5 साल पहले तक मुझे भी मीडिया पर ग़ुस्सा आता था जबसे वॉलमार्ट ने लिखित और पर स्वीकार किया कि भारत के लोगों को एजुकेट करने के लिए सैकड़ों करोड़ खर्च किया क्योंकि मैं मानता था कि भारत का मीडिया (फिल्म टेलीविज़न प्रिंट इलेक्ट्रोनिक सहित सभी) बिकाऊ है, झूठी ख़बरें दिखाता है आदि आदि । फिर मैंने अमेरिका के द्वितीय राष्ट्रपति थोमस जेफरसन का बयान पढ़ा और तब से मुझे मीडिया पर ग़ुस्सा नही आता , पर ख़ुद पर हँसी आती है कि मैं कितना बेवक़ूफ़ था !! बहरहाल 5 वर्षों से न तो मैं टीवी देखता हूँ, न ही अख़बार पढ़ता हूँ । टीवी और अख़बार से सूचना लेना बिलकुल ही छोड़ दिया । नीचे मीडिया से सम्बंधित कुछ वक्तव्य दिए गए है, जिन्हें आधार में रखकर जब आप किसी भी चीज़ को समझेंगे तो सबसे बेहतर तरीक़े से समझ पाएँगे ।
समाचार पत्रों में सिर्फ़ विज्ञापन ही सच्चे होते है — जेफरसन , 1810.
सभी राजनैतिक ख़बरों के लिए भुगतान किया जाता है, और सबसे अधिक भुगतान उन खबरो के लिए किया जाता है, जिन्हें दिखाना बेहद ज़रूरी था, किंतु नही दिखाया गया — जेफरसन , 1820.
जो व्यक्ति समाचार पत्र नही पढ़ता उसके पास ज़्यादा सच्ची ख़बरें होती है — (कथन किसका है, ठीक से याद नही) शायद जार्ज बर्नार्ड शॉ का है।
और अंत में — मीडिया ख़बरें छुपाने के कारोबार में है !!
दरअसल मीडिया का सही नाम पैड मीडिया है , और सबसे गम्भीर समस्या यह है कि पैड मीडिया में विज्ञान-गणित को छोड़कर कक्षा 1 से मास्टर डिग्री और PHD तक की सभी पाठ्यपुस्तकें शामिल है !!! मतलब जो जितना ज़्यादा शिक्षित है और जिसने जितनी ज़्यादा किताबें पढ़ी है या पढ़ता है, वह उतना ज़्यादा पैड मीडिया की चपेट में होता है। और पढ़े गए इस कचरे को दिमाग़ से निकालना सबसे मुश्किल है । बरसो लग जाते है निकलने में । तब आपको अहसास होता है कि हम इंसान नही है, हम जेहनी तौर पर पैड मीडिया का एक प्रोडक्ट है !!
बहरहाल मैंने तो 5 वर्ष से “ज्ञान देने” वाली किताबें भी पढ़ना भी छोड़ दिया है ।
आपका ध्यान समस्या से हटाना ही राजनीति है !! आपके पैरों में दर्द हो और कोई जोरं का घूंसा मुह पर मार दे तो कुछ देर के लिए आप पैरों के दर्द को भूल जाएंगे। #बस यही राजनीति है। #इस लेख को पूरा पढ़ कर ही विचार व्यक्त करें मूर्ख, दिमाग से पैदल और चरनचाटु लोग दूर रहे यह उनके लिए नही है। राजनीति को सत्ता के लालच से जोड़ कर देखा जाता है, इसीलिए अपना नैतिक मापदंड बनाए रखने के लिए कई संघठन गैर राजनेतिक गतिविधियाँ संचालित करते है, जैसे #सेवा_दल #संघ अर्थात लेकिन उनके लक्ष्य हमेशा राजनैतिक होते है । जनता में राजनैतिक विवेक पनपने से राजनैतिक सत्ताओ को चुनोती मिल सकती है, इसलिए कार्यकर्ताओं का टाइम पास करने के लिए उन्हें निस्वार्थ सेवा के ऊँचे आदर्श में उलझा दिया जाता है । . राजनैतिक दल पेड मीडिया, पेड बुद्धिजीवीयों, पेड स्तंभकारो, पेड पाठ्य पुस्तक लेखको की सहायता से आम जन के राजनैतिक विवेक को परिपक्व करने वाली सूचनाओं को बाधित कर देते है। इस से शासको के लिए शासन करना आसान हो जाता है । . उदाहरण 1 : जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के बाद देश की अवाम में भारी असंतोष पनपने लगा था। महात्मा लाला लाजपत राय, और महात्मा सचिन्द्र नाथ सान्याल के नेतृत्व में महात्मा भगत सिंह, महात्मा चन्द्र शेखर आज़ाद, महात्मा बटुकेश्वर दत्त तथा महात्मा राजगुरु जैसे हज़ारो युवाओ का मोहन गांधी से मोहभंग हुआ, और युवा राजनेतिक गतिविधियों में रूचि लेने लगे । ये क्रांतिकारी रऔर पूर्ण स्वराज्य की माग कर रहे थे । इनकी बढ़ती लोकप्रियता लाखों युवाओं में राजनेतिक विवेक का संचार कर सकती थी । निदान : अंग्रेजो के निर्देश पर जवाहर लाल और मोहन गांधी ने 1924 में 'सेवा दल' की स्थापना की । इस दल के कार्यकर्ताओं को राजनेतिक गतिविधियों में भाग न लेने की शपथ दिलाई गयी । . सेवा दल ने लाखों कार्यकर्ताओं को सुबह व्यायाम करने, जन जागरण और समाज सेवा जैसे अनुपयोगी कार्यो में इसीलिए उलझा दिया ताकि, कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट हो जाए, और पूर्ण स्वराज्य की मांग करने वाले क्रान्तिकारियो को कार्यकर्ता नही मिल सके । . उदाहरण 2 : ये विनायक दामोदर सावरकर ही थे, जिन्होंने भारत में सर्वप्रथम हिन्दू राष्ट्रवाद की अवधारणा व्यक्त की थी। 1922, तुर्की के खिलाफत आन्दोलन के दौरान मोहन गांधी आज़ादी की लड़ाई को हाशिये पर धकेल कर खिलाफत आन्दोलन में कूद गए थे । यह वाकयी में एक अजीब स्थिति थी। मोहन के इस कदम से हिन्दू नाराज हुए और हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण होने लगा । इसी दौरान सावरकर अखिल भारतीय हिन्दू महासभा के तहत राजनेतिक संघठन खड़ा करके चुनावी समर में उतरने की तैयारी में थे । यदि ऐसा होता तो मोहन गांधी और जवाहर लाल का युवाओं को चरखे, बकरी का दूध, खादी, भजन, अनशन और साफ़ सफाई में उलझाए रखने का कार्यक्रम खटाई में पड़ सकता था, जिस से ब्रिटिश साम्राज्य की नीवें हिल जाती । निदान : अंग्रेजो की अनुमति से सिंधिया राजवंश ने एक छद्म हिन्दू वादी अराजनेतिक संगठन 'X' को खड़ा करने के लिए धन मुहैया कराया, ताकि हिन्दू महासभा को तोड़ा जा सके । . संघठन X ने सिंधिया तथा अन्य देशी राजाओं से प्राप्त चंदो से लाखो हिन्दू कार्यकर्ताओं को खींच कर हाफपेंट पहनकर परेड करने, लाठी चलाना सीखने*, राष्ट्र भक्ति के गीत गाने, ध्वज वंदन करने और नारे लगाने जैसे अनुपयोगी कार्यो में उलझा लिया । हिन्दू महासभा को कार्यकर्ता और चंदे मिलने बंद हो गए, और यह संघठन टूट गया । चूंकि वीर सावरकर राजनेतिक लक्ष्यों के लिए हिन्दुओ को संघठित कर रहे थे, इसलिए हमेशा अंग्रेजो के निशाने पर रहे, और उन्हें अपने जीवन का अधिकाँश सलाखों में बिताना पड़ा । * 1857 की क्रान्ति इसलिए असफल हुयी थी क्योंकि अधिकाँश भारतीयों के पास लाठियां थी जबकि अंग्रेजो के पास बंदूके। अत: ब्रिटिश चाहते थे कि उनका कठपुतली संघठन X युवाओं का ध्यान शस्त्र से हटा कर लाठी प्रशिक्षण पर बनाए रखें । . कोई आश्चर्य नहीं कि संघठन X ने कभी हिन्दुओ के सशस्त्रिकरण की मांग नही की, पूर्ण स्वराज्य की मांग का समर्थन नही किया, अंग्रेजो को भगाने के किसी आन्दोलन में न हिस्सा लिया न युवाओं को लेने दिया । यहाँ तक कि 1946 में हुए नौ सेना विद्रोह को भी समर्थन नही दिया । . इस समय भारत एक अजीब स्थिति से गुजर रहा था, जिसमे एक और मोहन और जवाहर युवाओं को अनशन और चरखे से जबकि X परेड और लाठियों से आज़ादी लाने का विश्वास दिला रहे थे ( और दिला भी चुके थे), वही दूसरी और देश में कार्यकर्ताओं के अभाव से जूझ रहे राष्ट्रपिता महात्मा सुभाष चन्द्र बोस देश से बाहर जाकर कार्यकर्ताओं को इकठ्ठा कर के दुनिया की सबसे ताकतवर सेना से लड़ने के लिए फ़ौज खड़ी कर रहे थे । ब्रिटिशर्स ने पेड मिडिया के माध्यम से मोहन को महात्मा बना दिया, ताकि अहिंसा का प्रसार हो, जबकि हथियारों और सेना का महत्त्व समझने वाले बोस, भगत, आजाद आदि महात्माओं को धन और कार्यकर्ताओ के अभाव से झूझना पड़ा । . उदाहरण 3 : आजादी बचाओ आन्दोलन के प्रणेता महात्मा राजीव भाई दिक्षित 1985 से ही स्वदेशी का प्रचार कर रहे थे । पिछले 100 वर्ष में वो अकेले शख्स है जिन्होंने लाखों कार्यकर्ताओं को राजनेतिक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण सूचनाएं दी । व्यवस्था परिवर्तन के तथा विदेशी शासको से भारत की मुक्ति के लिए वो पूरे देश में घूम घूम कर 25 वर्ष तक राजनेतिक जन आन्दोलन की जमीन तैयार करते रहे । उन्होंने लाखों नागरिको को FDI के दुष्प्रभाव से परिचित कराया कि, कैसे FDI जनित विकास भारत को फिर से ग़ुलाम बना देगा । . निदान : चूंकि राजीव भाई राजनेतिक आन्दोलन खड़ा कर रहे थे, अत: इसे तोड़ने के लिए आरएसएस ने स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना की । आरएसएस, बीजेपी और धनिको से प्राप्त सरंक्षण और अनुदान से जागरण मंच ने लाखों कार्यकर्ताओं को अपनी और खींचा और बीजेपी को सत्ता हासिल हुयी, 1999 में सत्ता में आते ही बीजेपी ने स्वदेशी के मुद्दों को दरकिनार कर दिया । . मध्यांतर में राजीव भाई ने भारत स्वाभिमान ट्रस्ट का मंच को खड़ा करने में अपनी पूरी ऊर्जा को लगा दिया जिससे उनके अपने जैसे अनेक कार्यकर्ता जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन लगाया था दोनों संत देश में राजनेतिक आन्दोलन की जमीन तैयार करने लगे । चूंकि राजीव भाई राजनेतिक दलों/धनिको/मिडिया/मिशनरीज़/MNCs आदि के लिए बेहद खतरनाक तथा प्रजा के लिए अनूकुल साबित होने वाले 'राईट टू रिकाल' कानूनों की मांग कर रहे थे, अत: 2010 में उनकी 'रहस्यमयी' परिस्थितियों में मृत्यु हो गयी । स्वामी रामदेव ने आन्दोलन को जारी रखने का प्रयत्न से ज्यादा अपने कारपोरेट साम्राज्य को स्थापित करने में और सनातन की परंपराओं को छिद्राअन्वेषण करने में ही लगा दिया किन्तु इधार बाबा रामदेव को तोड़ने के लिए MNCs ने पेड मिडिया के सहयोग से अन्ना एंड केजरीवाल कम्पनी को देश के मानस पर छाप दिया, जिस से स्वामी जी नेपथ्य में धकेल दिए गए । . 2014 के चुनाव आते आते बाबा रामदेव के हौसले टूट चुके थे, अत: उन्होंने राजनेतिक दल/आन्दोलन खडा करने का विचार त्याग दिया, और काले धन के बीहड़ में गुम हो गए । . हाईजेक्ड सोशल मिडिया और पेड मिडिया के माध्यम से तेजी से लोकप्रिय होते जा रहे मोदी साहेब के सामने बाबा रामदेव ने समर्पण कर दिया/उन्हें करना पड़ा । आज बाबा स्वदेशी के नाम पर अपने तेल साबुन का कारोबार निर्द्वद्व चला रहे है, जबकि मोदी साहेब ने सत्ता में आते ही FDI की गति अपनी पूर्ववर्ती सरकारों से 4 गुना कर दी है। जबकि राजीव भाई के अन्य अनुयायी/कार्यकर्ता अपने अपने तरीके से आयुर्वेद, गाय बचाओ और स्वदेशी कृषि अनुसंधानों में कार्यकर्ताओं को खपा दे रहे है । . . ज़्यादातर बड़े समाज सेवी संघठन सत्ता में सेंध लगाने का ही कार्य करते है । यह कोयले की दलाली के बावजूद हाथ काले न होने देने का एक पैंतरा है । आरएसएस, विहिप, भारत स्वाभिमान ट्रस्ट तथा इन जैसे अन्य भारी भरकम गैर राजनेतिक संघठन समाज सेवा के नाम पर लाखो करोड़ो कार्यकर्ताओं को आकर्षित करते है, तथा उनकी मदद से परोक्ष राजनेतिक ताकत हासिल करते है । इसमें फायदा यह होता है, कि राजनेतिक दल इन अराजनेतिक संघठनो के भ्रमित कार्यकर्ताओं के प्रति जवाबदेह नही रहता, तथा इन संघठनो के पास हमेशा बच निकलने की यह पतली गली रहती है कि अमुक राजनेतिक दल उनकी उम्मीदों पर खरा नही उतरा । इस प्रकार ये संघठन अमरये बकरे बने रहते है । . बड़े संघठनो के अलावा इसी तासीर के हज़ारो संघठन देश में संचालित है, जिनका एकनिष्ठ उद्धेश्य नागरिको या धनिको से चंदा लेकर कार्यकर्ताओं का टाइम वेस्ट करना होता है । आपको किसी भी जिले में इस तबियत के सैंकड़ो छोटे मोटे संगठन मिल जायेंगे जिनका मॉडल कुछ इस तरह का होता है : . इनकी जिले स्तर पर एक कार्यकारिणी होती है, जिसमे 10-20 सदस्य/पदाधिकारी होते है। इन अध्यक्षों/ उपाध्यक्षो/सचिवो/कोषाध्यक्षो आदि नामधन्य पदाधिकारियों के हाथ जोड़ते हुए से फोटो वगेरह आप अखबारों और शहर के मुख्य चौराहों पर चस्पां हुए देख सकते है । वक्त जरुरत इन पदाधिकारियो द्वारा कार्यकर्ताओं को 'सक्रीय' बनाए रखने या आसान शब्दों में कहें तो संघठन से चिपकाये रखने के लिए एक सभा रखी जाती है, जिसके प्रारम्भ मालाएं और साफे पहनाने तथा समापन 'संघठन में ही शक्ति है' टाइप के नारो से होती है । अमूमन सभा के मध्य में चाय, बिस्किट, समोसो आदि के सिवाय कोई तार्किक एजेंडा नही होता, अत: गाहे बगाहे समस्या के समाधान सुझाने की जगह सिद्धांतो की रूटीन भाषण बाज़ी कर इति कर ली जाती है । . कार्यकर्ताओं को व्यस्त रखने के लिए ये संगठन रक्तदान शिविर लगाना, गाय बचाना, भोजन वगेरह बांटना, पेड़ लगाना, जयंतिया मनाना, प्याऊ चलवाना, नये मेंबर बनवाना, धर्म के लिए चंदा इकट्ठा करना भभका पैदा करने के लिए नारों के साथ जुलुस और वाहन रेली निकालना आदि तथा इसी तरह की फौरी गतिविधियाँ संचालित करते है । . अमूमन इस प्रकार के सभी संगठन : सिर्फ समस्याओ पर बात करते है, कभी भी समस्या के समाधानों पर बात नही करते । . समाधानों के लिए इनके पास न कोई लिखित बैश्विक सोच नही होते, न ही ये उनमे रूचि दिखाते है । . कार्यकर्ताओं को राजनेतिक रूप से महत्त्वपूर्ण सूचनाये नही देते । . देश की सेना मज़बूत करने, न्याय व्यवस्था को दुरुस्त करने या अर्थ व्यवस्था जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों पर कभी अपने कार्यकर्ताओं से विमर्श नही करते । . इनका मुख्य एजेंडा 'जागना','जगाना', 'एक करना' तथा संघठित करना, मतलब माहौल बना कर कार्यकर्ताओं का समय बरबाद करना होता है । . . . यदि आप ऐसे किसी भी अराजनेतिक/सांस्कृतिक/ सामाजिक संघठन से जुड़े हुए है, तो अपने नेताओं से समाधान हेतु लिखित कानूनी ड्राफ्ट्स की मांग करे । यदि ये संघठन समाधान के कानूनी ड्राफ्ट्स मुहैया नही कराते है, तो ऐसे संघठन में अपना समय नष्ट न करें ।
उपरोक्त लेख सोशल मीडिया का है जिसमें बहुत कई पहलू से यह एक श्रेष्ठ चिंतन का लेख प्रतीत होता है पर कई जगह कुछ स्पष्ट चित्र नहीं दिख रहा है r.s.s. हिंदू महासभा सहित अन्य अनेकानेक राष्ट्र चिंतक विचारक और समाज को दिशा देने वाले सनातन और अन्य श्रेष्ठ चिंतकों को पुर्ण निरूपित नाही किया गया है इसमें वैश्विक चिंतन का भी अभाव दिखता है इसलिए संपूर्ण विवेचन के लिए आप गुरुकुल पधारें अजय कर्मयोगी

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद