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स्वाभिमानी और हरामखोरी के बीच उलझा यह समाज

  
कड़ाह भर दाल,
डोलची भर दाल..
#जेवनार_की_परंपरा
सामूहिक भोज यानी कि जीमन। जेवनार = जीमणवार। जिम्मन। जीमण। ठेठ देसी। पारम्परिक।
वह भी दो तरह का :
१. पंगत ( पंक्ति में बिठाकर)
और
२. चेपी ( गिनती के मालपूए व डोलचीभर दाल देकर)
दोनों ही जेवनार में दाल खूब बनती है। चने की दाल। गुटी और फूटी। तड़के-भड़के वाली। मीठे के साथ तीखे तेवर वाली दाल। पूड़ी के साथ भरा दौना, रंज जाए कोना कोना।
जेवणार की दाल खूब मेहनत से तैयार होती है। बनती लोहे के कड़ाह में है। जीमने वालों की संख्या के प्रमाण में अंगुल से लेकर ताल-बालिश्त भर ऊंचाई से पानी डाला जाता है और मधरे आंच पर पकाया जाता है। दाल के कड़ाह समाज की सामूहिक सम्पत्ति होते हैं और जहां उनका उपयोग होता है, वे नोहरे कहे जाते हैं।
मालवा, राजस्थान, गुजरात तक सामाजिक नोहरे होते आए हैं और हाल के उपभोक्ता वाद में एक रात के भाड़े की वाटिका या गार्डन की दिखाऊ संस्कृति के आगे ये परंपरा अतीत होती जा रही है।
हां, अब भी कभी - कभार दाल भरे कड़ाह दिख जाते हैं। दाल परोसने और भरने की डोलचिया नज़र आ जाती हैं तो देहात में बची हमारी संस्कृति की झलक मिल जाती है। सच कहें कि ऐसे पड़छे और कड़ाह को देखे कितने दिन हो गए?
जय जय।
चक्‍की - तक्‍खिला या तक्षशिला से?

अक्‍सर यह गलती हो जाती है-  'आटा पिसवाने जा रहा हूं।' कहना चाहिए था- 'गेहूं पिसवाने जा रहा हूं।' बात की चक्‍की की है। उसमें भी हाथ चक्‍की की जिस पर अनाज पीसना बड़ा कठिन था मगर जब चक्‍की नहीं थी तब? तब अनाज को कूटा जाता, भिगाेया जाता और गूंथकर देर तक रख दिया जाता। चक्‍की ने राह आसान की, मगर चक्‍की आई कब ?
जरूर यह कबीर से पुरानी है जो अपने घर में इसे चलती देखकर कह उठे-
चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय ।
दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।।
शायद पहले यंत्र समझा गया। जन्‍त इसी का नाम है। इस पर बैठकर गाये जाने वाले लोकगीतों को जंतसार के गीत कहा गया है। हमारे यहां इसको घट्टी कहा जाता है, यह नाम इसकी 'गर्ड-गर्ड' जैसी आवाज की बदौलत हुआ होगा। इसके भी कई रूप है दाल दलने वाली रामुड़ी और अनाज पीसने वाली श्‍यामुड़ी। यह चक्‍की इतनी लोकप्रिय रही कि इसके निर्माण की विधि लिखने की जरूरत ही न पड़ी क्‍योंकि कहावत रही' 'घर घट्टी घर ओंखली, परघर पीसण जाए।' इसको हमारे घर तक पहुंचाने का श्रेय उन यायावरों को है जिनको कारवेलिया के नाम से जाना गया और जिनका संबंध पश्चिमी भारत से अधिक रहा है। वे ही इसको बनाने, टांकने-टांचने, सुधारने का भी काम करते रहे थे। मुगलकाल में गांवों में बड़ी बड़ी चक्कियां गाड़ी में लेकर लोग अनाज पीसने का कार्य करते थे, ऐसा साक्ष्‍य मिलता है।
विश्‍वास किया जाता है कि यह करीब 2000 साल पुरानी है। भारत में हाथ से घुमाकर चलाई जाने वाली चक्‍की के प्रमाण पहली सदी के आसपास के 'तक्षशिला' या 'तक्खिला' से मिले हैं। यह मत सबसे पहले जाॅन मार्शल ने तक्षशिला पर अपनी किताब में दिया। यही नहीं, वहां से पत्‍थर का चूर्ण करने वाली चक्‍की के प्रमाण भी मिले हैं। तो, क्‍या यह मान लिया जाए कि चक्‍की तक्षशिला से चली, मगर उसमें तक्षशिला जैसा है क्‍या ?
इसमें हत्‍था सबसे रोचक चीज है जिसके साथ पूरा घूर्णन नियम जुड़ा है। रचनात्‍मक रूप में यह थाला अथवा आलवाल पर 'नार पाट' लिए होती है जिसकी नाभि के आरपार 'खीला' या कील होती है। नार पाट पर रखा जाने वाला 'नर पाट' होता। उसके बीचो बीच तीन या चार अंगुल का आरपार छेद जिसे 'गला' कहा जाता है, इसमें डाले गए अनाज के दाने गाला कहलाते हैं। इस गले के बीच में लगती है चाखड़ी। इसके अधोभाग में एकांगुल के बराबर छेद होता। इसी में खीले का मुंड भाग आ जाता। यह ऊपरी पाट को संतुलित करता। पूरे वजन को नार पाट पर रखना है या कुछ ऊपर। महीन या मोटा आटा इसी विधि से पीसा जाता। इसको ऊपर-नीचे के करने के लिए थाले के नीचे 'तक्‍ख' या तोका होता। यह एक पटरी होती जो एक छोर से दूसरे छोर तक मोटी होती जाती। आगे सिरकाने पर खीला ऊपर उठता तो पाट को ऊंचा कर देता...। संतुलन और हत्‍थे के साथ गति का यही सिद्धांत इस चक्‍की यंत्र के निर्माण की प्रेरणा रहा है। मगर ये क्‍या कम अचरज है कि इसमें तक्‍ख और खीला खास अंग है और दोनों को मिलाकर ही चक्‍की पूरी होती है और दोनों शब्‍दों को मिलाएं तो 'तक्‍खीला' और संस्‍कृत में 'तक्षशिला' हो जाता है। ताज्‍जुब हुआ न। मगर हां, आप यह जरूर बताएं कि आपके पास इस यंत्र की क्‍या विशेष जानकारी है, यदि आप भी मेरी तरह चक्‍की चलाती मां की गोद में सोये होंगे तो जरूर याद आएगा यह यंत्र... । जय-जय
कई वर्ष पहले जब फ्री में अनाज वितरण शुरू हुआ था,लोगोँ ने लेने से इंकार कर दिया।
केवल भिखारी या भिखमंगी कुछ जातियों, जैसे जोगी आदि को छोड़कर कोई भी मुफ़्त का अन्न खाने की सोच भी नहीँ सकता था।
तब यदि कोई इस प्रकार की घोषणा करता तो प्रतिक्रिया होती "हमें भिखमंगा समझ रखा है क्या?"
प्राप्य वस्तु को फ्री में उपलब्ध करवाना  स्वाभिमान पर हमला माना जाता था।
फिर कुछ NGO वादी आने शुरू हुए,गाँवों में।
बच्चों को इकट्ठा करके एक एक पारले जी बांटते।
और समझाते कि ये तुम्हारा "हक" है।
हक की लड़ाई के सेमिनार होने लगे।
जो फिसलते गए उन्हें जागरूक कह कर भुनाया गया।
सार्वजनिक अभिनन्दन होने लगे। हकवादी मजे करने लगे और स्वाभिमानी हाशिये पर।
पारले जी से जेबख़र्ची यानि छात्रवृत्ति।
फिर कभी पशु तो कभी टँकी।आवास भी मिलने लगे। लाखों की घोषणाएँ,हजारों का रजिस्ट्रीकरण,सेकड़ों को बुलावा और अंत में किसी एक को "हक"।
इसी को विकास माना गया।
एक बार आदत लगा दी तो हक का दायरा बढ़ता गया।
धीरे धीरे देश के महत्त्वपूर्ण सन्साधन भी हक की भेंट चढ़ने लगे।
कभी मिक्सी तो कभी कम्बल,कभी साड़ी तो कभी गहना,; यहाँ तक तो ठीक,
अब मनोरंजन और विलास की चीजें भी हक में शामिल हो गई।
आने वाले समय में बिजली पानी के साथ साथ कुछ समूहों को खुश करने के लिए देश के कुछ कुछ टुकड़े काटकर आराम से हक के लिए कुर्बान किए जाने वाले हैं
           आपने कहीं न कहीं पुराने जमाने के बड़े #कड़ाह देखे होंगे।
ये लोहे के बने होते हैं। इन्हें बनाने वाले स्थानीय कारीगर ही हुआ करते थे। इनको बनाने के लिए लोहे की छोटी छोटी आयताकार चद्दरों को जोड़कर पहले एक रिंगनुमा कड़ा बनाया जाता था। फिर एक के ऊपर दूसरी रिंग जोड़कर उन्हें कड़ाह का आकार दिया जाता था। ये छोटे टुकड़े हस्तनिर्मित कीलों से जोड़े जाते थे जिन्हें मेख कहा जाता है। हाल ही तक, ऐसे कारीगर उपलब्ध थे जो घी चढ़े हुए तपते कड़ाह में भी उखड़ी मेख को वापिस लगा सकते थे।
इन कड़ाहों का उपयोग बड़े आयोजनों में मिठाई रांधने के लिए किया जाता था। सात कड़े वाले कड़ाह का अर्थ था, उसमें सात रिंग्स होते थे। बीस से तीस कड़ों वाले भी कड़ाह होते थे। इनमें तीन से चार मण (एक मण 40 kg का होता है) गेहूँ की लापसी या हलवा पकाया जाता था। ऐसे कड़ाह भी थे जिनमें नौ मण तक दलिया या आटा सेका जाता था। इन विशाल कड़ाहों में चार चार बलिष्ठ व्यक्ति खुरपा घुमाते थे। चार से पांच गज के खुरपे बलपूर्वक जब फिसलते थे तो उनकी घमक तीन कोस तक सुनाई देती थी। इन खुरपों को चाठुआ कहा जाता है, इन्हें एक विशेष लय से घुमाना होता था। ये आगे से लोहे के बने होते थे। कड़ाह के कड़े इस प्रकार से फिक्स होते थे कि वे जाते समय ठीक से फिसल सकें और किसी मेख को #क्षतिग्रस्त न करें।
यूँ तो हलवा शब्द से ही हलवाई बना है, लेकिन उस समय प्रायः सामान्य जन ही यह कार्य करते थे।
                    यह हलवा अथवा लापसी, शुद्ध घी और गुड़ से बना होता था, जिसे जीमने के लिए पूरी न्यात बुलाई जाती थी। जैसा ठोस आहार होता था वैसे ही जीमने वाले भी होते थे। पांच सेर लापसी खाने वाले लोग भी थे, एक बार खा लिया तो पांच दिन बिना खाए भी रह जाते थे।
लौह तत्व रक्तवृद्धि के लिए उत्तम रहता है। कई बार उसमें से घी झरता रहता था। वह घी भी वास्तव में घी था, वह बल भी बल ही था। शुद्ध खान पान का ही असर था कि ऐसे आयोजन में गांव के गांव, दल बल सहित आठ कोस तक पैदल चलकर खाने के लिए पहुँचते थे।
हलवा या लापसी के साथ कई बार चना-चावल भी बनते थे। खडीनों के चने और सिंध के चावल की बात ही कुछ और थी। उन मसालों की महक भी अब तो कहीं खो सी गई है।
आज हर दिन कोई न कोई जीमण होता है पर खाने वाले पता नहीं क्या खा रहे हैं,,,,!!! भव्य चकाचौंध में शक्कर और तेलीय पदार्थों की भरमार सी रहती है। एक एक आइटम भी खा लिया तो दो दिन तक उन्हें पचाना ही भारी पड़ जाता है। अनेक नाम वाले व्यंजनों में स्वाद और सुगंध में कहीं न कहीं बहुत खालीपन रहता है। आडम्बर, प्रदर्शन और भौंडापन के अतिरिक्त कुछ नहीं बचा यहाँ।
अनेक निमंत्रण होते हुए भी व्यक्ति खाना ही नहीं चाहता। आज का मानव 25% तो स्वयं के लिए खाता है और 75% इसलिए खाता है ताकि डॉक्टर की दुकान चलती रहे। गले तक ठूंस कर खाने के बाद सारी ताकत उसे पचाने में व्यय हो जाती है।
इधर रिफाइंड आयल के नए खुलासे से तो ऐसा लगता है कि हृदय रोग के इलाज में लगी कम्पनियों और तेल के विज्ञापनों में कोई भारी सांठ गांठ है।
आप कब तक बचोगे?
जहाँ जाओगे वहाँ यही तेल घी और मिठाइयां आपका पीछा नहीं छोड़ने वाली।
आप चाहे साउथ इंडियन खाओ या चाइनीज,,,, दस सीढियां चढ़ते ही हांफना आपकी नियति बन गई है।
आप जितना भारत को भूलोगे उतना ही गर्त में जाओगे।
यह शरीर बार बार नहीं मिलता। इसको कचरापात्र बनने से रोकिये। बलशाली बनिए। जिस भाव भी मिले, यदि शुद्ध मिलता है तो उसका उपयोग कीजिए।
गली के नुक्कड़ पर उपेक्षा से औंधे पड़े प्राचीन कड़ाह तिल तिल होकर जंग खा रहे हैं। वे धीरे धीरे मर जाएंगे पर मानव जाति उससे भी तीव्र गति से अपनी बर्बादी की योजना खुद बना रही है।

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