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पांच ऐसे धन जिस पर किसी सरकार का और उसके demonetisation का कोई प्रभाव नहीं पड़ता

     


विद्या धनं सर्वधनं प्रधानम''
यह बात शास्त्रों में हजारों साल पहले मनुष्य को जीवन जीने का  एक महत्वपूर्ण  दर्शन हमारी भारतीय ज्ञान  में समाहित था मनुष्य की पंचकोशी विकास में 5 धन बताए गए (1) विद्या (2)आरोग्य या स्वास्थ्य यह दोनों धन कोई किसी से लेन देन नहीं कर सकता एक पिता अपने पुत्र को भी नहीं दे सकता स्वयं के पुरुषार्थ से ही इस धन की प्राप्ति हो सकती है इस लेनदेन के क्रम पहला में प्रथम धन गऊ धन संपूर्ण धन में तीसरा स्थान गोधन का है चौथा पशुधन जिसमें गाय के अलावा सारे पशु जिसमें हाथी घोड़ा ऊंट बकरी यह सब आ जाते हैं चाहे कोई सरकार का डिमॉनेटाइजेशन हो इस पर लागू नहीं होता इसकी वैल्यू हमेशा बढ़ती रहती है पांचवा और अंतिम हीन( निम्न)धन  जिसे आप रतन धन भी कहते हैं क्योंकि यह धरती जिसे मां  कहते हैं उसको नोच कर खोदकर नीचे से निकाला जाता है आज उसी ही धन के लिए धरती मां को विच्छेदन करके धनी बनने का नाटक करते हैं
🗳  धन का अर्थ है अभि वर्धक यानि बढ़ने वाला भूमि धन है क्योंकि 1बीज मक्के से 3 माह में पंद्रह सौ से 2000 दाने बना देती है ,बाजरा तीन से 5000 दाने बना देती है इसीलिए भूमि धन है , गाय धन है ,पशुधन है, वृक्ष - वनस्पतियां धन है यही जीवन निर्वाह के लिए उपयोगी व काम आते हैं स्वर्ण चांदी धातु स्वास्थ्य के लिए उपयोगी है अत: धन है लेकिन विश्व व्यवस्था ने ,आर्थिक शक्तियों  ने कागज के नोट छाप कर आज उसकी महत्ता इस वास्तविक धन से ऊपर कर दी | आपके पास कागज के नोट आ जाए तो आप सब कुछ खरीद सकते हैं बुद्धिमानों ने कागज नोट छाप कर या तिकडमों से कमाकर संसार के सारे धन साधनों पर कब्जा कर लिया व दुनिया की नजरों में वैभव -विलास व प्रदर्शन की चमक-दमक से बड़े आदमी बन बैठे | इन्हीं नोटों के बल पर हर वस्तु धन-धान्य, मेवा- मिष्ठान, कपड़ा- लत्ता, सोना- चांदी, गाड़ी- घोड़ा, हीरे- जवाहरात', भव्य भवन, नौकर- चाकर, धर्मकथा व धर्माचार्य ,राज्य व्यवस्था व राजनेता ,महंगी चिकित्सा- चिकित्सक,
 कला व कलाकार सब कुछ जो भी भौतिक जगत में साधन सुविधायें है प्राप्त कर ली  तथा संसार के जनसामान्य से अलग हो इंद्र व कुबेर के वैभव की अलग दुनिया बसाली है | परिणाम वैभव विलास के सारे सरंजाम को देखकर आम आदमी इन्हीं कागज के नोटों के पीछे दौड़ पड़ा | जो जी तोड और ईमानदारी से श्रम करते हैं पर गुजारे भर के निर्वाह भर के पैसे मिल पाते है इसलिए समाज का प्रत्येक व्यक्ति कागज के नोट प्राप्त करने के सस्ते ,श्रम शीलता रहीत, यथाशीघ्र धनपति बनाने के मार्ग खोजने लगा और इसी आर्थिक व्यवस्था के दर्शन ने देश व समाज में जितनी भी विकृतियां हैं फैलाई है | इसी दर्शन से भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, मिलावट कम माप तोल, चोरी ,डकैती ,छल ,छद्म, धोखा, प्रपंच ,कपट, झूठ, फरेब है  कुकर्म है कराये हैं | विशेषकर शिक्षित युवा पीढ़ी तो
 *कामचोर* (यानि काम न करना पड़े)
 *हरामखोर*(यानि बिना श्रम के नोट जैसे भी मिले भरपूर मिल जाए) बन गई है इसी दर्शन में श्रमशील को घटिया व श्रमशीलता  को मूर्खतापूर्ण घोषित कर दिया | हरामखोर व काम चोरों को योग्य व समझदारों का दर्जा दे दिया |
 *परिणाम* सर्वत्र काम करने वालों की पुकार है उसके लिए हाहाकार मचा है पर काम करने वाले लोग नहीं है | दूसरी तरफ बेरोजगारों की फौज खड़ी है वह न समझदार है, न ईमानदार है,न जिम्मेदार है ,न बहादुर है | यह पीढ़ी शक्तिहीन दोष दुर्गुणों के महासागर में गोते लगा रही है यह पीढ़ी देश ,समाज व राष्ट्र के लिए क्या करेगी? जो अपनी जिंदगी की लाश ढो रही है |
👏अतः हे समाज के मूर्धन्य राजनेताओं, समाज शास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों ,सोचो ! व धन के दर्शन को बदलो | 👉क्या आप असली धन को महत्व देंगे ?
 **यदि हां* तो 👉लौट चलो गांव की ओर
☝ लौट चलो प्रकृति की ओर
🌽लौट चलो कृषि की ओर
☀लौट चलो संस्कृति की ओर
नहीं तो विनाश आपके द्वारे खड़ा है
 *फैसला आपको करना है* शानदार तरीके से जीना है या घुट घुट के मरना है?
अज्ञान ही सभी दुखों का कारण होता है आज जो ज्ञान की व्यवस्था स्कूल कॉलेज यूनिवर्सिटी के माध्यम से चल रही है वही एक अपराध की वीजारोपड़ अबोध मन पर हो जाता है और जीवन एक अंतहीन कंपटीशन की तरफ बढ़ जाता है और इस कंपटीशन का परिणाम अपराध ही होता है यह सब गुलामी व्यवस्था की देन है
अपराध को ताकत से खत्म नही किया जा सकता , कित्ती भी ताकत लगा लो । फासियाँ दो , इनकाउंटर करो , जेल बनाओ कुछ करो , अपराध तो बढ़ता ही जायेगा । अपराध को खत्म करने के लिए तो एक व्यवस्था का निर्माण किया जा सकता है , जो प्रेम और सौहार्द को आधार मानकर बनाई जाए , जिसमे कला हो , संस्कृति हो , और जो प्रतिस्पर्धा (कॉम्पटीशन) मुक्त समाज बनाये और सबसे महत्वपूर्ण बात पहले उस व्यवस्था में सभी के लिए आर्थिक सुरक्षा का वातावरण हो । आज की आधुनिक व्यवस्था में सबसे पहले तो बैंकिंग और मौद्रिक सिस्टम कर्ज़ आधारित सिस्टम है जो कभी भी आर्थिक सुरक्षा का माहौल नही बनने देगा । दूसरा यह पूरी व्यवस्था एकरूपता की ओर बढ़ रही है जिसमे संस्कृतियों का नाश हो रहा है । और तीसरा इस व्यवस्था का लक्ष्य सबको नौकर बना देना है इसलिए सबके काम की मात्रा और काम करने का समय पूर्वनिर्धारित होता है इसलिए इसमें कलाएं भी पनपना बंद हो गईं हैं । चौथा सबको आर्थिक सुरक्षा न दे पाने की वजह से यह व्यवस्था कॉम्पटीशन पैदा कर रही है । इसमें सबके लिए जगह नही है । यह पूरी व्यवस्था अधर्म की व्यवस्था है इसलिए इस व्यवस्था के समर्थन में स्वेच्छा से किया गया हर कर्म अधर्म का कर्म है इसलिए वो विकर्म बन जाता है । चाहे वो टैक्स देना ही क्यों न हो । इस व्यवस्था का समर्थन करते हुए शांति की कामना के साथ देवालयों (मंदिर-मस्जिदों) में दिया गया धन भी आपको पुण्य का नही बल्कि पाप का भागीदार बनाएगा । इसे समझिए और इस व्यवस्था के खिलाफ शांतिपूर्ण ढंग से खड़े होइए । यही वर्तमान का धर्म है । शुभ रात्रि , वन्देमातरम
यदि आप अपने बच्चों को श्रेष्ठ धन की अभिवृद्धि चाहते हैं स्वस्थ आनंद और सुखी परिवार की कल्पना  को साकार करना चाहते हैं  तो इस गुरुकुल महा अभियान के अंग बनकर पुन: विश्व गुरु और श्रेष्ठ भारत का उदय यदि चाहते हैं तो संपर्क करें अजय कर्मयोगी 93369 19081

Comments

D. S. said…
यही सही है। यही सत्य है।
धन्यवाद अजय जी कर्मयोगी।
शुभकामनाये।
Anonymous said…
Wa wa Abhinandan

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