जिसके दिये गणित पर ही अमेरिका अपोलो को अंतरिक्ष में भेज सका था। आइंस्टीन की थ्योरी का विरोध करने वाले वैज्ञानिक का नाम क्या है
■जमाने ने मारे जवाँ कैसे कैसे,
जमीं खा गयी आसमाँ कैसे कैसे!
●एक महानतम् विभूति को आज याद करें जो बिहार के आर्यभट्ट, रामानुजम और विश्वेसरैया एक साथ हैं।
●एक गणितज्ञ, वैज्ञानिक, खगोल शास्त्री और इंजीनियर एक साथ कोई कैसे हो सकता है?
और आध्यात्मिक आयाम अलग!
....संगीत वाद्ययंत्र से भी अनुराग।
●आईये एक स्वानुभूत घटना वशिष्ट नारायण सिंह के बारे में आपको बतायें...
बिहार, किशनगंज शहर में खगड़ा रेलवे क्रासिंग पर एक ओवरब्रिज बना था....
....जो उद्घाटन के पहले ही गिर-ढह गया।
पर उसका एक पाया-खँभा खड़ा था....
जैसे मुँह चिढ़ाने के लिये खड़ा रह गया हो।
वहीं मेरी बाइक खराब हो गयी।
बगल में एक मोटरसाइकिल मैकेनिक से बाइक ठीक कराने लगा।
वहाँ बैठने पर एकाग्रता आयी....
तो बेहद खूबसूरत अक्षरों में खंभे पर हिन्दी में लिखा देखा.....
【ये पुल छै माह 15 दिन में गिर जायेगा.....दस्खत... वशिष्ट नारायण सिंह】
मैं चौंका,
चूँकि बाईक मैकेनिक बगल का था,
मैंने उससे इस टिप्पणी के बारे में पूछा।
मैंने यही समझा कि देशी ठर्रे का यहाँ ठेका है किसी केस्टो मुखर्जी ने लिख मारा होगा।
मैंने वशिष्ठ नारायण सिंह के बारे में काफी कुछ सुन रखा था।संभवतः 1987 का समय रहा होगा।
●मैकेनिक ने जो बताया मैं सुनकर हैरान रह गया।
......बाबू...
ये बहुत बड़ा इंजीनियर-वैज्ञानिक है,
नाम यही है,
ज्यादे तेज दिमाग है,
बहुत पढ़ने से खिसक गया है,
पागल है पर नुकसानदेह नहीं है।
उसने जो लिखा है ठीक उसी समय पर यह पुल गिरा।
हमारे यहाँ भी आकर चाय पिलाने को कहता है,
यहीं कहीं घूम रहा होगा,
माँग टूँग कर खा लेता है,
कहीं पड़ा होगा।
जिस दिन पुल गिरा उसके एक दिन पहले आकर बोला....
अब्दुल, कल सावधान रहना,
हो सके तो दूकान ही बंद रखना कोई टुकड़ा पत्थर तुमको लग सकता है।
ठीक उसी दिन पुल गिरा....
सोचिए कैसा दिमाग चलता है इसका।
सुनते हैं अमेरिका, इंग्लैंड... सब जगह इसकी धाक थी।
●कल जन्मदिन था,
भारत के उस महान सपूत का,
जिसके दिये गणित पर ही अमेरिका अपोलो को अंतरिक्ष में भेज सका था।
आइंस्टीन की थ्योरी का विरोध करने वाले उस महान गणितज्ञ के शोध-पत्र (research papers) आज ऑक्सफ़ोर्ड, कैंब्रिज, हॉवर्ड, बोस्टन जैसी विश्वविख्यात यूनिवर्सिटी में पढ़ाये जाते हैं।
और निःसंदेह उन्हें भारत-रत्न से अलंकृत किया जाता।
●परंतु दुर्भाग्य है हमारा हमारे बिहार और संपूर्ण विश्व का कि ऐसा महान गणितज्ञ जो शायद आर्यभट का ही दूसरा जन्म है,
वह आज पटना के अशोक राजपथ स्थित एक छोटे से फ्लैट में अपनी जिंदगी गुज़ार रहा है,
.....वह भी मानसिक रोगी की अवस्था में।
●महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह आज 72 वर्ष के हो गये।
अपने जीवन का ज़्यादातर हिस्सा एक मानसिक रोगी के रूप में बिता दिया....
लेकिन किसी भी सरकार ने इन्हें ठीक कराने के लिये कभी प्रयास नहीं किया।
परिजन कहते हैं कि अगर सरकार चाहती तो देश-विदेश के नामी डॉक्टरों से इलाज करवा सकती थी....
लेकिन बीते चार सालों से दिल्ली के एक मानसिक अस्पताल के पुर्जे पर ही दवाएं चल रही हैं।
2009 के बाद किसी डॉक्टर से नहीं दिखाया गया●कोई भी घर आता है तो वशिष्ठ जी उससे पैसे माँगने लगते हैं।
नासा में सफलता के चरम-बिंदु पर पहुँचने के बाद भारत आये और कुछ ही साल बाद सिज्नोफ्रेनिया के मरीज़ बन गये।
तब से आजतक बीमारी से कभी उबर न सके।
गणित के क्षेत्र की विलक्षण प्रतिभा वशिष्ठ नारायण सिंह का जीवन आज भी कौतुहल है।
ठीक उसी तरह जब वह सवालों में उलझे कहीं पड़े मिलते थे।
●वशिष्ठ नारायण सिंह बिहार के आरा के अपने पैतृक गाँव वसंतपुर से इन दिनों पटना आ गये हैं....
और फ्लैट में अपनी बूढ़ी माँ, फौज से रिटायर्ड अपने छोटे भाई और उनके परिवार के साथ रहते हैं।
छोटे भाई अयोध्या प्रसाद सिंह बीते 40 वर्षों से अपने बड़े भाई की सेवा कर रहे हैं।
अयोध्या प्रसाद सिंह बताते हैं कि भैया पूरे दिन गणित के सवालों में ही खोये रहते हैं।
रोज़ाना उन्हें नोटबुक और पेन चाहिए होता है।
दुनिया के नामी राइटर्स की लिखी कठिन से कठिन कैलकुलस की मोटी-मोटी किताबों को भी सिर्फ एक दिन में खत्म कर देते हैं।
एक जगह पर ज्यादा देर तक बैठते नहीं।
कभी कमरे में बैठते हैं तो कभी हॉल में।
गणित के सवाल हल करते करते जब ऊब जाते हैं तो रामायण-महाभारत, गीता और वेदों का अध्ययन करते हैं।
फिर तबला, हारमोनियम और बाँसुरी बजाते हैं।
●72 वर्षीय महान वशिष्ठ नारायण सिंह अपनी बूढी माँ के लिये आज भी बच्चे ही हैं।
माँ आज भी उनका ख्याल रखती हैं।
अपनी ममता को वैसे ही लुटाती हैं जैसे उनका बेटा आज भी नन्हा बच्चा ही हो।
अयोध्या प्रसाद सिंह कहते हैं कि पटना में रहने के बावजूद साइंस कॉलेज के इस पूर्ववर्ती छात्र की आजतक कॉलेज ने कोई खबर नहीं ली।
यूनिवर्सिटी प्रशासन भी भूल गया।
कम से कम एक बार कॉलेज में बुलाया जाता तो एक बात होती।
●कोई याद रखे या न रखे....
हम आर्यभट्ट के इस अवतार स्वरुप बिहार की शान को नहीं भुला सकते।
आइये हम देर से ही सही सब मिलकर इन्हें जन्मदिन की शुभकामनायें दें....
और इनके पुनः स्वस्थ हो जाने की प्रार्थना करें।
■देखिए ये अति मार्मिक कथा, अमेरिका ने सारी सुविधा, फ्लैट और शानदार पैकेज देकर वहीं रहने को कहा।
पर वशिष्ट नारायण सिंह ने अपने देश भारत की सेवा की बात कहकर सारी सुविधाओं को लात मार दी और देश चले आये।
और देश ने इनके साथ क्या व्यवहार किया देख लीजिए.....
मामूली से राजनेता अपने इलाज के लिए विदेश जाते हैं....
पर इस मनोरोगी का देश में भी इलाज नहीं कराया जा रहा है।
छपरा जिला के खलपुरा गाँव के अभिजात्य परिवार की लड़की वंदना सिंह के साथ वशिष्ठ चाचा की शादी हुई थी।
वशिष्ठ चाचा ठहरे गँवई अंदाज के।
वैवाहिक जीवन खुशहाल नही रहा।
वशिष्ठ चाचा बताते हैं कि अमेरिका के कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटीज के डा केली मुझे भारत आने देना नहीं चाहते थे और वे अपनी पुत्री की शादी मुझसे करना चाहते थे, लेकिन देश प्रेम मुझे भारत खींच लाया।नब्बे के दशक मे लालू यादव ने तत्कालीन श्रम मंत्री वशिष्ठ नारायण सिंह के नेतृत्व मे "डाक्टर वशिष्ठ नारायण सिंह कल्याण समिति "बनवाई थी।
लालू प्रसाद यादव ने वशिष्ठ चाचा का इलाज बंगलोर के निमहांस मे कराया।
वे बहुत हद तक ठीक भी हैं और माँ के पास ही सोते हैं।
भाई कलयुग के भरत समान हैं।
किसी आगंतुक से दस रूपये खैनी के लिए माँगते हैं।
एक बार सिक्के कोई दे दिया तो उससे खेलते खेलते निगल गये थे।
तत्कालीन आरा डी एम ने अपनी गाड़ी से डाक्टर के पास ले जाकर किसी तरह सिक्के निकलवाये।
वे बचपन से असामान्य थे और आज भी असामान्य हैं।
काँग्रेस के जगन्नाथ मिश्र ने वशिष्ठ चाचा का इलाज कांके के मानसिक अस्पताल में ठीक से नही कराया।
विक्षिप्त अवस्था मे भी वे अपने ससुराल के पास डोरीगंज के एक होटल मे दो सह-ग्रामीण दलित भाई द्वारा पहचाने गये।
लालू यादव ने दोनो दलित भाई को इन्हे खोजने के एवज मे सरकारी नौकरी दिया।
बहुत लंबी फेहरिस्त और कहानी है इनके बारे में।
ये रामानुजम और आर्यभट्ट से भी बहुत आगे की व्यक्तित्व का नाम है डाक्टर वशिष्ठ नारायण सिंह।
वशिष्ठ चाचा को कोटि कोटि नमन।

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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद