होने की प्रबल संभावना है।
अत: अनुच्छेद 351 में संशोधन हो। भारत सरकार हिन्दी के प्रसार की जगह सरकार 'हम भारत के लोगों’ की मिली जुली भाषा को अपना ले। शब्द किसी भाषा विशेष की बपौती नहीं होते है। भाषीक परिवेश में जाकर शब्द उसके अनुरूप ढ़ल जाते है। अत:अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं से आये तकनिकी शब्दों को अपनाया जाए। राजभाषा विभाग जबरदस्ती का हिन्दी अनुवाद एवं कृत्रिम हिन्दी को पैदा करने का काम बंद कर दे और समस्त राजभाषा अधिकारियों को वीआरएस दिया जाए। सरकार से विशेष अनुरोध है कि राजभाषा विभाग को तुरंत से तुरंत बंद कर दिया जाए।
5. अनुच्छेद 147 को समाप्त किया जाए। जो ब्रिटेन की संसद के द्वारा 1947 से पूर्व पास किये गये कानूनों को ही मान्य नहीं करता अपितु अंग्रेजों के समय की व्यवस्था को भी बनाए रखता है।
6. केजी से पीएचडी तक परिवेश के भाषा माध्यमों में समान समान स्कूली और विश्वविद्यालयी शिक्षा एवं रोजगार का अधिकार नागरिकों को दिया जाए। वर्तमान शिक्षा बोर्डों को भंग कर, संकुल के सिद्धान्त पर सांस्कृतिक शिक्षा बोर्ड सह विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाए। तत्काल प्रभाव से निजी और सरकारी सभी प्रकार के प्रथमिक एवं नर्सरी स्कूलों का माध्यम विद्यार्थियों के परिवेश में बोली जाने वाली मातृभाषा ही हो।
7. समय के हिसाब से उम्र की ऊपरी सीमा को बढ़ा कर मूल संविधान के अनुच्छेद 45 को 21ए के स्थान पर लिखा की जाए और केजी से पीजी तक की सम्पूर्ण शिक्षा का राष्ट्रीयकरण किया जाए।
8. पीएससी, एसएससी, डीएसएसएसबी समेत सभी रोजगार के लिए नैकरियों की परीक्षा का आयोजन करने वाली संस्थाएं अपनी परीक्षाओं का आयोजन अनिवार्यत: भारतीय जनभाषाओं में ही करे।अंग्रेजी की अनिवार्यता पूर्णत: समाप्त की जाए। आईआईटी, आईआईएम समेत समस्त बेहतर माने जाने वाले उच्च शिक्षा संस्थानों/विश्वविद्यालयों की परीक्षा ही नहीं अपितु शिक्षा भी हो भारतीय भाषा माध्यमों में ही हो तथा इन संस्थाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता अर्थात अंग्रेजी का आरक्षण पूर्णत: समाप्त हो।
9. जब तक भाषाई समता लागू नहीं होती तब तक गैर-अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों के समतुल्य लाने के लिए सभी प्रकार की विश्वविद्यालयी एवं प्रतियोगिता परीक्षाओं में 5प्रतिशत का अतिरिक्तांक दिये जाए। विश्वविद्यालय एवं सरकारी सेवाओं की 75 प्रतिशत सीटे सरकारी स्कूलों एवं गैर-अंग्रेजी माध्यम में पढऩे एवं परीक्षा देने वाले भारतीय भाषा के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्यत: आरक्षित की जाएं। एक भाषा परिवेश से दूसरे भाषा परिवेश में जाने पर विद्यार्थी को उस भाषा परिवेश के विद्यार्थियों के समतुल्य लाने हेतु अतरिक्तांक भी दिया जा’ जैसे शब्दों के अलावा कोई भी शब्द भारतीय सांस्कृतिक बोलियों के नहीं रह जाएगे। भारतीय भाषाओं के शब्दकोश अजायब घर में रखे जाने वाली विलुप्त धरोहर भर बन कर रह जाएगी। रोम और यूनान की तो सभ्यताएं ही मिटी पर यहाँ तो पूरी की पूरी संस्कृति ही विलुप्त होने के कगार पर खड़ी है।
अत: राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, भारत सरकार एवं संसद से हम निम्न आग्रह करते हैं।
1. 343(1) हिन्दी के स्थान पर समस्त भारतीय जन-भाषाएं(भाषा एवं बोलियाँ) 343(1) धारा हिन्दी को राजभाषा घोषित करती है जिसे भ्रम वस लोग राष्ट्रभाषा भी समझ लेते हैं। इस धारा का महान योगदान यह है कि इसने हमारे देश को हिन्दी - गैर हिन्दी नामक दो कृत्रिम राष्ट्रीयताओं में विभक्त कर दिया है या यूं कहे कि भाषा और क्षेत्र के आधार पर अनेकों राष्ट्रीयताओं को पैदा कर दिया है। 'हिन्दी राष्ट्रभाषा है कि नहीं’, हिन्दुतानी भाषा-भाषी की आपसी इस लड़ाई में संविधान की धारा 343(2) के माध्यम से अंग्रेजी का वर्चस्व स्थापित हो जाता है।
एक रोज हिन्दी को पूरा देश स्वीकार करेगा उस रोज हिन्दी अंग्रेजी का स्थान लेगी, यह एक ऐसी मिथक कल्पना है, जो कभी पूरी होती नहीं दिखती। हम आपसे पूछते है कि यदि हिन्दी राष्ट्रभाषा है तो तमिल, तेलगू, कश्मीरी, गुजराती, बंगाली आदि क्या गैर राष्ट्र भाषा है ? सच्चाई तो यह है कि हिन्दी को राजभाषा बनाने वाली संविधान की धारा 343(1) की वजह से ही गैर हिन्दी परदेशों में हिन्दी के प्रति नफरत पनपी है। वर्ना समस्त भारतीय भाषाओं के मिश्रण से 'हिन्दुस्तानी-फेविकोल’(अमीर खुसरों से लेकर गांधी तक की मिली जुली हिन्दुस्तानी) तैयार होने की प्रबल संभावना है। आज हमें दो में से एक को चुनना है। एक भाषा अनेक देश। अनेक भाषा एक देश। हमारी संस्कृति विविधता में एकता की है। अत: 343(1) के स्थान पर भारतीय संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल समस्त भारतीय भाषाएं एवं आठवीं अनुसूची में समस्त भारतीय बोली-भाषाओं को शामिल किया जाए।
2. हिन्दी-उर्दू को एक भाषा माना जाए। लिपी भाषा नहीं होती है। लिपियांत्रण को बढ़ावा दिया जाए। समस्त भारतीय लिपियों में भी हिन्दी-उर्दू/हिन्दवी/हिन्दुस्तानी आदि को लिखा जाए एवं उसके विपरीत भी। देवनागरी/रोमन/फारसी/ समेत समस्त भारतीये लिपियों का इस प्रकार विस्तार किया जाए कि भारत की सभी भाषाओं को एक से ज्यादा लिपियों लिखा जा सके।
3. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343(2) एवं 348 के प्रवाधान से अंग्रेजी के स्थान पर समस्त भारतीय भाषाओं (कम से कम आठवीं अनुसूचि की) को शामिल किया जाए। त्वरित न्याय के लिए देश के हर एक जोन में सर्वोच्च न्यायालय स्थापित हो जो उस क्षेत्र में बोली जाने वाली सभी बोलियों में न्याय की व्यवस्था करे। सभी राज्यों के उच्चन्यायालय अनिवार्यत: उस राज्य में बोली भाषाओं में ही कामकाज करे। हर राज्य में सर्वोच्च न्यायालय की शाखा खोली जाए। जो उस राज्य की बोली भाषा में काम काज करे।
4. हिन्दी-उर्दू अर्थात हिन्दवी/हिन्दुस्तानी का काम भारत की समस्त भाषाओं में समन्वय का हो। पर किसी भी भाषा को थोपे न। परिवेश के अनुरूप इस मिली जूली हिन्दूस्तानी के कई-कई स्वरूप उत्पन्न हुए है। जैसे मराठी-हिन्दी-उर्दू-संस्कृत/हिन्दवी/हिन्दुस्तानी(मुम्बईया-हिन्दी), गुजराती-हिन्दी-उर्दू-संस्कृत/हिन्दवी/हिन्दुस्तानी, तमिल-हिन्दी-उर्दू-संस्कृत/हिन्दवी/हिन्दुस्तानी, नागामीश-हिन्दी-उर्दू-संस्कृत/हिन्दवी/-हिन्दुस्तानी, आदि। भाषा नदियों के समान होती है। नदी में पानी के बहाव की दर में परिवर्तन आता रहता है, वैसे ही भाषा में भी परिवर्तन आता रहता है। संगम पर दो नदियों की धारां अलग अलग जान पडती है पर मिल कर एक विशाल नदी का रूप ले लेती है। सरकार भाषाई मामले में हस्तक्षेप न करे तो भारत की भाषाओं को मिल कर एक होने की प्रबल संभावना है।
अत: अनुच्छेद 351 में संशोधन हो। भारत सरकार हिन्दी के प्रसार की जगह सरकार 'हम भारत के लोगों’ की मिली जुली भाषा को अपना ले। शब्द किसी भाषा विशेष की बपौती नहीं होते है। भाषीक परिवेश में जाकर शब्द उसके अनुरूप ढ़ल जाते है। अत:अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं से आये तकनिकी शब्दों को अपनाया जाए। राजभाषा विभाग जबरदस्ती का हिन्दी अनुवाद एवं कृत्रिम हिन्दी को पैदा करने का काम बंद कर दे और समस्त राजभाषा अधिकारियों को वीआरएस दिया जाए। सरकार से विशेष अनुरोध है कि राजभाषा विभाग को तुरंत से तुरंत बंद कर दिया जाए।
5. अनुच्छेद 147 को समाप्त किया जाए। जो ब्रिटेन की संसद के द्वारा 1947 से पूर्व पास किये गये कानूनों को ही मान्य नहीं करता अपितु अंग्रेजों के समय की व्यवस्था को भी बनाए रखता है।
6. केजी से पीएचडी तक परिवेश के भाषा माध्यमों में समान समान स्कूली और विश्वविद्यालयी शिक्षा एवं रोजगार का अधिकार नागरिकों को दिया जाए। वर्तमान शिक्षा बोर्डों को भंग कर, संकुल के सिद्धान्त पर सांस्कृतिक शिक्षा बोर्ड सह विश्वविद्यालयों की स्थापना की जाए। तत्काल प्रभाव से निजी और सरकारी सभी प्रकार के प्रथमिक एवं नर्सरी स्कूलों का माध्यम विद्यार्थियों के परिवेश में बोली जाने वाली मातृभाषा ही हो।
7. समय के हिसाब से उम्र की ऊपरी सीमा को बढ़ा कर मूल संविधान के अनुच्छेद 45 को 21ए के स्थान पर लिखा जाए और शिक्षा की दूकानदारी पूर्णत: समाप्त की जाए और केजी से पीजी तक की सम्पूर्ण शिक्षा का राष्ट्रीयकरण किया जाए।
8. पीएससी, एसएससी, डीएसएसएसबी समेत सभी रोजगार के लिए नैकरियों की परीक्षा का आयोजन करने वाली संस्थाएं अपनी परीक्षाओं का आयोजन अनिवार्यत: भारतीय जनभाषाओं में ही करे।अंग्रेजी की अनिवार्यता पूर्णत: समाप्त की जाए। आईआईटी, आईआईएम समेत समस्त बेहतर माने जाने वाले उच्च शिक्षा संस्थानों/विश्वविद्यालयों की परीक्षा ही नहीं अपितु शिक्षा भी हो भारतीय भाषा माध्यमों में ही हो तथा इन संस्थाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता अर्थात अंग्रेजी का आरक्षण पूर्णत: समाप्त हो।
9. जब तक भाषाई समता लागू नहीं होती तब तक गैर-अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों को अंग्रेजी माध्यम के विद्यार्थियों के समतुल्य लाने के लिए सभी प्रकार की विश्वविद्यालयी एवं प्रतियोगिता परीक्षाओं में 5प्रतिशत का अतिरिक्तांक दिये जाए। विश्वविद्यालय एवं सरकारी सेवाओं की 75 प्रतिशत सीटे सरकारी स्कूलों एवं गैर-अंग्रेजी माध्यम में पढऩे एवं परीक्षा देने वाले भारतीय भाषा के विद्यार्थियों के लिए अनिवार्यत: आरक्षित की जाएं। एक भाषा परिवेश से दूसरे भाषा परिवेश में जाने पर विद्यार्थी को उस भाषा परिवेश के विद्यार्थियों के समतुल्य लाने हेतु अतरिक्तांक भी दिया जाये
यह भी कोई संपूर्ण समाधान नहीं है संपूर्ण समाधान तो गुरुकुल व्यवस्था ही है जिसमें कोई डिग्री की कहीं आवश्यकता ही नहीं है बस सरकार सारे प्रतियोगी परीक्षा से वांछनीय योग्यता का मापदंड समाप्त कर इन सारी डिग्री व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर सकते हैं और यह गुलामी की प्रक्रिया से बाहर आ सकते हैं

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद