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राजव्यवस्था के वह अदृश्य पहलू जो शत्रु को पराजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका होती है


गुप्तचर विभाग________________________
भारत में गुप्तचर सेवा के ढाँचे के तीन प्रमुख स्तंभ हैं: इंटेलिजेंस ब्यूरो, रिसर्च एंड एनालिसिस विंग तथा डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी। इंटेलिजेंस ब्यूरो यानि IB का इतिहास अंग्रेजी शासन के समय का है जबकि R&AW का गठन इंदिरा गांधी के शासनकाल में कैबिनेट सचिवालय के एक विभाग के रूप में रामेश्वर नाथ काव ने किया था। डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) का गठन सशस्त्र सेनाओं के तीनों अंगों द्वारा संकलित अलग अलग स्रोतों से मिली खुफिया रिपोर्ट में सामंजस्य बिठाने हेतु किया गया था। किसी भी इंटेलिजेंस एजेंसी का मुख्य कार्य संभावित खतरे का अनुमान घटना होने से पहले ही लगा लेना होता है। दूसरे शब्दों में, इंटेलिजेंस का काम अपराध होने से पहले का होता है जबकि जाँच या investigation अपराध होने के बाद की जाती है। इंटेलिजेंस मुख्यतः ऐसी सूचना जुटाने का कार्य है जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा प्रभावित होती है। आज के गतिशील वैश्विक परिदृश्य में सूचना ही सबसे कारगर और खतरनाक हथियार है। इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस, सिग्नल इंटेलिजेंस, टेक्निकल इंटेलिजेंस इन सब आधुनिक विधाओं के उद्भव से पहले मनुष्य ही सूचना का मुख्य स्रोत हुआ करता था। इसीलिए कहा जाता है कि 'Human intelligence is the best form of intelligence'.रिसर्च एंड एनालिसिस विंग देश के बाहर एजेंट भेज कर गुप्त रूप से सूचनाएं जुटाती है।
 ब्यूरो के अधिकारी देश के अंदर छुपे दुश्मनों के बारे में सूचनाएं एकत्र करते हैं और दूसरे देश के गुप्तचरों से भी लड़ते हैं। इसे कॉउंटर इंटेलिजेंस कहा जाता है। आचार्य चाणक्य ने अर्थशास्त्र में लिखा है कि एक राजा को गुप्तचरों को प्रशिक्षण देकर धन धान्य सहित शत्रु के खेमे में भेजना चाहिये। देश में आईबी के अधिकारियों की कुल संख्या आधिकारिक रूप से प्रमाणित नहीं की जा सकती, फिर भी अनुमान है कि लगभग बीस हज़ार IB कर्मचारी अहर्निश देश सेवा में रत हैं। इनका कोई नाम, कोई पहचान नहीं होती। इनके लिए कोई 'दिवस' नहीं होता। वेतन बढ़ाने के लिए कोई आयोग गठित नहीं होता। इन गुप्त शूरवीरों के माँ बाप को इनकी वर्दी पर सितारे लगाने का सौभाग्य नहीं मिलता क्योंकि इनकी प्रतिबद्धता वर्दी की मोहताज नहीं होती। ये नारे नहीं लगा सकते, धरना, हड़ताल नहीं कर सकते। भारत में गुप्तचर सेवा कोई संवैधानिक अथवा विधि द्वारा स्थापित सेवा नहीं है।
जब किसी बच्चे के पिता शाम को नौकरी से घर लौटते हैं तो खाने की मेज पर अपने सहकर्मियों की बातें बता कर मन हल्का कर लेते हैं। परन्तु गुप्तचर सेवा के अधिकारी अपने विभाग के काम का ब्यौरा अपनी पत्नी को भी नहीं बता सकते। ये हर जगह होते हैं किंतु हम इन्हें देख नहीं सकते। ये सब कुछ सुनते हैं लेकिन हम इन्हें जान नहीं पाते। ये देश के सुरक्षा बलों की आँख, नाक और कान हैं। इनकी सेवा का महत्व इतना है कि रिसर्च एंड एनालिसिस विंग का एक फील्ड अधिकारी किसी देश की सत्ता पलट सकता है। भारत के सामरिक रणनीतिक हित साधने में इनकी भूमिका सन् 71 के युद्ध में प्रमाणित हो चुकी है।
हम गुप्तचर सेवा के बारे में सिनेमा में देखते हैं, अखबारों में पढ़ते हैं या किसी से सुन भर लेते हैं। इंटेलिजेंस सुधार पर संसदीय समितियां गठित नहीं की जातीं। विश्लेषक मोनोग्राफ नहीं लिखते, सैन्य सिद्धांत या doctrine नहीं बनाई जाती। गुप्तचर अधिकारी चुप चाप निजी सफलता का किसी भी तरह का श्रेय लिए बिना पूरी लगन से काम करते हैं। जब भी इनका कोई साथी कोई उपलब्धि हासिल करता है तो बन्द दफ्तर में प्रशंसा के मात्र दो शब्द के अलावा इन्हें कोई पुरस्कार नहीं मिलता। इसी तरह जब कोई अधिकारी प्राणों की आहुति दे देता है तब भी दफ्तर में केवल दो मिनट का मौन ही उसके खाते में जाता है।यहाँ दो और दो चार का हिसाब रखने से ज्यादा एक और एक ग्यारह बनाने की कवायद की जाती है इसीलिए सूचना का हर स्रोत एक asset होता है। जब न्यूज़ चैनलों में इंटेलिजेंस फेल्योर की खबरें आती हैं तो त्वरित आलोचना से पहले इतना याद रखें कि वह कथित फेल्योर पड़ोसी मुल्क के सौ षडयन्त्रों में से एक होता है। उस एक फेल्योर के पीछे इंटेलिजेंस ब्यूरो की निन्यानवे सफलताएं होती हैं। उन निन्यानवे सफलताओं के कारण ही राष्ट्र उस एक विफलता को झेल लेता है। अमरीकी इंटेलिजेंस एजेंसी CIA के संस्थापक एलन डब्लू डलेस ने अपनी पुस्तक Craft of Intelligence में लिखा है कि 28 नवंबर, 1961 को जब वह रिटायर होने वाले थे तब राष्ट्रपति कैनेडी ने कहा, "आपकी सफलताएं सुर्खियां नहीं बनतीं, विफलताओं के डंके ज्यादा बजते हैं। किंतु मैं आश्वस्त हूँ कि आपको इस बात का एहसास है कि आपका काम कितना महत्वपूर्ण है। इतिहास आपके प्रयासों की महत्ता की समीक्षा करेगा अतः मैं अभी इसकी विवेचना नहीं कर रहा तथा मुझे विश्वास है कि भविष्य में आप देश के प्रति प्रशंसनीय कार्य करते रहेंगे।"

ऐसे शब्द भारत के किसी प्रधानमंत्री ने आज तक सम्भवतः किसी भी गुप्तचर सेवा एजेंसी के लिए नहीं कहे होंगे। हम लोकप्रिय साहित्य, सिनेमा और सूचना प्रौद्योगिकी के माध्यम से रामेश्वर नाथ काव, के शंकरन नायर, बी रमन, आर के यादव, मलय कृष्ण धर, रवीन्द्र कौशिक, कर्नल हन्नी बक्शी इत्यादि का नाम जानते हैं। हम इन्हें पुस्तकों में या वेबसाइट पर खोजते हैं। हम श्री अजित डोभाल को जेम्स बांड कहते हैं। किंतु इंटेलिजेंस की दुनिया की वास्तविकता पुस्तकों और सिनेमा से कहीं ज्यादा खतरनाक है। एक टीवी सिरीज़ में डोभाल साहब मजाक में कहते हैं "डर सबको लगता है। किसी को घटना के पहले लगता है, किसी को घटना के दौरान लगता है तो किसी को घटना घटित हो जाने के बाद डर लगता है कि कहीं ऐसा हो जाता तो क्या होता। मैं (अजित डोभाल) तीसरी कटेगरी का हूँ।"
पूर्वोतर में विद्रोह हो या खालिस्तानी आतंकवाद, नक्सली हिंसा हो या कश्मीर का इस्लामी जेहाद, गुप्तचर सेवा के अधिकारियों ने सदैव हमारे सशस्त्र सुरक्षा बलों को विश्वसनीय सूचना उपलब्ध कराई है जिसपर कार्यवाही की जा सके। जब हम त्योहार मनाते हैं तब सीमा पर स्थित जवान को IB और DIA के एजेंट जान पर खेल कर शत्रु के संभावित अटैक की सूचना दे रहे होते हैं।सीआईए अपने हुतात्माओं को एक स्टार देकर सम्मानित करती है।

कश्मीर की समस्या मूलतः इंटेलिजेंस की समस्या है। आर्मी वहाँ काम जरूर कर रही है लेकिन सैद्धांतिक रूप से आर्मी का काम पत्थरबाजों से लड़ना नहीं है। लड़कों को भड़का कर उनके हाथ में पैसा और पत्थर देने वालों का इंटेलिजेंस नेटवर्क हमसे ज्यादा स्ट्रांग है। हम वहाँ इंटेलिजेंस कैसे जुटाते हैं? मूल रूप से दो तरीके हैं: एक होते हैं डबल एजेंट जो सीमा पार पाकिस्तान के कब्जे वाले अड्डों में घुलमिल गए होंगे। उनसे हमें जो सूचनाएं मिलती हैं वो बेहद क्लासिफाइड होती हैं और दीर्घकालिक परिणाम देने वाली होती हैं। दूसरे होते हैं डुअल (dual) एजेंट जो पैसा लेकर तात्कालिक सूचना देते हैं। ये हमारे देश के इंटेलिजेंस अधिकारी नहीं होते। यदि जिहादी गुटों ने इनको ज्यादा पैसा दिया है तो ये सुरक्षा बलों की जानकारी उनको दे देंगे। इस प्रकार का खतरनाक खेल कश्मीर में खेला जाता है। कुल मिलाकर आतंकियों से लड़ने के लिए हमारी रणनीति offensive या counter offensive होती है। लेकिन असली समस्या बंदूकधारी आतंकवादी नहीं हैं। समस्या है कश्मीर के नागरिकों की आतंकियों से सांठ गाँठ की vulnerability. आर्मी और अन्य सुरक्षा बल इसको neutralize करने के लिए बहुत सारे काम करते हैं। अस्पताल से लेकर स्कूल तक चलाते हैं। बाढ़ में तो कश्मीरियों को सेना ने अपने कंधों पर ढोया था। फिर भी कश्मीरी बहक जाते हैं। इसका कारण है कि हम अपने इंटेलिजेंस को सुधारने के लिए out of the box वाली सोच नहीं रखते। उदाहरण के लिए आज कोई भी पुस्तक उठा कर देख लीजिए किसी भी विश्लेषक को पढ़ लीजिए सब एक जैसा राग आलापते नजर आएंगे। स्वराज्य मैगज़ीन में आर जगन्नाथन की घिसी पिटी बकवास पढ़ने के बाद देखा तो द वायर में लिखे अपने लेख में ORF के पुरनिया डिफेंस एनालिस्ट मनोज जोशी साहब इस बात का रोना रो रहे हैं कि राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय का बजट 81 करोड़ से बढ़ा कर इस वर्ष 333 करोड़ क्यों कर दिया गया। अरे ये भी कोई बात हुई भला! एक तो आप कोई ढंग का सुझाव नहीं देंगे ऊपर से बकवास करेंगे।

अब समय आ गया है कि हम केवल offensive/counter offensive न होकर 'Subversive measures' को अपनाएं। इंटेलिजेंस प्रणाली में बड़े फेरबदल की आवश्यकता है। हमें ऐसे अधिकारी चाहिये जो कश्मीर की आबो हवा में घुल मिल जाएँ और वहाँ के नागरिकों के अंदर की मज़हबी कट्टरता को dilute, manipulate और अंततः subvert करने का कार्य करें। कोई संस्था वहाँ जमीन लेकर प्रवचन देने के लिए आश्रम तो बना नहीं सकती। इसलिए ये काम इंटेलिजेंस एजेंसियां ही कर सकती हैं। सबसे पहले तो आप अपने बजट में वृद्धि कीजिए। थिंक टैंक FINS की वेबसाइट के अनुसार आंतरिक सुरक्षा के लिए वर्ष 2016-17 में इंटेलिजेंस ब्यूरो का बजट मात्र 1410.45 करोड़ रूपये है। महत्वाकांक्षी परियोजना नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड बनाने के लिए मात्र 45 करोड़ दिए गए हैं। ऐसे तो काम नहीं चलेगा न साहब! दूसरा यह कीजिए कि कश्मीर पर फोकस कर एक अलग कैडर बना कर कम से कम 5 साल इंटेलिजेंस अधिकारियों की भर्ती सीधा राष्ट्रीय रक्षा अकादेमी (NDA) से कीजिए। बीस इक्कीस वर्ष के युवा कैडेट को इंटेलिजेंस का गहन प्रशिक्षण दीजिये। स्वयं अजित डोभाल साहब ने कई जगह isolated cases में आतंकियों को dilute किया है। हमें बस ऐसे अधिकारियों की फ़ौज खड़ी करनी है, उनकी संख्या बढ़ानी है। स्मरण रहे सन् 65 में कश्मीर radicalize नहीं हुआ था इसीलिए पाकिस्तान को परम्परागत युद्ध लड़ना पड़ा था वरना उस समय वो वही करना चाहता था जो आज कर रहा है। इतिहास गवाह है कि रूस, अमरीका और ब्रिटेन में एक जमाने में 25-26 साल के जवान इंटेलिजेंस अधिकारी भर्ती नहीं किये जाते थे बल्कि किशोरावस्था से ही गढ़े जाते थे।

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