मेरा नाम आजाद है अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद और स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है बाल गंगाधर तिलक की जयंती पर नमन उन अमर शहीदों को
स्वाधीनता संघर्ष में स्वदेशी और स्वराज्य की दीपशिखा को प्रज्वल्लित करने वाले क्रांतिपुरुष स्वदेशीआंदोलन के जनक स्वराज्य के प्रणेता अमर शहीद #लोकमान्यबालगंगाधरतिलक एवं आजादी के महानायक माँ भारती के सपूत अमर शहीद #चंद्रशेखरआजाद जी के जन्म दिवस पर शत् शत् नमन। #ChandraShekherAzad आज भारत के समाज सुधारक और स्वतन्त्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक की जयंती है, इनका कथन "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" स्वतंत्रता-सेनानियों का उद्घोष बन गया था। इन्हें आदर से "लोकमान्य" भी कहा जाता था। भारत के इस वीर पुरुष को इनकी जयंती पर भावभीनी श्रद्धांजलि *लोकमान्य जी की कलम अंग्रेजो के तोप और तलवारो पर भारी थी* *इसी कलम ने अंग्रेजो द्वारा सम्प्रदाय के नाम पर भारत को बांटने की साजिश को नाकाम कर दिया था* *ऐ कलम उन शहीदों को कर तू नमन जो तिरंगा कफन सर सजा के चले* देश के पहले राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने वाले बाल गंगाधर तिलक को लोग “लोकमान्य” की उपाधि देते थे। देश को आजाद कराने और जनता की सेवा के लिए उन्होंने कई अवस्मरणीय कार्य किए हैं। एक नेता होने के साथ वह एक प्रखर लेखक भी थे जिन्होंने “केसरी” जैसे क्रांतिकारी समाचार पत्र का संचालन किया था। बाल गंगाधर का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था। उनका बचपन का नाम केशव बाल गंगाधर तिलक था। बचपन से ही देशप्रेम की भावना उनमें कूटकूट कर भरी थी। प्रारम्भिक शिक्षा मराठी में प्राप्त करने के बाद गंगाधर को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने के लिए पूना भेजा गया। उन्होंने डेक्कन कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उनका सार्वजनिक जीवन 1880 में एक शिक्षक और शिक्षक संस्था के संस्थापक के रूप में आरम्भ हुआ। इसके बाद ‘केसरी’ और ‘मराठा’ जैसे समाचार पत्र उनकी आवाज के पर्याय बन गए। बाल गंगाधर तिलक समाज कल्याण के लिए शिक्षा पर जोर देते थे और इसके लिए उन्होंने खुद भी कई कदम उठाए थे। अपने समाचार पत्र के द्वारा उन्होंने अपनी आवाज और भारतीय संस्कृति को देश के कोने-कोने में फैलाने का निश्चय लिया था। 1890 में राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ते समय वह पार्टी के नरमपंथी विचारों के काफी खिलाफ थे। 1894 में तिलक के प्रयासों से गणेश पूजन को सार्वजनिक गणेशोत्सव का रुप मिला और 1895 में उन्होंने शिवाजी जयंती को शिवाजी स्मरणोत्सव के नाम से एक सामाजिक त्यौहार घोषित कर दिया। उसी समय से शिवाजी के जन्मदिवस और राज्याभिषेक पर भी समारोह मनाए जाने लगे। 1896-97 में महाराष्ट्र में प्लेग नामक एक महामारी फैली और इस दौरान लोकमान्य तिलक जी ने खुद आगे आते हुए राहत कार्य किया। लेकिन वह महामारी के दौरान हुए ब्रिटिश प्रशासन की उपेक्षापूर्ण रवैये की सख्त आलोचना भी करते रहे। राहत कार्यो के दौरान लोगों से बदसलूकी के लिए कुख्यात अंग्रेजी अफसर रैंड की हत्या के बाद ‘केसरी’ और ‘मराठा’ में छपे लेखों और आलोचनाओं के चलते तिलक पर राजद्रोह का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया और एक साल की कैद की सजा दी गई। जेल से छूटने के बाद तिलक समाचार पत्रों के प्रकाशन में पुन: लग गए। भारत के वाइसरॉय लॉर्ड कर्ज़न ने जब सन 1905 ई. में बंगाल का विभाजन किया, तो तिलक ने बंगालियों द्वारा इस विभाजन को रद्द करने की मांग का ज़ोरदार समर्थन किया और ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार की वक़ालत की, जो जल्दी ही एक देशव्यापी आंदोलन बन गया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम दल के लिए तिलक के विचार उग्र थे। नरम दल के लोग छोटे सुधारों के लिए सरकार के पास वफ़ादार प्रतिनिधिमंडल भेजने में विश्वास रखते थे। तिलक का लक्ष्य स्वराज था, छोटे-मोटे सुधार नहीं और उन्होंने कांग्रेस को अपने उग्र विचारों को स्वीकार करने के लिए राज़ी करने का प्रयास किया। इस मामले पर सन् 1907 ई. में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में नरम दल के साथ उनका संघर्ष भी हुआ। मामला इतना गरमाया कि नरम दल के नेताओं ने तिलक और उनके सहयोगियों को पार्टी से बाहर कर दिया। राष्ट्रवादी शक्तियों में फूट का लाभ उठाकर सरकार ने तिलक पर राजद्रोह और आतंकवाद फ़ैलाने का आरोप लगाकर उन्हें छह वर्ष के कारावास की सज़ा दे दी। कैद से वापस आकर 1914 में तिलक ने दुबारा सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेना शुरु किया। 1916-18 में ऐनी बेसेंट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ अखिल भारतीय होम रुल लीग की स्थापना की। इसी दौरान वह दुबारा कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़े। “स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा” के नारे के साथ बाल गंगाधर तिलक ने इंडियन होमरूल लीग की स्थापना की। सन् 1916 में मुहम्मद अली जिन्ना के साथ लखनऊ समझौता किया, जिसमें आज़ादी के लिए संघर्ष में हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रावधान था। अपने राजनैतिक कार्यों से अधिक तिलक अपने समाज सेवा के कार्यों के लिए जनता में प्रसिद्ध थे। लोग उन्हें अपना नेता मानते थे। शिक्षा को समाज कल्याण का एक अहम हिस्सा मानने वाले तिलक ने डक्कन एजुकेशन सोसाइटी का गठन किया जिसके सदस्यों का मुख्य कार्य शिक्षा को फैलाना था। देश के इस महान नेता ने 01 अगस्त, 1920 को अपनी आखिरी सांसें लीं। उनकी मौत से दुखी होकर महात्मा गांधी ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता और भारतीय क्रांति के जनक की उपाधि दी थी। आज हमारे बीच लोकमान्य तिलक नहीं हैं लेकिन उनकी शिक्षा और उनके वचन आज भी हर भारतवासी को जोश से भर देते हैं। *है वही शूरमा इस जग में जो अपनी राह बनाता है कोई चलता है पदचिन्हों पर कोई पदचिन्ह बनाता है* हमारे सुनहरे भविष्य के लिए अपना वर्तमान बलिदान करने वाले लोकमान्य जी को उनके जन्म दिवस पर शत् शत् नमन ************ *खुश रहो खुश रहो अहले वतन* *हम अपना फ़र्ज़ निभा के चले* *कभी बुझने न देना उस आग को* *आग सीनों में हम जो लगा के चले* ... *क्या हुआ नींद आयी जो हम सो गए* *हम तो सारे वतन को जगा के चले* *महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद जी को जयंती पर शत्-शत् नमन* *कैसे बने 'आज़ाद'* 1921 में जब महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन प्रारंभ किया तो उन्होंने उसमे सक्रिय योगदान किया। चंद्रशेखर भी एक दिन धरना देते हुए पकड़े गये। उन्हें पारसी मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट की अदालत में पेश किया गया। मि. खरेघाट बहुत कड़ी सजाएं देते थे। उन्होंने बालक चंद्रशेखर से उसकी व्यक्तिगत जानकारियों के बारे में पूछना शुरू किया - "तुम्हारा नाम क्या है?" "मेरा नाम आज़ाद है।" "तुम्हारे पिता का क्या नाम है?" "मेरे पिता का नाम स्वाधीन है।" "तुम्हारा घर कहां पर है?" "मेरा घर जेलखाना है।" मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट इन उत्तरों से चिढ़ गए। उन्होंने चंद्रशेखर को पन्द्रह बेंतों की सजा सुना दी। उस समय चंद्रशेखर की उम्र केवल चौदह वर्ष की थी। जल्लाद ने अपनी पूरी शक्ति के साथ बालक चंद्रशेखर की निर्वसन देह पर बेंतों के प्रहार किए। प्रत्येक बेंत के साथ कुछ खाल उधड़कर बाहर आ जाती थी। पीड़ा सहन कर लेने का अभ्यास चंद्रशेखर को बचपन से ही था। वह हर बेंत के साथ "महात्मा गांधी की जय" या "भारत माता की जय" बोलते जाते था। जब पूरे बेंत लगाए जा चुके तो जेल के नियमानुसार जेलर ने उसकी हथेली पर तीन आने पैसे रख दिए। बालक चंद्रशेखर ने वे पैसे जेलर के मुंह पर दे मारे और भागकर जेल के बाहर हो गया। इस पहली अग्नि परीक्षा में सम्मानरहित उत्तीर्ण होने के फलस्वरूप बालक चंद्रशेखर का बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में नागरिक अभिनन्दन किया गया। अब वह चंद्रशेखर आजाद कहलाने लगा। बालक चंद्रशेखर आजाद का मन अब देश को आजाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रान्ति की ओर मुड़ गया। उस समय बनारस क्रान्तिकारियों का गढ़ था। वह मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के सम्पर्क में आये और क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गये। क्रान्तिकारियों का वह दल "हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ" के नाम से जाना जाता था। *बचपन से ही साहसी थे आजाद* एक आदिवासी ग्राम भावरा के अधनंगे आदिवासी बालक मिलकर दीपावली की खुशियां मना रहे थे। किसी बालक के पास फुलझड़ियां थीं, किसी के पास पटाखे थे और किसी के पास मेहताब की माचिस। बालक चंद्रशेखर के पास इनमें से कुछ भी नहीं था। वह खड़ा–खड़ा अपने साथियों को खुशियां मनाते हुए देख रहा था। जिस बालक के पास मेहताब की माचिस थी, वह उसमें से एक तीली निकालता और उसके छोर को पकड़कर डरते–डरते उसे माचिस से रगड़ता और जब रंगीन रौशनी निकलती तो डरकर उस तीली को जमीन पर फेंक देता था। बालक चंद्रशेखर से यह देखा नहीं गया, वह बोला जिस बालक के पास मेहताब की माचिस थी, उसने वह चंद्रशेखर के हाथ में दे दी और कहा - "जो कुछ भी कहा है, वह करके दिखाओ तब जानूं।" बालक चंद्रशेखर ने माचिस की सारी तीलियां निकालकर अपने हाथ में ले लीं। वे तीलियां उल्टी–सीधी रखी हुई थीं, अर्थात कुछ तीलियों का रोगन चंद्रशेखर की हथेली की तरफ भी था। उसने तीलियों की गड्डी माचिस से रगड़ दी। भक्क करके सारी तीलियां जल उठीं। जिन तीलियों का रोगन चंद्रशेखर की हथेली की ओर था, वे भी जलकर चंद्रशेखर की हथेली को जलाने लगीं। असह्य जलन होने पर भी चंद्रशेखर ने तीलियों को उस समय तक नहीं छोड़ा, जब तक की उनकी रंगीन रौशनी समाप्त नहीं हो गई। जब उसने तीलियां फेंक दीं तो साथियों से बोला ********************************************************************** *चंद्रशेखर आजाद को यूं मिला नाम* ख्यात क्रांतिकारीचंद्रशेखर आज़ाद का जन्म मध्यप्रदेश के भाभरा (अलीराजपुर जिला) में 23 जुलाई, 1906 को सीताराम तिवारी और जगरानी देवी के यहां हुआ था। हालांकि, स्वतंत्रता संग्राम की एक घटना से उन्हें नया नाम मिला चंद्रशेखर आज़ाद। बचपन में ही उनमें देशप्रेम की भावना जग गई थी। गांधीजी ने जब असहयोग अांदोलन छेड़ा तो आज़ाद और उनके साथियों ने किसी भी तरीके से देश को स्वतंत्र कराने का संकल्प ले लिया। हनुमानजी के परम भक्त आज़ाद के मन में हर वक्त एक ही ख्याल रहता कि देश को कैसे आजाद कराएं। गांधीजी के असहयोग आंदोलन ने पूरे देश को आंदोलित कर दिया था। आज़ाद उनके साथी भी पूरे जोश के साथ इसमें योगदान देने लगे। उस समय वे बनारस में थे। आंदोलन के दौरान किशोर उम्र के आजाद अपनी पीठ पर आंदोलन संबंधी पर्चे लगाकर किसी सरकारी दफ्तर या थाने की दीवार से लगकर खड़े हो जाते और थोड़ी देर बाद वहां से चले जाते। वह पर्चा वहां चिपक जाता। इस तरह वह आंदोलन का काम भी करते और किसी को पता भी नहीं चलता। आखिरकार एक दिन पुिलस ने उन्हें ऐसा करते हुए पकड़ ही लिया। जब उन्हें कोर्ट में पेश किया तो न्यायाधीश ने उनसे नाम पूछा। किशोर चंद्रशेखर ने निर्भीकता से उत्तर दिया, 'आज़ाद'। उनके दुस्साहस से चिढ़कर अंग्रेज न्यायाधीश ने उनकी पीठ पर 15 बेतें लगाने की सजा सुनाई। बेत के हर प्रहार के साथ आज़ाद जोर से नारा लगाते, 'भारत माता की जय', 'महात्मा गांधी की जय'। इस घटना के बाद आज़ाद नाम उनके साथ जुड़ गया। वे प्राय: बड़े जोश के साथ ये पंक्तियां बोला करते थे, 'दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे। आज़ाद रहे हैं, आज़ाद ही रहेंगे।' स्वदेशी रक्षक
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स्वाधीनता संघर्ष में स्वदेशी और स्वराज्य की दीपशिखा को प्रज्वल्लित करने वाले क्रांतिपुरुष स्वदेशीआंदोलन के जनक स्वराज्य के प्रणेता अमर शहीद #लोकमान्यबालगंगाधरतिलक एवं आजादी के महानायक माँ भारती के सपूत अमर शहीद #चंद्रशेखरआजाद जी के जन्म दिवस पर शत् शत् नमन।
#ChandraShekherAzad
आज भारत के समाज सुधारक और स्वतन्त्रता सेनानी बाल गंगाधर तिलक की जयंती है, इनका कथन "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा" स्वतंत्रता-सेनानियों का उद्घोष बन गया था।
इन्हें आदर से "लोकमान्य" भी कहा जाता था। भारत के इस वीर पुरुष को इनकी जयंती पर भावभीनी श्रद्धांजलि
*लोकमान्य जी की कलम अंग्रेजो के तोप और तलवारो पर भारी थी*
*इसी कलम ने अंग्रेजो द्वारा सम्प्रदाय के नाम पर भारत को बांटने की साजिश को नाकाम कर दिया था*
*ऐ कलम उन शहीदों को कर तू नमन जो तिरंगा कफन सर सजा के चले*
देश के पहले राष्ट्रीय नेता के रूप में उभरने वाले बाल गंगाधर तिलक को लोग “लोकमान्य” की उपाधि देते थे। देश को आजाद कराने और जनता की सेवा के लिए उन्होंने कई अवस्मरणीय कार्य किए हैं। एक नेता होने के साथ वह एक प्रखर लेखक भी थे जिन्होंने “केसरी” जैसे क्रांतिकारी समाचार पत्र का संचालन किया था।
बाल गंगाधर का जन्म 23 जुलाई, 1856 को महाराष्ट्र के रत्नागिरी में हुआ था। उनका बचपन का नाम केशव बाल गंगाधर तिलक था। बचपन से ही देशप्रेम की भावना उनमें कूटकूट कर भरी थी। प्रारम्भिक शिक्षा मराठी में प्राप्त करने के बाद गंगाधर को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने के लिए पूना भेजा गया। उन्होंने डेक्कन कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उनका सार्वजनिक जीवन 1880 में एक शिक्षक और शिक्षक संस्था के संस्थापक के रूप में आरम्भ हुआ। इसके बाद ‘केसरी’ और ‘मराठा’ जैसे समाचार पत्र उनकी आवाज के पर्याय बन गए।
बाल गंगाधर तिलक समाज कल्याण के लिए शिक्षा पर जोर देते थे और इसके लिए उन्होंने खुद भी कई कदम उठाए थे। अपने समाचार पत्र के द्वारा उन्होंने अपनी आवाज और भारतीय संस्कृति को देश के कोने-कोने में फैलाने का निश्चय लिया था। 1890 में राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ते समय वह पार्टी के नरमपंथी विचारों के काफी खिलाफ थे।
1894 में तिलक के प्रयासों से गणेश पूजन को सार्वजनिक गणेशोत्सव का रुप मिला और 1895 में उन्होंने शिवाजी जयंती को शिवाजी स्मरणोत्सव के नाम से एक सामाजिक त्यौहार घोषित कर दिया। उसी समय से शिवाजी के जन्मदिवस और राज्याभिषेक पर भी समारोह मनाए जाने लगे।
1896-97 में महाराष्ट्र में प्लेग नामक एक महामारी फैली और इस दौरान लोकमान्य तिलक जी ने खुद आगे आते हुए राहत कार्य किया। लेकिन वह महामारी के दौरान हुए ब्रिटिश प्रशासन की उपेक्षापूर्ण रवैये की सख्त आलोचना भी करते रहे। राहत कार्यो के दौरान लोगों से बदसलूकी के लिए कुख्यात अंग्रेजी अफसर रैंड की हत्या के बाद ‘केसरी’ और ‘मराठा’ में छपे लेखों और आलोचनाओं के चलते तिलक पर राजद्रोह का आरोप लगाकर गिरफ्तार कर लिया गया और एक साल की कैद की सजा दी गई। जेल से छूटने के बाद तिलक समाचार पत्रों के प्रकाशन में पुन: लग गए।
भारत के वाइसरॉय लॉर्ड कर्ज़न ने जब सन 1905 ई. में बंगाल का विभाजन किया, तो तिलक ने बंगालियों द्वारा इस विभाजन को रद्द करने की मांग का ज़ोरदार समर्थन किया और ब्रिटिश वस्तुओं के बहिष्कार की वक़ालत की, जो जल्दी ही एक देशव्यापी आंदोलन बन गया।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नरम दल के लिए तिलक के विचार उग्र थे। नरम दल के लोग छोटे सुधारों के लिए सरकार के पास वफ़ादार प्रतिनिधिमंडल भेजने में विश्वास रखते थे। तिलक का लक्ष्य स्वराज था, छोटे-मोटे सुधार नहीं और उन्होंने कांग्रेस को अपने उग्र विचारों को स्वीकार करने के लिए राज़ी करने का प्रयास किया। इस मामले पर सन् 1907 ई. में कांग्रेस के सूरत अधिवेशन में नरम दल के साथ उनका संघर्ष भी हुआ। मामला इतना गरमाया कि नरम दल के नेताओं ने तिलक और उनके सहयोगियों को पार्टी से बाहर कर दिया। राष्ट्रवादी शक्तियों में फूट का लाभ उठाकर सरकार ने तिलक पर राजद्रोह और आतंकवाद फ़ैलाने का आरोप लगाकर उन्हें छह वर्ष के कारावास की सज़ा दे दी।
कैद से वापस आकर 1914 में तिलक ने दुबारा सक्रिय राजनीति में हिस्सा लेना शुरु किया। 1916-18 में ऐनी बेसेंट और मुहम्मद अली जिन्ना के साथ अखिल भारतीय होम रुल लीग की स्थापना की। इसी दौरान वह दुबारा कांग्रेस पार्टी के साथ जुड़े।
“स्वराज हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा” के नारे के साथ बाल गंगाधर तिलक ने इंडियन होमरूल लीग की स्थापना की। सन् 1916 में मुहम्मद अली जिन्ना के साथ लखनऊ समझौता किया, जिसमें आज़ादी के लिए संघर्ष में हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रावधान था।
अपने राजनैतिक कार्यों से अधिक तिलक अपने समाज सेवा के कार्यों के लिए जनता में प्रसिद्ध थे। लोग उन्हें अपना नेता मानते थे। शिक्षा को समाज कल्याण का एक अहम हिस्सा मानने वाले तिलक ने डक्कन एजुकेशन सोसाइटी का गठन किया जिसके सदस्यों का मुख्य कार्य शिक्षा को फैलाना था।
देश के इस महान नेता ने 01 अगस्त, 1920 को अपनी आखिरी सांसें लीं। उनकी मौत से दुखी होकर महात्मा गांधी ने उन्हें आधुनिक भारत का निर्माता और भारतीय क्रांति के जनक की उपाधि दी थी।
आज हमारे बीच लोकमान्य तिलक नहीं हैं लेकिन उनकी शिक्षा और उनके वचन आज भी हर भारतवासी को जोश से भर देते हैं।
*है वही शूरमा इस जग में जो अपनी राह बनाता है कोई चलता है पदचिन्हों पर कोई पदचिन्ह बनाता है*
हमारे सुनहरे भविष्य के लिए अपना वर्तमान बलिदान करने वाले लोकमान्य जी को उनके जन्म दिवस पर शत् शत् नमन
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*खुश रहो खुश रहो अहले वतन*
*हम अपना फ़र्ज़ निभा के चले*
*कभी बुझने न देना उस आग को*
*आग सीनों में हम जो लगा के चले*
...
*क्या हुआ नींद आयी जो हम सो गए*
*हम तो सारे वतन को जगा के चले*
*महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद जी को जयंती पर शत्-शत् नमन*
*कैसे बने 'आज़ाद'*
1921 में जब महात्मा गांधी के असहयोग आन्दोलन प्रारंभ किया तो उन्होंने उसमे सक्रिय योगदान किया। चंद्रशेखर भी एक दिन धरना देते हुए पकड़े गये। उन्हें पारसी मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट की अदालत में पेश किया गया। मि. खरेघाट बहुत कड़ी सजाएं देते थे।
उन्होंने बालक चंद्रशेखर से उसकी व्यक्तिगत जानकारियों के बारे में पूछना शुरू किया -
"तुम्हारा नाम क्या है?"
"मेरा नाम आज़ाद है।"
"तुम्हारे पिता का क्या नाम है?"
"मेरे पिता का नाम स्वाधीन है।"
"तुम्हारा घर कहां पर है?"
"मेरा घर जेलखाना है।"
मजिस्ट्रेट मि. खरेघाट इन उत्तरों से चिढ़ गए। उन्होंने चंद्रशेखर को पन्द्रह बेंतों की सजा सुना दी। उस समय चंद्रशेखर की उम्र केवल चौदह वर्ष की थी। जल्लाद ने अपनी पूरी शक्ति के साथ बालक चंद्रशेखर की निर्वसन देह पर बेंतों के प्रहार किए। प्रत्येक बेंत के साथ कुछ खाल उधड़कर बाहर आ जाती थी। पीड़ा सहन कर लेने का अभ्यास चंद्रशेखर को बचपन से ही था। वह हर बेंत के साथ "महात्मा गांधी की जय" या "भारत माता की जय" बोलते जाते था। जब पूरे बेंत लगाए जा चुके तो जेल के नियमानुसार जेलर ने उसकी हथेली पर तीन आने पैसे रख दिए। बालक चंद्रशेखर ने वे पैसे जेलर के मुंह पर दे मारे और भागकर जेल के बाहर हो गया।
इस पहली अग्नि परीक्षा में सम्मानरहित उत्तीर्ण होने के फलस्वरूप बालक चंद्रशेखर का बनारस के ज्ञानवापी मोहल्ले में नागरिक अभिनन्दन किया गया। अब वह चंद्रशेखर आजाद कहलाने लगा। बालक चंद्रशेखर आजाद का मन अब देश को आजाद कराने के अहिंसात्मक उपायों से हटकर सशस्त्र क्रान्ति की ओर मुड़ गया। उस समय बनारस क्रान्तिकारियों का गढ़ था। वह मन्मथनाथ गुप्त और प्रणवेश चटर्जी के सम्पर्क में आये और क्रान्तिकारी दल के सदस्य बन गये। क्रान्तिकारियों का वह दल "हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ" के नाम से जाना जाता था।
*बचपन से ही साहसी थे आजाद*
एक आदिवासी ग्राम भावरा के अधनंगे आदिवासी बालक मिलकर दीपावली की खुशियां मना रहे थे। किसी बालक के पास फुलझड़ियां थीं, किसी के पास पटाखे थे और किसी के पास मेहताब की माचिस। बालक चंद्रशेखर के पास इनमें से कुछ भी नहीं था। वह खड़ा–खड़ा अपने साथियों को खुशियां मनाते हुए देख रहा था। जिस बालक के पास मेहताब की माचिस थी, वह उसमें से एक तीली निकालता और उसके छोर को पकड़कर डरते–डरते उसे माचिस से रगड़ता और जब रंगीन रौशनी निकलती तो डरकर उस तीली को जमीन पर फेंक देता था।
बालक चंद्रशेखर से यह देखा नहीं गया, वह बोला - "तुम डर के मारे एक तीली जलाकर भी अपने हाथ में पकड़े नहीं रह सकते। मैं सारी तीलियां एक साथ जलाकर उन्हें हाथ में पकड़े रह सकता हूं।"
जिस बालक के पास मेहताब की माचिस थी, उसने वह चंद्रशेखर के हाथ में दे दी और कहा -
"जो कुछ भी कहा है, वह करके दिखाओ तब जानूं।"
बालक चंद्रशेखर ने माचिस की सारी तीलियां निकालकर अपने हाथ में ले लीं। वे तीलियां उल्टी–सीधी रखी हुई थीं, अर्थात कुछ तीलियों का रोगन चंद्रशेखर की हथेली की तरफ भी था। उसने तीलियों की गड्डी माचिस से रगड़ दी। भक्क करके सारी तीलियां जल उठीं। जिन तीलियों का रोगन चंद्रशेखर की हथेली की ओर था, वे भी जलकर चंद्रशेखर की हथेली को जलाने लगीं। असह्य जलन होने पर भी चंद्रशेखर ने तीलियों को उस समय तक नहीं छोड़ा, जब तक की उनकी रंगीन रौशनी समाप्त नहीं हो गई।
जब उसने तीलियां फेंक दीं तो साथियों से बोला- "देखो हथेली जल जाने पर भी मैंने तीलियां नहीं छोड़ीं।"उसके साथियों ने देखा कि चंद्रशेखर की हथेली काफी जल गई थी और बड़े–बड़े फफोले उठ आए थे। कुछ लड़के दौड़ते हुए उसकी मां के पास घटना की खबर देने के लिए जा पहुंचे। उसकी मां घर के अन्दर कुछ काम कर रही थी। चंद्रशेखर के पिता पंडित सीताराम तिवारी बाहर के कमरे में थे। उन्होंने बालकों से घटना का ब्योरा सुना और वे घटनास्थल की ओर लपके। बालक चंद्रशेखर ने अपने पिताजी को आते हुए देखा तो वह जंगल की तरफ़ भाग गया। उसने सोचा कि पिताजी अब उसकी पिटाई करेंगे। तीन दिन तक वह जंगल में ही रहा। एक दिन खोजती हुई उसकी मां उसे घर ले आई। उसने यह आश्वासन दिया था कि तेरे पिताजी तेरे से कुछ भी नहीं कहेंगे।
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*चंद्रशेखर आजाद को यूं मिला नाम*


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अजय कर्मयोगी गुरुकुलम अहमदाबाद