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अनेक अनजाने लोग जिसके कार्यों से सुप्रीम कोर्ट को राम मंदिर पे मुहर लगानी पडी


 



 
  बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।
ब्राह्मण, गौ, देवता और संतों के लिये भगवान् ने मनुष्य का अवतार लिया। वे माया और उसके गुण और इन्द्रियों से परे हैं। उनका शरीर अपनी इच्छा से ही बना है। _/\_
*जो पुरुषों में उत्तम है...!*
*जो त्याग समर्पण और मर्यादा के प्रतीक है जो शोर्य पथ के अनुगामी है जो अपने भक्तों को प्राणों से भी प्यारे है...!
समस्त ब्रह्मांड को भगवान् श्री राम के प्राक्ट्य दिवस की अनंत बधाई एवं शुभकामनाएं।
जय श्री राम..... राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान
   जिस तरह से रामसेतु बनाने का कार्य चल रहा था तो अनेकों लोगों ने अपने-अपने क्षमता अनुसार उसमें योगदान किया उसमें एक गिलहरी का भी योगदान भी रहा है ऐसे करोड़ों हिंदू अपना अपना वह योगदान आज राम मंदिर के लिए कर रहे हैं पर  नल नील के कार्यों को इस क्रम में कभी भी भुलाया नहीं जा सकता उसी तरीके से शारदा सर्वज्ञ पीठ के स्वामी अमृतानंद देव तिर्थ जी के इस अतुलनीय प्रयास जो पर्दे के पीछे राष्ट्र रक्षा व धर्म रक्षा  का कार्य आज भी कर रहे हैं इसमें बहुत सी गोपनीय बातें हैं जो हम यहां नहीं कर सकते वैसे साध्वी प्रज्ञा ठाकुर जी को पद प्रतिष्ठा मान सम्मान से सम्मानित आप सब जानते देखते होंगे कि एक स्त्री पर कितना जुर्म किया गया तो एक पुरुष पर कितना अत्याचार व अमानवीय व्यवहार हुआ होगा लेकिन इन महापुरुष का तो कहीं नाम भी नहीं आया पर एक सहज प्रकृति से निष्ठा भाव से पर्दे के पीछे रहकर इतना बड़ा त्याग करने वाले इन महापुरुषों का  योगदान इस राम मंदिर के मूल कार्यों में इन्हें भूलाया भी नहीं जा सकता  मेरा व्यक्तिगत परिचय महाराज जी के सानिध्य में ही  एएसआई के डायरेक्टर जनरल माननीय श्री बुध  रश्मि मणि जी के साथ संवाद  व्यूह रचना और विचारों को जानने का  अवसर दिल्ली में मिला था जो सुप्रीम कोर्ट का फैसले का आधार बना
रामलला पर फैसले का मुख्य आधार बनी डॉ. मणि की उत्खनन रिपोर्ट
अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मुख्य आधार बनी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) की उत्खनन रिपोर्ट को अंत तक कोई चुनौती नहीं दे पाया।...
   अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण संबंधी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का मुख्य आधार बनी भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) की उत्खनन रिपोर्ट को अंत तक कोई चुनौती नहीं दे पाया। एएसआइ ने खोदाई में मिले मंदिर के भग्नावशेषों की सही उम्र कार्बन डेटिंग पद्धति से निकालकर कोर्ट को बताई। देश के प्रमुख पुरातत्वविद् डॉ. बुद्ध रश्मि मणि के नेतृत्व में 50 दिग्गज वैज्ञानिकों की टीम ने हाई कोर्ट के निर्देश पर छह माह की खोदाई के बाद रिपोर्ट सौंपी थी।

शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसला सुनाए जाने के समय डॉ. मणि त्रिवेंद्रम प्रवास पर थे। विशेष बातचीत में उन्होंने प्रसन्नता जताई और कहा कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला देशहित में आया। उन्होंने बताया कि पिछले 16 साल के दौरान कई विद्वानों ने उत्खनन जांच रिपोर्ट को चुनौती देने की कोशिश की, लेकिन 'सांच को आंच नहीं' के चलते रिपोर्ट अडिग रही। उन्होंने बताया कि फैसला आने तक अयोध्या उत्खनन और जांच दल से जुड़े किसी भी सदस्य को इस बारे में बात करने की अदालत से स्पष्ट मनाही थी। हाई कोर्ट ने मार्च 2003 में उत्खनन कर वस्तुस्थिति बताने के निर्देश दिए थे।

खोदाई में मिले थे ये अकाट्य साक्ष्य

फैसला आने के बाद मौन तोड़ते हुए उन्होंने बताया कि छह महीने तक पूरी टीम ने कठिन परिश्रम किया। मेरे सहयोगी डॉ. भुवन विक्रम और अन्य वैज्ञानिकों ने तो कई रातों का जागरण किया। हमें गर्व है कि हमारे उत्खनन कार्य की गुणवत्ता, रिपोर्ट की तार्किकता और विश्वसनीयता साबित हुई। खोदाई में जमीन के भीतर हमें 1200 ईसा पूर्व के तीन मंदिरों के अवशेष मिले। ये मंदिर 10वीं, 11वीं एवं 12वीं शताब्दी के थे। प्राचीन ईटें, दीवारों पर उत्कीर्ण देवीय मूर्तियां, आमलक और मकरमुख आदि भग्नावशेषों का विस्तृत ब्योरा संबंधित विषय विशेषज्ञों की टिप्पणी सहित दो वॉल्यूम की रिपोर्ट में दर्ज किया गया है।

ऐसे पता चली मंदिर की सही उम्र

डॉ. मणि बताते हैं कि इन अति प्राचीन भग्नावशेषों की सही उम्र का पता लगाने हमने अत्याधुनिक कार्बन डेटिंग पद्धति सी-14 का उपयोग किया। लखनऊ स्थित लेबोरेटरी में कई भग्नावशेषों का वैज्ञानिक परीक्षण कराया गया। टीम के वैज्ञानिकों में साइंटिस्ट, पुरातत्वविद्, लिपि विशेषज्ञ, मूर्तिकला विशेषज्ञ, मंदिर स्थापत्यकला विशेषज्ञ, वास्तुविद्, ड्राइंग एवं सर्वे विशेषज्ञों के अलावा रसायनज्ञ भी थे। विशेषज्ञ रोज सुबह उत्खनन में जुट जाते थे और देर रात रिपोर्ट तैयार कर अलसुबह तीन बजे तक रिपोर्ट दिल्ली भेज देते थे। पहले वॉल्यूम में 300 पेज की रिपोर्ट और दूसरे हिस्से में उत्खनन के दौरान मिले साक्ष्यों के सैकड़ों फोटोग्राफ्स, स्कैच और ड्राइंग आदि संलग्न किए गए हैं।


 श्री के के मोहम्मद यह वही व्यक्ति हैं जिसके आधार पर आज भारत के सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला लेना पड़ा
अयोध्या में राम जन्मभूमि के मालिकाना हक़ को लेकर 1990 में पहली बार पूरे देश में बहस ने जोर पकड़ा था। इसके पहले 1976-77 में पुरातात्विक अध्ययन के दौरान अयोध्या में होने वाली खुदाई में हिस्सा लेने के लिए मुझे भी भेजा गया। प्रो बीबी लाल की अगुवाई में अयोध्या में खुदाई करने वाली आर्कियोलॉजिस्ट टीम में दिल्ली स्कूल ऑफ आर्कियोलॉजी के 12 छात्रों में से एक मैं भी था। उस समय के उत्खनन में हमें मंदिर के स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों से बनाया हुआ आधार देखने को मिला। हमें हैरानी थी कि किसी ने इसे कभी पूरी तरह खोदकर देखने की जरूरत नहीं समझी। ऐसी खुदाइयों में हमें इतिहास के साथ-साथ एक पेशेवर नजरिया बनाए रखने की भी जरूरत होती है। खुदाई के लिए जब मैं वहां पहुंचा तब बाबरी मस्जिद की दीवारों में मंदिर के खंभे साफ-साफ दिखाई देते थे। मंदिर के उन स्तंभों का निर्माण ‘ब्लैक बसाल्ट’ पत्थरों से किया गया था। स्तंभ के नीचे भाग में 11वीं और 12वीं सदी के मंदिरों में दिखने वाले पूर्ण कलश बनाए गए थे। मंदिर कला में पूर्ण कलश 8 ऐश्वर्य चिन्हों में एक माने जाते हैं।

1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के ठीक पहले इस तरह के एक या दो स्तंभ नहीं, बल्कि कुल 14 स्तंभों को हमने करीब से देखा। उस दौरान भी वहां पर कड़ी पुलिस सिक्योरिटी हुआ करती थी और मस्जिद में प्रवेश मना था। लेकिन खुदाई और रिसर्च से जुड़े होने के कारण हमारे लिए किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं था। खुदाई के लिए हम करीब दो महीने अयोध्या में रहे। यह समझना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं था कि बाबर के सिपहसलार मीर बाकी ने कभी यहां रहे विशाल मंदिर को तुड़वाकर उसके टुकड़ों से ही बाबरी मस्जिद बनवाई रही होगी। खुदाई से मिले सुबूतों के आधार पर मैंने 15 दिसंबर 1990 को बयान दिया कि बाबरी मस्जिद के नीचे मंदिर के अवशेष को मैंने खुद देखा है। उस समय माहौल गरम था। हिंदू और मुसलमान दो गुटों में बंटे थे। कई नरमपंथियों ने समझौते की कोशिश की, लेकिन तब तक विश्व हिंदू परिषद का आंदोलन बढ़ चुका था। बाबरी मस्जिद हिंदुओं को देकर समस्या का समाधान करने के लिए उदारवादी मुसलमान तैयार थे, लेकिन इसे खुलकर कहने की किसी में हिम्मत नहीं थी। (वामपंथी इतिहासकारों ने किस तरह से इलाहाबाद हाई कोर्ट को इस केस में गुमराह करने की कोशिश की और उनके एक-एक झूठ की कोर्ट में कैसे पोल खुली, ये जानने के लिए पढ़ें: राम मंदिर केस में इतिहासकारों ने हिंदुओं को कैसे छपा)

बाबरी मस्जिद पर दावा छोड़ने से विश्व हिंदू परिषद के पास कोई मुद्दा नहीं रह जाएगा, कुछ मुसलमानों ने ऐसा भी सोचा। इस तरह के विचारों से समस्या के समाधान की संभावना पैदा होती। ऐसी स्थिति में इतिहास और पुरातात्विक खोजबीन समस्या सुलझाने में मददगार हो सकते थे। लेकिन खेद के साथ कहना पड़ेगा कि कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों की मदद करने के लिए कुछ वामपंथी इतिहासकार सामने आए और उन्होंने मुसलमानों को उकसाया वो किसी हाल में मस्जिद पर अपना दावा न छोड़ें। उन्हें यह मालूम नहीं था कि वे कितना बड़ा पाप कर रहे हैं। जेएनयू के केएस गोपाल, रोमिला थापर, बिपिन चंद्रा जैसे इतिहासकारों ने कहा कि 19वीं सदी के पहले मंदिर तोड़ने का सुबूत नहीं है। यहां तक कि उन्होंने अयोध्या को ‘बौद्घ-जैन केंद्र’ तक कह डाला। उनका साथ देने के लिए आरएस शर्मा, अनवर अली, डीएन झा, सूरजभान, प्रो. इरफान हबीब जैसे ढेरों वामपंथी इतिहासकार भी सामने आ गए। इनमें केवल सूरजभान पुरातत्वविद् थे। प्रो आरएस शर्मा के साथ रहे कई इतिहासकारों ने बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के विशेषज्ञ के रूप में कई बैठकों में भाग लिया। मतलब साफ है कि ये वामपंथी इतिहासकार समस्या सुलझाने के बजाय आग में घी डालने में जुटे थे।
6 दिसंबर 1992 को कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद के ढांचे को ध्वस्त कर दिया था।

बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी की कई बैठकें भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) के अध्यक्ष प्रो इरफान हबीब की अध्यक्षता में हुईं। कमेटी की बैठक परिषद के सरकारी दफ्तर में करने का तत्कालीन सदस्य सचिव और इतिहासकार प्रो एमजीएस नारायण ने कड़ा विरोध भी किया। लेकिन प्रो इरफान हबीब ने उसे नहीं माना। वामपंथी इतिहासकारों ने अयोध्या की वास्तविकता पर सवाल उठाते हुए लगातार लेख लिखे और उन्होंने जनता में भ्रम और असमंजस का माहौल पैदा किया। वामपंथी इतिहासकार और उनका समर्थन करने वाली मीडिया ने समझौते के पक्ष में रहे मुस्लिम बुद्घिजीवियों को मजबूर कर दिया कि वो अपने विचार त्याग दें। वरना आज भी मुसलमानों की अच्छी-खासी आबादी मानती है कि अयोध्या के धार्मिक महत्व को देखते हुए अगर मुस्लिम अपने पैर पीछे खींच लें तो देश के इतिहास में यह मील का पत्थर होगा। इससे आगे के लिए हिंदू-मुस्लिम झगड़ों की एक बड़ी वजह खत्म हो जाएगी। दोनों समुदायों के बीच आपसी अविश्वास भी खत्म होगा। लेकिन कॉमरेड इतिहासकारों ने यह होने नहीं दिया।

इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि हिंदू या मुस्लिम कट्टरपंथ से ज्यादा वामपंथी विचार देश के लिए खतरा हैं। सेकुलर नजरिए से समस्या को देखने के बजाय वामपंथियों की आंख से अयोध्या मामले का विश्लेषण एक बड़ी भूल साबित हुई। राष्ट्र को इसकी कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी, यह अंदाजा अभी लोगों को नहीं है। इतिहास अनुसंधान परिषद (ICHR) में समस्या का समाधान चाहने वाले कई लोग थे, लेकिन इरफान हबीब के सामने वो कुछ नहीं कर सके। इरफान हबीब ने आरएसएस की तुलना आईएस जैसे आतंकवादी संगठन से की थी। आईसीएचआर के ज्यादातर सदस्य उनसे सहमत नहीं थे, लेकिन विरोध में बोलने की हिम्मत किसी में नहीं हुई। अयोध्या मामले के पक्ष और विपक्ष में इतिहासकार और पुरातत्वविद् भी गुटों में बंटे हुए थे। बाबरी मस्जिद टूटने के बाद पड़े मलबे में जो सबसे महत्वपूर्ण अवशेष मिला था वो था-विष्णु हरिशिला पटल। इसमें 11वीं और 12वीं सदी की नागरी लिपि में संस्कृत भाषा में लिखा गया है कि यह मंदिर बाली और दस हाथों वाले (रावण) को मारने वाले विष्णु (श्रीराम विष्णु के अवतार माने जाते हैं) को समर्पित किया जाता है।

1992 में डॉ. वाईडी शर्मा और डॉ. केएन श्रीवास्तव के सर्वे में वैष्णव अवतारों और शिव-पार्वती के कुषाण जमाने (ईसा से 100-300 साल पहले) की मिट्टी की मूर्तियां मिली हैं। 2003 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बेंच के आदेश से हुई खुदाई में करीब 50 मंदिर-स्तंभों के नीचे के भाग में ईंटों से बनाया चबूतरा मिला था। इसके अलावा मंदिर के ऊपर का आमलका और मंदिर के अभिषेक का जल बाहर निकालने वाली मकर प्रणाली भी उत्खनन में मिली थी। यूपी में पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के डायरेक्टर की रिपोर्ट में कहा गया है कि बाबरी मस्जिद के आगे के भाग को समतल करते समय मंदिर से जुड़े कुल 263 पुरातात्विक अवशेष मिले हुए। खुदाई से मिली इन तमाम सबूतों के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग इस निर्णय पर पहुंचा कि बाबरी मस्जिद के नीचे एक मंदिर दबा हुई है। सीधे तौर पर कहें तो बाबरी मस्जिद इस मंदिर को तोड़कर उसके मलबे पर बनाई गई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने भी यही फैसला सुनाया था।

अयोध्या में हुई खुदाई में कुल 137 मजदूर लगाए गए थे, जिनमें से 52 मुसलमान थे। बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के तौर पर सूरजभान मंडल, सुप्रिया वर्मा, जया मेनन आदि के अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट का एक मजिस्ट्रेट भी इस पूरी खुदाई की निगरानी कर रहा था। जाहिर है इसके नतीजों पर सवाल उठाने का कोई आधार नहीं है? ज्यादा हैरानी तब हुई जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया तो भी वामपंथी इतिहासकार गलती मानने को तैयार नहीं हुए। इसका बड़ा कारण यह था कि खुदाई के दौरान जिन इतिहासकारों को शामिल किया गया था वो दरअसल निष्पक्ष न होकर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के प्रतिनिधि के तौर पर काम कर रहे थे। इनमें से 3-4 को ही आर्कियोलॉजी की तकनीकी बातें पता थीं। सबसे बड़ी बात कि ये लोग नहीं चाहते थे कि अयोध्या का ये मसला कभी भी हल हो। शायद इसलिए क्योंकि वो चाहते हैं कि भारत के हिंदू और मुसलमान हमेशा ऐसे ही आपस में उलझे रहें।

(लेखक केके मुहम्मद भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के उत्तरी क्षेत्र के क्षेत्रीय निदेशक रह चुके हैं। यह लेख उनकी किताब ‘मैं भारतीय हूं’ का एक संपादित हिस्सा है)

Comments

Parent said…
I have shared this.

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