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गौ रक्षा के प्रश्न 7 नवंबर 1966 के बाद आज भी अनुत्तरित क्यों, चाहे कोई सरकार हो
आज 7 नवम्बर है। आज ही के दिन 53 वर्ष पूर्व 7 नवम्बर 1966 को राजधानी दिल्ली में ‘आयरन लेडी’ इंदिरा गाँधी द्वारा संसद के सामने ‘गोहत्याबंदी’ के लिये शांतिपूर्ण जलूस निकालते हजारों निहत्थे गोभक्तों, जिनमें महिलाएँ, बच्चे, वृद्ध व साधु भी थे, को गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतार दिया गया। इस लेख को लिखने वाले उस खूनी मंजर का प्रत्यक्षदर्शी गवाह है, मैं उस दिन उस जलूस में शामिल था और वह खौफनाक मंजर मैंने स्वयं देखा है। ‘हिन्दुस्तान समाचार’ न्यूज एजेंसी के विशेष संवाददाता श्री मनमोहन शर्मा ने, जो संसद की कार्यवाही कवर करते थे, ने उस घटनाक्रम का आँखोदेखा निम्न वर्णन किया है--- ‘‘वह दृश्य भूला नहीं हूँ। सुबह के 8 बजे होंगे, संसद भवन के सामने एक विशाल जन-समूह एकत्र हो चुका था। संसद के ठीक सामने एक विशाल मंच बना था, मंच पर करीब ढाई सौ लोग बैठे थे, चारों पीठों के शंकराचार्य, करपात्री जी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, आर्यसमाज, नामधारी समाज के प्रमुख लोग वहाँ मौजूद थे। धार्मिक गीत गाते-बजाते जत्थे आते जा रहे थे। बच्चे, बूढ़े, महिलाएं सभी उन जत्थों में शामिल थे। कई महिलाओं की गोद में तो दूध पीते बच्चे थे। करीब 5 लाख लोग दिल्ली से बाहर के आये हुए थे। कुल मिला कर दोपहर 11 बजे तक सब कुछ अपनी लय में चल रहा था।’’ ‘‘मैं संसद के प्रेस-कक्ष में था, तभी शोर मचा कि बाहर गोलियाँ चल रही हैं। मैं तेजी से बाहर निकला, वहाँ मैंने देखा कि आँसूगैस का धुँआ चारों ओर फैला हुआ है। वह इतना घना था कि कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। गोलियाँ चल रही थीं, चारों तरफ कोहराम मचा था, कुछ साधु संसद भवन में प्रवेश की कोशिश में थे। कुल मिलाकर वह दृश्य भयावह था। तत्काल मैं लौट कर वापिस आया।’’ ‘‘संसद भवन के गेट पर हमारी भेंट गुलजारी लाल नंदाजी से हो गई, तब वे गृहमंत्री थे। मैंने उनसे कहा-‘‘नंदाजी! इस दृश्य को देख कर क्या आपको शर्म नहीं आ रही है? आप निहत्थे गोभक्तों पर गोलियाँ चलवा रहे हैं।’’ जवाब में नंदाजी ने कहा था-‘‘सुनो! मैंने गोलियाँ चलवाने के कोई आदेश नहीं दिये हैं। किसके आदेश से गोली चली हैं? यह मेरी जानकारी में नहीं है।’’ भीगा रुमाल चेहरे पर लपेट मैं बाहर निकला, वहाँ से पटेल चौक आया। रास्ते में हर तरफ शव पड़े हुए थे, इतने खून बह रहे थे कि मेरा जूता खून से पूरी तरह लथपथ हो गया था। चारों तरफ से लोगों के कराहने, चीखने-चिल्लाने की आवाजें आ रही थीं।’’ ‘‘मुझे खबर मिली कि दिल्ली में 7-8 जगहों पर गोलियाँ चली हैं। करीब 2 घंटे तक गोलियाँ चलती रहीं। मुझे अनौपचारिक तौर पर बताया गया कि करीब 11,000 राउंड गोलियाँ चलाई गई हैं। सूत्रों से यह भी पता चला कि गोलियाँ चलने से 2700 से 2800 लोगों की जान गई थी। पता चला कि शवों को दिल्ली के 4 अस्पतालों में रखा गया है। इनमें से एक विलिंगटन अस्पताल (राम मनोहर लोहिया अस्पताल) में मैंने शवों को गिना, कुल 374 शव थे, जिनमें 8 महिलाओं और 40-45 बच्चों के शव थे, वे सभी दूध पीते थे। शेष अस्पतालों में शवों को गिनने का अवसर नहीं मिला, सख्त निर्देश थे कि किसी को भीतर न आने दिया जाए।’’ ‘‘सेना ने उन सभी स्थानों को अपने कब्जे में ले लिया था जहाँ-जहाँ गोलियाँ चली थीं। मैं दफ्तर पहुँचा, वहाँ भारत सरकार का निर्देश पहुँच चुका था जिसमें कहा गया था कि वही छापना है जो सरकार की प्रेस विज्ञप्ति में लिखा है। उस विज्ञप्ति में लिखा था-‘‘गोली चलने से 16 लोग मरे।’’ अगले दिन के अखबारों में वही खबर थी।’’ ‘‘उस वक्त एक अन्य महत्वपूर्ण जानकारी मुझे मिली, वह यह कि ‘आईबी’ ने रिपोर्ट दी थी कि यदि जरूरत पड़ने पर दिल्ली पुलिस को गोली चलाने के आदेश दिये गए तो सम्भव है कि वह गोली न चलाएं। आईबी की इस सूचना के बाद जम्मू-कश्मीर मिलीशिया पुलिस को खास तौर पर दिल्ली में तैनात किया गया था। इसमें ज्यादातर मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग थे। जब गोली चलाने के आदेश दिये गये तो इस दल के सुरक्षाकर्मियों ने समझ-बूझ कर गोभक्तों को जान से मारने के लिए गोलियाँ चलाईं। उन्हें डराने या भगाने के लिए गोलियाँ नहीं चलाई गईं। इस बात को मैं इसलिए दावे से कह रहा हूँ, क्योंकि अधिकतर लोगों के शरीर पर जख्म के निशान कमर से ऊपर थे, जबकि अक्सर कमर से नीचे गोली चलाने के आदेश होते हैं।’’ ‘‘4 दिनों तक दिल्ली में कर्फ्यू लगा रहा। बाहर से आये आंदोलनकारियों को सेना के जवान बसों-ट्रकों में बिठा कर दिल्ली से बाहर जहाँ-तहाँ छोड़ने में जुटे रहे। सरकार को यह डर बना हुआ था कि जिन गोभक्तों ने अपनी आँखों के सामने लोगों को मरते देखा है, कहीं वे भड़क न जायें। उनके गुस्से से बचने का यही रास्ता सरकार ने निकाला था। मेरे पास इस बात की पक्की जानकारी थी कि काँग्रेसी सांसद शशि भूषण वाजपेयी ने अपने गुंडों को लगा कर हिंसा भड़काई थी। हिंसक वरदातों को अंजाम देने के लिए पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से गुंडे बुलाये गए थे। घटना के 3 दिन बाद आत्मग्लानि में डूबे गुलजारी लाल नंदा ने कहा, ‘‘मैं साधुओं का खून अपने सिर पर नहीं ले सकता।’’ उन्होंने गृहमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।’’ (यथावत, 1-15 नवम्बर 2016 में प्रकाशित लेख के हूबहू अंश) संकलन अजय कर्मयोगी
गणित के विभिन्न क्षेत्रों में भारत का योगदान प्राचीनकाल तथा मध्यकाल के भारतीय गणितज्ञों द्वारा गणित के क्षेत्र में किये गये कुछ प्रमुख योगदान नीचे दिये गये हैं- आंकगणित : दाशमिक प्रणाली (Decimal system), ऋण संख्याएँ (Negative numbers) (ब्रह्मगुप्त देखें), शून्य (हिन्दू अंक प्रणाली देखें), द्विक संख्या प्रणाली (Binary numeral system), स्थानीय मान पर आधारित संख्या आधुनिक संख्या निरूपण, फ्लोटिंग पॉइंट संख्याएँ (केरलीय गणित सम्प्रदाय देखें), संख्या सिद्धान्त , अनन्त (Infinity) (यजुर्वेद देखें), टांसफाइनाइट संख्याएँ (Transfinite numbers), अपरिमेय संख्याएँ (शुल्बसूत्र देखें) भूमिति अर्थात भूमि मापन का शास्त्र : वर्गमूल (see Bakhshali approximation), Cube roots (see Mahavira), Pythagorean triples (see Sulba Sutras; Baudhayana and Apastamba state the Pythagorean theorem without proof), Transformation (see Panini), Pascal's triangle (see Pingala) बीजगणित: Quadratic equations (see Sulba Sutras, Aryabhata, and Brahmagupta), Cubic equations and Quartic equations (b...
प्रश्न यह है कि फिरोज कोई, ऐसे थोड़े झोला उठाकर बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रवेश कर दिया है उसके लिए बकायदा नियम कानून और यहां के बुद्धिजीवियों के और बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के सारे मापदंडों को पूर्ण करते हुए वह यहां तक पहुंचा है। प्रश्न यह है कि यह ऐसा नियम कानून और मापदंड स्थापित करने वाले कौन हैं जो भारत की अस्मिता को समाप्त करना चाह रहे हैं जो भारत की सनातन परंपरा को नष्ट करना चाह रहे हैं हालांकि गलती तो उसी समय हो गई थी जब अपनी गुरुकुल व्यवस्था का त्याग करके और अंग्रेजों की आधुनिक शिक्षा के माध्यम से एक बड़ा संस्थान बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी बनाई गई है उसी समय इस सनातन परंपरा के नष्ट होने का बीज डाल दिया गया था यह तो अब उसके फलअश्रुति हैं हम लोग केवल परिणाम पर छाती कूटते हैं कारण और निवारण पर कोई ध्यान नहीं रहता है बोय पेड़ बबूल का तो आम कहां से होय कहीं यही हालत राम मंदिर निर्माण का भी ना हो इसलिए सजगता आज से ही जरूरी है और श्रेष्ठ परंपरा के वाहक तेजस्वी पुरुष चयन अगर हो पाता है तू ही विश्व गुरु भारत के संकल्पना साकार हो सकती है नहीं तो अपने अपने पा...
जब हमारे श्रेष्ठ भारत का नाम कहीं बदनाम होता है।क्या बतायें जब शिक्षित वेश्यावृत्ति करता है बस ह्रदय दुखता है।क्योंकि कुछ ही दसक पहले हमारे यहां7लाख 32हजार गुरूकुल हुआ करते थे।समस्त संसार की मानव जाति हमसे ही सीखती थी कि शिक्षा क्या होती है।और अब हम अपनी मानसिकता से इतना विकृत हो चुके हैं कि क्या बतायें कुछ कहते नहीं बनता।पर इतना जरूर कहूंगा हमारे भारत की मूल गुरुकुल शिक्षा ही सभी समस्याओं से मुक्त करती है व मानव को महामानव बनाती थी। एक ही समाधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान विश्व हिन्दी दिवस प्रति वर्ष 10 जनवरी को मनाया जाता है. इसका उद्देश्य विश्व में हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए जागरूकता उत्पन्न करना तथा हिन्दी को अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करना है. अजय कर्मयोगी: https://m.youtube.com/watch?v=JixMEQ2kehU , https://m.youtube.com/watch?v=JseQIWhJ7xk , https://m.youtube.com/watch?v=JixMEQ2kehU , https://m.youtube.com/watch?v=IFmv2YFApQk ...
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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद