पिछले दिनों डिस्कवरी चैनल के मसहूर कार्यक्रम मैन वर्सेज वाइल्ड में बेयर ग्रिल्स से अपने बचपन की यादों को साझा करते हुये जब मोदी ने कहा कि एक सामान्य परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें साबुन इत्यादि दुर्लभ थे।लिहाजा वह नहाने तथा कपड़े धोने के लिये मैदान में ओस की बूंदें पड़ने के बाद तैयार हुई मिट्टी की पपड़ी को इकट्ठा कर के लाते थे और उसी से कपड़े धोते थे।इसके बाद सोशल मीडिया पर शहरी बुद्धिजीवियों के बीच एक नयी बहस शुरू हो गयी है कि यह कैसे हो सकता है? बहरहाल, शहरी बुद्धिजीवियों ने जिस चीज को नहीं देखा है तो यह एक प्रकार से शास्वत सत्य मान लिया जाता है कि उस तरह की चीजें दुनिया में होती ही नहीं हैं।मतलब कुएं के मेढ़क ने बाहर की दुनिया नहीं देखी तो वह बस यही गाता रहता है कि "इतना सा ही है संसार।" बाकी जो तीस-चालिस वयवर्ग के हैं और जिन्होंने ग्रामीण परिवेश को जीया है वह मोदी की उस बात को आसानी से समझते हैं कि वह रेह के बारे में बात कर रहे हैं।कुछ सालों पहले तक भूगोल और कृषि विज्ञान में भी इसे सहज ही पढ़ने को मिल जाया करता था।अब इसे पढ़ाया जाता है या नहीं, यह मुझे नहीं पता लेकिन साहित्य में रुचि रखने वाले जायसी के पदों में इसे जरुर पढ़ सकते हैं।जायसी,पद्मावत के स्तुतीखंड में लिखते हैं कि "जावत खेह रेह दुनियाई । मेघबूँद औ गगन तराई"फिर इसी में आगे और लिखते हैं कि,"जँह जँह भूमि जरी भइ रेहू । बिरह के बाह भई जनु खेहू।"सिर्फ जायसी ही नहीं बल्कि विद्यापति भी लिखते हैं कि,"नव जल- धर तर चमकए रे जनि बीजुरि रेह।" फिर अगर साहित्य से बाहर निकल कर कुछ और तथ्यों की ओर बढ़ा जाय तो 1876 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में नहरों द्वारा सिंचाई वाले क्षेत्रों में लवणों की उत्पत्ति के कारणों का पता लगाने, इनके वैज्ञानिक विश्लेषण एवं प्रायोगिक समाधान हेतु ‘भारतीय रेह समिति’ का गठन किया गया था जिसके निदेशक, प्रख्यात वनस्पति वैज्ञानिक राबर्ट्स बनाये गये।दरअसल उस दौर में नहरों के निर्माण के बाद एक मिथक बहुत तेजी से फैल चुका था कि इनके पानी के कारण ही खेतों में रेह बनती है।बाद में 1897 में बोएल्कर द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन का शुभारंभ हुआ और इम्पीरियल कृषि रसायनज्ञ जे. डब्लू. लीथर (भारतीय मृदा विज्ञान के पिता) ने इन मृदाओं का विस्तृत रूप से अध्ययन करके इस मिथक को तोड़ा था। वास्तव में उत्तरी भारत में रेह बोली जाने वाली ऊसर मिट्टी को लोना, शोरा, रेहटा, क्षार एवं खार के नाम से भी जाना जाता है। वहीं पंजाब एवं दिल्ली में लवणीय मिट्टी को ‘थर’ एवं क्षारीय को ‘रक्कर’ तथा ‘बारा या वारी’ के नाम से जाना जाता है।ऊसर भूमियों में घुलनशील लवणों या विनिमय सोडियम की अधिकता पायी जाती है। ये घुलनशील लवण वाष्पीकरण प्रक्रिया द्वारा धरातल पर एकत्र होते रहते हैं, परिणामस्वरूप मिट्टी की ऊपरी सतह सफेद दिखाई पड़ने लगती है।यह सफेद परत जमीन के उपर पपड़ी के रुप में इकट्ठा होती है जिसे रेह कहा जाता है। मृदा घोल में इन लवणों की सांद्रता बढ़ जाने के कारण पौधे मिट्टी से जल तथा पोषक तत्व सुगमता से नहीं ले पाते जिसका पौधों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। सोडियम कार्बोनेट की अधिकता से मृदा की भौतिक दशा अत्यंत खराब हो जाती है। साथ ही मृदा का पी एच भी काफी बढ़ जाता है जो पौधों के लिये जानलेवा साबित होता है।चूंकि इस मिट्टी में सोडियम कार्बोनेट (धावन सोडा) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है लिहाजा इसका इस्तेमाल कपड़े धोने में होता रहा है।वैसे तो मुझे कभी इसके उपयोग की आवश्यकता नहीं पड़ी, लेकिन बचपन में इससे कपड़े धुलते हुये खूब देखा हूं।बाकी आप नहीं देखे हैं तो इसका मतलब यह मत निकाल लीजिये कि ऐसी चीज दुनिया में होती ही नहीं।
पिछले दिनों डिस्कवरी चैनल के मसहूर कार्यक्रम मैन वर्सेज वाइल्ड में बेयर ग्रिल्स से अपने बचपन की यादों को साझा करते हुये जब मोदी ने कहा कि एक सामान्य परिवार में जन्म लेने के कारण उन्हें साबुन इत्यादि दुर्लभ थे।लिहाजा वह नहाने तथा कपड़े धोने के लिये मैदान में ओस की बूंदें पड़ने के बाद तैयार हुई मिट्टी की पपड़ी को इकट्ठा कर के लाते थे और उसी से कपड़े धोते थे।इसके बाद सोशल मीडिया पर शहरी बुद्धिजीवियों के बीच एक नयी बहस शुरू हो गयी है कि यह कैसे हो सकता है? बहरहाल, शहरी बुद्धिजीवियों ने जिस चीज को नहीं देखा है तो यह एक प्रकार से शास्वत सत्य मान लिया जाता है कि उस तरह की चीजें दुनिया में होती ही नहीं हैं।मतलब कुएं के मेढ़क ने बाहर की दुनिया नहीं देखी तो वह बस यही गाता रहता है कि "इतना सा ही है संसार।" बाकी जो तीस-चालिस वयवर्ग के हैं और जिन्होंने ग्रामीण परिवेश को जीया है वह मोदी की उस बात को आसानी से समझते हैं कि वह रेह के बारे में बात कर रहे हैं।कुछ सालों पहले तक भूगोल और कृषि विज्ञान में भी इसे सहज ही पढ़ने को मिल जाया करता था।अब इसे पढ़ाया जाता है या नहीं, यह मुझे नहीं पता लेकिन साहित्य में रुचि रखने वाले जायसी के पदों में इसे जरुर पढ़ सकते हैं।जायसी,पद्मावत के स्तुतीखंड में लिखते हैं कि "जावत खेह रेह दुनियाई । मेघबूँद औ गगन तराई"फिर इसी में आगे और लिखते हैं कि,"जँह जँह भूमि जरी भइ रेहू । बिरह के बाह भई जनु खेहू।"सिर्फ जायसी ही नहीं बल्कि विद्यापति भी लिखते हैं कि,"नव जल- धर तर चमकए रे जनि बीजुरि रेह।" फिर अगर साहित्य से बाहर निकल कर कुछ और तथ्यों की ओर बढ़ा जाय तो 1876 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले में नहरों द्वारा सिंचाई वाले क्षेत्रों में लवणों की उत्पत्ति के कारणों का पता लगाने, इनके वैज्ञानिक विश्लेषण एवं प्रायोगिक समाधान हेतु ‘भारतीय रेह समिति’ का गठन किया गया था जिसके निदेशक, प्रख्यात वनस्पति वैज्ञानिक राबर्ट्स बनाये गये।दरअसल उस दौर में नहरों के निर्माण के बाद एक मिथक बहुत तेजी से फैल चुका था कि इनके पानी के कारण ही खेतों में रेह बनती है।बाद में 1897 में बोएल्कर द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अध्ययन का शुभारंभ हुआ और इम्पीरियल कृषि रसायनज्ञ जे. डब्लू. लीथर (भारतीय मृदा विज्ञान के पिता) ने इन मृदाओं का विस्तृत रूप से अध्ययन करके इस मिथक को तोड़ा था। वास्तव में उत्तरी भारत में रेह बोली जाने वाली ऊसर मिट्टी को लोना, शोरा, रेहटा, क्षार एवं खार के नाम से भी जाना जाता है। वहीं पंजाब एवं दिल्ली में लवणीय मिट्टी को ‘थर’ एवं क्षारीय को ‘रक्कर’ तथा ‘बारा या वारी’ के नाम से जाना जाता है।ऊसर भूमियों में घुलनशील लवणों या विनिमय सोडियम की अधिकता पायी जाती है। ये घुलनशील लवण वाष्पीकरण प्रक्रिया द्वारा धरातल पर एकत्र होते रहते हैं, परिणामस्वरूप मिट्टी की ऊपरी सतह सफेद दिखाई पड़ने लगती है।यह सफेद परत जमीन के उपर पपड़ी के रुप में इकट्ठा होती है जिसे रेह कहा जाता है। मृदा घोल में इन लवणों की सांद्रता बढ़ जाने के कारण पौधे मिट्टी से जल तथा पोषक तत्व सुगमता से नहीं ले पाते जिसका पौधों पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। सोडियम कार्बोनेट की अधिकता से मृदा की भौतिक दशा अत्यंत खराब हो जाती है। साथ ही मृदा का पी एच भी काफी बढ़ जाता है जो पौधों के लिये जानलेवा साबित होता है।चूंकि इस मिट्टी में सोडियम कार्बोनेट (धावन सोडा) प्रचुर मात्रा में पाया जाता है लिहाजा इसका इस्तेमाल कपड़े धोने में होता रहा है।वैसे तो मुझे कभी इसके उपयोग की आवश्यकता नहीं पड़ी, लेकिन बचपन में इससे कपड़े धुलते हुये खूब देखा हूं।बाकी आप नहीं देखे हैं तो इसका मतलब यह मत निकाल लीजिये कि ऐसी चीज दुनिया में होती ही नहीं।

Comments
यदि कोई बात हम नहीं जानते है तो इसका मतलब यह नही की वो बात सत्य नहीं है। सत्य को जानने के बाद सत्य पर शंका नही होती।
धन्यवाद।
शुभकामनाये।
Post a Comment
अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद