आज मदन मोहन मालवीय जी की आत्मा की स्वयं उन्हें भी धिक्कार रही होगी कि मैंने क्यों इस अंग्रेजी पद्धति का इतना बड़ा शिक्षण संस्थान शुरू किया ?जो हमारे धर्मों पर ही आघात करेगा
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय (SVDV) के साहित्य विभाग में एक मुस्लिम सहायक प्रोफेसर डॉ. फिरोज खान की नियुक्ति 5 नवम्बर को हुई।संकाय के विद्यार्थियों को जैसे ही इसकी जानकारी हुई इस नियुक्ति के खिलाफ विश्वविद्यालय में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया और पिछले कई दिनों से लगातार छात्रों द्वारा विश्वविद्यालय परिसर में कुलपति के आवास के सामने धरना जारी है। लेकिन, तमाम मीडिया समूहों ने इस न्यूज़ को ऐसे चलाया जैसे पूरे BHU में मुस्लिम टीचर की नियुक्ति का विरोध हो रहा है। ऐसा बिलकुल नहीं है। अलीगढ़ के तर्ज पर बेशक BHU के नाम में कुछ समानताएँ हो लेकिन वहाँ किसी का सिर्फ मुस्लिम होने की वजह से विरोध कभी नहीं हुआ। फिर इस बार ऐसा क्या है कि इस नियुक्ति को रद्द करने की माँग SVDV के छात्र कर रहे हैं। दरअसल यह विरोध एक गैर-हिन्दू का ‘धर्म-विज्ञान संकाय’ में नियुक्ति का विरोध है। अगर यह नियुक्ति विश्वविद्यालय के ही किसी अन्य संकाय में संस्कृत अध्यापक के रूप में होती तो विरोध नहीं होता। विरोध का मूल इस विशेष संकाय में गैर-हिन्दू की नियुक्ति में निहित है। और विरोध करने वाले छात्र परम्परावादी हिन्दू हैं जो सनातन हिन्दू परम्पराओं, वेद, वेदांग, कर्मकाण्ड, ज्योतिष के प्रति पूरी श्रद्धा और भाव से समर्पित हैं और अब इस प्रकरण के बाद अपने भविष्य को लेकर आशंकित भी हैं। वास्तव में इस विरोध को समझने के लिए संकाय की संरचना को समझने की भी जरूरत है। ‘संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय’ यह पूरा नाम है, जिसमें दो हिस्से हैं। पहला ‘संस्कृत विद्या’ और दूसरा ‘धर्म विज्ञान’ (Theology)। समझने की बात यह है कि ‘संस्कृत विद्या’ कोई भी किसी भी धर्म का व्यक्ति पढ़-पढ़ा सकता है। लेकिन ‘धर्म विज्ञान’ की बात जब कोई दूसरे धर्म का व्यक्ति करे जिसका उन सनातन मूल्यों में कोई भरोसा ही न हो तो उसमें वह विश्वसनीयता नहीं रह जाती जिसकी जरुरत है।इसी कारण से यह संकाय भारत के अन्य संस्कृत संकायों/विभागों से भिन्न है। ‘हिन्दू’ विश्वविद्यालय में मालवीय जी ने इस संकाय की स्थापना संस्कृत विद्या के संरक्षण-संवर्धन के लिए इस उद्देश्य से किया कि हिन्दुओं की धार्मिक मान्यताओं के वैज्ञानिक स्वरूप की व्याख्या की जा सके। जब किसी हिन्दू धार्मिक मान्यता को (इस्लामिक और इसाई संगठनों द्वारा पोषित) वामपंथी या कोई अन्य तथाकथित बुद्धिजीवी दकियानुसी कह कर मजाक उड़ाता है तब इस संकाय की जिम्मेदारी होती है कि ये उस धार्मिक मान्यता का वैज्ञानिक पक्ष सबके सामने रखे। अगर आप इस संकाय में गये हों तो आपको याद होगा कि संकाय के मंदिरनुमा भवन के प्रवेश द्वार पर दो स्तंभों पर शंकर-पार्वती की मूर्तियाँ स्थापित हैं जिनका संस्कृत विद्या धर्म संकाय के अधिकांश प्रोफेसर्स प्रदक्षिणा करते हुए संकाय में प्रवेश करते हैं। क्या ऐसा तब भी होगा जब इस संकाय में आज-कल कई सारे मुस्लिम प्रोफ़ेसर होंगे। आपको शायद न पता हो कि BHU के इसी संकाय से प्रकाशित होने वाला ‘विश्व हिंदू पंचांग’ पूरे विश्व के हिन्दू धर्म के तिथि त्योहार सम्बन्धी सभी विवादों का समाधान करता है। लेकिन, आज दुर्भाग्य यह है कि इसके बारे में हिन्दू विश्वविद्यालय के बहुत सारे लोग ही नहीं जानते। और तब की सोचिए जब आज से 20 साल बाद गैर हिन्दू लोग यहाँ संकाय-प्रमुख और विभागाध्यक्ष होंगे तब हिन्दू-परम्पराओं की न जाने क्या-क्या और कैसी-कैसी व्याख्याएँ की जाएँगी। फिर जब बीएचयू के शिलालेख पर लिखा है कि संस्कृत विद्या धर्म संकाय में ‘गैर हिंदू’ ना ही अध्ययन कर सकता है और ना ही अध्यापन तो एक मुस्लिम की नियुक्ति क्यों की गई?दरअसल यह विश्वविद्यालय के कानून के दुरुपयोग का मसला है। नियुक्ति के समर्थकों का कहना है कि बीएचयू के संविधान में ऐसी नियुक्तियों की कहीं मनाही नहीं है।सच है कि संविधान में मनाही नहीं है।लेकिन क्या संकाय में लगे शिलालेख को कानून या विश्वविद्यालय के संविधान का हिस्सा नहीं माना जायेगा?अगर नहीं तो फिर वह शिलालेख अभी तक वहां क्यों रहने दिया गया?और अगर वह शिलालेख आज भी वहां बदस्तूर उपस्थित है तो नियुक्ति तथा संकाय में प्रवेश इत्यादि भी उसपर लिखित आदेशों के अनुकूल ही होने चाहिये

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद