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क्या श्राद्ध से पर्यावरण संतुलन सम्भव


पितृपक्ष का संबंध पितरों से है । पिता भर से उसका कोई संबंधनहीं है। नित्य तर्पण किया जाता है। ध्यान रहे यह नित्य कर्महै। शास्त्रों में इसे कर्म कहा गया है। तर्पण में सर्वप्रथम ब्रह्मा विष्णु रुद्र तथा समस्त देवों को तर्पण किया जाता है पूर्वाभिमुख हो कर। इसमें भू लोक,भुवः लोक और स्व: लोक सभी के देवों को ,देवियों को तर्पण करते हैं।फिर वेदों को, छंदों को,ऋषियों को, पुराण आचार्यो को,इतर आचार्यो को, गन्धर्वो को,देवानुगों को, नागों को, सागर, पर्वत ,नदियों, मनुष्यो ,यक्षों,राक्षसों, पिशाचो ,सुपर्णा,पशु, वनस्पतियों, वनों,औषधियों,समस्त प्राणियों और समस्त महाभूतों को तर्पण किया जाता है। इसके बाद ब्रह्मा के मानस पुत्रों को और ऋषियों को उत्तर अभिमुख होकर तर्पण करते हैं। फिर दक्षिणाभिमुख होकर दिव्य पितरों को,चतुर्दश यमों को तर्पण, फिर समस्त पितरों को आवाहन।फिर पिता, पितामह,प्रपितामह, वृद्ध प्रपितामह आदि को,पितामही, प्रपितमही, वृद्ध प्रपितमही को ,माता,मातामही, आदि सबको, मामा आदि न रहे हों तो उनको भी जितने कुटुम्बी नर नारी मृत हुए हों, सबको स्मरण कर नाम ले लेकर गोत्र सहित स्मरण कर तर्पण करते हैं । फिर जलचर ,वायुचर,भूतल चर आदि सबको। फिर यदि कोई अपुत्र मरे हों तो उनको। अंत में वैयाघ्रपद गोत्र में उत्पन्न सांकृत प्रवर वाले गंगापुत्र भीष्म पितामह को जो अपुत्र रहे एक महत लक्ष्य के लिए, एक स्वतंत्र श्लोक के साथ तर्पण प्रत्येक सनातन धर्म अनुयायी अवश्य करता है। सबसे अंत में श्लोक है जिसका अर्थ है कि ब्रह्म से लेकर तृण तक समस्त लोक को तर्पण। पिंडदान के समय माता को पिंडदान करते हुए जो मार्मिक श्लोक पढ़े जाते हैंउन्हें सुनते हुए कठोर हृदय व्यक्ति भी बरबस रोने लगता है।गर्भधारण ,प्रसव ,पालन आदि का इतने मर्मस्पर्शी ढंग से स्मरण गायन होता है कि आँसू न आ जाएं, यह असम्भव
और_हमारे_पूर्वज यह हमारे ऋषि मुनियो का दूरदृष्टि पूर्ण चिंतन ही था जो कौवों के लिए खीर बनाने को कहते थे ? और कहते थे कि कौवों को खिलाएंगे तो हमारे पूर्वजों को मिल जाएगा? , हमारे ऋषि मुनि क्रांतिकारी विचारों के थे। यह है सही कारण। तुमने किसी भी दिन पीपल और बरगद के पौधे लगाए हैं? या किसी को लगाते हुए देखा है? क्या पीपल या बड़ के बीज मिलते हैं? इसका जवाब है .... नहीं.... बरगद या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करो परंतु नहीं लगेगी। कारण प्रकृति/कुदरत ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है। यह दोनों वृक्षों के टेटे कौवे खाते हैं और उनके पेट में ही बीज की प्रोसेसीग होती है और तब जाकर बीज उगने लायक होते हैं। उसके पश्चात कौवे जहां-जहां बीट करते हैं, वहां वहां पर यह दोनों वृक्ष उगते हैं। पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन O2 छोड़ता है और बरगद के औषधि गुण अपरम्पार है। देखो अगर यह दोनों वृक्षों को उगाना है तो बिना कौवे की मदद से संभव नहीं है इसलिए कौवे को बचाना पड़ेगा। और यह होगा कैसे? मादा कौआ भादो महीने में अंडा देती है और नवजात बच्चा पैदा होता है। तो इस नयी पीढ़ी के उपयोगी पक्षी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है इसलिए ऋषि मुनियों ने कौवों के नवजात बच्चों के लिए हर छत पर श्राघ्द के रूप मे पौष्टिक आहार की व्यवस्था कर दी। जिससे कि कौवों की नई जनरेशन का पालन पोषण हो जाये...... इसलिए दिमाग को दौड़ाए बिना श्राघ्द करना प्रकृति के रक्षण के लिए नितांत आवश्यक है। ध्यान रखना जब भी बरगद और पीपल के पेड़ को देखो तो अपने पूर्वज तो याद आएंगे ही क्योंकि उन्होंने श्राद्ध दिया था इसीलिए यह दोनों उपयोगी पेड़ हम देख रहे हैं।

*प्रेतों का भोजन*                           
एक बार महर्षि गौतम ने प्रेतों से पूछा - संसार में कोई भी प्राणी बिना भोजन के नहीं रहते अतः बताओ तुम लोग क्या आहार करते हो
प्रेतों ने कहा-
_अप्रक्षालितपादस्तु   यो   भुङ्क्ते  दक्षिणामुखः।_
 _यो वेष्टितशिरा भुङ्क्ते प्रेता भुञ्जन्ति नित्यशः।।_
अर्थात-     
द्विजश्रेष्ठ ! जहाँ भोजन के समय आपस में कलह होने लगता है वहाँ उस अन्न के रस को हम ही खाते हैं।           
जहाँ मनुष्य बिना लिपी-पुती धरती पर खाते हैं, जहाँ लोग शौचाचार से भ्रष्ट होते हैं वहाँ हमको भोजन मिलता है।
जो पैर धोये बिना खाता हैं, और जो दक्षिण की ओर मुँह करके भोजन करता है, अथवा जो सिर पर वस्त्र लपेटकर भोजन करता है, उसके उस अन्न को सदा हम प्रेत ही खाते हैं।
जहाँ रजस्वला स्त्री-चाण्डाल और सूअर श्राद्ध के अन्न पर दृष्टि डाल देते हैं, वह अन्न पितरों का नहीं हम प्रेतों का ही भोजन होता है।
जिस घर में सदा जूठन पड़ा रहता है, निरन्तर कलह होता रहे, और बलिविश्वैदैव न किया जाता हो वहाँ हम प्रेत लोग भोजन करते हैं।
महर्षि गौतम ने पूछा -
कैसे घरों में तुम्हारा प्रवेश होता है, यह बात मुझे सत्य-सत्य बताओ।
प्रेत बोले - जिस घर में बलिवैश्वदेव होने से धुँए की बत्ती उड़ती दिखाई देती है, उसमें हम प्रवेश नहीं कर पाते।
गौ-ब्राह्मण तथा गुरु को जब कुछ दिया जाता हो उस समय जो न देने की सलाह देते हैं, वे भी प्रेत ही होते हैं
गौतम ने पूछा -किस कर्म के परिणाम में मनुष्य प्रेत भाव को प्राप्त होता है?
प्रेत बोले -जो धरोहर हड़प लेते हैं, जूठे मुँह यात्रा करते हैं, गाय और ब्राह्मण की हत्या करने वाले हैं  वे प्रेत योनि को प्राप्त होते हैं।
चुगली करनेवाले, झूठी गवाही देने वाले, न्याय के पक्ष में नहीं रहने वाले, वे मरने पर प्रेत होते हैं।
सूर्य की ओर मुँह करके थूक-खकार और मल-मूत्र का त्याग करते हैं, वे प्रेत शरीर प्राप्त करके दीर्घकाल तक उसी में स्थित रहते हैं।
विप्रवर ! जो अमावस्या की तिथि में हल में बैलों को जोतता है वह मनुष्य प्रेत बनता है।
जो विश्वासघाती, ब्रह्महत्यारा, स्त्रीवध करने वाला, गोघाती, गुरुघाती और पितृहत्या करने वाला है वह मनुष्य भी प्रेत होता है।
मरने पर जिसका अन्तिम संस्कार तथा श्राद्ध नहीं किये गये हैं, उसको भी प्रेतयोनि प्राप्त होती है।
गौ-ब्राह्मण तथा गुरु को जब अंशदान दिया जाता हो उस श्रेष्ठ कर्म के बाधक बनने वाला भी प्रेत ही होते हैं इस श्रेष्ठ संयोग के उत्तम दान का विधान राष्ट्रीय स्वतंत्र गुरुकुल अभियान टैक्स छूट कि लाभ से रहित केवल श्रेष्ट दान के लिए 7984113987 काल करें या 9336919081 पर व्हाटसप टेलिंग्राम कॉल

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